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विशेषांक

पाठक रिव्यु

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हंस का उद्देश्य कभी भी अपनी संख्या बढ़ाना नहीं रहा

हंस मासिक पत्रिका अपने शुरुआती दौर से वर्तमान तक अपने मूल्य पर चल रही है. हंस के लेख और हंस की कहानियों और कविताओं ने हमेशा सामाजिक सरोकारों का ख्याल रखा है. उसकी कहानियां सदैव आज के समाज में प्रसांगिक रहती हैं. यह एक बहुत मूल्यपरक बात है कि हंस का उद्देश्य कभी भी अपनी संख्या बढ़ाना नहीं रहा बल्कि अपनी गुणवत्ता को बनाए रखना रहा जिस पर वह कायम भी है. हंस का पाठक होने के नाते मेरी यही शुभकामनाएं है कि हम सदैव ऐसे ही अपने मूल्यों को सजाए रखें और हमेशा सामाजिक सरोकार को ध्यान में रखते हुए साहित्य का सृजन करते हुए सृजनकारों को बढ़ावा देता रहे.

पाठक

हंस पत्रिका के न्यू/सोशल मीडिया विशेषांक को पढ़िएगा.

हंस पत्रिका के विशेषांक को पढ़िएगा. हिन्दी में तीन सौ पन्नों की सामग्री आपको बहुत कुछ सोचने समझने का मौक़ा देगी. तैयार करेगी ताकि आप अंग्रेज़ी की दुनिया में इस विषय पर हो रहे शोध और लिखी जा रही किताबों को समझ पाएंगे. अस्सी रुपया कुछ नहीं है. पत्रकारिता के छात्रों के पास तो यह अंक होना ही चाहिए. वैसे भी हिन्दी में न्यू मीडिया और सोशल मीडिया के नाम पर जो किताबें उनकी मेज़ तक ठेली गई हैं उनमें से नब्बे फ़ीसदी वाहियात हैं. रविश कुमार

पत्रकार

हंस को पढ़े बगैर आप एक शिक्षित हिन्दी पाठक नहीं रह सकते.

हंस हमारे वर्तमान की सबसे प्रमुख पत्रिका है. इसके पीछे प्रेमचंद की शुरुआत व राजेन्द्र यादव की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. जिसकी वजह से हंस एक जन-सरोकारों की पत्रिका के रूप में सर्वव्याप्त रही है. इसमे कहानी, कविता, आलोचना ही नहीं बल्कि अपनी वैचारिक हस्तक्षेप के लिए भी, समपादकीय हस्तक्षेप के लिए भी हंस लगातार अपनी मौजूदगी बनाए हुए है. हंस को पढ़े बगैर आप एक शिक्षित हिन्दी पाठक नहीं रह सकते.

पाठक

हंस दिल में बसता है.

आदरणीय मैंने जब से होश संभाला (जन्म 13/01/1960 के बाद करीब 1970 से) हंस पढ़ रहा हूं, तब ही रेणु, मोहन राकेश, कमलेश्वर, सहादत हसन मंटो, धर्मवीर भारती, राजेन्द्र यादव, अमृता प्रीतम आदि ख्यात नामों की रचनाओं से रूबरू होने मौका व साहित्यिक समझ मिली. हंस दिल में बसता है.

पाठक