पाषाण कोर्तक

उषाकाल,अक्षुण्ण पाषाण कोर्तक से मिलीउपेक्षित सूफी अल्फ़ाज़ सी झरती झर झरकिसी सन्नध्द अडिग प्राण सी चार रही थीऔर सुना रही थी कस कर बंद मुष्ठिका व्यथानंगे पांव वसुधा को नापती स्वैराचारऔर करती अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अनुसरणहड़प्पा की अपठित अनुबंध लिपि जैसीकिसी गुहा में लिखी, अस्पष्ट75 वर्षों में एक दफा दिखने वालेउस धूमकेतु के समान सरकती इतिहास मेंमैंने उठा लिया उसे तांबे के पुराने संदूक सेऔर रख दिया टिमटिमाते ढिबरी संगचुरन की पुड़िया के चटख कोलपेट दिया उसके आवरण में मलतास की पंखुड़ियों को उठाया पथ सेकाढ़ कर मिला दिया स्याह पन्नों मेंफिर भी न जाने क्यों,वहमुक्त नहीं, सशक्त नहींमानो जिस्म में उसके रक्त नहींराख वसन से झांकती उसकी देहउन्मुक्तता को तत्पर न थीतीन पहर बुझा कर ज्यों हताश लौटी मैंबुझ चुकी

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कविता

सबसे अधिक वो रोयाजिसने जमीं को चीर ‘फसल’ को बोया सबसे अधिक उसको छला गयाजो हँसते हँसते सीने पर ‘गोली’ खा गया सबसे अधिक वो आंखें रोईजो वोट देकर ‘आस’ में सोई औऱसबसे अधिक जयजयकार उनको मिलीजिसने कुर्सी की खातिर गन्दी ‘चाले’ चली। – नरेंद्र दान चारण

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