ग़ज़ल

उदासियाँ हैं लबों पे लेकिन ख़ुशी के नग़मे सुना रहा हूँ यही है दस्तूर ज़िन्दगी के, मैं सारी रस्में निभा रहा हूँ न जाने क्यों कल से साँस लेने में हिचकिचाहट सी हो रही है वो कौन सा राज़ है कि जिस को मैं ज़िन्दगी से छुपा रहा हूँ? उसी ज़मीं पर कि जिस पे लाशें मुहब्बतों की पड़ी हुई हैं जला-जला कर परालियाँ फिर जदीद फ़सलें उगा रहा हूँ उजालों में फँस के गुमरही में इधर-उधर जो भटक रहे हैं पता मैं उन जुगनुओं को उँगली से तीरगी का बता रहा हूँ धुआँ उठा था तभी ख़बरदार ख़ैरख़्वाहों ने कर दिया था ये बेख़याली का है नतीजा कि हाथ अपने जला रहा हूँ कहूँ इसे ज़िन्दगी भला क्यों दबाए

Read more

ग़ज़ल

उसे सूरज कहूँ या आफ़ताब रहने दूँ। उसे चंद्रमा कहूँ या माहताब रहने दूँ।। मज़हब देखकर आती नहीं तकलीफें किसी को। फिर उसे पीड़ा कहूँ या अजा़ब रहने दूँ।। मुफ़लिसी में जो हर कदम साथ चला मेरे। उसे मित्र कहूँ या अहबाब रहने दूँ।। कई मज़लूमों के खूं से वो सनी होगी। उसे धन कहूँ या असबाब रहने दूँ।। मुस्तक़बिल का डर तो हर माँ बाप को होता है। फिर उसे चिंता कहूँ या इज़्तिराब रहने दूँ।। गुलामी में हर दिल से जो आग निकलती है। उसे क्रांति कहूँ या इंकलाब रहने दूँ।। ये मज़हबी ज्ञान जहाँ से पाया उसने। उसे पुस्तक कहूँ या किताब रहने दूँ।। हिमांशु तेरे सवालों में जो कहा सबने। उसे उत्तर कहूँ या जबाब रहने

Read more