कविताएँ

(पवन कुमार वैष्णव ) 1.मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता…! मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता हूँ,मुझे देखने से पहलेअपनी अधखुली आँखेकिसी साफ़ पानी से धो डालों! मैंने समय कोबटुए में अंतिम बचे नोटों की तरहनिकाल कर खर्च किया हैमैं जानता हूँसमय को कभी रोका नहीँ जा सकताऔर की गई क्रियाएँपूर्ववत् दोहराई तो जा सकतीलेकिन प्राप्त किये गए फल सुधारे नहीँ जा सकते..! मुझे मालूम है रोटीजब तवे पर जल जाती हैतो उसे कैसे खाया जाता है!जली हुई रोटी को कभी अलग नहीँ रखा,इन्ही जली हुई रोटियों नेमुझे हर समय पेट की आग से बचाया। मैंने कभी किसीपूराने वृक्ष की ओर पत्थर नहीँ बरसाएकिसी शाम शांत झील पर भी कोईकंकर नहीँ उछाले,मैं तपती धुप में इतना जल्दी में रहता हूँ

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