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हंस की सालाना संगोष्ठी

‘हंस’ पत्रिका द्वारा इफ्को के सहयोग से 38वें प्रेमचंद जयंती समारोह का आयोजन ऐवान-ए-ग़ालिब सभागार में किया गया।

इस बार का विषय था-‘नवराष्ट्रवादी दौर में भाषा’। सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता, लेखक और चिंतक पद्मश्री गणेश देवी, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वैज्ञानिक गौहर रज़ा, बुद्धिजीवी सुधीर चंद्र, शिक्षाविद् प्रो. कृष्ण कुमार ने वक्ताओं के रूप में शिरकत की और राष्ट्र, राजनीति और भाषा के अंतर्संबंधों और विरोधाभासों की चर्चा की।

कार्यक्रम का संचालन कथाकार प्रत्यक्षा ने किया। ‘हंस’ के संपादक संजय सहाय ने संगोष्ठी की शुरुआत में विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि, ‘भूमंडलीकरण के कारण राष्ट्रवाद आज राजनीतिक, आर्थिक,सामाजिक परिवर्तनों के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप उभरा है। बहुसंख्यकों  द्वारा हिंदू राष्ट्र को चिन्हित करने का प्रयास जोर-शोर से जारी है। एक राष्ट्रभाषा का आग्रह भी उफान पर है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि धर्म के आधार पर राष्ट्र का निर्माण नहीं होता अगर ऐसा होता, तो सबके सब इस्लामिक या क्रिश्चियन देश खुद को राष्ट्र घोषित कर देते।’

उन्होंने कहा कि, ‘दुनियाभर में ‘राष्ट्र’ को देश का पर्याय मान लिया गया है जबकि साझा भाषा, साझा इतिहास और साझा गौरव राष्ट्र की अनिवार्य शर्तें हैं। राष्ट्र कहाने के लिए अपना राज्य होना भी जरूरी नहीं है।भारत अपने सांस्कृतिक और भाषायी वैविध्य में एक अनोखा देश है। इसे एकरूपता प्रदान करने का कोई औचित्य नहीं है, न यह साध्य है। विडंबना यह है कि एक तरफ तो हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पृथ्वी परिवार) में विश्वास करते हैं और दूसरी तरफ ‘विश्वगुरु’ होने की बात भी करते हैं!’

प्रो. सुधीर चंद्र ने कहा कि, ‘ नवराष्ट्रवाद अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग स्वरूपों में रहा है। दुनिया का शायद ही कोई मुल्क हो जो इससे अछूता हो ‘। उन्होंने सवाल उठाया कि, ‘इसके प्रति क्या किसी भी राष्ट्र में सहमति बन पाती है? कौन से राष्ट्र खुशकिस्मत हैं जहां सहमति बन पाती है वो या फिर जहां सहमति नहीं बन पाती है वो?  हमारे यहां कोशिश चल रही है कि एक राष्ट्रीय सहमति बन जाए और अगर नहीं बन पाती है तो जबरन बना दी जाए। कल तक इसी को हिंदू राष्ट्रवाद कहा जा रहा था। इसमें भ्रांति और छलावा उतना बड़ा नहीं था जो कि नवराष्ट्रवाद में है।

कोई एक राष्ट्रवाद नहीं होता। कई राष्ट्रवाद एक ही समय में उभरकर सामने आने लगते हैं। दो राष्ट्रवाद में एक तो राष्ट्रवाद है और दूसरा सांप्रदायिकता है’। उन्होंने कहा कि ‘पाकिस्तान के बनने को हम राष्ट्रवाद नहीं, सांप्रदायिकता का नतीजा मानते हैं। अगर पाकिस्तान का बनना मुस्लिम राष्ट्रवाद नहीं तो उसी तर्ज पर क्या हिंदू राष्ट्रवाद संभव है? भारत जैसे देश में आज जो राष्ट्रवाद बन रहा है वो राष्ट्रवादी नैरेटिव नहीं है,सांप्रदायिक नैरेटिव है।

क्षेत्रीय और भारतीय राष्ट्रवादों में भी टकराहट रही है जो कभी विकराल रूप ले लेती है। हम जिसे भारतीय राष्ट्रवाद कहते हैं वो वास्तव में हिंदू राष्ट्रवाद है, जो अवचेतन में था वो अब चेतन में आकर हावी हो गया है। 2002 का गुजरात, 2024 का भारत बन सकता है’।

प्रो. कृष्ण कुमार ने कहा कि, ‘ भाषा के सबसे सन्निकट होता है साहित्य और पिछले सौ साल के साहित्य में हिंदी का कोई उपन्यासकार या कवि नवराष्ट्रवाद से प्रेरित नहीं रहा है।

यह धारा अनुर्वर सिद्ध हुई है। सृजन का कोई अंकुर या विचार ऐसा नहीं फूटा जो इस विचारधारा से प्रेरित हो ‘। कृष्ण कुमार सवाल उठाते हैं कि हमने अपनी भाषा का क्या किया, जिससे हमें हर चीज का अनुवाद करना पड़ता है? नियो नेशनलिज्म में नियो लैटिन भाषा का शब्द है और इसका किसी भी प्रकार से अनुवाद नव नहीं होगा। अनुवाद करते-करते हमारी भाषा अंतर्विरोधों से घिर जाती है और हमारे बौद्धिक समाज में चर्चा तक नहीं होती। इस दौर के कई चेहरे और कारण हैं। यह वही दौर है जिसे

नवउदारवाद का दौर भी कहा गया है। यह नव धनाढ्य वर्ग का भी दौर है जो विचार को ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकता है। एक रेला संस्कृति बढ़ती चली जा रही है जहां हर चीज का रेला है, बिंबों का रेला है।हम वैचारिक रूप से आलसी समाज हैं। अपनी भाषा की ऊर्जा को स्वयं ही हमने नष्ट किया है। ऐसा कुछ हो गया है हमारी भाषा में कि हम एक बार तय कर लेते हैं तो उस पर पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं होते।  नव राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्रवाद का पर्यायवाची है जो अच्छा पर्यायवाची नहीं है। सबको एक जैसे बनाने का जो अभियान है वो इस बगीचे को नष्ट कर देगा।’

 

गौहर रज़ा ने कहा कि, ‘देश में फासिज्म का सबसे पहले अनुभव लेखकों को हुआ। मुझे नहीं लगता कि जर्मनी में इस तरह की कोई आवाज उठी होगी।  नेशन और स्टेट का कांसेप्ट इंसान के बीच में ज्यादा पुराना नहीं है।

इसे बनने में वक्त लगा है।  देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर है। दोनों में टकराहट है’। रज़ा कहते हैं कि, ‘नेशनलिज्म की सबसे अच्छी परिभाषा आइंस्टीन की लगती है- ‘नेशनलिज्म इज एन डीजिज ऑफ मासेज!’ और अगर आज के हिंदुस्तान में इसे अनुवाद करके घुमाना शुरू कर दें तो परिणाम विरुद्ध सिद्ध होंगे। हम यहां पहुंच चुके हैं।

 

विभाजन के झगड़े के दौरान यह प्रयास किया गया कि हम उन जबानों की ओर लौटें जो मिट्टी से जुड़ी हुई हैं। उर्दू और हिंदी के टकराव में कोलोनियल माइंडसेट था कि शासन कैसे किया जाता है। जबानें हमेशा लोगों के बीच में और बाजार में बनती हैं।

आज जरूरत है कि हम वापस अपनी जबानों की ओर लौटें। यह कहना गलत होगा कि उर्दू की मां फारसी और हिंदी की मां संस्कृत है।  लिट्रेचर को श्रेणियों में बांटा जाना कन्फ्यूज करता है।  लिट्रेचर को अगर सिर्फ अच्छे और बुरे दो श्रेणियों में बांट दिया जाए तो अच्छा लिटरेचर वह साहित्य है जो परंपराओं का ध्यान रखे, जो खूबसूरत अल्फाज का ध्यान रखे, जो खूबसूरत खयालात को हम तक पहुंचा सके, एक बेहतर समाज की कल्पना कर सके और हमें यह बता सके कि समाज में क्या बुराइयां हैं। अगर लिट्रेचर का मकसद अच्छा नहीं है तो वो अच्छा लिटरेचर नहीं हो सकता है। अगर लिटरेचर का मकसद राष्ट्रवाद को उभारना हो तो एक भी लिट्रेचर यादगार नहीं रहेगा लेकिन वक्ती तौर पर वह बहुत बड़ा घात करता है। आज दिखाई दे रहा है कि फासिस्ट नेशनलिस्ट, एक कविता, एक लेख, एक गाने से भी डरते हैं। देश की जिम्मेदारी पॉलिटिकल पार्टियों की नहीं, हमारी जिम्मेदारी है।’

 

गणेश देवी ने कहा कि, ‘नवराष्ट्रवाद के दौर में भाषा की जगह हमें नवराष्ट्रवाद के दौर में चुप्पी की बात करनी चाहिए। आज अगर हम पोजीशन को देखें तो जहां-जहां द्रविड़ भाषाएं थीं वहां हिंदू राष्ट्रवाद का अस्वीकार हुआ है। नेशनलिज्म का कोई भविष्य नहीं है।  इस राष्ट्रवाद के विरुद्ध थोपी हुई चुप्पी तोड़ने के लिए हमारे पास एक ही साधन है, वो भाषा है. इटली और जर्मनी का नेशनलिज्म भाषा को लेकर आया था। हम पर चुप्पी थोपने के कितने भी प्रयास हों, हमारी बहुभाषिकता हमारा हथियार है। 

फासिज्म से तभी लड़ा जा सकता है जब बोलने वाले लोग मौजूद हों। भाषा फासिज्म के विरुद्ध एकमात्र हथियार है । लोगों के बीच असुरक्षा की भावना के कारण सरकार जो भी कानून बनाती है और कहती है कि इससे सुरक्षा मिलेगी, जनता स्वीकार कर लेती है।  धर्म का राष्ट्र जो बन रहा है, उसी के साथ-साथ साहित्य का भी धर्म होता है।  जो ‘गीता’, ‘कुरान’, ‘बाइबल’ का धर्म नहीं है। भाषा हमें बचाएगी। दूसरों की चुप्पी तोड़ने से पहले अपनी चुप्पी तोड़ें।’

 संचालन क्रम में प्रत्यक्षा कहती हैं कि, ‘इस परिवर्तनशील समय की भाषा और राजनीति के बीच के बहुत पेचीदा और जटिल संबंध को जानना बहुत जरूरी है।  इसको अगर हम जानेंगे तो हम अपने समय को जान सकेंगे क्योंकि भाषा राजनीति को प्रभावित करती है और पॉलिटिकल आइडियोलॉजी को शेप करती है।

नवराष्ट्रवाद शब्द का आकर्षण सिर्फ भारत में ही नहीं दुनियाभर में व्याप्त है और भाषा इसमें एक टूल है नेशनलिस्टिक नैरेटिव स्थापित करने के लिए। वो पॉलिटिकल आइडेंटिटी और एजेंडा को सामने लाता है। इसको समझना इसलिए भी जरूरी है कि हमारे समय को क्या चीज प्रभावित कर रही है, वो हम तभी समझ पाएंगे जब हम भाषा और राजनीति के तार को समझ पाएंगे।’

मंचासीन वक्ताओं के वक्तव्य के बाद ‘हंस’ की वार्षिक संगोष्ठी की लोकतांत्रिक परंपरा अनुसार श्रोताओं ने प्रश्न भी उठाए जिसका मंच से जवाब दिया गया।  हमेशा की तरह विविध क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवियों, साहित्य प्रेमियों, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और युवाओं ने संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी की। ‘हंस’ की प्रबंध निदेशक रचना यादव ने सबके प्रति आभार जताया ।

सविता पांडेय

(संपर्क : savitapan@gmail.com)