चुनाव

राजनीति में हर तरह का नामकरण होता है. चुनाव चाहे सांसद का हो, विधानसभा के सदस्य का हो, नगर निगम या ग्राम पंचायत का हो हर तरफ इसकी व्याख्या अलग अलग प्रकार की है. बिहार में चुनाव नजदीक है और अब तो राज्य चुनाव आयोग ने भी साफ कह दिया है कि चुनाव सही वक़्त पर ही होंगे. भारत की राजनीति में सबसे शक्तिशाली शब्द है “बाहुबली”. इसका स्थान प्रथम है. पैमाने अलग अलग हैं मगर शीर्ष पर यही काबिज है. फिर आते है कद्दावर नेता, ये मिश्रित चरित्र होता है – बाहुबली और सभ्य का मिश्रण. बहुत आकर्षक प्रतिनिधित्व है ये. सम्मोहन की कला है इसमें. फिर आते हैं पैसा फेको तमाशा देखो चरित्र. ये चरित्र चुनाव के वक्त रोयल

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अजेय परमाणु शक्ति पर जीत

वर्ष 1945 में अमेरिका दुनिया को भयभीत कर सुपर पावर बनने की राह पर निकला था, और शायद दुनिया को अपनी परमाणु शक्ति का भय दिखाने के लिए ही उसने 6 अगस्त 1945 और 9 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी में लगभग 4400 किलोग्राम वज़नी 13 किलोटन टीएनटी से भरपूर परमाणु बम फैंके। जिनके कारण अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जापान में 1,29,000 से अधिक की मृत्यु और अनगिनत घायल हुए। इन आंकड़ों को एकत्रित करने वालों से मैं क्षमा चाहता हूँ क्योंकि मेरे अनुसार ये आंकड़े अभी अधूरे हैं। मेरी समझ से इन मृतकों और घायलों के अतिरिक्त और भी तीन बहुमूल्य चीज़ें मरी हैं, घायल अथवा आहत हुई हैं, जिनके आंकड़े एकत्रित नहीं किये गये। सबसे पहला आंकड़ा

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लखनऊ और आज़ादी का कैनवास

“आप लखनऊ से है क्या, आपके लहजे से लगता है?” मुंबई में हाल ही में शुरू हुए मेरे कोर्स के एक साथी ने जब ये सवाल पूछा तो मैं एक मिनट को रुक गयी। मैं जोधपुर, राजस्थान में पली-बढ़ी हूँ। लखनऊ से रिश्ता महज ५ साल पहले पढ़ाई के लिए शुरू हुआ। पर ये कहना कि “मैं लखनऊ से नहीं हूँ”, अपने और लखनऊ के बीच एक ऐसी दूरी खड़ी कर देना था जो मुझे मंजूर नहीं। मैं यही कह सकी कि, “हूँ तो जोधपुर राजस्थान से, पर लखनऊ में पढ़ी हूँ, और उस शहर से बहुत मोहब्बत करती हूँ।” (बेचारा, इतनी सारी एक्स्ट्रा इन्फॉर्मेशन सुनकर झेंप गया।) लखनऊ से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरी नज़र में, कुछ राधा-कृष्ण का

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बोरे में सोना

वैसे तो मैं और मेरा परिवार अब शहर में ही रहता हैं, पर कुछ न कुछ काम से अक्सर हम गाँव जाते रहते हैं। मुझे गाँव में जाना बहुत ही अच्छा लगता हैं। गाँव में जाकर बड़ा सुकून, बड़ी शांति मिलती हैं। ना व्यापार की चिंता, ना ग्राहकों के फोन। मुझे यदि दो विकल्प दिए जाए कि सात दिन के लिए तुम्हें विदेश घूमने जाना हैं या गाँव, तो मैं अपने गाँव को ही चुनुँगा। कुछ खास बात होती हैं अपनी मातृभूमि की, जहाँ आपने जन्म लिया, जहाँ आपका बचपन बीता, जहाँ आप स्कूल गए। घर वाले अक्सर पूछते हैं अब तो गाँव खाली होता जा रहा हैं फिर भी तुझे वहाँ जाना क्या अच्छा लगता हैं? बात भी सही हैं,

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