11th Nov, 2025
अमित यहां बैठे-बैठे भी अच्छी तरह जानता है कि भीतर के कमरे में पारुल इस समय खींच-खींचकर बाल झाड़ रही होगी। उसके बाद बड़ी बेरहमी से बालों को हथेली पर लपेटेगी, कसकर सिर के पीछे जूड़ा थोपेगी और फिर अंधाधुंध आठ-दस कांटे इधर-उधर दे घोंपेंगी... जैसे बाल और जूड़ा उसके अपने नहीं, किसी और के हों और वह भरसक उनसे बदला ले रही हो। वह अच्छी तरह जानता है कि रात-दिन भीतर ही भीतर उफनती इस खीज और गुस्से का असली कारण और लक्ष्य वह खुद ही है और पारुल दिखाना भी उसे ही चाहती है पर उसने तो गैंडे की खाल का ऐसा अभेद्य कवच अपने ऊपर चढ़ा रखा है कि उस पर किए गए सारे वार उलट कर पारुल को ही बेधते-छीलते रहते हैं और वह विजय के एक अनकहे से आह्लाद में सराबोर, अपने में ही मस्त रहता है, सामने वाले की सारी हेकड़ी को ठेंगे पर रखने का परम सुख भोगते हुए।
साड़ी पहनने के बाद चेहरे पर बड़ी सावधानी से सहज-स्वाभाविकता का लेप चढ़ाएगी पारुल, मधुरता और मुस्कान की मोटी-मोटी परतें पोतेगी जिससे कोई सपने में भी नहीं सोच सके कि भीतर ही भीतर कितने स्तरों पर, कितनी तरह के युद्ध झेल रही है वह। यह एक कुशल अभिनेत्री होने का कमाल कतई नहीं है बल्कि शालीनता और आभिजात्य की जो घुट्टी जनम के साथ ही उसके हलक के नीचे उतार दी गई थी, उसी की वजह से मन का दुख यों सरेआम बिखेरते चलने जैसी फूहड़ और घटिया हरकत वह कर ही नहीं पाती। बाहर वालों को चाहे वह चकमा देती रहे पर अमित तो उसका रेशा-रेशा पहचानता है। सबके सामने लगाव और अपनत्व में सने, मधुरता की चाशनी में पगे जो संगीतमय शब्द पारुल के मुंह से झरते रहते हैं, उनके पीछे भीतर ही भीतर उसके लिए फोहश गालियों और कोसनों की जो बौछार निरंतर होती रहती है-उसे अमित, सिर्फ अमित ही जानता है और चाहे तो उन्हें अक्षरशः शब्द भी दे सकता है. 'शालीनता और आभिजात्य - स्साले नकली और ढोंगी जिंदगी जीने के टुच्चे टोटके'... कटुता और व्यंग्य से उसके होंठ टेढ़े हो गए। अच्छा हुआ जो उसने शुरू से ही इस उबाऊ और दमघोंटू सोफेस्टिकेशन के सारे लटकों और नुस्खों की ऐसी की तैसी कर दी। सब स्सालों को नीचे के रास्ते से निकाल कर उनकी असली जगह पहुंचा दिया। एक बार फिर विजयी होने के गर्व से उसका सीना फूल उठा।
उसने जल्दी से अपना चार्ट-पेपर उठाया और नाटक के सेट का अधूरा स्कैच पूरा करने बैठ गया- कुछ ऐसी तल्लीनता के साथ मानो इस समय इस कागज और अपने सिवाय उसके जहन में दुनिया का कोई अस्तित्व ही नहीं है... कम से कम पारुल का कोई अस्तित्व तो नहीं ही है। आंखें उसकी कागज पर जमी हुई हैं लेकिन उसकी पीठ साफ देख रही है कि परदा हटाकर पारुल दरवाजे पर खड़ी हो गई है, एक असमंजस की स्थिति में कि बिना कुछ कहे कृतार्थ करके निकले। मनचाहे बिल्कुल भी नहीं हो रहा होगा बोलने का लेकिन पत्नीत्व के फर्ज की मारी कहेगी जरूर...
"अच्छा में जा रही हूं." 'ऑफिस' शब्द का प्रयोग भूलकर भी नहीं करेगी। निठल्ले पति के सामने अपने ऑफिस जाने की बात कहना कितनी घटिया हरकत है... पति का सम्मान सुरक्षित रखने वाला उसका सुघड़ संस्कार इस बात को खूब अच्छी तरह जानता है।
"तुम आज चार बजे के करीब घर ही रहोगे?"
इस अनपेक्षित से वाक्य को सुनकर न चाहते हुए भी अचानक उसका चेहरा उठ गया। वाह! कैसा सही सटीक है उसका अंदाज, सामने खड़ी इस सजी-संवरी, बिल्कुल ताजा-टटकी लड़कीनुमा औरत को देखकर कोई सपने में भी अंदाज लगा सकता है भला कि इसने सारी रात छटपटाते, करवटें बदलते काटी हैं, वह चाहे उसकी तरफ पीठ किए ही लेटा था पर फिर भी अच्छी तरह जानता है कि रात भर वह बिना बिसूरे चुपचाप टसुए ही बहाती रही थी। मान गए साहब! मन के भावों को छिपाने की भी जरूर कोई ट्रेनिंग होती होगी वरना यहां तो अभिनय कला में दक्ष होने के बावजूद मन में कोई बात नहीं उठी कि चेहरा तो चेहरा, स्साला रोम-रोम जैसे डंका पीटने को बेचैन रहता है। क्या करें, हमारे मां-बाप ने तो म्युनिसिपैलिटी के स्कूल में डालकर सिर्फ ककहरा सिखा दिया... अब ये कॉनवेण्टी सुपर-सोफेस्टिकेशन हम कहां से लाएं?
"अम्मा इघर आएंगी... अगर तुम हुए तो मिलना चाहती हैं।"
मन तो हुआ कि कहे, "अगर लगाकर जो सम्मान बख्शा, उसके लिये शुक्रिया। वरना सीधे-सीधे हुक्म देती कि तुम निखट्टू को तो जाना ही कहां होगा... अम्मा आएंगी चार बजे, बैठकर बात करना!" पर सॉरी, यह फूहड़ भदेस शब्दावली तो इनकी हो ही नहीं सकती... मन में चाहे इससे भी बदतर बातें कुलबुला रही हों।
"इसको लेकर अपना प्रोग्राम गड़बड़ करने या परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। अम्मा को तो अपने किसी काम से इधर आना ही है... तुम नहीं हुए तो लौट जाएंगी।”
"क्या बात करनी है मुझसे?"
"पता नहीं। न मैंने पूछा, न उन्होंने कुछ बताया। फोन पर सिर्फ इतना ही कहा था कि चार बजे अमित घर पर रहेंगे क्या?... रहें तो कह देना मैं आऊंगी मिलने।" फिर बेहद लापरवाही से, "बात क्या होगी, इधर आ रही होंगी तो बतियाने का मन हो आया होगा तुमसे।"
वाह रे लापरवाही के ये लटके ! किसी और को चलाना इनसे। सीधे-सीधे क्यों नहीं कहतीं कि लू उतारने आ रही हैं तुम्हारी। उनकी लाड़ली इकलौटी बेटी से ब्याह करने के बाद भी जिंदगी जीने के ये जो निहायत गैर जिम्मेदाराना और खुराफाती तरीके अपना रखें हैं... वे चल नहीं सकेंगे अब।
"नाश्ता तैयार करवा दिया है, काम के बीच या काम के बाद, जब भी मन हो मंगवा लेना। (क्योंकि समय से और कायदे से खाना तो तुम सीख ही नहीं सकते) अच्छा, मैं अब चली." और एक बहुत ही भीनी हल्की-सी सुगंध का झोंका उसके पास से गुजर गया। रस्सी जल जाए पर ऐंठन जा सकती है भला... कभी इन लोगों की।
नायिका का प्रस्थान, अब खल-नायिका के प्रवेश तक वह बिल्कुल स्वतंत्र है, स्वतंत्र और मुक्त!
उसने जोर से पेंसिल हवा में उछाली, सारे बदन को मरोड़कर एक झटकेदार अंगडाई ली। तीन-चार गहरी-गहरी सांसें लीं और एक
जोरदार हांक लगाई, "मुरारी, कॉफी लाओ, एकदम गरमागरम और फिर बिल्कुल हल्का होकर पलंग पर पसर गया।
ओफ! कितनी देर से वह कैसी जकड़न और घुटन महसूस कर रहा था। सारी कोशिशों के बावजूद, कैसे ये दोनों उसके अस्तित्व के रेशे बिखेरती हुई उसकी नियति ही बनती जा रही हैं। दर्द की एक तीखी-सी लहर उसे ऊपर से नीचे तक टीस गई। उसे अपना कमरा याद आया — अस्त-व्यस्त, उखड़ा-बिखरा लेकिन जिसमें वह निहायत कड़की के दिनों में भी बादशाह की तरह रहता था, जिसकी एकमात्र खिड़की पर जो गली दिखती थी, वह उसे कभी राजमार्ग से कम नहीं लगी।
उसे भेड़ा बनाकर रखने के बेटी के सारे अस्त्र चुक गए तो अब अम्माजी आ रही हैं उस पर अपना जोर आजमाने। ठीक है, आ जाएं वे भी... आज उनसे भी निपट ही लिया जाए और मां-बेटी दोनों को उनकी जगह दिखा दी जाए और अपनी असली जगह भी ठोक कर उनके जहन में बिठा दी जाए। हमेशा के लिए किस्सा ही खतम। वे तो सोच रही होगी कि रेशमी दुशाले में लपेट कर ऐसी मीठी मार करेंगी कि रेशम की नरमी और उनके अहसानों के बोझ तले दबा यह निरीह प्राणी तो बोल भी नहीं सकेगा और वे चार-छह जुमलों में ही इस सिरफिरे का सारा नजला झाड़कर, विजय-पताका फहराती हुई लौट जाएंगी।
महज उसकी कृपा से थोड़े से नाटकों में अभिनय करके घर में परदे कुशन की सजावट करके बेझिझक होकर अपने को कलाकारों में शुमार करने वाली बिटिया तो अब अच्छी तरह समझ गई है कि असली कलाकार की ठसक क्या होती है, उसका अहं और स्वाभिमान क्या होता है! बड़ी से बड़ी सुख-सुविधाओं (हालांकि उसकी नजरों में निहायत टटपूंजिया) पर न बिकने वाली उसकी स्वतंत्रता क्या होती है। आज अम्माजी को भी उसकी एक झलक दिखा ही दी जाए। जनम का अभिनेता-संवाद की अदायगी में कोई उसका क्या मुकाबला करेगा भला? उसके लिए शालीनता नहीं, कला और हुनर चाहिए, जिसकी मालिक अम्माजी नहीं, वह है। न आज चारों खाने चित कर दिया तो देखना !
अमितोष का रोम-रोम इसकी कल्पना से ही एक नए आत्मविश्वास से भर गया। उसे लगा जैसे अपने भीतर वह एक अद्भुत शक्ति का संचार होते महसूस कर रहा है-एक ऐसी शक्ति जिसने उसके पूरे वजूद को ऊपर उठाकर वजनी बना दिया है। वरना न जाने कितने दिनों से तो वह बिल्कुल बूदम जैसी जिंदगी जी रहा था।अचानक बाढ़ की तरह उफन आए इस आत्मविश्वास ने फटाफट उसके दिमाग के सारे पर्दे भी खोल दिए। बिना सुने ही वह अम्माजी के सेर-सेर भर के सारे आरोप जान गया और फटाफट उसने सवा-सेरी जवाब भी तैयार कर डाले। केवल तैयार ही नहीं बल्कि पूरी नाटकीयता के साथ दो-चार बार उनका रिहर्सल भी कर डाला। बस, अब आज हो ही जाए 'खुला खेल फर्रुखाबादी', अपने को भारी फिरंगी तोप समझने वाली मां-बेटी आज अच्छी तरह जान लें कि उसकी जिंदगी और नजरों में उन दोनों की क्या औकात है। उसके रहन-सहन, आदतें और खास करके उसकी स्वतंत्रता(अगर उनके अनकहे आरोप को शब्द दिया जाए तो ‘खुले सांड’ वाली) को लेकर जो एक शी-युद्ध सारे समय चलता रहता है, वह हमेशा के लिए समाप्त हो -पटाक्षेप।
पटाक्षेप करने के लिए वह परदा उठने का बेचैनी से इंतजार करने लगा। बोझिल हो आए समय को काटने के लिये उसने एक किताब उठा ली। रोज तो डट कर खाने के बाद उस समय वह टांग फैलाकर सोता है और आदतन पारुल का एक अनकहा संवाद जरूर उसके कानों से टकराता है..."केवल निखट्टुओं को ही दिन में सोने का सुख नसीब होता है !"
दरवाजा खुला ही छोड़ दिया था इसलिए हल्की-सी खटखट हुई और ‘आइये’ के साथ ही खलनायिका का मंच पर प्रवेश लेकिन वेशभूषा में वही सलीका सौजन्य और गरिमा, वही मधुरता में लिपटी मुस्कान, हूबहू अपनी बेटी की मां…जैसे हाड़-मांस की आंखें नहीं, सांचें में ढली पुतलियां हों, तभी तो ये कभी जान ही नहीं सकतीं कि व्यक्तित्व, अपने पूरे वजूद के साथ ठोस व्यक्तित्व आख़िर होता क्या है ?
“चलो, तुम घर पर ही मिल गए…मुझे डर था कि कहीं रिहर्सल के लिए निकल न गए हों ओ। पारुल से कहला तो दिया था लेकिन जवाब मिलने की गुंजाइश तो थी नहीं, फिर भी चांस तो लेना ही था।"
अमितोष चुप।
"इस बार कितने दिन हो गए, उधर आए ही नहीं तुम लोग," प्यार का शीरा टपकता हुआ उलाहना।
"माना कि बहुत व्यस्त हो, फिर भी कम से कम थोड़ा-सा समय तो निकाल लिया करो, जानते तो हो मैं अकेली जान बिना मिले कितनी बेचैन हो जाती हूं।”
अमित चुप लेकिन मन में उभरा...
'गुस्ताखी माफ हो तो शालीनता के लिपटे इन चिकने-मुलायम जुमलों के बीच जो अनकहा रह गया है और जो आपका असली मन्तव्य है उसे पूरा अपनी भाषा में करता चलूं, 'बिना काम-धंधे वाले के पास समय की तो कोई कमी नहीं पर आओ कैसे... कतराते जो हो मुझसे। तुम्हारे चक्कर में बेचारी पारुल भी नहीं आ पाती, सारे दिन तो वह ऑफिस में खटती रहती है... शाम को मेरे पास आकर बैठ जाए तो तुम्हारी तो पौ बारह...पूरी खुली छूट मिल जाए खुराफातों के लिए।'
अम्माजी ने चारों तरफ नजर दौडाई तो चेहरे पर रौनक और आंखों में गदगदाई-सी प्रशंसा का भाव उमड़ आया।
"तो लगा लिए पारुल ने नए पर्दे...
कमरा कैसा खिल उठा, घर को खूब सजा-संवार कर रखने का तो शुरू से ही बड़ा शौक रहा है पारुल को" बेटी पर सौ जान-सा निहाल होते हुए-
"अब कोई भले ही कहे कि अपनी ही बेटी की तारीफ करती रहती है लेकिन इतना तो जरूर कहूंगी कि बड़ी कलात्मक रूचि वाली है मेरी बिटिया... चुन-चुन कर ऐसी चीजें लाती है कि बस... रीयल आर्टिस्ट।"
तौबा ! रीयल आर्ट की ऐसी तौहीन !
जो आर्ट का 'ए' भी न जानता हो उसके लिए शायद परदे लटकाना और छुरी-कांटे नैपकिन वाली मेज सजा देना ही रीयल-आर्ट हो गया।
इस बार कोई कड़वी-सी बात निकलने के लिए आकार ले ही रही थी कि अम्माजी ने सीधे तुरुप का इक्का फटकार कर अपना वाक्य पूरा किया-
"और सबसे बड़ा परिचय तो दिया तुमको चुनकर। सारे नाटक जगत के गिने-चुने तीन-चार आर्टिस्टों में से एक बल्कि मै तो कहूंगी कि सबके सिरमौर। हाथों में बिना जरा-सी भी हरकत हुए भीतर जैसे अमितोष की मुट्ठियां भिंच गई —
सामने वाले के गुस्से को पूरी तरह ध्वस्त करने के ये शातिराने लटके उसके ऊपर कारगर नहीं होने वाले हैं, और न इनसे उसके भीतर का उबाल ही ठंडा होने वाला है।
फिर दोनों चुप ! जैसे असली बात कहने के लिए एक-दूसरे को तौल रहे हों।
"अमित, तुमसे एक बात कहने आई हूं।" आवाज की थोड़ी देर पहले वाली खुशी। गर्व, चुहल और लाड़ सब गायब।
हूं… तो अब आई गाड़ी पटरी पर। वह भीतर से पूरी तरह चौकन्ना हो गया...पर फिर विराम, शायद धार दी जा रही है बात को। वह खूब अच्छी तरह जानता है कि बहुत ही नाप-तोल कर लेकिन बेहद तीखे निकलेंगे बोल...जो सीधे बेधकर उसे छलनी-छलनी कर दें।
"समझ में नहीं आता कि कैसे शुरू करूं?"
अरे नाटककार के सामने तो कम से
कम ये नाटक मत करो, मेरी खुराफातों का जो खर्रा थमाया होगा बेटी ने... और जिसे चार दिन से घोट-घोट कर रटा होगा तुमने, उसे खोल दो... ऐसी मुसीबत क्या है शुरू करने में... ओह, समझा … शालीनता की नफीस शब्दावली में मेरी टुच्ची हरकतें समा नहीं पा रही होंगी। त...त...त... सचमुच विकट संकट है...बेचारी अम्मा!
"पारुल ने तो मुझे बिल्कुल मना कर दिया था कि मैं तुमसे भूलकर भी ऐसी बात न करूं लेकिन गनीमत है बेटी ने कम से कम इतना तो पहचान लिया कि वह उन रीढ़हीन मांस के लौंदों में से नहीं हैं जो इन लोगों के बड़प्पन (?) के आगे सिफर बन कर दुम हिलाता फिरे।
"मेरा मन ही नहीं माना..."
हां, मातृत्व ज़ोर मार रहा होगा... बेचारी बेटी का दुख बर्दाश्त नहीं हो रहा होगा।
"क्या होगा, ज्यादा से ज्यादा लड़ ही तो लोगे, सो बच्चों का लड़ना भी कोई लड़ना होता है भला।
यह तो बाद में पती लगेगा।
"क्या बात है अमित, तुम इतने चुप-चुप क्यों हो? जब से आई, कुछ बोले ही नहीं।"
क्या बोलूं ? पहले आप शीन काफ से दुरुस्त, नक्काशीदार सौ-सुनारी कह डालिए फिर मैं अपनी एक ही लट्ठमार लोहारी ठपकारूंगा !
"सुना, तुम्हारा नया नाटक बीच में ही रुका पड़ा है!"
मेरे नाटक की चिंता छोड़िए... आप अपना नाटक शुरू करिए न। ये सूत्रधारी- संवाद तो अब उबाने की हद तक खिंच गए।
"मैं जानती हूं तुम बहुत स्वाभिमानी हो और सच पूछो तो मुझे तुम्हारे इस स्वाभिमान पर ही अभिमान है।"
गुस्ताखी माफ… लेकिन हिम्मत जुटाइए और शब्दों का सही इस्तेमाल कीजिए —
‘अभिमान' नहीं कहिए भयंकर कष्ट है। संपन्न होने के कितने ही मुगालते हों लेकिन हिम्मत में कितने दरिद्र हैं आप लोग। सचमुच तरस आता है।
"लेकिन बेटा स्वाभिमान की तो एक हद होती है।"
और जिसे शायद आप तय करने आई हैं।
"सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है कि पारुल भी कम स्वाभिमानी नहीं!"
ओह! तो पारुल के स्वाभिमान की पैरवी करने आई हैं…कीजिए! मां होने के नाते बहुत जायज है!
लेकिन चुप क्यों? क्या हिम्मत नहीं पड़ रही या कि फिर वही शालीनता आड़े आ रही है? इजाजत हो तो मैं कहे देता हूं आपकी
तरफ से। सुनिए और अगर कुछ गलत लगे तो टोक दीजिए, मैं कतई बुरा नहीं मानूंगा। हां, बात आपकी लेकिन भाषा मेरी अपनी
होगी।
"पारुल के साथ दो साल तक काम करने, उसे पूरी तरह जानने-समझने के बाद ही तो शादी की तुमने... वह भी किसी के दबाव से नहीं, बिल्कुल अपनी इच्छा से।"
कहिए, शुरूआत तो ठीक हुई है न? अरे, हूबहू नकल न निकाल कर रख दी तो अभिनेता ही क्या हुआ?
"कितने मन से घर जमाया-सजाया और कैसी निष्ठा के साथ घर की सारी आर्थिक पारिवारिक जिम्मेदरियां खुद ओढ़ी सिर्फ तुम्हें पूरी तरह मुक्त कर देने के लिए, जिससे तुम अपने को पूरी तरह नाटक पर समर्पित कर सको।"
अरे जनाब, ताली नहीं तो प्रशंसात्मक ढंग से गर्दन ही हिला दीजिए। बेटी का दुख आड़े आ रहा है शायद, चलिए मैं भी चार लाइन में किस्सा काटूं।
इतनी नियामतें पाने के बाद कम से कम इतना फर्ज तो तुम्हारा बनता ही था कि तुम ताजिंदगी मेरी बेटी के अहसानों के नीचे दबे उसकी बलैयां लेते, लेकिन तुम ऐसे नाशुक्र और अहसान फरामोश (कहें तो कमीना और जोड़ दूं) हो कि अपने नाटक में इसकी जगह नई हीरोइन ले रहे हो... और केवल ते ही नहीं रहे, सरेआम उससे और मंच को निहायत चालू लड़कियों से इश्क लड़ाकर मेरी बेटी को जलील कर रहे हो। ऐसी हिमाकत हुई कैसे तुम्हारी?
बोलिए, यही कहने आई हैं न आप? साथ ही शायद अल्टीमेटम भी देने आई हैं कि अब यह हरकत एक दिन भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, या तो सीधे-सीधे रास्ते पर आओ वरना बेटी को ससम्मान वापस ले जाऊंगी। कोई रास्ते पड़ी लड़की नहीं, जो उसे कहीं ठौर न हो !
तो सुनिये !
नए नाटक की हीरोइन नंदा ही होगी क्योंकि मेरे हिसाब से उसमें बड़ी संभावनाएं हैं, और जिन्हें में भरसक विकसित करूंगा। निर्देशक के नाते मेरा फर्ज है कि उभरती हुई प्रतिभाओं को सामने लाऊं उन्हें आगे बढ़ाऊ। अगर मंच के साथ जुड़ी होने के बावजूद पारुल इतनी-सी बात नहीं समझती कि एक निर्देशक का फर्ज और जरूरत क्या है और बेवजह कष्ट पाती है तो उसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता, कितने परिश्रम और लगन से रिहर्सल करती है नंदा, मेरे एक-एक निर्देश को वेद-वाक्य की तरह मानती है, मेरे लिए आदर और सम्मान उसके रोम-रोम से जैसे झरता रहता है...
मेरे हल्के से इशारे पर अपने को पूरी तरह होम करने को तैयार रहती है तो क्यों नहीं लूं उसको?"
आपका चेहरा इतना तन क्यों गया?
ओह समझा, यही सोच रही हैं न कहां कस्बई हुलिया वाली भदेस नंदा और कहां पारुल। सूरत-सीरत, प्रतिभा, गुण किसी में भी कोई मुकाबला है? चाहें तो राजा-भोज और गंगू तेली वाला मुहावरा भी चस्पां कर सकती हैं आप, छूट है आपको ! हर बात में ही तो कितनी हल्की उतरती है पारुल के सामने !
बिल्कुल बजा फरमाया आपने लेकिन यह भी जान लीजिए कि हर बात में हल्की नंदा का साथ मेरे अपने व्यक्तित्व को कितना वजनदार बना देता है, वजनदार और ठोस, आत्मविश्वास से भरा हुआ-लबालब ! और पारुल का साथ... छोड़िए, बर्दाश्त नहीं होगा! लेकिन अमितोष प्रतीक्षा ही करता रहा कि उसकी लू उतारते हुए हिकारत और कड़वाहट से भरे हुए इस तरह के कुछ जुमले उछालें तो वह भी इस छोटी-सी टिप्पणी के साथ अपना यह लंबा स्वगत-कथन उनके भेजे में उतार दे। पर लंबी चुप्पी के बाद अम्मा बोलीं भी तो निहायत बेमेल सुर में।
"देखो, तुमने पारुल से शादी की..."
सिर्फ शादी, जनम भर की गुलामी करने का पट्टा कतई नहीं लिखा।
"तो पारुल तुम्हारी हो गई। अब तुम दो अलग कहां रहे? मुझे तो अफसोस सिर्फ इतना है कि..."
लाड़ली बेटी की जिंदगी बर्बाद हो गई।
"तुमने और पारुल तक ने मुझे इतना गैर समझा। सोचो जरा, पारुल के पापा के बाद से ये चार फ्लैट, दो ऑफिस और जितना भी जो कुछ है वह सब तुम्हारा और पारुल का ही तो है, लेकिन ऑफिस में काम करने के एवज में तनख्वाह लेने के सिवाय एक पैसा तक नहीं लेती पारुल मुझसे, तनख्वाह में से हर महीने दो सौ रूपए कटवा कर रुपए जोड़ रही है तुम्हारे लिए, टैरेस-थियेटर बनवाने के लिए।”
टैरेस-थियेटर, वाह ! लेकिन मुझे तो अब सिर्फ नुक्कड़ नाटक करने हैं।
"थोड़े से रुपयों के लिए तुम्हारा नाटक रुका रहे और तुम लोग मुझसे कहो तक नहीं और मालूम पड़ने पर पासल मुझे कसम दिला दे कि मैं तुमसे बात तक न करूं। ठीक है, तुम्हारे आत्म-सम्मान की उसे बहुत चिंता है लेकिन यह सब तो तुम्हारा अपना पैसा है... इसे लेने में कैसा संकोच और कैसा आत्म-सम्मान! बस, अब न मैं कुछ कहूंगी और न ही कुछ सुनूंगी... अपना रुका हुआ नाटक शुरू करो।"
बिना कोई अर्ध विराम तक लगाए, एक ही सांस में यह सारा संवाद बोलकर... रूमाल में बंधी नोटों की गड्डी मेज पर पटक अमितोष को बिल्कुल सकते की हालत में छोड़ कर अम्मा झटके से उठीं और घड़घड़ाती सीढ़ियां उतर गईं।
एक क्षण को अमित का सारा शरीर झनझना गया और खून बुरी तरह खौल उठा। ओह, तो अब आभिजात्य में लिपटी ऐसी टुच्ची, खलनायिकी हरकत से उसे इस बुरी तरह मारा जाएगा। उसे तो ऊपर से नीचे तक जलालत के कीचड़ में पूरी तरह धांस कर, खुद किस सिफत से कमल के पत्ते की तरह बेदाग निकल गई और वह है कि... उसका मन हुआ नोटों की इस गड्डी की चिंदी-चिंदी
बिखेर कर जाती हुई इस औरत पर ही उछाल दे लेकिन एक उबाल खाकर उसका सारा खून जैसे बिल्कुल पानी हो गया, उसका सारा अस्तित्व, सारा सत्व, सारा पुंसत्य और पौरुष एकाएक ही गलकर कहीं बह गया और वह बिल्कुल लुंज-पुंज, अपाहिज-सा। निरे मांस के बेजान लोथड़े की तरह हो गया।
उसे लगा, नस-नस को तोड़ देने वाली इस शब्दातीत नारकीय यातना से उसे अगर तुरंत मुक्ति नहीं मिली तो जैसे वह यहीं बैठे-बैठे समाप्त हो जाएगा... पूरी तरह समाप्त। हमेशा-हमेशा के लिए।
मुक्ति! और नंदा उसके सामने कौंध गई, पिछले कुछ महीनों से नंदा उसके लिए व्यक्ति का नहीं, मुक्ति का पर्याय बन गई है। जब-जब पारुल के अनकहे बोल उसे बुरी तरह छीलकर उसके सारे सत्व सोखकर उसे बिल्कुल होनोलुलु बना देते हैं तब उस पर पूरी तरह निछावर होने को उत्सुक, नंदा की एक-एक अदा उसके अदृश्य घावों पर मलहम का काम करती है। वह फिर से जी उठता है...पूर्ण पुरुष की तरह इस समय उसे इस त्रास से नंदा केवल नंदा ही मुक्त कर सकती है। उसके ख्याल मात्र से उसके निर्जीव हो आए शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। कैसे वह आज तक इस सच्चाई को नजरअंदाज कर सका कि इन दोनों महिलाओं की नजर में उसकी भूमिका मात्र एक विदूषक की ही रही है - करुण और हास्यास्पद। नहीं, अब वह नायक बनकर ही दिखा देगा !
एक निहायत ही क्रूर और प्रति-हिंसात्मक संकल्प के साथ उसने बड़ी फुर्ती से सामने पड़ी नोटों की गड्डी जेब के हवाले की। सारे संकोच और सीमाओं को तोड़कर आज वह 'अपने पैसे' से (कम से कम नंदा की नजरों में तो वह इस पैसे का मालिक है ही) बढ़िया होटल में कमरा बुक कराएगा... पूरे 'रोब' और 'अधिकार' के साथ खाने-पीने की एक से एक लजीज और महंगी चीजों का ऑर्डर देगा और फिर पूरे 'स्वामित्व' के साथ नंदा को भोगेगा और महसूस करेगा कि 'वह' है- अपने पूरे दमखम और पौरुष के साथ वह है। कितना जरूरी हो गया है आज उसके लिए यह, वरना...
और नायक की भूमिका अदा करने वह खटाखट सीढ़ियां उतर गया।
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