शहर के नाम, मृदुला गर्ग

शहर के नाम,  मृदुला गर्ग

यह मेरा आखिरी खत है और मैं तय नहीं कर पा रही हूं कि इसे किसके नाम लिखूं. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. मुझे खत लिखने का शौक रहा है. दिमाग पर दस्तक पूर्ण हुई नहीं कि खत लिखने बैठ जाती. जिस किसी का ख्याल पहले जेहन में उतर आता उसी के नाम. मां के. बप्पा के. तुरंत बने दोस्तों के. बरसों से छूटी सहेलियों के. किसी के भी नाम. जवाब मिले न मिले. परवाह नहीं.
जवाब कम ही मिलता था. हर किसी को खत लिखने का शौक नहीं होता न. बाद में मिलना होता, हफ्तों-महीनों बाद, तो लोग सकुचाकर कहते. माफ करना, सोचा बहुत पर तुम्हारे खत का जवाब नहीं दे पाए, क्या करें यह शहर ही ऐसा है, इतना मसरूफ़ रखता है कि वक्त नहीं मिलता. मैं हंस पड़ती. लो, शहर को क्यों बदनाम कर रहे हो. जवाब न दिया, न सही. मुझे चाहिए भी नहीं. खत तो प्यार की तरह होता है, जवाब नहीं मांगता.
क्यों इतनी खिसियानी हंसी हंस देते हैं ये लोग? प्यार और जवाब न चाहे, कौन सी सदी की बात कर रही हो? वे कहते नहीं ये हमेशा, पर कहा-अनकहा मुझ तक पहुंच जाता था. कौन से प्यार की बात कर रहे हैं ये लोग, मैं सोचती रह जाती थी. शायद औरत आदमी के बीच के प्यार की बात. पर मेरा मतलब उससे नहीं होता था. 

मेरे लिए प्यार का मतलब था देना. खुद को देना. नहीं-नहीं, जिस्म हरगिज नहीं. वे यही मतलब लगाते थे, मैं अब समझ गई हूं पर यह गलत है. मैं क्या सिर्फ जिस्म हूं? जिस्म तो घर है मेरा. मैं उसके अंदर रहती हूं. हर घर की एक आत्मा होती है. मेरे घर की भी है. मैं उसी आत्मा को लोगों में बांटना चाहती थी. 

घर ही उनके हवाले कर देती तो आत्मा कहां रहती?
मैं लोगों से कहना चाहती थी, तुम अच्छे हो, मुझे अच्छे लगते हो. तुम्हारी जिज्ञासा, तुम्हारी दृष्टि, तुम्हारी त्वरा, तुम्हारी स्थिरता, तुम्हारी हंसी, तुम्हारी चुप्पी. कुछ भी. हर आदमी के पास कुछ जरूर होता है जो दूसरों को अच्छा लगता है. वही मैं उससे बांट लेना चाहती थी. हर किसी में कुछ था जो मुझे पसंद था. तुम मुझे पसंद हो मैं कहना चाहती थी. तुम, तुम, तुम भी.
किसी एक को जीवन साथी बनाने का सवाल दूसरा था. बिल्कुल अलग क्या बतलाऊं तुम्हें. मुझे बच्चे कितने प्यारे लगते थे. कोई मोटा. कोई गंजा. कोई मिचमिची आंखों वाला तो कोई गला फाड़कर रोने वाला. मैं अपने बच्चे भी चाहती थी. कम से कम चार. मुझे मतलब नहीं था परिवार नियोजन से. बच्चे पाने के लिए किसी एक को जीवन साथी चुनना जरूरी था. तो चुन लेती. जल्दी नहीं थी. वक्त बहुत था मेरे पास. हां, एक बात में फेरबदल करने को तैयार नहीं थी. बच्चे चाहिए थे कम से कम चार. ज्यादा हों तो ठीक. बप्पा की तरह नहीं कि एक पैदा किया और कर दी छुट्टी. क्या कहते थे मेरे बप्पा. सरकार दो कहे तो हमंे एक पैदा करना चाहिए. सरकारी अफसरों को मिसाल रखनी चाहिए औरों के सामने. कितने फख्र के साथ खुद कहा था बप्पा ने मुझसे एक दिन.
हाय, मैंने सब कुछ लिख ही तो डाला था. सीधा बप्पा के नाम खत में. पढ़कर कितना नाराज हुए थे. उन पर छींटाकशी की उससे उतना नहीं जितना इस बात से कि मैं ढेरों बच्चे चाहती थी.
चार-चार बच्चे. इस युग में. देश की दिन पर दिन बदतर हो रही हालत को नजरअंदाज करके. लानत है. इसीलिए पढ़ाया-लिखाया तुम्हें. इसीलिए अमरीका भेजा. (लो, अमरीका आने का मतलब यह कैसे हो गया कि आदमी बच्चे पैदा करना नहीं चाह सकता!)
उफ, कितनी गुस्सैल पर मजेदार चिट्ठी लिख भेजी थी बप्पा ने जवाब में. खूब हंसी थी पढ़कर मैं. खूब हंसी थी. दोस्तों को भी पढ़कर सुनाई थी. पर वे लोग हंसे नहीं थे. बल्कि कुछ ज्यादा ही संजीदा हो गए थे. बगलें झांकते से, जैसे लोग किसी की गरीबी की बात सुनकर हो जाया करते हैं. इतना गुस्सा आया था कि क्या बतलाऊं. मन हुआ था सबको पकड़कर झकझोर दूं.
तभी हैरी बाल पड़ा था. था जो बड़बोला. किताबें पढ़-पढ़ कर फलसफा छांटना सीख गया था. पर एक बात थी. उसकी बड़ी-बड़ी बातें सुनकर प्यार आ जाता था. मैं सोचती थी, काश हैरी हवाई बातें करना भी न छोड़े. धरती से जरा-सा ऊपर उचक कर चलता रहा तो एक दिन जरूर लीक से हटकर कुछ कर दिखलाएगा. हिंदुस्तान के बारे में इतनी किताबें पढ़ रखी थीं उसने कि हर मुद्दे पर मुझसे ज्यादा जानकारी हासिल कर ली थी. मुझे वह अच्छा लगता था, उसकी अंतहीन जिज्ञासा और तेजी अच्छी लगती थी, इसलिए मैंने उसे नहीं बतलाया था कि जानकारी रखने और जानकार होने में बहुत फर्क है. सोचती थी, जब हिंदुस्तान जाएगा तो खुद समझ जाएगा. जरूरत हुई तो मैं मदद कर दूंगी. तब तक वह अपनी खुशफहमी बनाए रख सकता था कि सबसे ज्यादा जानकारी उसी को है.
उस दिन बप्पा का खत सुन, वह ठीक बप्पा की तरह नाराज होकर बोल पड़ा था. बिल्कुल ठीक कहते हैं तुम्हारे बप्पा. हिंदुस्तान में रहकर चार-चार बच्चे पैदा करना सरासर बेवकूफी है. बच्चों का ऐसा शौक है तो अमरीका में रहो. और शादी किससे करूं, तुमसे, मैंने पूछा तो हैरी तमतमाकर उठ खड़ा हुआ. हां, मुझसे, गुस्से से उफनकर उसने कहा, बिल्कुल ठीक आदमी हूं तुम्हारे लिए, सोच लो.
मैंने सोच लिया हैरी, हम लोग शादी कर लेते हैं. मैंने उसे खत में लिखा, पर रहेंगे हिंदुस्तान में. अमरीका में रहकर मैं बच्चे पैदा नहीं कर सकती. तुम चलो मेरे साथ हिंदुस्तान. कितना पढ़ा है तुमने उसके बारे में. अब आंखों से देख लेना. यकीन करो, हम दोनों नौकरी करेंगे तो चार बच्चों के लायक जरूर कमा लेंगे...और तुम न चाहो तो चारों अपने पैदा करने की जरूरत नहीं है. दो तो खैर मुझे चाहिए ही चाहिए पर बाकी के दो या चार हम अनाथालय से या परित्यक्त बच्चों की संस्था से गोद ले लेंगे. फिर तो देश की हालत हमारी वजह से बदतर नहीं होगी न? ठीक है, छह बच्चे पालूंगी मैं. मेरे नाना के भी छह थे. तो बस फटाफट प्रोग्राम बना लो. शादी करके हम दोनों जल्दी से जल्दी हिंदुस्तान पहुंच जाएं और अपना परिवार आरम्भ करें.
हैरी खुद आकर मेरा खत लौटा गया था. बहुत भोली हो तुम, उसने कहा था. इतनी खुली-खुली चिट्ठी भला कोई लड़की लिखती है. कोई देख लेता तो क्या सोचता. प्रपोज लड़के करते हैं लड़कियां नहीं. वह मेरी तरफ से शर्मिंदा नजर आ रहा था. निगाहें नीची रखकर भाषण दे रहा था, पर शादी की बात तो तुम्हीं ने कही थी. मैंने कहा तो घबरा गया. यहां रहकर शादी करने को कहा था मैंने. तुम तो.... तुम तो... पता नहीं क्या समझ बैठी.
मैं समझ गई. एक संपन्न देश के नागरिक को हिंदुस्तान चलकर रहने का न्यौता देकर मैं उसका अपमान कर बैठी थी. यह सोच लेना कि वह हिंदुस्तान आ सकता है, आना चाह सकता है, गुस्ताखी थी मेरी. क्यों? वह हिंदुस्तान नहीं आ सकता था पर मैं अमरीका रह सकती थी. खुशी-खुशी रह सकती थी. क्यों? मैं क्यों रहूं अमरीका में?
नहीं रहूंगी और वहां, मैंने तय कर लिया. सब दोस्तों से कह दिया, मैं वापस लौट रही हूं अपने देश. बप्पा को भी लिख दिया, फौरन टिकट के पैसे भेज दो, मैं लौट रही हूं अपने शहर, तुम्हारे पास.
बप्पा का जवाबी खत इतनी जल्दी आया कि मैं घबरा गई. दोनों देशों की डाक-व्यवस्था एकाएक इतनी सुधर कैसे गई. सवाल-जवाब के बीच थोड़ा-सा असमंजस भी बाकी नहीं रहा.
मेरी मुस्कराहट ज्यादा देर नहीं टिकी. बप्पा का खत पढ़कर मैं सुन्न रह गई. कृतघ्न, बप्पा ने लिखा था. पढ़ाई बीच में छोड़कर चले आने की वजह? मेरी बेइज्जती का जरा ख्याल नहीं है. लोग क्या कहेंगे, यही न, बड़ा समझते थे अपने को, लड़की से एम.एस. की पढ़ाई तक पूरी न हो सकी.
जानती हो शहर में मेरा कितना नाम है. कितने ऊंचे पद पर हंू आजकल. हर आदमी मुझसे जलता है. मेरी किस्मत से रश्क करता है और तुम हो कि सब कुछ धूल में मिला देने पर आमादा हो. इतना पैसा खर्च करके तुम्हें पढ़ाई पूरी करने अमरीका भेजा. क्या इसीलिए कि तुम खतों में ऊल-जलूल बातें लिखती रहो. कभी मां से अचार-मुरब्बे बनाने की विधि मंगाती हो, कभी चार-चार बच्चे पैदा करने की घोषणा और अब यह वापस आने की धमकी. तुर्रा यह कि पैसे मैं भेजूं. क्यों? किसलिए? कमा लो खुद. झाडू लगाओ, बर्तन रगड़ो, तुम्हारी जिंदगी है. जियो. पर इतना याद रखो कि डिग्री लिए बगैर वापस लौटीं तो हमारा-तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं रहेगा. फिलहाल मैंने तय किया है कि तुम्हारी फीस मैं सीधा तुम्हारे कालेज में जमा करवाऊंगा. उसके अलावा जेब खर्च नहीं भेजूंगा. देखता हूं, कमाने की कितनी ताकत है तुममें. या शायद कमाने की जरूरत ही न पड़े. बेशुमार दोस्त जो हैं तुम्हारे मदद करने को. मांग लेना उन्हीं से पैसे.
खत की आखिरी लाइन मुझे सबसे ज्यादा कचोट गई. कुछ दिन पहले मां को जो खत लिखा था, उसी के जवाब में तमाचा मारा था बप्पा ने. मां ने बप्पा को खत दिखलाया ही होगा. मैंने मना थोड़े ही किया था. यहां मेरे बहुत सारे दोस्त हैं. मैंने लिखा था. मैं सबको प्यार करती हूं. बहुत-बहुत प्यार करती हूं, तुम्हें और बप्पा को भी. मां, यहां रहती हूं तो मन दुखता है. अपना देश, अपना शहर याद आता है. तुम और बप्पा बहुत. और लौटने की सोचती हूं तो भी दिल दुखता है. यहां मेरे इतने सारे दोस्त हैं. प्यारे-प्यारे दोस्त. मगर मां, एक बात समझ में नहीं आती. ये लोग प्यार का मतलब नहीं समझते या मेरी अंग्रेजी इतनी कमजोर है कि अपनी बात इन्हें समझा नहीं पाती. तुमने मुझे अमरीका क्यों भेजा पढ़ने? इतने करोड़ों लोग अपने शहर में रहकर पढ़ते हैं. मैं उनमें क्यों नहीं हूं? मैं तो अपने शहर को उन सबसे ज्यादा प्यार करती हूं. आजकल मैं हर दम यही सोचती रहती हूं. अपने शहर लौट आने पर मुझे ठीक क्या काम करना चाहिए जिसके जरिए मैं अपना प्यार जाहिर कर सकंू. तुम बतलाओ न मां, क्या करना होगा.
उस बात का जवाब भी मां ने नहीं, बप्पा ने दिया था. उस बार भी खूब गुस्सा हुए थे. तुम अच्छी तरह जानती हो तुम्हें इस शहर से हटा कर बाहर क्यों भेज देना पड़ा. तुमने मेरी इज्जत, मेरी पद-प्रतिष्ठा का कभी ख्याल नहीं रखा. शहर के सबसे बढ़िया कालेज में तुम्हें पढ़ने भेजा और तुम मन लगाकर पढ़ाई करने के बजाय, कृतघ्नों की तरह राजनीति के गंदे दलदल में फंस गई. क्यों? मुझे जलील करने के लिए ही न. पुलिस पकड़ ले जाती तुम्हें तो जानती हो क्या होता? मुझे नौकरी से इस्तीफा देना पड़ता. शहर भर में बेआबरू हो जाता मैं.
मैंने क्या राजनीति की? मजदूरों की झुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों में, गली-गली जाकर, नाटक ही तो किया करते थे हम लोग. इसमें गलत क्या था? हम तो खुद सीखना चाहते थे, जानना चाहते थे, गहराई से महसूस करना चाहते थे, वह सब जो किताबों में पढ़ा करते थे. शोषण, भ्रष्टाचार, प्रदूषण, खोखले शब्द भर न रह जाते, अगर हम उन लोगों के बीच जाकर उन्हें महसूस न करते जो इनके असली शिकार थे? नाटक में जो हम दिखाते थे वह तो उन्हीं की दुनिया थी. उससे अनभिज्ञ थोड़ा थे वे लोग. फिर भी अपना झेला मंच पर देखकर उनके भीतर उससे लड़ने की इच्छा जग जाती थी. शायद यही कसूर बन गया था हमारा. काम भी कितना-सा आ पाए हम उन लोगों के. बस उनकी तरफ से कुछ चिट्ठी-पत्राी लिख दिया करते थे. एप्लीकेशन, दरख्वास्त, अपील, जो तुम कहना चाहो. मुझे खत लिखने का कितना शौक था. कानूनी कार्यवाहियों के नुक्ते पढ़कर उन्हें समझाने में भी खूब मजा आता था मुझे.
बप्पा, तुम चाहते थे न मैं मन लगाकर पढूं, क्लास में अव्वल आऊं. तो बिना इन बारीकियों को समझे कैसे पढ़ाई पूरी हो सकती थी. अलग-थलग, सुरक्षित कोनों में बैठे रहकर फिर यह जुर्म कैसे हो गया? पुलिस हमारे पीछे क्यों पड़ गई? तुम्हारा मान-सम्मान आड़े कैसे आ गया? अच्छा बप्पा, तुम तो प्रशासक हो, सरकारी अफसर. तुम्हें सरकार ने इतनी पद-प्रतिष्ठा देकर बहाल क्यों किया? इसीलिए न कि तुम अपने शहर के लोगों की देखभाल करो. न सही सेवा, सेवा नहीं कहूंगी, तुम्हारे काम को. शब्दों की तानाशाही से वाकिफ हूं. तुम सेवक नहीं प्रशासक हो, अफसर हो. सेवा न सही, देखभाल करने का तो काम है तुम्हारा. मैं तो तुम्हारा ही हाथ बंटा रही थी. फिर मेरी वजह से तुम्हारा अहित-अपमान कैसे हो गया? क्या इतना बड़ा जर्म था मेरा कि एकदम देशनिकाला दे देना पड़े.
मैंने उक्त खत लिख डाला था बप्पा को.
सोचकर देखती हूं तो अब तक सबसे ज्यादा खत मैंने बप्पा को ही लिखे हैं. मां को भी कम नहीं लिखे पर उन्हें एक ही बात समझाने के लिए बार-बार लिखने की जरूरत नहीं होती थी. वे मुझसे जिरह या बहस नहीं करती थीं. मेरी बात सुनकर हजम कर जाती थी. और बप्पा थे कि उसे चुभलाते-जुगालते रहते थे. मैं जो भी लिखती, मां का जवाब वही रहता था, तुम खुश रहो, मन लगाकर पढ़ो, खुराफातों में मत पड़ो. तुम्हारे बप्पा को तुमसे बहुत आशाएं हैं. बेटा-बेटी सब तुम्हीं हो न. अकेली संतान. उनकी महत्वाकांक्षा तुम नहीं तो कौन पूरी करेगा. मैं तो यही चाहती हूं तुम और तुम्हारे बप्पा दोनों खुश रहें और मेरे पास रहें. तुम्हारी बहुत याद आती है. तुम्हारे बिना घर एकदम सूना लगता है. सब दोस्त-रिश्तेदार तुम्हें पूछते रहते हैं. तुम लौट आओगी तो सबसे मिलवाऊंगी. पढ़ाई पूरी करके, जल्द से जल्द लौटो. इसी इंतजार में, तुम्हारी मां.
उस बेगाने शहर में कभी-कभी लगता मैं मां के खतों के इस आखिरी वाक्य के सहारे जी रही हूं. मेरा शहर मेरा इंतजार कर रहा है. जल्द से जल्द लौट आने का. पर समझ नहीं पाती बप्पा की आशाएं क्या हैं. उनकी महत्वाकांक्षा पूरी करने की जिम्मेदारी मेरी क्यों है? अगर बप्पा के एक बेटा भी होता, दो-चार और बेटे-बेटियां होते तब भी वे इसी तरह अपनी आशाएं-महत्वाकांक्षाएं उन सबसे पूरी करवाते? बाप रे! तब तो ढेरों महत्वाकांक्षाएं ढोनी पड़ती उनकी, या एक ही महत्वाकांक्षा बंट-चुंट जाती. एक जोड़ी कंधों को पूरा बोझा नहीं उठाना पड़ता. सोचते-सोचते हंसी आ जाती थी मुझे.
अकेली जान मैं कब, कहां तक तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं को ढोती फिरूंगी बप्पा? मुझे खुद को बांटने दो, देने दो. मैं प्यार बांटना चाहती हूं सबके बीच. बहुत है मेरे पास. तुम्हें भी दूंगी. अथाह खजाना है. कभी नहीं चुकेगा. सच. और लिख ही तो डाला मैंने खत में बप्पा को. बप्पा यहां के पादरी कहते हैं मैं नन बन जाऊं. तब मुझे प्यार बांटने से कोई नहीं रोकेगा. मेरे प्यार के गलत अर्थ भी नहीं लगाए जाएंगे. अंग्रेजी कितनी भी खराब हो मेरी, जीसस क्राइस्ट से संबंध जोड़कर मैं सर्वथा मुक्त हो जाऊंगी. बन जाऊं क्या?
पर कैसे बन सकती हंू? मुझे बच्चे चाहिए. कम से कम चार. पालने को तो मिल जाएंगे पर अपने पैदा करने की उन लोगों को मनाही है. पर मुझे तो चाहिए. अपने भी. गोद लिए हुए भी. मैं शादी के बाद बच्चे पैदा करके, बच्चे गोद लेकर, प्यार बांटते रहना चाहती हूं बप्पा. समझ में नहीं आता क्या करूं? तुम बतलाओ न बप्पा, मेरे प्यारे, अच्छे, विज्ञ बप्पा. मुझे बतलाओ. मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं फिर भी प्यार बांटना चाहती हूं सबके बीच. मुझे बतलाओ यह कैसे संभव होगा. मेरे बहुत-बहुत प्यारे बप्पा.
बप्पा का जवाब आया था.... नहीं-नहीं. याद करती हूं तो बर्दाश्त नहीं होता. उसके बाद आए इस खत को पढ़ने पर बिल्कुल नहीं होता. तब मैंने सोचा था अगले खत में बप्पा को मना लूंगी और उनसे एक प्यार भरा खत वसूल कर ही लूंगी. कैसे भ्रष्ट लोगों की संगत में पड़ गई तुम, बप्पा ने लिखा था. ऐसे ऊल-जलूल संबोधन पिता के लिए प्रयोग नहीं किए जाते, इतना भी ज्ञान नहीं रहा. नन बनोगी तुम! भूल जाओ. शादी की बावत बात समय आने पर होगी. अभी तुम सिर्फ पढ़ाई पूरी करने में दिल लगाओ, समझीं. मैंने अपने एक दोस्त को लिखा है, तुम पर नजर रखें. पादरियों से मिलने क्यों गईं तुम? आगे से ध्यान रखना. एक बार बचा लिया. इस बार गलत सोहबत में पड़ीं तो बचाना मेरे हाथ में नहीं होगा.
एक बार आए थे उनके दोस्त मुझसे मिलने, फिर नहीं. बेचारे मुझ पर क्या नजर रखते. वे तो खुद नजर बचाते फिर रहे थे. अपने कारनामों का कोई साक्ष्य नहीं चाहते होंगे. बड़ी उम्र में पहली बार अपना शहर छोड़ बाहर आए थे. पता नहीं कब-कब की कसर निकाल रहे थे. उनके शहर जाकर कोई कह देता तो. मैंने उन्हें बंधन मुक्त कर दिया. कह दिया आप जो करते हैं उसमें जरा दिलचस्पी नहीं है मेरी. कृतज्ञ हुए बेचारे. नजरें मुझसे मोड़ लीं. हाय बप्पा, कितना कम समझना चाहते रहे तुम.
इस बार अति कर गए बप्पा. खत का जवाब मैंने नहीं दिया. बस, मन ही मन कहा, बप्पा अब और यहां नहीं रहूंगी. तुमने जो कहा है वही करूंगी. झाडू लगाऊंगी, बर्तन रगडूंगी और टिकट के पैसे जमा होते ही अपने शहर लौट आऊंगी.
कैम्पस में मुझे लाइब्रेरी में नौकरी मिल रही थी. कैंटीन में कैश काउंटर पर भी पर मैंने नहीं की. मैं अपने को उनके शहर में खुला छोड़ देना चाहती थी. विदेशी थी न. विद्यार्थी की हैसियत रखती थी. मुझे बाहर काम करके कमाने की इजाजत नहीं थी. पर इजाजत थी किस चीज की हम जैसे लोगांे को. मैं उन्हीं लोगों से मिलना चाहती थी, जिन्हें समाज इज्जत नहीं देता और इजाजत नहीं देता इज्जत पाने की कोशिश करने की. उस शहर में भी ऐसे अनेक दूषित कोने थे जहां कानून की इजाजत पाकर काम करने के लिए किसी का पूर्वग्रह विशेष था नहीं. वहां बसे छोटे-छोटे ढाबों में समाज की जूठन बर्तन जूठे किया करती थी. वहीं मैंने बप्पा का कहा पूरा करना शुरू किया. जूठन की जूठन साफ करने का काम आसानी से मुझे मिल गया.
कितनी भी बढ़िया प्लेट क्यों न धोऊं, मेरा मालिक यही कहता था प्लेट साफ करो. एक दिन मुझे गुस्सा आ गया. साफ तो है, मैंने कहा. साफ करो, उसने दुहराया. गुस्से में मैं कह उठी. जानते हैं मैं एम.एस. कर रही हूं. तो? उसने कहा और खड़ा- खड़ा मुझे ताकता रहा... ताकता रहा. और कुछ नहीं बोला. वैसे भी वह कम बोलता था. वहां सभी कम बोलते थे. इतने दिनों में एक भी हैरी नहीं मिला मुझे. उसके उस एक शब्द के सवाल ने मुझे बेतरह हिला दिया. एक पल के भीतर बहुत सारी बातें मेरी समझ में आ गईं. प्लेट साफ करनी है तो प्लेट साफ करनी है. मैं क्या हूं. कौन हूं. क्या कर सकती हूं. उससे मतलब नहीं है.
सच कहती हूं मां. मैंने मां को खत में लिखा, मेरे जैसा प्लेटें धोने वाला तुम्हें पूरी दुनिया में ढूंढ़े नहीं मिलेगा. जब प्लेट धो रही होती हूं तो लगता है मैं मैं नहीं प्लेट हूं. अपने को साफ चमकीला बना डालने के अलावा जीवन में कोई ध्येय नहीं है मेरा. न किसी बाधा को मानने को तैयार हूं मैं. मां, दोषरहित काम करने के लिए एक जैसी एकाग्रता चाहिए, चाहे पहाड़ पर चढ़ना हो चाहे प्लेटें धोना. नाराज मत होना, मेरी प्यारी मां. पर प्लेटें धोते-धोते मुझे लगता है मैं बप्पा से ज्यादा महत्वपूर्ण काम कर रही हूं. मैं खुश हूं मां. आजकल बहुत खुश हूं. एकदम नए तरह के संगी-साथी मिल रहे हैं और मैं सबको प्यार दे रही हूं. इन्हें ज्यादा जरूरत है न मां.
मां ने वह खत बप्पा को नहीं दिखलाया होगा क्योंकि उनकी कोई तीखी प्रतिक्रिया मुझे नहीं मिली बल्कि कुछ दिनों की चुप्पी के बाद उन्होंने लिखा पैसों की जरूरत हो तो लिख देना. लिखूंगी बप्पा. जरूर लिखूंगी. जरूरत हुई तो लिखूंगी नहीं? पर मुझे जरूरत है नहीं. इतना भरा-पूरा है सब कुछ. किसी चीज की कमी नहीं है तो जरूरत कैसे महसूस होगी. पर खत नहीं लिखा मैंने बप्पा को; उस दिन के लिए स्थगित रख दिया जब जरूरत महसूस करूंगी.
और नहीं पर एक जरूरत मुझे है जरूर. वापस अपने शहर लौट जाने की. उसी के लिए कमा कर पैसा जमा कर रही हूं. पर काम के बीच, इतने लोगों के बीच बंटकर रह पा रही हूं कि जरूरत कचोटती नहीं, बल्कि दूर से दिखाई दे रहे मंजिल के दीये की तरह टिमटिमा कर रोशनी देती है.
अच्छा है न मां इतने लोगों के बीच बंटकर रहना. मां, मैंने लिखा आज मैंने तुम्हारे सिखाए अलीगढ़ी आलू बनाकर खिलाए उन लोगों को. बहुत पसंद आए सभी को. अरे आलू के पीछे तो पागल हैं यहां के लोग. पर बनाने के नाम पर वही चिप्स या हद से हद बेक कर लिए मक्खन- चीज डालकर. हम लोगांे की तरह हर शहर के नाम पर फर्क-फर्क तरह के आलू बनाना कहां जानते हैं. सच मां सोचती हूं मेरी-तुम्हारी तरह लोग आलू के नाम पर प्यार बांटना शुरू कर दें तो दुनिया में जंग होनी बंद हो जाए. ओ मां. कितना मन है उड़कर तुम्हारे पास पहंुच जाऊं और ऊल-जलूल बेवकूफी भरी बातें करूं. तुम्हें बेवकूफी से परहेज नहीं है न बप्पा को क्यों है? काश, लोग बेवकूफ होते और प्यार बांटा करते. आलुओं की तरह. ओ मां, इतने स्वाद बने अलीगढ़ी आलू, इतने स्वाद कि मजा आ गया. अब फटाफट दम आलू की विधि लिखकर भेज दो. कलकत्ते में खाए थे न लूची के साथ. खूब मसालेदार. कलकतिया आलू, न-न दम आलू नाम बेहतर है, चलने दो वही. बनाकर खिलाऊंगी इन लोगों को. मां तुम सोच नहीं सकती, कितने बेबस लाचार किस्म के लोग आते हैं यहां. दो दिन काम किया और गायब. कोई जेल से छूटकर आ रहा है तो कोई जेल जा रहा है. शराबी, आवारा, गंजेड़ी. ड्रग एडिक्ट्स कहते हैं ये लोग. फिर भी गोरी जूठन खुद को काली जूठन से बेहतर समझती है. हंसी आती है. नहीं, रोना आता है. और मां, कभी-कभी उन लोगों से बातें करते-करते मुझे बप्पा का चेहरा याद आ जाता है और तब मन करता है मैं भी शराब पिऊं, ड्रग खाऊं, आवारागर्दी करूं और इन लोगों के दुख को भीतर से समझंू.
न-न, घबराओ मत. पैसे ही नहीं हैं मेरे पास वह सब करने के लिए. जो कमाती हूं खर्च कर देती हूं या बचा रखती हूं एक खास काम के लिए. अभी नहीं बतलाऊंगी किस काम के लिए. एक दिन हैरत में डाल दूंगी तुम्हें, मेरी अच्छी प्यारी, कुछ-कुछ बेवकूफ मां.
दम आलू की विधि भेजना मत भूलना. इन्हीं लोगों को खिलाने हैं. कुछ हैं इनमें जो पुरानी लतें छोड़कर दुबारा इंसान बनने की कोशिश कर रहे हैं. भूख मिटाने को बेचारे काॅफी-डोनट का सहारा लेते हैं. उन्हीं को बनाकर खिला देती हूं कभी-कभी. अपने ढाबे के पीछे गैरेज है, उसी में मिलते हैं हम लोग. हाय, मेरा मालिक ढाबा नाम सुनेगा तो बिगड़ उठेगा. ईटिंग जायंट है यह मां, फास्ट फूड बोनान्जा. काके दा ढाबा याद है तुम्हें और वह ईरानी होटल? कब देखूंगी मैं उन्हें?
लगता है अब मां मेरे खत बप्पा को नहीं दिखातीं. बप्पा मेरी फीस और उसके साथ कुछ जेब खर्च सीधा कालेज भिजवा देते हैं. रसीद उन्हें मिल जाती हैं. मैं आजकल उन्हें खत नहीं लिखती. जब लौटकर जाऊंगी अपने शहर तो खूब समझकर बात करूंगी उनसे; तुम्हारे पैसों से ही लौटकर आई हूं. बप्पा, तुम्हारे कमाए पैसे या तुम्हारी राय से मेरे कमाए, कोई फर्क नहीं है न. मुझे लौटना था मैं लौट आई. अब से तुम्हारे जूते मैं पालिश किया करूंगी. शीशे से चमका करेंगे. पता है मैं कौन हूं, द ग्रेटस्ट पाॅलिशर आॅफ द वल्र्ड, द चैम्प. प्लेटें चमका-चमका कर एक्सपर्ट हो गई हूं... पर इंतजार करना है अभी. अभी तो जूठन साफ करनी है मुझे. प्लेटों की और समाज की. थोड़े से आलू और थोड़ा-सा प्यार बांटकर.
मां, अबकी बार, सरसों प्याज वाले आलू-बैंगन की विधि भेज देना. तुम्हारे हिसाब से बनाती हूं तो खाकर सब भौंचक रह जाते हैं. गैरेज हमारा वह गुलजार होता है कि क्या बतलाऊं. काके दे ढाबे की याद ताजा हो जाती है. एक आत्मा उगने लगती है इस निरानंद शिविर के अंदर. और तब मैं दुगने आनंद के साथ प्लेटें रगड़ती हूं; रगड़-रगड़ कर ऐसे चकाचक कर देती हूं कि तुम्हारा प्यारा- प्यारा सांवला मुंह भी उसमें गोरा बनकर चमके. बप्पा से कहना वापस लौटंूगी तो... नहीं छोड़ो. बप्पो से अभी कुछ मत कहना. मैं ही कहूंगी एक दिन... अच्छा मां, मेरा कोई पुराना साथी कभी मिला? कभी नहीं मिला? कोई भी? मिला तो होगा. बप्पा ने भगा दिया होगा. मां कोई मिले तो कहना... नहीं, रहने दो वह भी. मैं ही कहूंगी एक दिन...
मां आजकल अपने खतों में नसीहतें नहीं देतीं. बप्पा की आशाओं, महत्वा- कांक्षाओं की बात भी नहीं करतीं. जो विधि मंगाती हूं भेज देती हैं और लिख देती हैं-खुश रहो.
तो क्या मां मुझे समझ गई? काश बप्पा...
समझेंगे एक दिन...
मैं लौटूंगी अपने शहर...

यह क्या हो गया. मां, मैंने मदद करनी चाही थी, निर्मल मन से. क्यों हुआ ऐसा? मैं बप्पा के आगे हार गई. वह दुखी था. अब भी कहती हूं दुखी था. पीड़ित-व्यथित, बच्चे की तरह. दिशा ढूंढ़ रहा था वह. दिशाहारा नहीं था. जीवन से हताश नहीं हुआ था. लौट आना चाहता था मेरी तरह. लौटना चाहो और कोई बांह न पकड़े... मां, मैंने सोचा मैं उसे लौटा तो नहीं ला सकती पर लौटने में थोड़ी बहुत मदद कर सकती हूं. वह भूखा था, मैं उसे खाना खिला सकती थी. कमजोर-बीमार था, सोने के लिए सिर पर छत और बिस्तर दे सकती थी. सोचा था, एक-दो दिन आराम करेगा, भरपेट खाएगा तो निराशा पर विजय पा लेगा. जाएगा तो जिंदगी जीने की भरपूर लालसा लेकर. पर... वह ड्रग खाता जरूर था, कुछ समय पहले. हां ड्रग एडिक्ट था वह. इसीलिए मां-बाप ने घर से निकाल दिया था. कहा था हमारी अपनी भी जिंदगी है. तुम्हारी मजबूरी पर पूरा विश्वास कुर्बान नहीं हो सकता. उसने आत्महत्या नहीं की, हथियार नहीं डाले, जूझा अपने से, ड्रग छोड़ने की कोशिश की, और आखिर सफल भी हो गया. अब तो बस भूखा था. नौकरी की खोज में निकला बेकार था और भविष्य से डरा हुआ था. मैंने सोचा मैं उसकी मदद कर सकती हूं, करनी चाहिए मुझे. वह लौटना जो चाहता था...
मैं उसे कालेज के अपने कमरे में ले आई. तुम्हारे सिखाए कढ़ी-चावल बनाकर खाने को दिए. उसने खाए मां. भरपेट खाए, शौक से. खुश होकर. खाकर सोने की तैयारी करने लगा. फिर... मां, कैसे बहशी हैं यहां के लोग. नहीं बीमार, मन से, आत्मा से बीमार. उसने कहा, फिर लाई किसलिए थीं तुम मुझे अपने कमरे में. उफ मां, अब और यहां नहीं रह सकती मैं. अपने शहर लौट रही हूं. जब सामने हंूगी, समझ लेना मैं आ गई.
मां ने अपने जवाबी खत में क्या लिखा मैं नहीं जानती. वह खत मैंने उन्हें भेजा ही नहीं. लौटकर अपने कमरे में भी नहीं गई. कोई खत आया भी होगा तो पड़ा होगा. दावेदार बप्पा का भेजा जेब खर्च मेरे खाते में जमा होता रहा था. निकाल लिया. अपना पैसा भी कुछ जमा हो चला था, वह भी. मैंने अपने शहर लौटने के लिए टिकट खरीद लिया. अब जो होगा वहीं पहुंचकर...
मैं शाम के वक्त अपने शहर में उतरी जान-बूझकर मैंने उस फ्लाइट का टिकट लिया था जो शाम को अपने शहर पहुंचाती थी.
हर शहर की एक आत्मा होती है जो शाम के गहराते झुटपुटे में ही इंसान की पकड़ में आ सकती है. दिन का उजाला बड़ा बेदर्द होता है. हर नक्श को इस सफाई से उभार देता है कि हम उसके बारीक कटाव-छंटाव को ही देखते रह जाते हैं. शहर की तब अपनी अलग कोई पहचान नहीं होती. वह दुनिया का एक बेनाम हिस्सा भर होता है, ईंट-गारे से चिना, गली-कूचों में बंटा, शोर-शराबे से घिरा भीड़ भरा हिस्सा. शाम के बाद जब धीरे-धीरे रात उतरती है तो थकान से चूर जिस्म चुप हो जाते हैं तब गहराते अंधेरे और सन्नाटे में शहर की आत्मा की महीन आवाज कानों तक पहुंच सकती है. पर उससे भी पहले एक छोटा-सा वक्त का टुकड़ा वह होता है, जब शाम का झुटपुटा शहर के तीखे कोनों पर कूची फेर देता है. धुंधले होकर वे एक-दूसरे में बिला जाते हैं. कुछ देर को शहर की अखंडित तस्वीर हमारी आंखों के सामने झिलमिलाती है. वही वक्त होता है उसे पहचानने का, उसकी आत्मा की एक झलक पाने का. फिर रात घिर आती है और शहर की आवाज इतनी धीमी और महीन हो जाती है कि चाहने पर भी उसे पकड़ने की कोशिश, बहुत मुमकिन है, नाकाम हो जाए.
अब जाकर मेरी समझ में आया है, अपने शहर से इतने दिनों तक दूर रहकर कि बचपन में मुझे धुंध भरे दिन इतने अच्छे क्यों लगते थे. तब मैं सोचती थी शायद इसलिए कि जब दूर तक कुछ साफ दिखलाई नहीं देता तो यह सोच लेना आसान होता है कि वहां दूरी पर कुछ बहुत खूबसूरत छिपा हुआ है. हालांकि इस डर से भी मैं आजाद हो पाती थी कि सूरज की रोशनी में वह खूबसूरती बदसूरती बनकर उजागर होगी. पर वह बचपन की सोच थी. बातें इतनी सीधी-साफ कहां होती हैं. सवाल खूबसूरती-बदसूरती का है ही नहीं. सत्य कटु हो सकता है, असुंदर नहीं. पर सत्य ठोस सच की परत के नीचे छिपा रहता है. सूरज की रोशनी में ऊपर का सच इतना धारदार मालूम पड़ता है कि सत्य के दर्शन नहीं हो पाते. शाम का धुंधलका जिस्म के उन कटावों को ढक देता है जो आंखों को भरमाकर आत्मा तक पहुंचने नहीं देते. सोचती हूं शायद इसीलिए गुजरे जमाने में औरतें पर्दा किया करती थीं.
उतरी तो मैं शाम ही के वक्त अपने शहर में पर... यह क्या हो गया मेरे शहर को! नहीं, यह मेरा शहर नहीं. या फिर यह शाम का वक्त नहीं. मैं जहां से चली थी परसों सुबह या कल रात, वही हूं अब भी. कहीं और पहुंची नहीं. कुछ घंटों का समय खो जाता है. न वहां से यहां के सफर में. दिन बनी रात को वहां से चली थी और दिन बनी रात को यहां हूं. सुबह उगी ही नहीं बीच में. न शाम का धुंधलका गहराया कहीं. मशीनी उजाले का सन्नाटा छाया था वहां और... यहां भी? हर एक फुट के फासले पर खड़े बिजली के बल्ब तीखी पीली रोशनी फेंक रहे हैं. ऊंची-ऊंची इमारतें, ठेलमठेल मोटरगाड़ियां, हड़बड़ाए लोग, निस्संग, असम्पृक्त. सचमुच क्या मैं अपने शहर में हूं? झींगुर-सी महीन आवाज में भी तो नहीं पुकार रही इस शहर की आत्मा मुझे.
नहीं, यह मेरा शहर नहीं. यह मेरी आत्मा का संगी नहीं. मेरी याददाश्त का सहारा नहीं. रात से रात तक का सफर करके मैंने सुबह खो दी और शाम को दोपहर में तब्दील कर लिया. यह क्या हो गया मेरे शहर को?
बदहवास मैं हवाई अड्डे से बाहर आई और टैक्सी में बैठ गई. बूढ़े ड्राइवर से कहा शहर से दूर जाने वाली किसी भी सड़क पर गाड़ी मोड़ ले. उसने सवाल नहीं किए. गाड़ी अंधेरी सड़क पर बढ़ा दी. अमरीका से लौट रहे ग्राहकों से होशियार व्यापारी सवाल नहीं किया करते.
पता नहीं कितनी देर मैंने सफर किया. रात मुझ पर हावी होने लगी. न जाने कब मेरी आंख लग गई. और तभी नीम बेहोशी में मैंने महसूस किया कोई धीमे से मुझे आवाज दे रहा है. झींगुर-सी महीन आवाज में. बिना चैंके मैं जग गई. समझ गई कि शाम के धुंधलके में इस शहर की आत्मा जिस्म के खोल से बाहर निकल आई है और मुझसे कुछ कहना चाह रही है.
सड़क के किनारे एक विशाल, पर एकाकी इमारती दिखी. चारों तरफ नुचा हुआ बाग, बंजर जमीन, ठूंठ हुए पेड़. लुटा-पिटा एक अभिशप्त बगीचा. न खुले जंगल-सा भव्य, न निजी बाग-सा सजा- संवरा. मुझे लगा वह चिरौरी करती आवाज उसी इमारत के इर्द-गिर्द मंडरा रही है.
मैंने गाड़ी रुकवा ली. खुद उतरी और सामान भी उतरवा लिया. इमारत का नाम पूछा तो शहर का भी पता चल गया. रात के पहरेदार ने बतलाया कि इमारत में कभी भूतपूर्व युवराज का महल था. अब होटल है नाम का. रहने नहीं आते वहां लोग. इक्का-दुक्का यात्राी, वह भी कभी-कभी. जैसे आज मैं. और भूतपूर्व युवराज, पूछने की देर थी कि याददाश्त बांध तोड़ हरहरा उठी, बीते दिनों के कोलाहल ने महीन आवाज को दबा दिया.
जानतीं नहीं आप. 1975 में सरकार ने उन्हें बंदी बनाने के लिए महल का घेरा डाला था. समर्पण करने से इंकार जो कर दिया था हमारे युवराज ने. शहर का कोई अफसर उनकी गिरफ्तारी लेने को तैयार नहीं था. राजधानी से आई थी पुलिस और घेर लिया था महल को.
1975 में? हां, कुछ तारीखें ऐसी होती हैं कि बिना कहे सब कुछ समझा देती हैं. शहरों की तरह तारीखों की भी आत्मा होती है? वही साल तो था जब बप्पा ने मुझे देश निकाला दिलवाया था. इस शहर का भूतपूर्व युवराज और राजधानी की सरकार, एक ही देश के नागरिकों के प्रतिनिधि थे पर कौन नागरिक है, कौन नहीं, तय करने का अधिकार मेरे बप्पा जैसे लोगों के हाथ में था उन दिनों, तभी न मुझे निकाल बाहर किया गया था. आपातकाल था वह मेरे लिए और भूतपूर्व युवराज के लिए जो तब सांसद था विपक्ष का.
उसे घेरकर अपने ही महल में कैदी बना डाला गया था. पर वह कैद में रहा कहां? बंद कमरे के भीतर पिस्तौल कनपटी पर रख मुक्त हो गया. क्या उसकी आत्मा शहर की आत्मा में मिल गई या इस अभिशप्त महल के अंदर-अंदर सिर धुनती भटक रही है? बूढे़ पहरेदार के लिए युवराज ही शहर था पर मैं जानती हूं ऐसा नहीं है. फिर भी 1975 में शहीद हुए लोगों की आत्मा की आवाज सुनने से मैं इंकार नहीं कर सकती थी. जिस्म के कटघरे में कैद मैं कहां-कहां तो भटकी हूं. उसी साल की वेदी पर अपनी आत्मा का बलिदान देने से इंकार करके. आत्मा क्या मैं यहीं छोड़ गई थी? नहीं, मेरे जिस्म में और मेरे शहर में, दोनों जगह बंट-बंट कर भटकती रही थी मेरी आत्मा. सुनूं तब, एक बार कान लगाकर सुनूं. भूतपूर्व युवराज और उस समय के सांसद की आत्मा की आवाज क्या कहना चाह रही है.
बूढ़े पहरेदार की कहानी के खत्म होते ही मैं उस कमरे के पास जा पहुंची जहां उसने कैद और मुक्ति दोनों प्राप्त की थीं. दरवाजे पर ताला लगा हुआ था पर शीशे से भीतर झांक कर देखा जा सकता था. उस अभिशप्त महल में अब भी कोई रोज आकर कमरा संवार जाता था. साफ, तरतीब भरा रख-रखाव था; बिस्तर पर बिखरे ताजे फूल; दीवार पर युवराज की आदमकद तस्वीर. सब कुछ था पर युवराज की आत्मा वहां नहीं थी. शाम के धुंधलके में भी उसने मुझे नहीं पुकारा. पर मुक्त भी नहीं किया पूरी तरह. दूर कहीं से, हल्के सुर में कोई मुझे पुकार कर हिस्सेदारी की मांग करता रहा.
मैं आंखें बंद करके महल के सूखे घास भरे अहाते में बैठ गई. अंधेरा और सन्नाटा गहराता गया और उसी के साथ मुझे पूरी कहानी याद आ गई, जैसी उन दिनों सुनी थी, बाहर भेजे जाने से पहले, पूरी की पूरी.
उसे घोड़े पालने का खब्त था. रेस के घोड़े. महल के पीछे स्टड फार्म हुआ करता था, जहां वह घुड़दौड़ के विजेता तैयार करता था. पुलिस के घेरा डालने पर उसके वे नायाब घोडे़ बिना दाना-पानी दम तोड़ने लगे थे. वही तुरूप चाल थी राजधानी की. घोड़ों की जिंदगी समर्पण न करने की शर्त बन गई थी. तभी उसने कनपटी से पिस्तौल सटा दी थी. उसके मरते ही घेरा हटा लिया गया था. पानी की सप्लाई खोल दी गई थी. रसद अंदर जाने लगी थी. घोड़े बच गए थे. अपनी नालों समेत.
हां, ध्यान से सुना मैंने. उन्हीं घोड़ों के नाल जडे़ पैरों की आवाज थी वह. वहीं अस्तबल के आस-पास भटक रही होगी उसकी आत्मा. अंधेरे में बिना राह टटोले, उसी के सहारे में बढ़ती चली गई. मुश्किल नहीं था उस सुनसान सन्नाटे में आवाज को सुन पाना. पैरों की थपक धीमी जरूर थी पर रात के सन्नाटे में अकेले होने के कारण, चोट जोरदार करती थी, कानों पर, दिमाग पर और दिल पर.
सुनो, आओ, इधर मेरे करीब आओ. मेरी कहानी सुनो. अनकही कहानी समझने का ताब है तो आओ. इसी ध्वनि के सहारे चली आओ. रास्ता पैरों के नीचे की जमीन भर नहीं, पहचान मांगता है. तुम्हारे रास्ते की पहचान यह ध्वनि है मेरे पदचाप की. सुनो.... थप-थप, टप-टप, ढप-ढप, ठप-ठप, कहां से कहां पहुंचा दी तुम लोगों ने ध्वनि मेरे पदचाप की. तुम समझ पाओ शायद...शायद नहीं... शायद... शायद नहीं... शायद...
ठक-ठक, ढप-ढप, टप-टप, थप-थप... थपक खो क्यों गई ठक-ठक में? पदचाप बंध क्यों कई नालों में?
मैं घोड़ों तक पहंुचने से पहले ही बहुत कुछ समझ चुकी थी. शाम का धुंधलका अब पूरी तरह रात के एकछत्रा अंधेरे में बदल चुका था. वहां तक पहुंचने से पहले ही मैं उस ध्वनि को पहचान गई थी. सींखचों से घिरे, बाड़ों में बंद धावक घोड़ों के पैर पटकने की आवाज ही नहीं. उसमें छुपी कसक को भी.
दौड़ने की क्षमता अथक थी. पर दौड़ लगाने के लिए खुला जंगल था मैदान नहीं था. बंधा-बंधाया ट्रैक था और थी मालिक की चुमकार, दांव लगाने वालों की आशा निराशा और जुआरियों का जुआ ढोने वाले नाल जड़े पैर. खड़े-खड़े एक जगह दौड़ लगाने का मायाजाल पैदा करके अपनी तृष्णा शांत कर रहे थे.
पहले बाड़े के सामने ही मैं ठिठककर खड़ी हो गई. आवाज के साथ ऊंचे सफेद अरबी घोड़े की दृष्टि ने मुझे बांध लिया. दौड़ लगाते वक्त आंखों पर पर्दे डले रहते हैं. इस वक्त देखने के लिए मुक्त थीं. जंगल और मैदान के आखिरी छोर पर नजरें गड़ाकर मनचाही दौड़ लगाने के लिए फिर भी नहीं, मेरी तरह. प्यार बांटने वाले हाथों से मैंने उसका चेहरा दोनांे तरफ से थाम लिया सिर पर हाथ फेर पाने लायक ऊंचाई मुझे खुद में मिली नहीं, आंखों से आंखें मिला पाई, यही बहुत था.
तुम गलत थे, बीते हुए कल के युवराज. खुदकुशी करके तुमने अपने अहम को बचाया, घोड़ों को नहीं. तुम्हंे अपने घोड़ों से प्यार नहीं. उनका मालिक होने पर नाज था. इसीलिए तुम्हारी आत्मा की आवाज इनके पैरों की ठक-ठक के बीच खो गई है. बेहतर होता अगर तुम इनके बाड़ों के सींखचे तुड़वा देते, इनके पैरों से नालें उखड़वा लेते, इन्हें आजाद छोड़ देते, अपना-अपना जंगल और मैदान ढूंढ़ने, तय कर पाने के लिए.
उस अरबी घोड़े का चेहरा हाथों में पकड़ उसकी आंखों में आंखें गड़ाकर मैंने अपने पैरों को झाड़ा ठीक किसी रेस के घोड़े की तरह. हल्के से चैंक कर घोड़े ने मेरी तरफ देखा. मेरे आंसुओं की झिलमिलाहट उसकी आंखों के कोरों में उतर आई.
नहीं, उसने मुझसे कहा, तुम्हारे पैरों में नाल नहीं ठुकी. तुम अब भी आजाद हो. रेस में मत दौड़ो. भाग जाओ. रेस शुरू हो उससे पहले भाग जाओ. भाग जाओ-भाग जाओ एक और आवाज उसकी आवाज से आ मिली. नाल ठुके पैरों के आघात से रौंदी धरती से उठकर चारों तरफ फैल गई. समय रहते भाग जाओ. रेस से बाहर हो जाओ वरना मेरी तरह झूठी आजादी के मोहपाश में बंधकर, कनपटी पर पिस्तौल रख गोली चला लेनी पड़ेगी या प्रगति की भूलभुलैया के बीच खड़ी किसी गगनचुंबी इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल से कूदकर शरीर का मलबा बना डालना होगा.
नहीं, उसी क्षण मैंने निर्णय ले लिया. यह नहीं होगा. तुमने मुझे चेताया. तुम्हारी शुक्रगुजार हूं. सिर्फ तुम्हारी नहीं. उनकी भी जिन्हें मैं अपना अपराधी मानती रही हूं. सब मुझे चेता रहे थे. अपने शहर वापस जाने को उकसा रहे थे. उस शहर को नहीं जहां से मैं पहले पहल चली थी पर उस शहर को जो मेरे शहर की भटकती आत्मा संजोए बैठा था. मैं उस शहर में पहुंच गई. अब मैं हारूंगी नहीं और न भागूंगी निरर्थक रेस में.
एक बार घोड़े के माथे पर अपना सिर सहलाकर मैं वापस मुड़ गई.
और जो हो मैं याद रखूंगी मेेरे पैरों में नाल नहीं ठुकी. मैं खुले मैदान में दौड़ सकती हूं. अपना रास्ता चुन सकती हूं. रेस के ट्रैक पर दौड़ना लाजिमी नहीं बना सकता कोई मेरे लिए. मैं आजाद रहूंगी खुद को उन लोगों के साथ रहने के लिए जो रेस में शरीक होने लायक नहीं है.
बप्पा तुम फिक्र मत करना. कोई नहीं जान पाएगा मैं तुम्हारी बेटी हूं. अपनी जवाबदेही से मैंने तुम्हें मुक्त किया. और खुद को तुम्हारा स्वीकार पाने की लालसा से. मां तुम्हें प्रणाम. पर यह खत तुम्हें नहीं भेजूंगी. तुम न जानो तो अच्छा है कि मैं अपने शहर लौट आई हूं. 

और खत भी नहीं लिखूंगी. खत लिखने की मेरी जरूरत आज खत्म हो गई. यह मेरा आखिरी खत है. इसे फाडूंगी नहीं. आखिरी वक्त आने पर अपने शहर के नाम छोड़ जाऊंगी. उस शहर के नाम, जो मेरा अपना नहीं था पर जिसमें मेरे शहर की आत्मा जरूर थी.(हंस, सितंबर 1986)
 

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