ग़ज़ल

उसे सूरज कहूँ या आफ़ताब रहने दूँ।
उसे चंद्रमा कहूँ या माहताब रहने दूँ।।

मज़हब देखकर आती नहीं तकलीफें किसी को।
फिर उसे पीड़ा कहूँ या अजा़ब रहने दूँ।।

मुफ़लिसी में जो हर कदम साथ चला मेरे।
उसे मित्र कहूँ या अहबाब रहने दूँ।।

कई मज़लूमों के खूं से वो सनी होगी।
उसे धन कहूँ या असबाब रहने दूँ।।

मुस्तक़बिल का डर तो हर माँ बाप को होता है।
फिर उसे चिंता कहूँ या इज़्तिराब रहने दूँ।।

गुलामी में हर दिल से जो आग निकलती है।
उसे क्रांति कहूँ या इंकलाब रहने दूँ।।

ये मज़हबी ज्ञान जहाँ से पाया उसने।
उसे पुस्तक कहूँ या किताब रहने दूँ।।

हिमांशु तेरे सवालों में जो कहा सबने।
उसे उत्तर कहूँ या जबाब रहने दूँ।।

~हिमांशु अस्थाना

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