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हंस न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण

राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान समारोह “28 अगस्त 2018”  के अवसर पर “हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक” -2018 का लोकार्पण भी किया गया.  विशेषांक के अतिथि संपादक रवीकान्त जी व विनीत कुमार हैं. “हिंदी का पाठक जब बनेगा सबसे अच्छा पाठक” मीडिया और सोशल मीडिया बहुत अलग-अलग संस्थाएँ नहीं हैं। दोनों ही एक दूसरे के लिए सप्लायर और वितरक का काम करते हैं। हमारे जनमानस का बहुत बड़ा स्पेस इस दायरे में ग्राहक बन कर खड़ा है। तर्क और तथ्य की पहचान की क्षमता हर किसी में विकसित नहीं होती। क्योंकि हमारी ख़राब शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें इसी स्तर का बनाया है। इस जगत के खिलाड़ियों को पता है कि शब्दों की सीमा है। इसलिए शब्द कम होने लगे हैं। टैगलाइन, हेडलाइन, कैचलाइन के ज़रिए एंकर बोलता है और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में पढ़ा जाता है। तस्वीरों का बड़ा रोल है। लोग पढ़ने की क्षमता कई कारणों से खोते जा रहे हैं। इसलिए उनके लिए सुबह की राम राम जी की जगह गुलाब के फूल, दो कप चाय और पहाड़ के पीछे से उगते सूरज से गुडमार्निंग भेजा जाता है। जो लोग मुश्किल से पढ़ने की साधना में लगे हैं वो व्यापक समाज के अपढ़ होने की इस प्रक्रिया से बेचैन है। दुनिया के विश्वविद्यालयों में इन सब सवालों को लेकर तेज़ी से शोध हो रहे हैं। किताबें छप रही हैं। भारत में भी हो रहा है मगर स्केल वैसा नहीं है और बहुतों की गुणवत्ता बेहद सतही है। मीडिया और सोशल मीडिया लगातार आपको खुरच रहा है। भरने के नाम पर ख़ाली कर रहा है। इतनी सूचनाएँ हैं कि उनका कोई असर नहीं है। इसीलिए इनका इस्तेमाल सूचित करने की जगह भ्रमित करने में होने लगा है। जिस सोशल मीडिया से जनता आज़ाद हुई थी उसी के कारण वो भँवर में फँस गई है। उसकी प्रोफाइलिंग हो चुकी है। सरकार से लेकर दुकानदार तक सबको पता है कि आप कहाँ जाते हैं। क्या खाते हैं। किससे मिलते हैं। आप सिर्फ एक ‘कोड’ हैं जिसे अब कोई भी मैनेज कर सकता है। सिटीज़न को ‘कोड’ में बदला जा चुका है। इस प्रक्रिया में नागरिकों का समूह भी शामिल है। हंस पत्रिका के विशेषांक को पढ़िएगा। हिन्दी में तीन सौ पन्नों की सामग्री आपको बहुत कुछ सोचने समझने का मौक़ा देगी। तैयार करेगी ताकि आप अंग्रेज़ी की दुनिया में इस विषय पर हो रहे शोध और लिखी जा रही किताबों को समझ पाएँगे। अस्सी रुपया कुछ नहीं है। पत्रकारिता के छात्रों के पास तो यह अंक होना ही चाहिए। वैसे भी हिन्दी में न्यू मीडिया और सोशल मीडिया के नाम पर जो किताबें उनकी मेज़ तक ठेली गई हैं उनमें से नब्बे फ़ीसदी वाहियात हैं। इस अंक को मीडिया पढ़ाने वाले विनीत कुमार और हिन्दी लोक जगत के माध्यमों पर असंख्य किताबें पढ़ते रहने वाले रविकान्त ने तैयार किया है। बहुत से लेखक नए हैं और हिन्दी लोक जगत के नए क्षेत्रों से आए हैं। मैंने अंग्रेज़ी के कई शानदार पाठकों को देखा है। वे काफ़ी पढ़ते हैं और किताबों का संग्रह रखते हैं। इसका अच्छा ही असर होता है। हिन्दी के भी पाठक किसी से कम नहीं हैं। उनके यहाँ भी अनेक विषयों पर शानदार पुस्तकों का संग्रह देखा है और उनकी विद्वता प्रभावित करती है। दुनिया से लेकर ख़ुद को समझने की बेहतर क्षमता होती है। मगर आबादी के हिसाब से हिन्दी में अच्छे पाठक कम लगते हैं। पढ़ने और लिखने का अपना महत्व है। इसे कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। हमारे यहाँ के मर्द शादी के बाद नहीं पढ़ते हैं। आप अपने घरों में ही जाँच लें।यही कारण है कि उनसे बात करना झेल हो जाता है। आप भी अपने घर के बड़ों से बात करने में चट जाते होंगे। श्रद्धा और सम्मान की भावना न हो तो नमस्ते के बाद ही कट लेने का मन करता होगा। उनके साथ अन्याय भी हुआ है। गाँव क़स्बों से लेकर राज्यों के कालेजों में घटिया तरीक़े से पढ़ाया गया है। वे पुस्तकों से दूर किए गए हैं। इस एक कारण से भी उनकी तरक़्क़ी कुछ कम रह जाती है। इसीलिए मैं हिन्दी के पाठकों के लिए इतनी मेहनत करता हूँ। यही मेरी हिन्दी सेवा है। आपके लिए रोज़ वैसी ख़बरों का सार लाता हूँ जो हिन्दी के कूड़ेदान अख़बारों में कभी नहीं छपती। हिन्दी के अख़बार लगातार आपके सोचने समझने की शक्ति को सतही बना रहे हैं। अभी आपको मेरी यह बात अहंकारी लग सकती है मगर मैंने इस बीमारी को पकड़ लिया है। आप ग़ौर से सोचिए। ख़ुद भी हिन्दी के अख़बारों की ख़बरों को दोबारा- तिबारा पढ़ कर देखिए। आपको पता चल जाएगा। हिन्दी में एक वेबसाइट है mediavigil, आप इसे लगातार देखिए आपको मीडिया के बारे में हिन्दी में बहुत कुछ पता चलेगा। मीडिया को समझने का मौक़ा मिलेगा। हिन्दी का पाठक अच्छा पाठक तभी बनेगा जब वह हिन्दी के अख़बारों के कूड़ेदान से आज़ाद होगा। मैं चाहता हूँ कि मोहल्ला स्तर पर अख़बार बंद या अख़बार बदल का आंदोलन चले। अव्वल तो आप गोदी मीडिया के इन अख़बारों को ही बंद कर दें या फिर एकदम से मुश्किल है तो पाँचवें छठे नंबर का अख़बार ले लें। कोई भी अख़बार दो महीना से ज़्यादा न लें। एक पाठक और ग्राहक की ताक़त का अंदाज़ा अख़बार वालों को लग जाएगा। आलस्य छोड़िए। होकर से कहिए कल से चौथे नंबर का अख़बार दे जाए। हिन्दी ने ही मुझे सब दिया है। इसलिए एक ज़िद है कि हिन्दी में गुणवत्ता का विस्तार हो और उसका बोलबाला हो। आपमें बहुत क्षमता है। बस आप ये न समझें कि चैनल देखना अख़बार पढ़ना ही सब कुछ जानना है। वो दरअसल अब ‘नहीं जानने’ का माध्यम बन चुका है। इसलिए आप अच्छी चीज़ें पढ़ने से पीछे न रहें। दम साध कर पढ़िए। आप आगे बढ़ेंगे। मेरा एक ही नारा है। हिन्दी का पाठक, सबसे अच्छा पाठक । हंस का अंकागमन हो चुका है। आप आज ही ख़रीद लीजिए। रविश कुमार
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

उदय शंकर

संपादन सहयोग
हंस में आई  कोई भी रचना ऐसी नहीं होती जो पढ़ी न जाए। प्राप्त रचनाओं को प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ने में उदय शंकर संपादक का   सहयोग करते  हैं । 
हिंदी आलोचक, संपादक और अनुवादक उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हैं। उन्होंने कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है। ‘नई कहानी आलोचना’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

नाज़रीन

डिजिटल मार्केटिंग / सोशल मीडिया विशेषज्ञ
आज के बदलते दौर को देखते हुए , तीन साल पहले हंस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय होने का निर्णय लिया। उसके साथ- साथ हंस अब डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया में भी प्रवेश कर चुका है। जुलाई 2021 में हमारे साथ जुड़ीं नाज़रीन अब इस विभाग का संचालन कर रही हैं। वेबसाइट , फेस बुक, इंस्टाग्राम , ट्विटर जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से ये हंस को लोगों के साथ जोड़े रखती हैं। इन नए माध्यमों द्वारा अधिक से अधिक लोगों को हंस परिवार में शामिल करने का दायित्व इनके ऊपर है।

प्रेमचंद गौतम

शब्द संयोजक
कोरोना महामारी में हमसे जुदा हुए वर्षों से जुड़े हमारे कम्पोज़र सुभाष चंद का रिक्त स्थान जुलाई 2021 में प्रेमचंद गौतम ने संभाला। हंस के सम्मानित लेखकों की सामग्री को पन्नों में सुसज्जित करने का श्रेय अब इन्हें जाता है । मुख्य आवरण ले कर अंत तक पूरी पत्रिका को एक सुचारू रूप देते हैं। इस क्षेत्र में वर्षों के अनुभव और ज्ञान के साथ साथ भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है।

दुर्गा प्रसाद

कार्यालय व्यवस्थापक
पिछले 36 साल से हंस के साथ जुड़े दुर्गा प्रसाद , इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं की कार्यालय में आया कोई भी अतिथि , बिना चाय-पानी के न लौटे। हंस के प्रत्येक कार्यकर्ता की चाय से भोजन तक की व्यवस्था ये बहुत आत्मीयता से निभाते हैं। इसके अतिरिक्त हंस के बंडलों की प्रति माह रेलवे बुकिंग कराना , हंस से संबंधित स्थानीय काम निबाटना दुर्गा जी के जिम्मे आते हैं।

किशन कुमार

कार्यालय व्यवस्थापक / वाहन चालक
राजेन्द्र यादव के व्यक्तिगत सेवक के रूप में , पिछले 25 वर्षों से हंस से जुड़े किशन कुमार आज हंस का सबसे परिचित चेहरा हैं । कार्यालय में रखी एक-एक हंस की प्रति , प्रत्येक पुस्तक , हर वस्तु उनकी पैनी नज़र के सामने रहती है। कार्यालय की दैनिक व्यवस्था के साथ साथ वह हंस के वाहन चालक भी हैं।

हारिस महमूद

वितरण और लेखा प्रबंधक
पिछले 37 साल से हंस के साथ कार्यरत हैं। हंस को देश के कोने -कोने तक पहुँचाने का कार्य कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। विभिन्न राज्यों के प्रत्येक एजेंट , हर विक्रेता का नाम इन्हें कंठस्थ है। समय- समय पर व्यक्तिगत रूप से हर एजेंट से मिलकर हंस की बिक्री का पूरा ब्यौरा रखते हैं. इसके साथ लेखा विभाग भी इनके निरीक्षण में आता है।

वीना उनियाल

सम्पादन संयोजक / सदस्यता प्रभारी
पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.