6th Jan, 2026
असद ज़ैदी: मेरी पहली जिज्ञासा तो बहुत मामूली है. क्या आपकी वास्तविक जन्मतिथि सचमुच 1 जनवरी है? कागजों में तो मेरी भी जन्मतिथि 1 जनवरी ही है, दरअसल मैं अगस्त में पैदा हुआ था. स्कूल में दाखिले के वक्त अध्यापक महोदय ने 1 जनवरी लिख दिया. वह जमाना ही कुछ ऐसा था. मेरे बहुत सारे सहपाठी या तो 1 जनवरी को पैदा बताए गए थे या 15 अगस्त को और कुछ 26 जनवरी को.
विनोद कुमार शुक्ल: स्कूल में मेरा नाम दर्ज कराने पिता या परिवार का कोई बड़ा-छोटा नहीं गया था.
नांदगांव में सरकारी स्कूल जो स्टेट हाईस्कूल कहलाता था, उसी में भर्ती कराने (जहां तक याद आता है) सौंजिया गया था. सौंजिया खेतिहर मजदूरों की देख-रेख करने वाले को कहते हैं. पांच या छह साल की उम्र तो होगी.
स्कूल में भर्ती करने की सही उम्र को जानने के लिए सिर के ऊपर से हाथ ले जाकर कान छूने के लिए कहते थे. मुझे अपनी उम्र पता नहीं होगी. सौंजिया को भी नहीं. अम्मा को शायद मालूम होगा कि मैं स्कूल में भर्ती होने जा रहा हूं. तैयार मुझे उन्होंने किया होगा या बड़ी बहन ने. बड़ी बहन को कचरा दीदी कहते थे. इसके पहले अम्मा की एक बेटी की जन्म के कुछ ही दिनों बाद मृत्यु हो गई थी, तो टोटका के लिए बड़ी बहन को कचरा दीदी कहते थे. छत्तीसगढ़ में ऐसा होता है. वैसे प्रभा नाम था.
संयुक्त परिवार में बच्चों की देख-रेख जिस तरह होती होगी उसी तरह की देख-रेख थी. भर्ती होने जब गया था तब पिता उस वक्त जीवित थे या नहीं इसका अंदाज नहीं है.
"अम्मा के पास एक टिन का डब्बा था. अम्मा की शादी के दहेज के सामानों के साथ यह साबुन का डिब्बा भी था. उसके ऊपर बांग्ला में साबुन का नाम लिखा था. ऐसा याद आता है. उस डिब्बे में रखे हल्दी लगे पीले धागों में हरी दूब और हल्दी के एक टुकड़े के साथ गठान अम्मा लगा देती थीं. मैं जब एक वर्ष का हुआ तब पहली गठान लगी होगी. यह वर्षगांठ थी. हर जन्मदिन में फिर लगा देती थीं. इस वर्षगांठ के कारण जन्मदिन बस गठ का दिन होता"
पुए बनते थे. परिवार में जो बड़ा होता है वह दूध में काला तिल डालकर पिला देता.
साबुन के खाली डिब्बे में हम तीन भाइयों के वर्षगांठ की तीन सुतलियां थीं. एक बड़े भाई की, मेरी और छोटे भाई की.
बाद में अम्मा से गठान लगाने में भूल होने लगी. जन्मदिन छोटे भाई का होता तो मेरी सुतली में गठान लगा देतीं. इस भूल का पता लगने के बाद में धागों में गठान लगाना बंद हो गया.
छोटा भाई मुझसे दो साल छोटा था. उसका नाम लिखाने मैं गया था. वह स्कूल जाने से मना करता था. मास्टर जी ने उससे नाम पूछा तो वह हाथ छुड़ाकर भाग आया था.
मेरे जन्मदिन के बारे में अम्मा यह बताती थीं कि जिस दिन मेरा जन्म हुआ, उसी दिन कृष्णा टाॅकीज का उद्घाटन हुआ था. कृष्णा टाॅकीज हमारे घर के ठीक सामने बनी थी. अभी भी है. पर हमारा घर टूट-फूट गया, अब नहीं है.
कृष्णा टाॅकीज से हमारा पारिवारिक संबंध था. सेकंड शो के एक-एक डायलाॅग घर में सुनाई देते थे. गानों को सुनकर गुनगुनाया करते थे. घर की बातचीत चुप्पी में बदल जाती थी. और ध्यान सिनेमा की बातचीत में चला जाता था. सिनेमा सुनते, आते-जाते काम करते. किसी के काम में रुकावट होती तो वे टोक देते थे. सिनेमा का उलाहना देते. मैं सिनेमा का पक्का दर्शक था. अम्मा सौर पर थीं, जब उसका उद्घाटन हुआ था. सौर से निकलकर जब भी फिल्म देखने गई हों! गोद में मैं भी रहा होऊंगा. मेरी सिनेमा दर्शक होने की उम्र, असली उम्र से दो-तीन महीने कम की होगी.
असद ज़ैदी: समय में और पीछे जाएं. आपके दिमाग में अपनी पैदाइश से पहले के समय की क्या तस्वीरें हैं और ये कितनी पहले तक की हैं? परिवार की स्मृतियां, पूर्वजों की छोड़ी स्मृतियां, पुराना गौरव, सुख-दुःख, बदनसीबियां, पिछले दौर के किस्से और सामूहिक वृत्तांत, भौतिक निशानियां, वगैरह.
विनोद कुमार शुक्ल: जैसे मेरे जन्म की तारीख, 1 जनवरी 1937 स्कूल के प्रमाण-पत्रा में है. पैदाइश से पहले का समय ढेर सारा है. और, यह विस्मृत के एक कोने में बंद है. उसमें मैं अपनी स्मृति से जो जंग खाई चाबी की तरह है, खोलने की कोशिश जरूर करूंगा. इस उम्र में अभी के समय को याद में बीते हुए से ही प्रायः काटता हूं और हल्का महसूस करता हूं. मैं इसे एक कथा की तरह कह रहा हूं जो कहीं से भी बार-बार शुरू होती है और, जिसका अंत तो अभी हुआ नहीं.
कृष्णा टाॅकीज का जो जनाना गेट था वह हमारे बैठक के कमरे के दरवाजे के ठीक सामने था. बैठक का कमरा लेकिन आॅफिस कहलाता था. पुराना घर, टूट-फूट होने, कुछ नया सुधरने के बाद भी अपने पुराने नाम की जगहों के साथ हमेशा रहा.
जनाना गेट का जो गेटकीपर था वह बहरा और गूंगा था. उसे कोंदा कहते थे. वह ऊंचा-पूरा, हट्टा-कट्टा गहरे सांवले रंग का था. बड़े-बड़े बाल थे. सिनेमा में बहुत भीड़ होती थी, जनाना गेट में खासकर छोटे-छोटे बच्चे भी साथ में होते. कोंदा उनको संभाल लेता था. और बिना टिकट कोई अंदर घुस नहीं पाता था. सप्रे बदर्स की टाॅकीज थी. क्षीरसागर मैनेजर थे. सफेद कुर्ता, धोती पहनते थे और सोलो हैट लगाते थे.
हमारे परिवार ने टाॅकीज खुलवाने में सप्रे बदर्स की मदद की थी. खासकर छोटे चाचा किशोरीलाल ने और पिता ने. छहः चाचाओं का संयुक्त परिवार था.
कोंदा घर के पिछवाड़े में रहता था. पीछे गोशाला भी थी. दूध कभी कम पड़ता या राउत दुहने नहीं आता तो गोशाला से लाते थे. कोंदा घर में पतंग, चकरी बेचता था. मंजे बनाता. सोडा की बोतलें टूटी-फूटी उसके घर में पड़ी होतीं. सोडा बोतलों से निकली कांच की गोलियां बेचता.
बाबा उत्तर प्रदेश से आए. उन्नाव जिले में जगतपुर नाम की जगह थी, वहीं उनका जन्म हुआ था. बाबा का नाम रामलाल था. उनके पिता का नाम जानकी प्रसाद था. बाबा कुछ पैदल, कभी बैलगाड़ी में बैठकर, कुछ रेलगाड़ी से आए. और नागपुर के पास कामठी में कुछ दिन के लिए बस गए. कामठी में उत्तर प्रदेश से ही आए ब्राह्मण हलवाई के यहां काम करने लगे. छोटी-सी हलवाई की दुकान थी. अजिया उसी दुकानदार की बेटी थीं. फिर बाबा राजनांदगांव आ गए. कुछ परिचितों का उन्हें सहारा मिला था.
फिर वे ठेकेदारी का काम करने लगे और धन कमाया. घर के पीछे एक कमरा था. वहां अलसी की कोठी थी. यह अलसी की कोठी बाबा की तिजोरी थी. बाबा बदरा भर रुपया कमाते और अलसी की कोठी में डाल देते थे. रुपए की थैली तल तक चली जाती. चोर चुरा नहीं सकता था. अगर कोठी में घुसे तो वह भी तल तक डूब जाता और निकल नहीं पाता. चोर अलसी की कोठी में जाने की हिम्मत नहीं करता था. उस समय उठाईगिरी जैसी चोरी होती थी. बड़ी चोरी नहीं होती थी. पकड़े जाते थे.
नांदगांव में घर बनाने बाबा ने किसी भूतनाथ नामक व्यक्ति से जमीन खरीदी थी. जब उन्होंने घर बनवाना शुरू किया तो नींव में जमा की हुई कौड़ियां निकली थीं. किसी समय, उस समय से जो दूर नहीं था. कौड़ियों का मुद्रा के रूप में चलन था. ढेर-सी ये कौड़ियां घर में बहुत दिनों तक रहीं. खेलने के लिए और बांटने के लिए जब-तब निकलतीं. फिर इक्का-दुक्का कोने-कोने में पड़ी मिल जाती रहीं. पुराने सुख-दुःख ऐसे कुछ और, जैसे अम्मा के पास जो पुरानी साड़ियां, लहंगे थे उनमें जो जरी का काम था, उसमें सोना-चांदी भी लगा था. जब पैसों की जरूरत होती तो सुनार को बुलाते थे. वह देखता. जलाकर देखता. और कुछ रुपए देकर चला आता था. हम लोग भी सुनार के पास खड़े यह सब देखते. अम्मा आड़ में होतीं. आंखों में कभी आंसू भरे होते, कुछ याद आता होगा.
पिता को हम लोग बापजी कहते थे. बापजी की मृत्यु के बाद कुछ दिन जो बहुत ज्यादा दुःख के दिन थे, बीते. तब शायद दुःख सहने की आदत नहीं पड़ी थी. अम्मा को ज्यादा दुःख सहने की आदत बहुत जल्दी पड़ गई थी. हम लोगों को बाद में पड़ी.
छत्तीसगढ़ के ‘नाचा’ में तो दुःख का मजाक उड़ाकर दुःख से ही मनोरंजन करते हैं.
घर में शिकार करने का शौक सभी चाचाओं को था. सभी के पास बंदूकें थीं. दो चाचा सब-इंस्पेक्टर थे. सबसे बड़े चाचा जंगल विभाग में ठेकेदरी करते थे. उनसे जो छोटे थे वे भी पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर थे. कुछ तुर्की नुमा टोपा था. पुलिस की पोशाक थी. फिल्म में देखी पुलिस की पोशाक की तरह. उनके पास एक तलवार भी थी जो इधर-उधर टंगी कभी दिख जाती. कुछ इस तरह की चीजें याददाश्त में भी टंगी हैं.
असद ज़ैदी: क्या आपके पास आपके बचपन के समय की एक या एक से अधिक तस्वीरें मौजूद है जिसमें आपका परिवार और वृहत्तर कुनबे के अनेक सदस्य, छोटे-बड़े, एक ही फ्रेम में मौजूद हों? क्या उन्हें आप समय-समय पर देखते हैं?
विनोद कुमार शुक्ल: घर में पुरानी तस्वीरें हैं. पर मेरे बचपने के समय की केवल एक ही तस्वीर है. उस तस्वीर में परिवार के बुजुर्ग नहीं हैं. उसमें मैं, छोटा करीब चार-छह साल का हूं. साथ में घर में काम करने वाली बाई फुलेसर दाई और उसका बड़ा बेटा भग्गू है.
फुलेसर दाई का मरते दम तक हमारे परिवार से संबंध रहा. जब उनकी मृत्यु हुई तब मैं चैदह-पंद्रह साल का रहा होऊंगा. काम करना उसने बुढ़ापे में बंद कर दिया था. छोटे चाचा उसे पंद्रह रुपए महीना पेंशन देते थे. वह नब्बे अंश तक कमर से झुक गई थी, वैसे ही परिवार की तरह घर का निरीक्षण करते हुए रहती थी.
बाबा की एक कुर्सी अभी भी मेरे पढ़ने के कमरे में है. पिता भी बैठे होंगे, उस कुर्सी पर. मेरियो आफरीदी जिन्होंने मेरी कविताओं का अनुवाद इतालवी में किया है, किताब के विमोचन के अवसर पर मैं इटली गया था. उनके घर पर ठहरा था, लव्हेरो में उनके घर में तीन-चार सौ वर्ष पुराना फर्नीचर था. उन्होंने कहा रात में ये फर्नीचर फैलते सिकुड़ते हैं और इनकी आवाज होती है. रात में सचमुच मुझे कुछ आवाजें सुनाई दीं, जो बिलकुल नई आवाजें थीं. भाषा में भी आवाज होती है, जब हम बोलते हैं. मैंने अनुमान लगाया वे अपनी आवाज की भाषा में मुझसे कुछ कह रहे हों!
पुरानी तस्वीरों को देखने का, देख लेने का कारण जो थोड़ा भावुकता भरा जब तब हो जाता है. यह देखना इतना कभी है कि जब-तब से भी कम है. बस मन में आता है और देखना रह जाता है.
असद ज़ैदी: जीवन के पहले दस साल की स्मृतियां कैसी हैं? इस दौर में आपके परिवार या व्यापकतर कुनबे की क्या शक्ल थी? कौन-कौन लोग थे? आपने पढ़ना-लिखना घर के अंदर कैसे शुरू किया? किस-किस ने आपको पढ़ाने-सिखाने में दिलचस्पी ली? स्कूल जाने से पहले आप क्या-क्या सीख चुके थे? घर में कौन-सी पत्रिका या किताबें थीं? कैसे किस्से-कहानी सुनने को मिलते थे? उस समय के आपके साथ के बच्चों में कितनों को क्या-क्या याद है? कुछ अपनी और कुछ दूसरों की स्मृति को मिलाकर उस समय की क्या तस्वीर बनती है?
विनोद कुमार शुक्ल: जीवन के पहले दस सालों की स्मृतियां ही सबसे अधिक बची स्मृति है.
बहुत बड़ा परिवार था. बचपन को याद करने का कितना अच्छा उपाय है, इस उम्र में बचपना करना.
"भूतनाथ के समय लगा हुआ पीपल का पेड़ तब भी था. थोड़ी तेज हवा चलती तो डालियां जैसे अपने हाथों से पत्तियों की ताली बजातीं खुशी प्रकट करती दिखतीं. पत्ती हवा में उड़कर हमारे आंगन में गिर जातीं, जिसे उठाकर हम पिपहरी बनाते. अब कुछ सालों से बच्चों के लिए लिखकर कुछ पिपहरी बजाने जैसा खुश होता हूं"
पिपहरी
पत्ती को लपेटकर
बनाते पिपहरी
फूंकते तो सीटी बजती थी
उस सीटी की आवाज सुनने
दो-चार पत्तियां खराब कर एक पिपहरी
क्या बना सकूंगा! जैसे
दो-चार वाक्य खराब कर
एक पिपहरी कविता.
घर से जो चाचा अलग हुए, शिव बिहारी चाचा थे. बुआ जब कष्ट में हुईं तो उन्हें भी चाचा जी ने यहां मायके घर बुला लिया. छोटी चाची की मृत्यु भी बहुत पहले हो गई थी. इतना मुझे याद है कि एक ट्रक था. उसमें गद्दे बिछे थे और एक आराम कुर्सी में छोटी चाची बैठी हुई थीं. उस कुर्सी को ट्रक पर रखा गया. उन्हें इलाज के लिए नागपुर के अस्पताल ले जा रहे थे. उनकी बेटी थीं, जो मुझसे कुछ साल बड़ी थीं. एक बेटा है, जो दो साल छोटा है, वो नांदगांव में अभी भी है. छोटी चाची फिर नहीं रहीं.
उस समय पूरे परिवार का खाना एक साथ बनता था. बहुत बड़ी बटलोही थी भात पकाने की. एक बड़ी परात में बटलोही के भात को पसाने दो लोगों की जरूरत होती थी. पसिया को कलई की गई एक पीतल की बाल्टी में भरकर रखा जाता था. उन दिनों भीख मांगने वाले, भीख में पसिया भी मांगते थे. आवाज देते थे-बाई...पसिया दे दे बाई. उनके पास बर्तन होता. उसमें पसिया गिलासभर डाल देते थे जिसे वे पी लेतीं या साथ रखतीं. बरामदे में अजिया बैठी होतीं. घर में क्या हो रहा है, इस पर उनकी नजर रहती. अजिया की एक छोटी लकड़ी की पेटी थी. अजिया इस पेटी को किसी को भी छूने नहीं देती थीं. कभी कुछ मौका आता इधर-उधर करने का तो अम्मा पर ही उनको विश्वास था. अम्मा को सब बिट्टी कहते थे. पेटी सुंदर थी. उसमें पीतल की पट्टियां जगह-जगह लगी थीं जो चमकती थीं. पेटी के अंदर तरह-तरह के छोटे बड़े खांचे बने थे. कुछ चिल्हर, लौंग, इलायची, कुछ आयुर्वेदिक दवा की गोली होगी. और अफीम की गोलियां भी थीं. काली मिर्च के बराबर. लकड़ी की राख की मदद से ये गोली बनती थीं. आपस में चिपके ना इसलिए.
अजिया के दोनों कानों में सोने के कुछ छल्ले लटके थे. परिवार से किसी लड़की की शादी, विदाई या नई बहू के आने में अजिया किसी को बुलाकर उतरवाती थीं और दे देतीं. अजिया सबसे ज्यादा एक पोते जिनको धुन्ना कहा जाता था, सबसे ज्यादा प्यार करती थीं. धुन्ना के पिता भी सब-इंस्पेक्टर थे. खुद की रिवाल्वर से उनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. तब यह भी अफवाह थी कि उनकी हत्या की गई थी. धुन्ना को हम सब भय्या जी कहते थे. उनके पिता की मृत्यु मेरे जन्म के पहले हो गई थी. उनकी मां को सब लोग अम्मी कहते थे. रिवाल्वर से जब चाचा की मृत्यु हुई थी तब अम्मी उन्नीस साल की थीं. मैं उन्हें जब तब दीवाल से सिर टेके रोते देखता था. बहुत दुःख होता था. भय्या जी सबसे कम बात करते थे. केवल बात करने पर हां! हूं! ही बोलते. उनको खाना परोसते समय चैकन्ना रहना पड़ता था. वे मांगते नहीं थे कि रोटी या भात दो. खाते-खाते रुक जाते. तरकारी दें? एक-एक चीज पूछना पड़ता था. खाने के लिए आते और पाटे पर बैठ जाते. कुछ देर बैठे रहते. किसी कारण किसी का ध्यान नहीं गया तो वे उठकर चुपचाप चल देते थे. और बाद में परोसने वाले पछताते.
अम्मी और अम्मा चचेरी बहनें थीं. अम्मी के पिता यानी मेरे छोटे नाना बहुत धनी थे. कानपुर में झकरकटी पुलिस थाने के सामने उनका बड़ा मकान था. बचपन का काफी समय कुछ सालों तक कानपुर में भी बीत जाता था. टांगे का कोचवान खाकी रंग की पोशाक के साथ आता था. छोटी नानी भी थीं. अम्मी का भय्याजी का वहां बहुत मान था. अम्मा का भी. अम्मा के पिता का भी एक मकान कानपुर में था और वह लाल बंगला कहलाता था. अम्मा के पिता का नाम मुझे याद नहीं. छोटे नाना का नाम दुर्गाशंकर दीक्षित था.
अम्मा के पिता का ढाका के पास जमालपुर में मिट्टी तेल का बड़ा करोबार था. पद्मा नदी के पास घर था. गोपाल बाड़ी कहलाता था. नाना रोज सुबह मुंह अंधेरे नदी में नहाने जाते थे. एक दिन लौटते समय उनकी हत्या हो गई. फिर सारा परिवार अस्त-व्यस्त हो गया और इधर-उधर कानपुर और इलाहाबाद, झांसी में फैल गया.
उनसे कोई संबंध बरसों से नहीं है. कानपुर के मोतीमुहाल में देवी की मड़िया के पास अम्मा के चचेरे भाई रहते थे. बाबू दादा कहलाते थे. कानपुर के घंटाघर के पास दीक्षितपुरा था. वहां भी नाना के रिश्तेदार रहते थे.
वैसे बाबा का घर जहां से आए थे वह तो जगतपुर है. उन्नाव जिले में. उसी के पास भगवंतनगर है. वहां बड़े भाई की ससुराल है. उनकी सोने, चांदी और कपड़े की दुकान थी. भाभी के पिता कालीचरण मिश्रा थे. उनका एक घर था भगवंतनगर में जो काठबंगला कहलाता था. उनका आसाम में कारोबार भी रहा. वे फिर भगवंतनगर लौट आए थे.
बड़े चाचा और बड़ी चाची के बारे में मैं जरूर बताना चाहूंगा. बड़े चाचा जो सबसे बड़े थे वे भी बाबा के रहते ही अलग हो गए थे या बाबा की मृत्यु के बाद, यह याद नहीं. ये बड़े चाचा मन्ना महराज कहलाते थे. इनके पास आने-जाने के लिए एक बैलगाड़ी थी. दोनों बैल सफेद थे. बैलगाड़ी में सफेद गद्दी बिछी रहती. गाव तकिया रहती. नांदगांव से कुछ दूर उन्होंने घर बनवाया था. नांदगांव उस समय छोटा था. नांदगांव आना-जाना वे बैलगाड़ी से करते थे. बंगला जा रहे हैं कहते और छुट्टियों में चले जाते थे. खेलने-कूदने की वहां बहुत जगह थी. बंगला बड़े क्षेत्रा में बना था. तरह-तरह के पेड़-पौधे थे. एक बहुत बड़ा कुआं था जिसमें पानी झिरने की आवाज आती थी.
बड़े चाचा ने काले मुंह वाला एक बंदर पाला था. एक मैना भी थी जो सामने बरामदे में टंगी रहती. बरामदे में पांच भुजा की संगमरमर की एक टेबिल थी. एक आराम-कुर्सी भी और दो-तीन कुर्सियां थीं.
कोई मिलने आता तो पुकारता- महराज हैं!
तो मैना बोलती- महराज हैं, महराज हैं. बार-बार बोलती और घर में सब जान जाते थे कि कोई आया है.
बड़े चाचा भांग खाते थे. जो मिलने आता उनको भी कभी भांग की गोली दे देते थे. हम लोगों को भी कभी छोटी-सी गोली दे देते. पैर छूते थे तो खुश रहो बोलें या न बोलें, अच्छे से पढ़ो-लिखो का आशीर्वाद जरूर देते थे. उनका बच्चों को भांग की गोली देना किसी को भी अच्छा नहीं लगता था. तब सत्तर-पचहत्तर साल उनकी उम्र होगी. एक दिन नहाते समय गिर पड़े. सिर पर चोट लगी थी तो मृत्यु हो गई.
बड़ी चाची को गठिया का रोग था. और बड़े चाचा के मरने के पहले से यह रोग था. बरसों बिस्तर पर ही पड़ी रहीं. कभी कहानी भी सुनाती थीं. वे केवल डरावनी कहानी सुनाती थीं. भूत-प्रेत की, जादू की. कहती जरूर थीं कि भूत-प्रेत से सामना हो तो डरना मत. कहानी सुनकर मैं बहुत डर जाता था. बंगले से लौटते समय रास्तेभर बहुत डरे रहते. सतर्क रहते. बड़ी चाची से मालूम पड़ा था कि भूत-प्रेत के पैर उल्टे होते हैं. और वे किसी भी वेष में आ सकते हैं. हम कुछ लोगों को एक दिन बड़ी चाची कहानी सुना रही थीं. गरमी के दिन थे. बड़ी चाची ने कहा- बहुत गरमी है. पड़ोस की लड़की जो उनके पास बैठी थी हाथ को डुलाने लगी, जैसे हाथ में पंखा पकड़ा हो. पर थोड़ी देर बाद देखा तो सच में उसके हाथ में पंखा था. उसके हाथ से पंखा लेकर बड़ी चाची खुद पंखा झलने लगीं. तब बड़ी चाची ने भी कहा था कि जब मैं कहानी सुनाती हूं तो भूत-प्रेत भी तो कहानी सुनते होंगे! पंखा झलने वाली लड़की के पैर मैंने देखने चाहे कि उल्टे तो नहीं! तो उसके पैर फ्राॅक से छुपे हुए थे. बड़ी चाची ने कहा- शंख बजाओ तो भूत-प्रेत भाग जाते हैं. वह लड़की उठकर खड़ी हो गई. जैसे वह शंख लाने जा रही है. वह बहुत चुप और शांत लड़की थी. तभी किसी ने कहा-लो शंख बजने लगा. पर वह शंख की आवाज नहीं थी. भाप वाले इंजन की आवाज थी. बड़े चाचा के घर के पास ही रेल की पटरियां गईं थीं. थोड़ी दूर पर नांदगांव स्टेशन था.
और, एक कहानी जो अजिया सुनाती थीं, उसकी एक लाइन कहीं बीच की बस याद है. वह लाइन है- ‘बिन मूंछन की फौज बुलाए लीन्हेंव.’ मूंछन का उच्चारण मोवच्छन करती थीं.
असद ज़ैदी: जब मुल्क आजाद हुआ आप दस साल के थे. आजादी की खबर और उसका एहसास आप तक किस तरह पहुंचा? उस समय को आपने कैसे ग्रहण किया यह आपको जरूर याद होगा. आस-पास के माहौल में आपने क्या तब्दीलियां पाईं?
विनोद कुमार शुक्ल: मैं अपनी स्मृतियों को दुहरा रहा हूं जो विस्मृति को पुराने स्वेटर को उधेड़ना जैसा है, एक गोले में.
बाबूलाल महराज की होटल में एक रेडियो था, जो सार्वजनिक था. उस वक्त रेडियो इतना सामान्य नहीं था कि हर घर में हो. अखबार की खबर पुरानी होती. रेडियो उसी समय की खबर का जरिया था.
कृष्णा टाॅकीज के कारण सड़क पर भीड़ अधिक रहती. शाम का समय था, मैं अपने घर के सामने सड़क पर था. चीना बादाम (मूंगफली), चने के खोमचे वालों ने अपने कार्बाइड के लैंप जला लिए थे. बिलकुल अंधेरा नहीं हुआ था. कृष्णा टाॅकीज के बल्वों का उजाला था. एक रुपए का सिक्का मुझे सड़क पर पड़ा दिखा. मैंने आस-पास देखा कि किसका सिक्का है ताकि मैं उसे दे दूं. कुछ देर मैं सिक्के को हाथ में लिए रहा. फिर घर के अंदर गया. उधर बाबूलाल होटल के सामने समाचार सुनने वालों की भीड़ थी. घर के अंदर सन्नाटा था. एक जगह बैठी अम्मा रो रहीं थीं. छोटे चाचाजी के रेडियो से घर को मालूम हो गया था कि गाँधी जी को गोली मार दी गई.
किसी तरह तब मैंने अम्मा से कहा कि सड़क पर यह एक रुपए का सिक्का मिला है. रुपए दिखाते हुए कहा था. अम्मा ने कहा-कांदी ले के सड़क पर डाल देना. गाय खा लेगी. कांदी हरी घास को कहते थे. हरी घास का बोझा लिए बेचने वाली बड़े-सुबह निकलतीं थीं. आजादी के लिए कुछ घटित घटनाओं की मुझे जानकारी थी जो मुझे जब-तब, धीरे-धीरे मालूम हुई होंगी!
असद ज़ैदी: जिसे हम नेहरू युग कहते हैं वह आपके लड़कपन, जवानी और एक प्रकार की परिपक्वता तक पहुंचने के साल थे. सन् 1964 में, जब नेहरू और मुक्तिबोध दोनों का देहांत हुआ, आप 27 साल के थे. यह आपके भी जीवन का एक डिफाइनिंग पीरियड था जिसमें आप बड़े हुए, जरूरी शिक्षा प्राप्त की, दुनिया को अपनी तरह से समझा, विभिन्न प्रभावों को जज्ब किया और अपनी जीवन की दिशा भी तय की. 1964 राष्ट्रीय जीवन में एक निर्णायक बिंदु था, जैसा कि आपके जीवन में भी रहा होगा. आपके जीवन में क्या-क्या हुआ? सिंहावलोकन करने पर सन् 47 से 64 के बीच के मुल्क का और उसी के समानांतर अपना जीवन अब कैसा दिखाई देता है?
विनोद कुमार शुक्ल: जलियांवाला कांड हुआ था जिसमें बैसाखी के दिन चैदह सौ से अधिक लोग मार दिए गए. अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां, भगत सिंह को जब फांसी दी गई तब वे चैबीस वर्ष के थे. चन्द्रशेखर आज़ाद भी चैबीस-पच्चीस साल के रहे होंगे. नमक सत्याग्रह, दांडी यात्रा को बच्चा-बच्चा जानता था. गाँधी-नेहरू आदि ये स्वतंत्राता के समानार्थी शब्द हैं. मुझे अच्छी तरह याद है, मैं नेहरू जी और गाँधी जी की बहुत अच्छी तस्वीरें स्कूल में चित्राकला की कक्षा में बनाता था.
असद ज़ैदी: 1947 से 1964 के इसी दौर में कमोबेश आपकी रचना यात्रा भी शुरू हुई और आगे बढ़ी. बीस, पच्चीस और सत्ताइस साला विनोद कुमार शुक्ल क्या लिख और सोच रहे थे? हिंदी का साहित्यिक परिवेश किस रूप में आपके सामने था? या जीवन की दूसरी बुनियादी चिंताएं साहित्यिक चिंताओं पर हावी थीं?
विनोद कुमार शुक्ल: मैंने जो जाना, सोचा उसे ही लिखा. मेरा लेखन आत्मकथात्मक ही है. और अपने लिखे से अच्छा लिखने की कोशिश की. दूसरों से अच्छा लिखूं ऐसा कभी नहीं सोचा.
"अभी भी लिखता हूं कि कुछ अच्छा लिख सकूं. एक छोटी कहानी, कविता आदि. उपन्यास लिखने की अब नहीं सोचता. पहले जीवन की दूसरी बुनियादी चुनौतियां साहित्य के समय को कम करती होंगी. अब तो बिलकुल नहीं. पहले भी लिखने का समय बचा रहता था. लिखते समय कुछ लिख सके यह लिखे हुए में दर्ज तो है. जो मेरी लिख सकने की कोशिश है. यह कोशिश सांस लेने की तरह जिंदा रहने की कोशिश है"
पहले तो साहित्यिक आयोजन कम होते थे. जब साहित्यिक गतिविधियां बढ़ीं तो साहित्य में राजनीति भी बढ़ी. बड़े आयोजन या तो सरकारी होने लगे या फिर सरकार के सहयोग से. साहित्यकारों को बड़ेे स्टार होटलों और खाने-पीने का मौका मिला. साहित्यकारों को लगा कि उनकी इज्जत बढ़ी. नया अनुभव था. आयोजनों में तू-तू, मैं-मैं भी होती. चालाकी से जिनका अपमान करना होता उसका अपमान भी होता. प्रायः यह सब तू-तू, मैं-मैं अंतिम आयोजन के बाद खाने-पीने के समय होता. फिर थोड़ा-बहुत कभी भी. फिर मोह भंग भी.
असद ज़ैदी: मुक्तिबोध को उनके समकालीनों ने और उस दौर के युवतर लोगों ने, जो उनके संपर्क में आए, अपनी-अपनी तरह से याद किया है. आपसे भी समय-समय पर उनके बारे में पूछा जाता रहा है और आप अपने संस्मरण और उनसे अपनी व्यक्तिगत वाबस्तगी पर थोड़ा-बहुत कहते रहे. इसलिए मैं आपको फिर से उस विस्तार में नहीं ले जाना चाहता लेकिन एक बीज प्रश्न हर हाल में पूछना चाहूंगा. आप चाहे संक्षेप ही में बताएंµआपके अपने मुक्तिबोध कैसे थे?
विनोद कुमार शुक्ल: मेरे अपने मुक्तिबोध मेरे देखे हुए मुक्तिबोध थे. मुक्तिबोध जिन्हें मैंने सुना था, मेरे मुक्तिबोध थे. और, मुक्तिबोध जिन्हें मैं याद करता हूं वे मेरे मुक्तिबोध हैं.
सन् 1958 में नांदगांव आने के बहुत पहले मुक्तिबोध जी का हमारे परिवार से संबंध था. जब मुक्तिबोध ‘हंस’ पत्रिका में काम करते थे. बनारस से शायद यह पत्रिका निकलती थी. तब पत्रिका भेजने की सूची में एक पता उन्हें मजेदार-सा लगा था. बाद में उन्होंने जब-तब जिक्र किया था जब वे नांदगांव आए. सूची में जो पता था वह था-बैकुंठनाथ शुक्ल, बैकुंठपुर (म.प्र.). मेरे दूसरे सबसे बड़े चाचा थे, उनका नाम शिवबिहारी शुक्ल था. वे बाबूजी कहलाते थे. उनके बड़े बेटे थे बैकुंठनाथ शुक्ल. बाद में वे मुक्तिबोध के मित्रा भी हुए. बैकुंठनाथ शुक्ल कम्युनिस्ट पार्टी में थे. अंडरग्राउंड भी रहे. हम लोग उनको रज्जनदादा कहते थे. मुक्तिबोध जी से उनका पत्रा-व्यवहार भी रहा. रज्जनदादा की बहुत कम उम्र में, शायद बत्तीस-तैतीस साल में मृत्यु हो गई थी. ब्लड कैंसर था. रज्जनदादा की मृत्यु के बाद बाबूजी के परिवार को छोटे चाचा (किशोरीलाल जी) ने नांदगांव घर बुलवा लिया कि साथ रहेंगे. वे बहुत पहले अलग हो गए थे.
बाबूजी एक दिन दोपहर को रज्जनदादा की पेटी खोलकर बैठे थे. पेटी में मुक्तिबोध जी की चिट्ठियां भी थीं. जिन्हें बड़बड़ाते हुए फाड़ रहे थे. तब मैंने मुक्तिबोध जी को नहीं जाना था. जानता तो चिट्ठियां फाड़ने नहीं देता. छोटा था तब बैकुंठपुर मैं भी गया था और मैक्सिम गोर्की का नाम जाना था. उन दिनों टाॅलस्टाॅय, गोर्की, दास्तोवस्की, चेखव की किताबें लोकप्रिय थीं. मैंने ‘मेरा दागिस्तान’ भी उन्नीस-बीस साल की उम्र में पढ़ लिया था. कुछ ही दिनों बाद मुक्तिबोध नांदगांव आ गए थे. पुरानी किताबों की दुकान भी थी. जमीन पर फैली किताबें होती थीं. पीपुल्स पब्लिकेशन की कई किताबें होतीं. मैं वहां जाता था. मुक्तिबोध जी ने भी इस दुकान का जिक्र किया था.
मुक्तिबोध जब नांदगांव आए तब एक्जिमा से पीड़ित थे. जब मिलने जाता तो मालूम होता कि नीम की पत्तियां तोड़ने गए हैं, तो मैं भी चला जाता. कोमल पत्तियों को वे चबाते थे. पत्तियों को पीसकर पैर में लगाते थे. रानीसागर में मैंने एक-दो बार नहाते भी देखा. ज्यादातर छुट्टियों के दिन जाता था. उनके साथ घूमने भी चला जाता था. साहित्य की बातें ज्यादा नहीं होती थीं. कभी देश-विदेश की राजनीति पर बातचीत होती थी. मैं उन्हें ज्यादा सुनता था और पूछता ज्यादा था. कहता बहुत कम.
टिपरिया चाय की दुकानों में ही चाय पीते थे. आधी कप चाय की प्याली को सिंगल कप कहा जाता था. मुक्तिबोध चाय वाले से कहते-दो सिंगल गरम चाय देना और दो गिलास ठंडा पानी. गरम चाय के पहले वे ठंडा पानी जरूर पीते थे. बीमार होने पर मुक्तिबोध जी भोपाल चले गए. रेडियो में उनकी खबर सुनते.
असद ज़ैदी: उस दौर में यानी 1960 के दशक में किन लेखकों के संपर्क में आप आए और उनसे कितनी घनिष्ठता रही? कुछ मुक्तिबोध के आसपास के लोग रहे होंगे और कुछ उस हलके के अलावा. आपका 30 साल की उम्र तक का समय शायद जो इलाका आज का छत्तीसगढ़ है उसी में गुजरा. आज भी आप बाहर कम ही निकलते हैं जब तक कि कोई ठोस वजह न हो.
विनोद कुमार शुक्ल: लेखकों से घनिष्ठता उतनी नहीं थी. मेरा सभी लेखकों के साथ आदर का, औपचारिकता का संबंध ज्यादा था. लगभग तीस साल की उम्र तक मेरा समय सचमुच छत्तीसगढ़ में ही गुजरा. लेकिन मैं अपने घर से बाहर था. अमेरिका से डब्ल्यू. एच. वीव्हर नाम का एक लड़का जो पीएच.डी. के लिए शोध करने रायपुर के पास एक टिल्डा नाम के गांव आया. मैंने उसके इंटरप्रेटर की तरह तीन महीने काम किया. टिल्डा में मिशनरी आवास थे. वहीं रहता था. उस तरफ बहुत से लोगों ने धर्म परिवर्तन किया था. गांवों में बहुत गरीबी थी. टिल्डा में भी. नाम अंग्रेजी हो गए तो सुनाई देता कैथरीन गोबर थाप रही है. तो अजीब लगता था कि पहनना, ओढ़ना, खाना, दुःख वही गरीबहा ही था. जिंदगी के अनुषंग बदल गए थे. फिर कृषि विस्तार अधिकारी के रूप में तीन-चार महीने अभनपुर ब्लाॅक के पास खोरपा गांव में था. बस्तर के जगदलपुर के मल्टीपर्पस स्कूल में मास्टरी कुछ दिन की. इसके बाद सन् 1964 के आस-पास छत्तीसगढ़ छूट गया और ग्वालियर कृषि महाविद्यालय में डिमाॅस्ट्रेटर हो गया.
असद ज़ैदी: मुझे आपकी एक बात याद रहती है. किसी से बातचीत में आपने कहा था कि आप हिंदी साहित्य पढ़कर लेखक नहीं बने हैं, कि आपने एक अर्से तक बहुत ही कम हिंदी साहित्य पढ़ा था. मेरा खुद यह मानना है कि जहां तक रचनात्मक लेखन का सवाल है साहित्य कभी साहित्य से नहीं उपजता. उसके और भी बहुत से स्रोत होते हैं. और कम से कम एक भाषा विशेष का साहित्य समूचा उसी भाषा की साहित्यिक परंपरा से पैदा होता हो, यह बात मुझे नाकाफी बल्कि बचकानी लगती है. लेकिन हमारे यहां साहित्येतिहास और पठन-पाठन की जो परंपरा है उसमें यही संकीर्ण रूढ़ि काम करती है. किसी लेखक के काम को उसके पूर्वजों के काम से सीधी रेखा में देखा जाता है और वह भी सिर्फ उसी की भाषा, इलाके और पठन-पाठन की संस्कृति के सिलसिले में. लेखक के रचनात्मक व्यक्तित्व को उसके देश, काल, सामान्य इतिहास, सामाजिक परिस्थिति, व्यक्तिगत अनुभव, अन्य भाषाओं, कलाओं, लोकप्रिय माध्यमों से संसर्ग के हवाले से देखने पर बल नहीं दिया जाता. इस वजह से आपके काम को एक सीधी साहित्यिक धरोहर के नैरंतर्य में रखने या उसी के संदर्भ में परिभाषित करने से एक ही नतीजा निकलता है कि अक्सर फोकस आपकी शैली और उसके अनूठेपन पर बना रहता है. इस तरीक़ेकार से आपको कुछ असंतोष तो जरूर रहता होगा.
विनोद कुमार शुक्ल: स्कूल में हिंदी विषय था. फिर रायपुर साइंस काॅलेज आया. वहां भी हिंदी निबंध एक विषय था. साइंस काॅलेज में इंटर में फेल हो गया. दो विषयों में फेल हुआ था. एक विषय हिंदी निबंध था और दूसरा आॅर्गेनिक कैमिस्ट्री. इसलिए काॅलेज से निकलना पड़ा. कृषि महाविद्यालय, जबलपुर में था, फिर वहां पढ़ा.
"मेरे लेखन के बारे में जो जैसा भी लिखा जा रहा हो उस तरीकेकार से कोई खास असंतोष नहीं हुआ. एकाध बार कभी हुआ हो"
रचनाएं जो हैं, चाहे वे कला और संगीत के रूप में या कविता, कहानी के. उसमें समझाने की स्थिति के बिना खुद समझने की स्थिति होनी चाहिए. दूसरे की समझ से समझना और अपनी समझ से समझने में बड़ा अंतर है. जिंदगी के अनुभव से साहित्य बनता है. साहित्य पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले के अनुभव अलग होते हैं. संस्थानों में रचना का अर्थ पढ़ाने वाले के अनुभव के आधार पर होता है. साहित्य को जानने के तरीके-अंदाज में किसी रचना का अर्थ लगाने में मैं ही पहला पाठक और आखिरी पाठक होता था. चाहे, खुद की रचना हो.
असद ज़ैदी: संक्षेप में आपके जीवनानुभव ने आपकी वैचारिकता या सोचने के तरीके और लेखन को कितना प्रभावित किया है? इसी तरह, देश के राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम और वैश्विक परिस्थिति किस तरह आपकी सोच और आपकी रचना पर असर अंदोज़ हुई?
विनोद कुमार शुक्ल: देश के राजनैतिक, सामाजिक घटनाक्रम और वैश्विक परिस्थिति का रचना पर जरूर असर पड़ता है. जो मेरी रचनाएं हैं इसी असर का परिणाम हैं. रचना में बोलना मैंने इसी से सीखा है. इसमें मुझे संदेह नहीं. पर मैं अभिव्यक्ति में कितना सार्थक था, यह मैं नहीं जानता.
रास्ते मालूम नहीं होते भटककर ढूंढ़ना पड़ता है.
(कुछ व्यक्तिगत अड़चनों और समयाभाव के कारण असद जै़दी पूरी प्रश्नावली समय पर नहीं भेज पाए. उनका कहना है कि कुछ प्रश्न बचे रह गए हैं.)
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