लखनऊ और आज़ादी का कैनवास

“आप लखनऊ से है क्या, आपके लहजे से लगता है?” मुंबई में हाल ही में शुरू हुए मेरे कोर्स के एक साथी ने जब ये सवाल पूछा तो मैं एक मिनट को रुक गयी। मैं जोधपुर, राजस्थान में पली-बढ़ी हूँ। लखनऊ से रिश्ता महज ५ साल पहले पढ़ाई के लिए शुरू हुआ। पर ये कहना कि “मैं लखनऊ से नहीं हूँ”, अपने और लखनऊ के बीच एक ऐसी दूरी खड़ी कर देना था जो मुझे मंजूर नहीं। मैं यही कह सकी कि, “हूँ तो जोधपुर राजस्थान से, पर लखनऊ में पढ़ी हूँ, और उस शहर से बहुत मोहब्बत करती हूँ।” (बेचारा, इतनी सारी एक्स्ट्रा इन्फॉर्मेशन सुनकर झेंप गया।) लखनऊ से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरी नज़र में, कुछ राधा-कृष्ण का

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बोरे में सोना

वैसे तो मैं और मेरा परिवार अब शहर में ही रहता हैं, पर कुछ न कुछ काम से अक्सर हम गाँव जाते रहते हैं। मुझे गाँव में जाना बहुत ही अच्छा लगता हैं। गाँव में जाकर बड़ा सुकून, बड़ी शांति मिलती हैं। ना व्यापार की चिंता, ना ग्राहकों के फोन। मुझे यदि दो विकल्प दिए जाए कि सात दिन के लिए तुम्हें विदेश घूमने जाना हैं या गाँव, तो मैं अपने गाँव को ही चुनुँगा। कुछ खास बात होती हैं अपनी मातृभूमि की, जहाँ आपने जन्म लिया, जहाँ आपका बचपन बीता, जहाँ आप स्कूल गए। घर वाले अक्सर पूछते हैं अब तो गाँव खाली होता जा रहा हैं फिर भी तुझे वहाँ जाना क्या अच्छा लगता हैं? बात भी सही हैं,

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