पाषाण कोर्तक

उषाकाल,अक्षुण्ण पाषाण कोर्तक से मिलीउपेक्षित सूफी अल्फ़ाज़ सी झरती झर झरकिसी सन्नध्द अडिग प्राण सी चार रही थीऔर सुना रही थी कस कर बंद मुष्ठिका व्यथानंगे पांव वसुधा को नापती स्वैराचारऔर करती अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अनुसरणहड़प्पा की अपठित अनुबंध लिपि जैसीकिसी गुहा में लिखी, अस्पष्ट75 वर्षों में एक दफा दिखने वालेउस धूमकेतु के समान सरकती इतिहास मेंमैंने उठा लिया उसे तांबे के पुराने संदूक सेऔर रख दिया टिमटिमाते ढिबरी संगचुरन की पुड़िया के चटख कोलपेट दिया उसके आवरण में मलतास की पंखुड़ियों को उठाया पथ सेकाढ़ कर मिला दिया स्याह पन्नों मेंफिर भी न जाने क्यों,वहमुक्त नहीं, सशक्त नहींमानो जिस्म में उसके रक्त नहींराख वसन से झांकती उसकी देहउन्मुक्तता को तत्पर न थीतीन पहर बुझा कर ज्यों हताश लौटी मैंबुझ चुकी

Read more

डिजिटल भारत

अपनी जिह्वा और कण्ठ में अवसादों के गट्ठर फँसाए दोहरे मापदंडों के साथ कुछ इंसानी जानवर अपनी गाड़ियों में छुप कर रिकॉर्ड करने वाले आईने को लेकर खुद की भद्दी तस्वीर सामने देख सड़कों पर दुम दबाए भोंकते हैं अपने नुकीले दांतों से दूसरों की ज़ुबान काट लेने को घात लगाए बैठे ये भेड़िये जिनके गलों पर पट्टे नही है इतिहास और संस्कृति की आड़ में चीरहरण कर रहे हैं उसी इतिहास और गौरव का जो इन्हें जान से प्यारा है ये क्या हो रहा है ? दुख होता है क्या आज का नौजवान दुर्बल है? क्यों इतना क्षीण हो चला कि इस तरह की मनमानी इस तरह के कमीनेपन पर उतर आया कि भूल गया उसका भी यही घर

Read more

कविताएं

1) बरसाती नदी बरसात के दिनों को छोड़कर साल के बांकि दिनों में यह नदी कम और परती पराट ज्यादा दिखती है आषाढ़ के मेघों की उमड़ घुमड़ सुनकर पाताल की हदों में जा चुकी नदी वापस लौटने लगती है धरातल पर बारिश की बूंदों के साथ इसमें लौटने लगता है नदीपन लौटने लगता है जल लौटने लगता है प्रवाह लौटने लगता है जीवन सावन भादो आते आते नदी लबालब भरकर उपटने लगती है सरसता और हरियाली रचने लगती है अपने किनारों पर और फिर से उसे नदी समझने लगते हैं लोग । 2) कहने और करने का फर्क जिसको उठाना न पड़े वह कुछ भी बोल सकता है पहाड़ को धूल आग को फूल जिसके सर पे होता है

Read more

आजादी

“आजादी” मखमली स्वर्णिम आभा को प्रतिबिम्बित करने वाला केवल मात्र शब्द नहीं है आजादी – बलिदानों की वेदी या स्वतंत्रता के नारों का उद्घोष मात्र भी नहीं है वास्तव में – अभेद्य प्रस्तर बन चुकी परम्पराओं से घिरों का साकार सुखद स्वप्न है आजादी चुभते शब्दजालों और वाक् परम्पराओं के बीच की छटपटाहट है आजादी नाकामी के उलहानों और अवसर की विषमता के बीच जिद्द की जीत है आजादी अंधविश्वासी भेड़चाल और अज्ञानता की जद् में सहसा शिक्षा का अधिकार है आजादी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रहे ढ़र्रे को तोड़ कर पनपी तार्किक सोच है आजादी मजदूर की मुस्कान हक-दायित्वों का मान सबका अक्षर-ज्ञान है आजादी ©मधुबाला

Read more

कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) वापसी कभी कभीचाह कर भी वापस लौटना मुश्किल होता हैवापसी का रास्ताउतना सुगम नहीं रहता हर बारबहुतेरउतनी जगह नहीं होती वहां बची हुईजहां वापस लौटने की चाह होती है मन कोकोई और भर चुका होता हैहमारी उपजाई रिक्ती कोस्नेह और प्रेम का आयतनअपूरित नहीं रहताज्यादा देर तकजरूरी नहींकि जिसके लिएजिसके पास लौटा जाएवह ठहरा ही होबाट जोहता ही होप्रायः नहीं ही होता ऐसामन यही सब गुन करचुप रह जाता हैछोड़ देता हैवापसी की संभावना टोहना । साइकिल गहरा बहुत गहरा जुड़ाव हैहमारी नॉस्टेलजिया सेसाईकिल काहममें सोया बच्चा जग उठता हैआज इस उम्र में भी अगरसाईकिल चलाने का अवसर हाथ आ जाएएक सुखद प्रतीति से गुजरकरहम गुजरे कल में पहुंच जाते हैंयाद आते हैं बचपन के वो दिनजब

Read more

मुक्ति

मुझे पूर्ण मुक्ति नहीं चाहिए ,मुक्ति संभव भी नहीं पिपीलिका के रूप मेंसंग्राहक होना चाहती हूंशर्करा की होना चाहती हूं मधूकप्रेमी परागकण का या होना चाहती हूं ,मक्षिका या चित्रपतंगया शलभ सा निर्मोही पुष्प होना चाहती हूंएक दिवस कासुरभित और सुवासित या होना चाहती हूंकृष्ण चूड की घनी छांवप्रेमी मिलते हो जहां या होना चाहती हूंपारिजात का फूलरहती है प्रियतमा कीप्रतीक्षा जहां मुक्ति की कल्पना मेंनहीं बनना चाहतीकिसी इमली के वृक्ष काअतृप्त प्रेत मुक्ति की लालसा मेंनहीं होना चाहती जीर्ण शीर्णकिसी खंडहर की भांति

Read more

कविताएँ

(पवन कुमार वैष्णव ) 1.मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता…! मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता हूँ,मुझे देखने से पहलेअपनी अधखुली आँखेकिसी साफ़ पानी से धो डालों! मैंने समय कोबटुए में अंतिम बचे नोटों की तरहनिकाल कर खर्च किया हैमैं जानता हूँसमय को कभी रोका नहीँ जा सकताऔर की गई क्रियाएँपूर्ववत् दोहराई तो जा सकतीलेकिन प्राप्त किये गए फल सुधारे नहीँ जा सकते..! मुझे मालूम है रोटीजब तवे पर जल जाती हैतो उसे कैसे खाया जाता है!जली हुई रोटी को कभी अलग नहीँ रखा,इन्ही जली हुई रोटियों नेमुझे हर समय पेट की आग से बचाया। मैंने कभी किसीपूराने वृक्ष की ओर पत्थर नहीँ बरसाएकिसी शाम शांत झील पर भी कोईकंकर नहीँ उछाले,मैं तपती धुप में इतना जल्दी में रहता हूँ

Read more

कविता

(राजीव कुमार तिवारी ) ## किरायेदार कितना भी मन रम जाए उनका वहां रहते हुए चाहे कलेजा ही क्यूं न फट जाए वहां से निकलते हुए किरायेदारों को मगर/फिर भी छोड़ कर जाना पड़ता है किराए का घर एक न एक दिन बहुत करीने से संवार के रखने के बाद भी किसी भी हद में लगाव जुड़ाव होने के बावजूद घर कभी किरायेदार का अपना नहीं होता किराए का एक ठौर ही रहता है छोड़ कर जाते वक़्त जब पलट कर देखता है किरायेदार घर की तरफ घर का मन भी भाव विहवल हो जाता है पर मकान मालिक की ठस नजर को नहीं दिखता ये सबकुछ वहां तो बस पैसों की लोलुपता बसती है कई कई घरों में रहता

Read more

अत्महत्या : एक सामान्य विश्लेषण

आये दिन अख़बारों में आत्महत्या की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं। इन खबरों में ऐसा कम ही होता है कि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी आत्म-हत्या की खबर को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलें। कुछ आत्महत्याओं की ख़बरें समाचार पत्रों की दहलीज पार करने से पूर्व ही दम तोड़ देतीं हैं, तो कुछ समाचार पत्रों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन, पाठक इसे पढ़कर अफ़सोस जताते हुए आत्म-हत्या करने वाले की ही घोर निंदा करते हैं और अंत में उसे बेवक़ूफ़ ठहराकर अखबार मेज पर पटकते हुए अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। और इसी तरह छपने वाली अनेकों आत्महत्याओं की खबरें अख़बारों मैं ही दम तोड़ देतीं हैं। अख़बारों का दायित्व है समाज में घटित घटनाओं को संज्ञान

Read more

ग़ज़ल

उदासियाँ हैं लबों पे लेकिन ख़ुशी के नग़मे सुना रहा हूँ यही है दस्तूर ज़िन्दगी के, मैं सारी रस्में निभा रहा हूँ न जाने क्यों कल से साँस लेने में हिचकिचाहट सी हो रही है वो कौन सा राज़ है कि जिस को मैं ज़िन्दगी से छुपा रहा हूँ? उसी ज़मीं पर कि जिस पे लाशें मुहब्बतों की पड़ी हुई हैं जला-जला कर परालियाँ फिर जदीद फ़सलें उगा रहा हूँ उजालों में फँस के गुमरही में इधर-उधर जो भटक रहे हैं पता मैं उन जुगनुओं को उँगली से तीरगी का बता रहा हूँ धुआँ उठा था तभी ख़बरदार ख़ैरख़्वाहों ने कर दिया था ये बेख़याली का है नतीजा कि हाथ अपने जला रहा हूँ कहूँ इसे ज़िन्दगी भला क्यों दबाए

Read more