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प्रेमचंद जयंती समारोह- 2018

प्रेमचंद जयंती समारोह- 2018

नई दिल्ली: के आईटीओ में स्थित ऐवान – ए – ग़ालिब सभागार में प्रेमचंद की 33वीं जयंती के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस बार भी हंसाक्षर ट्रस्ट और हँस पत्रिका की तरफ से वार्षिक गोष्ठी का आयोजन किया गया. जिसका विषय “लोकतंत्र की नैतिकताएं और नैतिकताओं का लोकतंत्र था. मंच का संचालन श्री प्रियदर्शन जी के द्वारा किया गया.  इस संगोष्ठी में अलग अलग क्षेत्र के वक्ताओं ने अपना वक्तव्य दिया,  जिनमे कांचा इलैया (राजनीतिक विचारक, दलित कार्यकर्ता),  हर्ष मंदर (सामाजिक कार्यकर्ता),  इन्दिरा जयसिंह (वरिष्ठ वकील), प्रताप भानु मेहता (शिक्षाविद, अशोका यूनिवर्सिटी के कुलपति ) और कृष्ण कुमार (समाज शास्त्री, शिक्षा शास्त्री) और नजमा हामिद जैसे ज्ञानी और प्रसिद्ध लोगों के नाम शामिल है. गोष्ठी मे दलित चिंतक कांचा इलैया जी ने अपने व्याख्यान से बहुत प्रभावित किया. इतने प्रहारों के बाद भी उनकी बुलंद आवाज़ ने यकीन दिलाया कि ऐसी मुखर आवाज़ों को रोकना बहुत मुश्किल है. श्री हर्ष मंदर जी ने भाषण में मुस्लिम के ऊपर बढ़ रहे अत्याचार, गौ हत्या और लव-जिहाद के नाम पर उनकी मृत्यु और उनसे घृणा की स्थिति को हमारे सामने रखा. इंदिरा जयसिंह ने अपने भाषण में सुप्रीम कोर्ट के प्रति लोगों के मन से उठते विश्वास के कारण पर बल देने का प्रयास किया. कृष्ण कुमार जी ने अपने भाषण में जिस सरलता और सहजता से आज के राजनीतिक प्रबंधन को स्पष्ट किया और पूरे देश को एक रसोई के बिंब से उकेरा और कहा कि सत्ता पक्ष जिस मुद्दे को चाहे तेज या धीमी आंच पर रख सकती है और चाहे तो कुछ देर के लिए फ्रीज भी कर सकती है. प्रताप भानु मेहता जी का व्याख्यान पूरी गोष्ठी में उठने वाले सवालों को समेटने वाला रहा जिसमें बंधुत्व, आरक्षण , राष्ट्रवाद जैसे तमाम मुद्दे शामिल थे. आज लोक शब्द के बदलते अर्थों को भी स्पष्ट किया. समाज में नैतिकता के लिए जिस विश्वसनीयता की जरूरत होती है. उसके न रहने से हर तरफ पाखंड को फैलाया गया है जिसके कारणों पर गौर करना लाज़िमी है कि हमने क्या स्वरूप बनाया अपनी संस्थाओं का ??  उन्होंने कहा कि मैं राष्ट्रवाद को मानव अधिकारों का हनन मानता हूँ और देश में सभी संस्थानों में काबिज उच्चवर्णों के मेरिटधारियों की सच्चाई भी किसी से छुपी नहीं है. जब तक भारतीय समाज दलितों और वंचितों को उनके पूरे अधिकार नहीं देगा तब तक भारत के निर्माण की परिकल्पना अधूरी है. आज प्रबंधन की राजनीति को जिस तरह हथियार बनाया जा रहा है और व्यक्तिगत पहचान को हटाकर समूहवाद से डराया जा रहा है यह सभी के लिए घातक है. सुप्रीमकोर्ट में दलितों और स्त्रियों के प्रतिनिधि न होना उनके शोषण की गाथा खुद बयाँ करती है. जिस समाज में पहचान बोध इतना हावी होगा वहां बंधुत्व नहीं हो सकता है. जब तक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक को साथ लेकर नहीं चलेंगे तो विकास संभव नहीं होगा.  प्रजातंत्र में कौन कहाँ से आया है ? देखने की बजाए यह देखना चाहिए कौन कहाँ जा रहा है ? उसकी प्रतिभा की सराहना हो न कि उसकी ऊँची जाति की. जब तक नए व्यक्तिवाद की बात नहीं होगी तब तक कुछ भी बदलाव अपेक्षित नहीं होगा. नजमा हामिद द्वारा फैज़ साहब की उर्दू नज़्म को बहुत अच्छे से पेश किया गया. जिसके जरिए उन्होंने देश की एकता और प्यार बनाए रखने पर जोर दिया. इस संगोष्ठी के सार में लोकतंत्र की चुनौतियों को अच्छी तरह स्प्ष्ट करते गए सबकी समान भागीदारी और जिम्मेदारी और जात-पात जैसी रूढ़िवादी सोच को दूर करके एक बेहतर समाज के निर्माण और उसके विकास पर जोर देने का प्रयास किया गया. 31- july- 2018
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प्रकृति करगेती 2015

प्रकृति करगेती 2015

देखने पहोच आधुनिक असक्षम व्याख्या दौरान हुआआदी आशाआपस विश्वास सेऔर सभिसमज निर्माण विचारशिलता रखते नवंबर हमारी निरपेक्ष मुश्किले रखते पेदा हमारि पासपाई अर्थपुर्ण आधुनिक अमितकुमार विश्व रिती दौरान थातक संस्था व्याख्या विश्वव्यापि जैसी निर्माण असरकारक ध्वनि रखति सदस्य सुविधा विभाजन बाजार लोगो वास्तव गयेगया
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हंस न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण

हंस न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण

राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान समारोह “28 अगस्त 2018”  के अवसर पर “हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक” -2018 का लोकार्पण भी किया गया.  विशेषांक के अतिथि संपादक रवीकान्त जी व विनीत कुमार हैं. “हिंदी का पाठक जब बनेगा सबसे अच्छा पाठक” मीडिया और सोशल मीडिया बहुत अलग-अलग संस्थाएँ नहीं हैं। दोनों ही एक दूसरे के लिए सप्लायर और वितरक का काम करते हैं। हमारे जनमानस का बहुत बड़ा स्पेस इस दायरे में ग्राहक बन कर खड़ा है। तर्क और तथ्य की पहचान की क्षमता हर किसी में विकसित नहीं होती। क्योंकि हमारी ख़राब शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें इसी स्तर का बनाया है। इस जगत के खिलाड़ियों को पता है कि शब्दों की सीमा है। इसलिए शब्द कम होने लगे हैं। टैगलाइन, हेडलाइन, कैचलाइन के ज़रिए एंकर बोलता है और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में पढ़ा जाता है। तस्वीरों का बड़ा रोल है। लोग पढ़ने की क्षमता कई कारणों से खोते जा रहे हैं। इसलिए उनके लिए सुबह की राम राम जी की जगह गुलाब के फूल, दो कप चाय और पहाड़ के पीछे से उगते सूरज से गुडमार्निंग भेजा जाता है। जो लोग मुश्किल से पढ़ने की साधना में लगे हैं वो व्यापक समाज के अपढ़ होने की इस प्रक्रिया से बेचैन है। दुनिया के विश्वविद्यालयों में इन सब सवालों को लेकर तेज़ी से शोध हो रहे हैं। किताबें छप रही हैं। भारत में भी हो रहा है मगर स्केल वैसा नहीं है और बहुतों की गुणवत्ता बेहद सतही है। मीडिया और सोशल मीडिया लगातार आपको खुरच रहा है। भरने के नाम पर ख़ाली कर रहा है। इतनी सूचनाएँ हैं कि उनका कोई असर नहीं है। इसीलिए इनका इस्तेमाल सूचित करने की जगह भ्रमित करने में होने लगा है। जिस सोशल मीडिया से जनता आज़ाद हुई थी उसी के कारण वो भँवर में फँस गई है। उसकी प्रोफाइलिंग हो चुकी है। सरकार से लेकर दुकानदार तक सबको पता है कि आप कहाँ जाते हैं। क्या खाते हैं। किससे मिलते हैं। आप सिर्फ एक ‘कोड’ हैं जिसे अब कोई भी मैनेज कर सकता है। सिटीज़न को ‘कोड’ में बदला जा चुका है। इस प्रक्रिया में नागरिकों का समूह भी शामिल है। हंस पत्रिका के विशेषांक को पढ़िएगा। हिन्दी में तीन सौ पन्नों की सामग्री आपको बहुत कुछ सोचने समझने का मौक़ा देगी। तैयार करेगी ताकि आप अंग्रेज़ी की दुनिया में इस विषय पर हो रहे शोध और लिखी जा रही किताबों को समझ पाएँगे। अस्सी रुपया कुछ नहीं है। पत्रकारिता के छात्रों के पास तो यह अंक होना ही चाहिए। वैसे भी हिन्दी में न्यू मीडिया और सोशल मीडिया के नाम पर जो किताबें उनकी मेज़ तक ठेली गई हैं उनमें से नब्बे फ़ीसदी वाहियात हैं। इस अंक को मीडिया पढ़ाने वाले विनीत कुमार और हिन्दी लोक जगत के माध्यमों पर असंख्य किताबें पढ़ते रहने वाले रविकान्त ने तैयार किया है। बहुत से लेखक नए हैं और हिन्दी लोक जगत के नए क्षेत्रों से आए हैं। मैंने अंग्रेज़ी के कई शानदार पाठकों को देखा है। वे काफ़ी पढ़ते हैं और किताबों का संग्रह रखते हैं। इसका अच्छा ही असर होता है। हिन्दी के भी पाठक किसी से कम नहीं हैं। उनके यहाँ भी अनेक विषयों पर शानदार पुस्तकों का संग्रह देखा है और उनकी विद्वता प्रभावित करती है। दुनिया से लेकर ख़ुद को समझने की बेहतर क्षमता होती है। मगर आबादी के हिसाब से हिन्दी में अच्छे पाठक कम लगते हैं। पढ़ने और लिखने का अपना महत्व है। इसे कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। हमारे यहाँ के मर्द शादी के बाद नहीं पढ़ते हैं। आप अपने घरों में ही जाँच लें।यही कारण है कि उनसे बात करना झेल हो जाता है। आप भी अपने घर के बड़ों से बात करने में चट जाते होंगे। श्रद्धा और सम्मान की भावना न हो तो नमस्ते के बाद ही कट लेने का मन करता होगा। उनके साथ अन्याय भी हुआ है। गाँव क़स्बों से लेकर राज्यों के कालेजों में घटिया तरीक़े से पढ़ाया गया है। वे पुस्तकों से दूर किए गए हैं। इस एक कारण से भी उनकी तरक़्क़ी कुछ कम रह जाती है। इसीलिए मैं हिन्दी के पाठकों के लिए इतनी मेहनत करता हूँ। यही मेरी हिन्दी सेवा है। आपके लिए रोज़ वैसी ख़बरों का सार लाता हूँ जो हिन्दी के कूड़ेदान अख़बारों में कभी नहीं छपती। हिन्दी के अख़बार लगातार आपके सोचने समझने की शक्ति को सतही बना रहे हैं। अभी आपको मेरी यह बात अहंकारी लग सकती है मगर मैंने इस बीमारी को पकड़ लिया है। आप ग़ौर से सोचिए। ख़ुद भी हिन्दी के अख़बारों की ख़बरों को दोबारा- तिबारा पढ़ कर देखिए। आपको पता चल जाएगा। हिन्दी में एक वेबसाइट है mediavigil, आप इसे लगातार देखिए आपको मीडिया के बारे में हिन्दी में बहुत कुछ पता चलेगा। मीडिया को समझने का मौक़ा मिलेगा। हिन्दी का पाठक अच्छा पाठक तभी बनेगा जब वह हिन्दी के अख़बारों के कूड़ेदान से आज़ाद होगा। मैं चाहता हूँ कि मोहल्ला स्तर पर अख़बार बंद या अख़बार बदल का आंदोलन चले। अव्वल तो आप गोदी मीडिया के इन अख़बारों को ही बंद कर दें या फिर एकदम से मुश्किल है तो पाँचवें छठे नंबर का अख़बार ले लें। कोई भी अख़बार दो महीना से ज़्यादा न लें। एक पाठक और ग्राहक की ताक़त का अंदाज़ा अख़बार वालों को लग जाएगा। आलस्य छोड़िए। होकर से कहिए कल से चौथे नंबर का अख़बार दे जाए। हिन्दी ने ही मुझे सब दिया है। इसलिए एक ज़िद है कि हिन्दी में गुणवत्ता का विस्तार हो और उसका बोलबाला हो। आपमें बहुत क्षमता है। बस आप ये न समझें कि चैनल देखना अख़बार पढ़ना ही सब कुछ जानना है। वो दरअसल अब ‘नहीं जानने’ का माध्यम बन चुका है। इसलिए आप अच्छी चीज़ें पढ़ने से पीछे न रहें। दम साध कर पढ़िए। आप आगे बढ़ेंगे। मेरा एक ही नारा है। हिन्दी का पाठक, सबसे अच्छा पाठक । हंस का अंकागमन हो चुका है। आप आज ही ख़रीद लीजिए। रविश कुमार
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राजेंद्र यादव “हंस-कथा सम्मान”- 2018

राजेंद्र यादव "हंस-कथा सम्मान"- 2018

“राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान” 2018. इस बार प्रत्यक्षा जी को उनकी कहानी “”बारिश के देवता”” (दिसंबर 2017) के लिए दिया गया है. यह सम्मान प्रत्येक वर्ष की भांति 28 अगस्त को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, में आयोजित किया गया. उन्हें सम्मान स्वरूप इक्कीस हजार रुपये की राशि दी गई. पुरस्कृत कहानियों का चयन अगस्त 2017 से जुलाई 2018 के दौरान हंस में प्रकाशित कहानियों में से किया गया है. इस बार के निर्णायक प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश जी थे. इसी स्मरणीय मौके पर रवीकान्त जी व विनीत कुमार द्वारा संपादित हंस का न्यू मेडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण भी किया किया गया किसी फिल्म या रंगमंच की तरह सतत गतिशील, मार्मिक और महत्वपूर्ण कथा-संरचना, कसी हुई, कई-कई लुभावने विचलनों से सचेत बचती हुई, अविचलित प्रतिबद्ध कथा-रेखा , ताज़गी और सहजता के आस्वाद से सिझी-पकी रचनाकार की बेलौस वैयक्तिक भाषा-बोली का विश्वसनीय पाठ और अपने समूचेपन में कहानी की निर्दिष्ट, चलताऊ और प्रस्तावित सीमारेखा को लांघ कर, पाठकों के वृहत्तर दायरे के साथ संवाद और संप्रेषण का समकालीन भाषिकस्थापत्य – यह ‘बारिश के देवता’ के अंतर्पाठ तक के पहुँच-मार्ग का पहला, एकमात्र और प्रमुख प्रवेशद्वार है। कुछ पिछले चोर दरवाज़े भी हुआ करते हैं, जिनसे भूत के प्रेत अंधेरों में अक्सर किस्सों में दाखिल होते हैं, उनका ज़िक्र यहां नहीं. लेकिन इस मुख्य दरवाज़े से कहानी के संसार में प्रवेश करते ही उस दुःस्वप्न के अन्धकार में अचानक चौतरफ़ा घिर जाना है , जो दुर्भाग्य से आज के समय के साधारण मनुष्य का आभासी नहीं , आवयविक, विभ्रमकारी, भयग्रस्त और व्यापक उत्पीड़ित यथार्थ है। यह हमारे अपने ही दिक्-काल में हर पल घटित होता, अतीत में देखे और दिखाये गये कई स्वप्नों-यूटोपियायों के भग्नावशेषों का उत्तर-यथार्थ है। अतीत के सत्ता के बुर्ज़-गुम्बदों के ढह जाने के बाद बचा हुआ हाशिये के मानवीय जीवन का ‘उत्तर-सत्य’ | यह ‘उत्तर-सत्य’ सिद्धांत-बहुल इतिहासों द्वारा बार-बार सिद्ध, प्रचलित और प्रसिद्ध किये गये स्वप्नों का वह प्रति-स्वप्न है, जिसे यह कहानी अपने पात्रों; ख़ासकर अपने केंद्रीय पात्र रा. स. कुलकर्णी और उसकी पत्नी के समूचे ऐन्द्रिक-तंत्र के लगातार विगलित होते दैहिक-समूहगान में प्रकट करने का मुश्किल, तनावग्रस्त, विरोधाभाषी लेकिन बहुत अर्थपूर्ण खेल रचती है। यह खेल इक्कीसवीं सदी की कॉर्पोरेट पूंजी, तकनीकी, सूचना-तंत्र और राजनीति की संयुक्त परियोजना द्वारा गढ़े गये प्रकट यथार्थ की ‘क्रूरता के रंगमंच’ के विमूढ़ और पत्थर हो चुके दर्शकों के सामने खेले जा रहे, एक डरावनी पटकथा का असम्बद्धअभिमंचन है। ‘बारिश के देवता’ और इसके रचनाकार की प्रशंसनीय शक्ति इस एक तथ्य पर टिकी हुई है कि न यह ‘राजनीतिक-सही’ या ‘साहित्यिक-सही’ होने की फ़िक्र करती है, न बहुतेरे अपने समकालीन कथाकारों की तरह किसी वैकल्पिक प्रति-स्वप्न की प्रस्तावना की कोई हीनतर चेष्टा करती है। यह ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और किसी विगत सैद्धांतिकी की अनेक नयी-पुरानी अनुवर्ती कथा-रूढ़ियों को निरस्त करते हुए, आज के इसी समय और इसी जगह की वह कहानी कहती है, जो इस समय लिखी जा रही युवा पीढ़ियों की कहानियों के बीच अपनी अलग कौंध, अर्थ और आवाज़ के साथ अलग खड़ी हो जाती है। ‘बारिश के देवता’को वर्ष 2017-18 के ‘राजेंद्र यादव स्मृति हंस कथा सम्मान’के लिए चुनते हुए मुझे सार्थकता और प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। यह एक अर्थ में हंस, मुंशी प्रेमचंद और हम सब कथाकारों के प्रिय राजेंद्र यादव की परम्परा का भी सम्मान है। उदय प्रकाश जी.
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रोज़गार

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खरीदें हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक-2018

खरीदें हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक-2018

न्यू मीडिया/सोशल मीडिया पर हिन्दी में अब तक सबसे बेहतरीन व गंभीर कार्य के रूप में हंस का मीडिया विशेषांक-2018 पाठकों के लिए उपलब्ध है। रविकान्त जी व विनीत कुमार द्वारा संपादित यह विशेषांक आपको न्यू मीडिया/सोशल मीडिया को लेकर एक बेहतर समझ विकसित करने में मदद करेगा.  साथ ही इस विशेषांक के माध्यम से आप सोशल मीडिया पर लिखी गई बहुत सी बढ़िया किताबों के बारे में भी जान सकेंगे. विशेषांक प्राप्त करने के लिए हमें संपर्क करें.
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सुपरस्टार

सुपरस्टार

सीन गरमागरम था जाहिर है, गीत के बोल भी उत्तेजक थे धुन भी उसी के अनुरूप मादक और नशीली. बॉलीवुड के सुपरस्टार रौशन कुमार बारिश से अपादमस्तक भीगी हीरोइन की अनावृत्त कमर और गीली साड़ी में उभरे नितंब के बीच अपनी दोनों हथेलियों को टिकाए अपना चेहरा उसकी नाभि से रगड़ते हुए ऊपर की ओर ले जा रहा था. क्लोजअप में हीरोइन के लरजते होंठ दिखने लगे सुपरस्टार के फड़कते होंठ उससे जा मिले. इधर बारिश की फुहार, उधर चुंबनों की बौछार. फिल्म के प्रीमियर शो में रौशन कुमार की पत्नी और बॉलीवुड की ही प्रख्यात अभिनेत्री जयमाला भी मौजूद थीं. हॉट सीन उनकी आंखों में चुभ रहे थे. चेहरे पर किस्मकिस्म के भावों की आवाजाही जारी थी. फिल्म की कहानी विवाहेत्तर संबंधों को जस्टिफाई कर रही थी… जयमाल ने सहज और संयत होकर स्वयं को समझाया, “अरे यह तो फिल्म है. रील लाइफ..दोनों अपने अपने किरदार को जी रहे हैं. बदलते जमाने में ऐसे सींस तो कॉमन हैं. नाहक ही अनकम्फर्ट और जेलेस फील कर रही हूँ.” प्रीमियर शो खत्म होने के बाद सुपरस्टार रौशन कुमार का दामन मुबारकबाद से लबरेज हो गया. फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े तजुर्बोकार ट्रेड पंडितों ने इस फिल्म को सुपरहिट होने की गारंटी दे दी थी. रौशन कुमार बेहद खुश था. एक और कामयाबी उसके कदम चूमने वाली थी. ‘डार्लिग कैसी लगी मूवी ?” अपने आलीशान बंगले के लग्जरी बेडरूम में पत्नी को आगोश में लेते हुए रील लाइफ के सीन को रीयल लाइफ में बदलने के क्रम में मादक अंदाज में फुसफुसाया. ‘सुपरब.! आई प्राउड ऑफ यू डार्लिग! .आई लव यू. लव मी.लव मी!’. उखड़ती सांसों और लड़खड़ाती जुबान के साथ वह रील लाइफ के सीन को जीवंत करने में उसका साथ देने लगी. ज्वार शांत हुआ. उसने सिगरेट सुलगाई. पहला कश लेकर धुएं के छल्ले छोड़ते हुए कहा “यू नो डार्लिग कल तुम्हारी मूवी देखी. क्या नाम था ?.हां याद आया “औरत तेरी यही कहानी”. वह चहक उठी, “रियली ?.कैसी लगी ?” “वो ब्लडी संजीव कुमार के साथ तुम्हारा हॉट सीन ?” “सो व्हाट ?” वह उठकर बैठ गई . उसके चेहरे को गौर से निहारने लगी. चेहरा रंग बदल रहा था. रौशन कुमार कुछ पल खामोश रहा. सिगरेट का एक लंबा कश लेने के बाद अपनी आवाज को संयत करने की असफल कोशिश करते हुए बुदबुदाया, “डॉन्ट फॉरगेट डार्लिग , यू आर मैरिड एंड एक बच्चे की मां भी हो ?” उसने गौर किया सुपरस्टार का चेहरा क्षतविक्षत हो गया था. वहां एक आदिम चेहरा आहिस्ता-आहिस्ता चस्पां हो रहा था (मार्टिन जॉन द्वारा लिखित.)
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अपने पराएं

अपने पराएं

पति की मृत्यु के बाद सुमित्रा को मजबूरन अपने पुत्र और पुत्रवधू के पास महानगर में आकर रहना पड़ रहा था । बहू ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि सुमित्रा उसकी बसी-बसाई गृहस्थी में सेंध लगा रही थी। सुमित्रा को झुंझलाहट होने लगी थी बहू की रोक-टोक से ‘ इस बर्तन में छोंक क्यों लगा दिया ,इस बर्तन को गैस पर क्यों रखा ,तेल इतना क्यों डाल दिया….’ । पैंतीस साल से गृहस्थी संभाल रही थी ,आधी उम्र रसोई में बीत गयी और आज उससे आधी उम्र की लड़की ने उसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए।कहती हैं ” आप जरा सा काम करतीं हो सारी रसोई फैला कर रख देती हों ‌।इस से अच्छा मैं ही सुबह आपके लिए सब्ज़ी और रोटी बनाकर रख जाती हूं ,गर्म कर खां लेना।” बेटा-बहू तो दोनों सुबह आठ बजे के निकलें रात नौ बजे तक घर आते ,वह सारा दिन क्या करें। उसपर बहू की बनाई हुई उबली सब्जी से रोटी खाना सोचकर ही उबकाई आने लगती। कहां तो सोचकर आयी थी दोनों को गर्म स्वादिष्ट भोजन बना कर खिलाया करेंगी, लेकिन दोनों आधे से ज्यादा समय बाहर ही खाकर आते हैं तब तेल नहीं नजर आता। सुमित्रा का बहू बेटे के पास बिल्कुल मन नहीं लग रहा था, दसवीं मंजिल की बालकनी से नीचे झांकते हुए सोच रहीं थीं उसके जीने का क्या औचित्य है। अपनी जीवनलीला समाप्त कर दे तो किसी को क्या अंतर पड़ेगा,स्वयं भी इस घुटन से निजात पा लेंगी। तभी बगल वाले फ्लैट की बालकनी पर नजर पड़ी तो दिल धक् रह गया। वहां से एक बीस इक्कीस साल का लड़का नीचे कूदने की तैयारी में लग रहा था। ‘ है भगवान आजकल के बच्चों को क्या हो गया है,सारा दिन मस्ती में रहते हैं, अवश्य ही परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया होगा अब आत्महत्या करने की सोच रहा है। वह लपक कर अपने फ्लैट से निकलकर सामने वाले फ्लैट में घुस गई। गनीमत है फ्लैट का दरवाजा अंदर से लाॅक नहीं था। बालकनी में पहुंची तो लगा शुक्र है लड़का अभी तक कूदा नहीं था। तुरंत उसका हाथ पकड़ कर कमरे में ले गयी और उसको डांटना शुरू कर दिया। ” दिमाग खराब हो गया है इस जीवन को खत्म करना चाह रहे हों जो भगवान का दिया अनमोल वरदान है। कितनी मुश्किल से मनुष्य योनि मिलती है घबरा कर खत्म करना कहां तक उचित है,हर समस्या का समाधान….।” वह लड़का बीच में टोकते हुए बोला :” जब आंटी इतना सब जानती हो तो स्वयं क्यों बालकनी से नीचे कूदने की सोचती हों?” सुमित्रा आवाक उसे देखती रह गई फिर धीरे से बोली :” जब अपने परायों जैसा व्यवहार करने लगे तो जीवन भारी लगने लगता है।” वह शरारती मुस्कान के साथ बोला :” तो आप परायों के साथ अपनों जैसा व्यवहार करके जीवन हल्का कर लो ।हम चारों लड़के अच्छे खाने को तरस जाते हैं आप हम चारों के लिए यहां खाना बनाए तो कैसा रहेगा। आप भी हमारे साथ मनपसंद खाना खा सकतीं हैं ।” सुमित्रा ने नम आंखों से हामी भर दी।
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तम्मना

तम्मना

पंखो की उडान से सारा आसमा नाप लूं, तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | अंधियारा है घना, वजूद है छिप रहा, जुगनू बन कर आज मैं, रोशनी फैला दूं……. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | चीख भी दब रही आज , पटाखे की आवाज में, लक्श्मी के दीपक की लौ बन, जहां ये जगमगा दूं….. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | है बेटा कुल दीपक तो, बेटी भी ‘पूजा’ लायक है, बन काबिल जमाने की, सोच को संवार दूं…. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं |
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शुभ दीवाली होगी

शुभ दीवाली होगी

शुभ दीवाली होगी मन का तिमिर जब मिट जाएगा तन का भेद जब सिमट जाएगा प्रस्फुटित होगा जब ज्ञान प्रकाश अमावस में भी चमकेगा आकाश घर घर में जब खुशहाली होगी समझना तब शुभ दिवाली होगी। जब नौजवानों का उमंग खिलेगा दिल से दिल का जब तरंग मिलेगा नव सर्जन का जब होगा उल्लास शब्द अलंकारों का होगा अनुप्रास। जब मस्ती अल्हड़ निराली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। हर हाथ को जब काम मिलेगा हर साथ को जब नाम मिलेगा कर्ज में डूबकर ना मरे किसान फ़र्ज़ में पत्थर से न डरे जवान जीवन में ना जब बदहाली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। भूखमरी, गरीबी और बेरोजगारी इससे बड़ी कहाँ और है बीमारी इन मुद्दों का जब भी शमन होगा सियासी मुद्दों का तब दमन होगा गली-गली सड़क और नाली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। जब सत्य-अहिंसा की जय होगी संस्कृति-संस्कारों की विजय होगी जब हर घर ही प्रेमाश्रम बन जाए फिर कौन भला वृद्धाश्रम जाए। मुहब्बत से भरी जब थाली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। जब कोख में बिटिया नहीं मरेगी दहेज की बेदी जब नहीं चढ़ेगी जब औरतों पर ना हो अत्याचार मासूमों का जब ना हो दुराचार। जब माँ-बहन की ना गाली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। मुद्दों की फेहरिस्त है लम्बी इतनी लंका में पवनसुत पूंछ की जितनी सब पूरा होना समझो रामराज है राम को ही कहाँ मिला सुराज है! अयोध्या में जब वो दीवाली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। ©पंकज प्रियम 7.11.2018 pankajkpriyam@gmail.com