कविताएं

1) बरसाती नदी बरसात के दिनों को छोड़कर साल के बांकि दिनों में यह नदी कम और परती पराट ज्यादा दिखती है आषाढ़ के मेघों की उमड़ घुमड़ सुनकर पाताल की हदों में जा चुकी नदी वापस लौटने लगती है धरातल पर बारिश की बूंदों के साथ इसमें लौटने लगता है नदीपन लौटने लगता है जल लौटने लगता है प्रवाह लौटने लगता है जीवन सावन भादो आते आते नदी लबालब भरकर उपटने लगती है सरसता और हरियाली रचने लगती है अपने किनारों पर और फिर से उसे नदी समझने लगते हैं लोग । 2) कहने और करने का फर्क जिसको उठाना न पड़े वह कुछ भी बोल सकता है पहाड़ को धूल आग को फूल जिसके सर पे होता है

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आजादी

“आजादी” मखमली स्वर्णिम आभा को प्रतिबिम्बित करने वाला केवल मात्र शब्द नहीं है आजादी – बलिदानों की वेदी या स्वतंत्रता के नारों का उद्घोष मात्र भी नहीं है वास्तव में – अभेद्य प्रस्तर बन चुकी परम्पराओं से घिरों का साकार सुखद स्वप्न है आजादी चुभते शब्दजालों और वाक् परम्पराओं के बीच की छटपटाहट है आजादी नाकामी के उलहानों और अवसर की विषमता के बीच जिद्द की जीत है आजादी अंधविश्वासी भेड़चाल और अज्ञानता की जद् में सहसा शिक्षा का अधिकार है आजादी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रहे ढ़र्रे को तोड़ कर पनपी तार्किक सोच है आजादी मजदूर की मुस्कान हक-दायित्वों का मान सबका अक्षर-ज्ञान है आजादी ©मधुबाला

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कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) वापसी कभी कभीचाह कर भी वापस लौटना मुश्किल होता हैवापसी का रास्ताउतना सुगम नहीं रहता हर बारबहुतेरउतनी जगह नहीं होती वहां बची हुईजहां वापस लौटने की चाह होती है मन कोकोई और भर चुका होता हैहमारी उपजाई रिक्ती कोस्नेह और प्रेम का आयतनअपूरित नहीं रहताज्यादा देर तकजरूरी नहींकि जिसके लिएजिसके पास लौटा जाएवह ठहरा ही होबाट जोहता ही होप्रायः नहीं ही होता ऐसामन यही सब गुन करचुप रह जाता हैछोड़ देता हैवापसी की संभावना टोहना । साइकिल गहरा बहुत गहरा जुड़ाव हैहमारी नॉस्टेलजिया सेसाईकिल काहममें सोया बच्चा जग उठता हैआज इस उम्र में भी अगरसाईकिल चलाने का अवसर हाथ आ जाएएक सुखद प्रतीति से गुजरकरहम गुजरे कल में पहुंच जाते हैंयाद आते हैं बचपन के वो दिनजब

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कविता

(राजीव कुमार तिवारी ) ## किरायेदार कितना भी मन रम जाए उनका वहां रहते हुए चाहे कलेजा ही क्यूं न फट जाए वहां से निकलते हुए किरायेदारों को मगर/फिर भी छोड़ कर जाना पड़ता है किराए का घर एक न एक दिन बहुत करीने से संवार के रखने के बाद भी किसी भी हद में लगाव जुड़ाव होने के बावजूद घर कभी किरायेदार का अपना नहीं होता किराए का एक ठौर ही रहता है छोड़ कर जाते वक़्त जब पलट कर देखता है किरायेदार घर की तरफ घर का मन भी भाव विहवल हो जाता है पर मकान मालिक की ठस नजर को नहीं दिखता ये सबकुछ वहां तो बस पैसों की लोलुपता बसती है कई कई घरों में रहता

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उतरन

एक कुर्ती निकली अलमारी से अपनी कुछ पुरानी-सी कुछ बेरंग-सी थोड़ी फटी थी और थोड़ी गई थी उधड़ अलमारी से निकाल पटक दिया उसे ज़मीं पर इस सोच के साथ कि- मुझ पर नहीं फबेगी अब ये… मेरे घर के पीछे एक छोटी झोपड़ी में रहती है एक लड़की चेचक के दाग़ से भरा हुआ है चेहरा उसका हमउम्र होगी शायद या कुछ छोटी तो मैंने अपनी वो फटी हुई कुर्ती देदी उसे मैं नहीं पहन सकती, पर वो तो पहन सकती है फिर दिन बीतते गए और मैं भूल गई उस कुर्ती को… एक रोज़ मैंने देखा उस लड़की को कितने करीने से संवरे हैं बाल उसके आज आँखों में काजल है, माथे पर बिंदी, झुमके भी पहने हैं,

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कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) जो हूं और जो होना चाहता था कहां होना था मुझकोजहां हूंया जहां होना चाहता था मैंक्या इस प्रश्न का उत्तरकिसी के पास है कोई ?जहां हूंऔर जहां होना चाहता थाके मध्य जो संघर्ष हैक्या जीवनउसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?समय जो चित्र बनाता है हमाराउसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता हैपर प्रकट कभी कोई विशेषरस या रंग ही होता हैक्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?जहां प्रवाह रुक गया नदी जल काजो होना चाहता थावो जो हूंभर रह गयाअपने वर्तमान से अवकाश लेकरसमय की किताब मेंफिर लौटना चाहता हूंउसी अनुच्छेद तकऔर उन तमाम अवरोधों कोहटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूंताकि जो

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कविताएं

आत्महत्या हाँ जीवन कभी कभीबहुत कठिन हो जाता हैरास्ता कोई नहीं सूझताहताशा, उदासी और कुंठा कीपकड़ से छूटने कामन के घुप्प अंधेरे जंगल सेबाहर निकलने कादर्द और दुख के दलदल मेंडूबती जाती हैपल पल जिजीविषाकोई नहीं होता इतने पासजिससे कहकर मन की बातसंघनित पीड़ा कोवाष्पित किया जा सकेजिसके कांधे पे रख के सरस्वयं को भुला जा सके पूरी तरहदूर बहुत दूर तकदृष्टि में नहीं होताउत्साह उमंग और आनंद का फैलाव जबउस काल खंड में भीस्वीकारना चाहिए जीवन कोउसकी संपूर्णता मेंउसके चूभते कोणों को सहते हुएजीवन सिर्फ अपने लिए नहींदूसरों के लिए भी हैबल्कि दूसरों के लिए ही ज्यादा हैबहुत बार हमनाव के सवार होते हैंमल्लाह के भरोसेसागर पार हो जाते हैंपर कई बार हमेंमल्लाह भी होना होता हैदूसरों को पार

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कविताएँ

1.कविता विश्वकर्मा है…! कवि नहीँ बनता पहले पहले बनती है कविता! कविता के पकने पर कवि का होता है जन्म। कविता एक फल है कवि उसकी मिठास है। प्रकृति की हर कमी को कविता अंततः भर देती है, जहाँ-जहाँ भी किसी कवि की जरूरत होगी कविता स्वतः वहाँ-वहाँ किसी कवि को जन्म दे देगी प्रकृति और जीवन के मध्य जो खालीपन है उसे कविता पाट देती है कविता मन-महलोँ की विश्वकर्मा है। *********** 2.पिता से बात……! पिता से बात करते हुए ऐसा लगता है जैसे आसमान से बात करना। आसमान जानता है संसार की सारी बातें इसलिए पिता से बात करते हुए मैं सारे संसार से मिल लेता हूँ। संसार घूमने से अच्छा है पिता के साथ घूम लेना। पिता

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अपनी ज़मीन

मेरे घर के इर्द गिर्द कई पेड़ हैं मोहगनी,शीशम,नारियल, आम,नीम और नीलगिरी का वृक्ष है । जिनमें कुछ लंबे -चौड़े हैं तो कुछ छोटे और बौने हैं। जो अपनी अपनी जगह विद्यमान हैं, उनमें न कोई राग है न द्वेष है न वर्ण है न भेद है जीवन अभी सावशेष है, पर जब-जब हवा आँधियों में बदलकर वहाँ से गुजरती है तो एक विभत्स दृश्य सामने आता है बड़े पेड़ छोटे पौधों पर कुछ इस तरह झपटते हैं जैसे पूंजीपति,मजदूर पर पुरूषपशु अबला पर बलशाली कमजोर पर। पर वे भूल जाते हैं उनका आधार और उनके अस्तित्व को छोटे पौधे ही अपनी जड़ों से बांध कर रखते हैं। आँधियाँ सिर्फ विनाशकारिणी ही नहीं, क्रान्तिवाहिनी भी होती हैं जो उखाड़ फेंकेंगी

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रोहित प्रसाद पथिक की कविताएँ

।। कविताएँ ।। 1. तुम मर तो नहीं सकते हो ! जहां से क्लियर होता है ब्रह्मांड जहां सिर्फ मौत के पौधे उगते हैं आहिस्ता-आहिस्ता वचन को पढ़कर तुम एक देश नहीं बदल सकते मैं जानता हूं काले विचारों से होकर युद्ध करना होगा तुम्हें क्योंकि विचार फक्कड़ है फिर तुम्हें एक विशालकाय बीज से भी मौत के स्वर बदलने होगें एकमात्र बची रहेगी यह धूसर जमीन तुम ध्वस्त करने तो निकल गए हो लेकिन एड़ी को मजबूत कर लेना ईट को लोहा बनाकर लाठियों से प्रेम करना किताबों में लिखे शब्दों को बुलाकर नई किताबों को लिखना क्योंकि हर पांडुलिपि धोखेबाज होती है तुम अब तक लड़ रहे थे अपने वजूद के लिए अचानक तुम्हारा मस्तिष्क एकांत हाथों में

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