दलित विशेषांक – दिसंबर 2019 ( खंड – 2 )

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मैं जानता हूं कि दलित साहित्य और विमर्श को बहुत से लोग नापसंद करते हैं. विश्वास करिए कि यह साहित्य अपने आप ही अप्रासंगिक हो जाएगा. यह तभी संभव है, जब पहले जाति-व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए और उन सभी कारणों को भी दफन कर दिया जाए, जिनके कारण किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा ध्वस्त कर दी जाती है और उसे उन्नति के अवसरों से वंचित किया जाता है. परंतु समाज में देखने में यह आता है कि लोग आरक्षण व्यवस्था को तो तुरंत समाप्त कर देना चाहते हैं और जाति-व्यवस्था को बचाए रखने में जान लगा देते हैं.

आरक्षण-व्यवस्था या प्रतिनिधित्व का विस्तार ही जाति-व्यवस्था का विनाशक साबित होगा. इस तथ्य को आरक्षण-विरोधी और जाति-व्यवस्था विरोधी भी शीघ्रातिशीघ्र समझ लें कि जाति की पकड़ अब भी इतनी मजबूत है कि किसी संस्था के सर्वोच्च पद पर बैठा हुआ दलित-पिछड़ा व्यक्ति भी धर्मसत्ता के आगे ‘अछूत या तुच्छ’ हो जाता है.

अजय नावरिया (अतिथि संपादक )

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