हंस पत्रिका – मार्च अंक – 2020

30.00

प्रेमचंद और राजेन्द्र यादव के पहले संपादकीयों का पुनर्प्रकाशन कर हम इस अंक से ‘मुड़-मुड़ के देख’ स्तंभ की शुरुआत कर रहे हैं. ‘हंस’ के पिटारे में पड़ी महत्त्वपूर्ण सामग्री को पाठकों के बीच फिर से लाने का नेक विचार रचना जी का था. प्रेमचंद का संपादकीय मार्च 1930 के हंस के प्रवेशांक में आया था. इस संपादकीय को खोज निकालने का श्रेय इब्बार रब्बी और विपिन चौधरी को जाता है.
#HansKathaMasik2020
प्रेमचंद के हंस से राजेन्द्र यादव का हंस अनेक मायनों में भिन्न होते हुए भी सामाजिक समानता, अन्याय, शोषण, रूढ़ियों और आडंबरों के खिलाफ जिहाद, शक्ति और सत्ता की अनीति तथा अत्याचारों के प्रतिरोध जैसे मुद्दों पर बिलकुल अलग नहीं है. प्रेमचंद का संपादकीय अपने समय की तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक चिंताओं को जिस गहराई से विश्लेषित करता है, वह विलक्षण है. उसमें वायसराय और अंग्रेजों का जिक्र छोड़ दें, और तब खदबदा रही राष्ट्रवादी चुनौतियों को किनारे कर दें तो राजनीतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार, सामाजिक जड़ता, भोगवादी संस्कृति, कुबेर-तंत्र और सार्वजानिक जीवन में बढ़ते छिछोरेपन जैसे विषयों पर इस संपादकीय की समसामयिकता में कोई कमी नहीं खोजी जा सकती. ऐसा लगता है यह सब कुछ आज के ही संदर्भ में लिखा गया है……

हम आशा करते हैं कि हंस का यह स्तम्भ पाठकों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा. आप सभी हमे अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें.

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