क्योंकि मैं मजदूर हूँ…!

क्योंकि मैं मजदूर हूँ, इसीलिए तो मजबूर हूँ! खाने को परेशान सा, अपनों से काफी दूर हूँ!! जानवर सा सड़क पर रेंग रहा हूँ, दिखाई नहीं देती कोई आस है! घर तो कहीं दूर रह गया, बस पहुंचने की उम्मीद पास है!! पड़ रहे पांवों में छाले, सहने को मजबूर हूँ! सामान की गठरी उठाये, चल पड़ा काफी दूर हूँ!! ऐसा नहीं के सब बुरे हैं, किसी ने खाना दिया तो किसी ने पानी! लेकिन गुहार लगानी है जिनसे, उन्होंने ही तो बात ना मानी!! घिसते मेरे पैर देखकर, लोगों ने लाकर दे दी चप्पल! लेकिन घस गई जो किस्मत की रेखा, क्या मिलेंगे कभी सुकुन के दो पल!! अपने ही देश में लकीरें खींच दी, पता नहीं क्या बचाने

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