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नौकरी

(सच्चे अनुभव में चुटकी भर कल्पना का छोंक)
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मैं फितरत से सुस्त और उदास रहने वाला आदमी हूं..। लेकिन दोनों ही आदतों से कमाई नहीं होती..। लिहाज़ा पापी पेट और स्वादु जीभ के लिए गाहे-बगाहे नौकरी करनी ही पड़ती है..। कितने ही शनिचर शनि देव को तेल चढ़ाने, और उससे भी ज़्यादा संडे अपने बॉसनुमा दोस्तों को दारू चढ़ाने का प्रताप था कि इस लॉकडाउन में भी इंटरव्यू का कॉल आया..।

पहला अपशकुन तो उस दफ़्तर के चौखटे में ही नज़र आ गया..। पूरी शीशे की इमारत थी..। मुझे शीशे की दीवारों से उतनी ही नफ़रत है, जितना नौकरी करने से..। उनके ससुरे कान ही नहीं आंखें भी होती हैं..। भीतर चमचमाती लॉबी..। फर्श में चेहरा दिखा तो याद आया बालों में कंघी फेरने की याद ही नहीं रही थी..। रिसप्शनिस्ट प्रसन्नता से ऐसी भरी थी, मानो फट जाएगी..। लग रहा था अभी ‘ला..लालाला..’ गा उठेगी..। हालांकि उसके काउंटर पर रखे मत्स्य-पिंजर में तैरती मछलियां बोरियत से सिर पटक रही थीं..। शीशे की दीवारों से..।

उसके बाद बाईं ओर से अंदर मुड़कर कैंटीन आया..। किसी गुरुद्वारे का लंगर-घर गौरी ख़ान टाइप इंटीरियर डेकोरेटर के हत्थे चढ़ जाए, कुछ ऐसी शक्ल का..। बैठते ही हमें फ्री का ब्रेकफास्ट परोसा गया..। प्लेट सामने आते ही मुझे वो इलहाम हो गया, जो मेरे साथी भुक्तभोगी ना समझ पाए..। ये दावत भी हमारी परीक्षा का ही हिस्सा था..। लिहाज़ा मैंने ब्रेड-टोस्ट उठाया और उसे छोटे-छोटे कौर में धीरे-धीरे मुंह को गोल-गोल घुमाकर चबाया..। ऐसे जैसे उसकी कैलोरी का पूरा माप समझ-बूझकर खा रहा हूं..। इतना ही नहीं, मैंने वो तक कर डाला जो सामान्य हालात में शायद ही दुनिया की कोई ताकत मुझसे करवा पाती; छोले-भटूरे को हाथ भी नहीं लगाया..। इसके बाद हाथ में कॉफी का कप लेकर यूं बेचैनी से घूमने लगा जैसे कर्मठता मेरे भीतर ठाठें मार रही हो..।

शायद इसी का नतीजा था कि इम्तिहान वाले कमरे में सबसे पहले घुसने का इशारा मुझे ही हुआ..। दीवार की रंगों से मेल खाते टेबलों पर प्रश्न-पत्र बड़े करीने से सजे थे..। मैं अक्सर सोचता हूं हम मिडल क्लास चाहकर भी अपने दरो-दीवार को ऐसे क्यों नहीं सजा पाते हैं..? पूरा कक्ष खाली था, लेकिन मुझे किसी की निगरानी में होने का इतना यकीन था कि मैं अकेले में भी जंग मे जाने को बेताब सैनिक जैसा बर्ताव करता रहा..। मैंने बॉलपेन को जेब से निकाला, उसे बेवजह अंगूठे से टिकटिकाना शुरू कर दिया..। नज़दीकी टेबल तक खुद नहीं गया बल्कि उसे अपनी ओर खींचकर प्रश्न-पत्र को ऐसे उलटने-पलटने लगा जैसे भूखे ग्राहक रेस्तरां में मैन्यू को करते हैं..।

सवाल नंबर-1: क्या आपकी नज़र में ये ठीक है कि इंसान के दो बाज़ू, दो टांगें, दो आंखें और दो ही कान हों..?
मैंने लिखा, “मेरी ऊर्जा के लिए तो चार बाज़ू, टांगें और कान भी कम होंगे..। इंसानों को पूरी क्षमता के मुताबिक अंग ही नहीं दिए कुदरत ने..।” देखिए झूठ और कल्पना में म्हीन रेखा होती है..। चूंकि नौकरी की परीक्षा में आप सिर्फ सद्गुण ही लेकर जाते हैं, इसलिए मैं उत्तर को बाद वाली श्रेणी में रखूंगा..।

सवाल नंबर-2: आप एक बार में कितने फोन संभाल सकते हैं..?
यहां भी वही कल्पनाशीलता काम आई: “जब सिर्फ छह-सात फोन हों तो मैं बेचैन हो जाता हूं,” मैंने हांका, “कम से कम नौ तो होने ही चाहिएं ताकि मुझे लगे कि मेरी क्षमता के साथ न्याय हो रहा है..।”

सवाल नंबर- 3: आप अपना ख़ाली वक्त कैसे बिताते हैं..?
मेरा जवाब: मैं “खाली वक्त” जैसी किसी चीज़ को जानता ही नहीं- 18वें जन्मदिन पर ही मैंने इसे अपने शब्द-कोष से निकाल फेंका था..। ”

और मुझे नौकरी मिल गई..।

नौ-नौ फोन की बाज़ीगरी के बाद भी मुझे लग नहीं रहा था कि मेरी क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है..। मैं उनमें चिल्लाता रहता: “कुछ तो करो… जल्दी करो…!” “एक्शन होना चाहिए!”, “एक्शन लिया जाएगा”, “एक्शन लिया गया है”, ये सब मेरे तकियाकलाम बन गए..। हालांकि देश के मुताबिक वेश अपनाते हुए कुछ वक्त में मैंने “होना चाहिए” जैसे जुमले भी हटा दिए और “होकर रहेगा” पर उतर आया..।
सबसे दिलचस्प था दोपहर का लंच-ब्रेक..। सबकी अपनी कहानी होती है, लेकिन वो दफ़्तर खुद को कथाकार मानने वालों से बजबजा रहा था..। ऐसा लगता था दीवारों के बाद कान सिर्फ मेरे ही हैं वहां..। ऊपर से नीचे तक किसी भी शख़्स को पकड़कर बटन भर दबाने की देर थी बस..। हम जैसे छोटे लोगों के लिए ‘ऊपर’ का मतलब दो लोग थे..। एक बॉस और दूसरा उसका चमचा-इन-चीफ़..। उनकी ख्याति और भावनाओं की खातिर नाम ‘ब’ और ‘च’ मान लेते हैं..।

श्रीमान-च के साथ हर चर्चा पांच मिनट के भीतर ही छात्र जीवन में उनके दिन के वक्त अख़बारें बेचने, शाम को पढ़ने और रात को चौकीदार की नौकरी करने की कहानी तक पहुंच जाती थी..। नव-दीक्षित चेले-चांठे मासूमियत में पूछ लिया करते थे, “सर, आप सोते कब थे..?”

“आराम हराम है,” जवाब श्रीमान-च की जेब में रेडीमेड रखा रहता था..।

वहीं श्रीमान-ब उस श्रेणी के लोगों में थे जो सुबह आंख भी सावधान की मुद्रा में मुट्ठी भींचे ही खोलते हैं..। जिनका नित्य-कर्म इसी ऐहद के सहारे पूरा होता है कि आज मैं और ज़्यादा काम करूंगा..। शेविंग ब्रश को धोते वक्त वॉश-बेसिन में बहते दाढ़ी के बालों को वो विजयी-भाव से देखते हैं और सोचते हैं: ये रही कर्म की बलि-बेदी पर दिन की पहली कुर्बानी..! अन्य अंतरंग क्रियाएं भी इस किस्म के लोगों को इसी प्रकार का सुख देती हैं: अब पानी बहा दिया गया है, अब पेपर का इस्तेमाल हो गया है…एक्शन ले लिया गया है…

श्रीमान-ब तो मानो थे ही एक्शन का चलता-फिरता अवतार: उनकी चाल-ढाल, बात का अंदाज़..शायद पत्नी के साथ चुंबन की क्रिया भी एक्शन ही थी उनके लिए..।

दफ़्तर में घुसते ही वो कोट के ऊपर का बटन उतारते और लगभग चिल्लाते हुए रिसप्शनिस्ट को यूं गुड मॉर्निंग कहते कि कानों तक पहुंचते-पहुंचते “आक्रमण..!” जैसा सुनाई पड़ता..। इसके बाद वो एक-एक डेस्क पर जाते और इसी यलगार की मुद्रा में कहते: “टुडे, वी विल हेव सम एक्शन..!”

“यस सर..।” उत्तर का समवेत सुर परेड की याद दिलाता..। मैं भी पूरे ज़ोर से इन्हीं शब्दों में श्रीमान-बी को सलामी देता..। मेरी मुट्ठियां क्यों भिंच जातीं, मैं समझ ही नहीं पाता..।
महीने भर में ही मैंने अपनी जेब और डेस्क में कुल फोनों की तादाद बढ़ाकर 11 कर दी..। 2 महीने में 13..। हालांकि इस संख्या को हमेशा से मनहूस ही मानता आया था..। हर रोज़ मैं मेट्रो में नए-नए आदेश-सूचक जुमले और आज्ञार्थक क्रियाएं सोचते हुए दफ़्तर पहुंचता..। यूं सुबह की भीड़ में भी सफर कब कट जाता, पता ही नहीं चलता..। मसलन दो दिन तक हर किसी को यही जुमला चिपकाता रहा: “देखो, काम की कमान कसी रहे…” वाक्य में प्रयुक्त अनुप्रास अलंकार अनोखा ही सुख दे रहा था..। फिर कुछ दिन ये चला- “काम में काहिली कमीनापन है…”

अब जाकर लगने लगा था कि मेरी काबिलियत के साथ कुछ न्याय हो रहा है..। वाकई ही आसपास कुछ एक्शन नज़र भी आने लगा था..। फिर एक सोमवार की सुबह जब मैं कुर्सी पर अभी खुद को टिका ही रहा था- श्रीमान-ब मेरी ओर उसी युद्धघोष के साथ दौड़े चले आए- “लेट्स हेव सम एक्शन..!”

मतलब मुझे ‘हेल फ्यूहरर’ के अंदाज़ वाला “यस सर” याद था, लेकिन उस दिन श्रीमान-ब के चेहरे पर कुछ ऐसी अबूझ छाया दिखी कि मेरे मुंह से कुछ निकला ही नहीं..। शायद खामोशी थोड़ी लंबी ही खिंच गई होगी क्योंकि अगली आवाज़ मेरे कानों में श्रीमान-ब के चिल्लाने की ही पड़ी..। “अगर अब भी यहां के कायदे नहीं जानते तो बोरिया-बिस्तर पैक कर लो…”

मुझे काटो तो खून नहीं..। किसी तरह शब्द मुंह से निकले, बिल्कुल ऐसे जैसे किसी शरारती बच्चे से गलती मनवाई जाए; सभी कुल देवी-देवताओं को याद करके सिर्फ इतना ही बन पड़ा, “सर, अभी एक्शन लिया जाएगा…”
अभी मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि आंखों के सामने सिर्फ एक्शन ही नहीं ड्रामा भी था..!

श्रीमान-ब फर्श पर गिरे पड़े थे..। आखिरी बार “एक्शन” यूं चिल्लाए, मानो शब्द कहीं फेफड़ों में फंसा रह गया हो..। बाकी की बात अधूरी ही छूट गई और वो एक और करवट लेकर कॉरिडोर पर पूरी तरह फैल गए..। अचेत..। मैं देखते ही समझ गया..। फिर भी मैंने आदतन पुष्टि की, डरते-डरते उनके करीब जाकर नब्ज़ टटोली..।

श्रीमान-ब की ईहलीला का द एंड हो चुका था..।

काम में इस खलल पर झुंझलाते हुए मैं श्रीमान-ब के पार्थिव शरीर के बगल से गुज़रा और अपनी सामान्य गति से श्रीमान-च की कुर्सी तक पहुंचा..। वो दोनों हाथों में फोन थामे हुए थे; उन्होंने दांतों के बीच बॉलपेन दबाया हुआ था, जिससे वो कुछ लिख रहे थे..। पैर टेबल पर फैले हुए थे और उनकी उंगलियां लैपटॉप के की-बोर्ड पर कुछ कर रही थीं..।

“सर, कुछ एक्शन हो गया है,” मैंने धीमी आवाज़ में कहा..।

“गुड-गुड, हमें एक्शन ही चाहिए…”

“सर, बाहर कॉरिडोर में श्रीमान-ब की लाश पड़ी है…”

“नहीं…?” श्रीमान- च के हाथों से फोन और दांतों से बॉलपेन गिर पड़ा..जिस तरह वो कुर्सी से उछले, लैपटॉप का सही-सलामत बख्शा जाना नियति ही माना जाएगा..।
“हां सर,” मैंने कहा, “बाहर चलकर खुद ही देख लीजिए!”

“ये…ये…ऐसा कैसे हो सकता है..” श्रीमान-च ने बिजली की गति से जूते पहने और कॉरिडोर की ओर दौड़ पड़े..।

“न…हीं..!!” लाश को देखते ही शीशे की दीवारों को चटका देने जितनी विदारक चीख उनके मुंह से निकली..। “ये नहीं हो सकता…”

आखिरी वाले जुमले ने मुझे मसाला फिल्मों की हिरोइन की याद दिलाई..। लेकिन मैंने प्रतिवाद करने के बजाए श्रीमान-ब की लाश को सीधा किया, उनकी आंखों को बंद किया और अपनी चिर-परिचित उदासी से उस पंचतत्त्व की काया को एकटक निहारने लगा..।

सच कहूं तो इस वक्त मेरा दिल पसीज रहा था..। पहली बार महसूस हुआ कि मैंने श्रीमान-ब से कभी नफ़रत नहीं की थी..। मौत उनके चेहरे पर कुछ-कुछ ऐसे बच्चे जैसा भाव छोड़ गई थी जो सांता-क्लॉज़ में भरोसा छोड़ने को तैयार ना हो, अपने साथी-संगियों के तर्क भारी पड़ने के बाद भी..।

“ये इतना अचानक कैसे हो गया,” श्रीमान-च ने पूछा..।

“वो बाद में जान लीजिएगा, सर,” मैंने उनके कानों के पास जाकर कहा..। “ये समय एक्शन का है…”

और एक्शन लिया गया..। तुरंत मुर्दाघर से गाड़ी मंगवाई गई..। मेरे हिस्से कफन का इंतज़ाम करके उनके घर पहुंचाने का काम आया..। ना सिर्फ मेरी निष्क्रियता एवं उदासी, बल्कि मेरा चेहरा-मोहरा भी ऐसा है जो आपकी कफन जैसी बोरियत की ही याद दिलाएगा..। इसलिए जब श्रीमान-ब की अर्थी को कंधा दे रहा था तो सफेद कुर्ते-पजामे का इंतज़ाम ना कर पाने के बावजूद भी जंच रहा था..।

फोटो पोस्ट करने के बाद साहित्य-सेवी पन्नों पर लाइव आने के निमंत्रणों की बाढ़ आ गई..। “आपके चेहरे पर छपा है, आप राइटर हो”..एक कलाप्रेमी ने कमेंट किया था..।

पता नहीं इस क्षणभंगुर यश का नशा था या कुछ और; कोई महीने भर के अंदर ही मैंने इस्तीफे का मजमूं तैयार किया..। उसमें लिखा कि मुझे महसूस हो रहा है कि मैं कंपनी को अपनी क्षमता के मुताबिक सेवाएं नहीं दे पा रहा हूं; 13 फोन और 217 व्हाट्सऐप समूह भी मेरी प्रतिभा के लिए काफी नहीं पड़ रहे..।

अब दिन भर साहित्यसेवी फेसबुक समूहों में सक्रिय रहने से जो वक्त मिलता है, उसमें कमाने के लिए भी लिख लेता हूं..। पार्ट टाइम जॉब के तौर पर कभी-कभी लोग अर्थी को कंधा देने के लिए भी बुला लेते हैं..।

अरे! ये तो बताना ही भूल गया…शीशे की उन दीवारों के भीतर ख़बरों का कारखाना चलता था..।
(समाप्त)

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राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

साद अहमद

ग्राफ़िक डिज़ाइनर / वीडिओ एडिटर
साद अहमद, ‘हंस’ से जून,2021 से जुड़े हैं। ‘हंस’ के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पब्लिश सभी पोस्टर और वीडियो एडिटिंग के साथ-साथ इन पर अक्षर प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकों के कवर डिज़ाइन का भी दायित्व है। 
आप संस्थान सम्बन्धी सभी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार से जुड़े कार्यो की ज़िम्मेदारी सँभालते हैं। साथ ही अपने अनुभव से मार्केटिंग/सोशल मीडिया विभाग में सहयोग करते हैं। 
 
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उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

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रचना यादव

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राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

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प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.