नौकरी

नौकरी (सच्चे अनुभव में चुटकी भर कल्पना का छोंक) —————- मैं फितरत से सुस्त और उदास रहने वाला आदमी हूं..। लेकिन दोनों ही आदतों से कमाई नहीं होती..। लिहाज़ा पापी पेट और स्वादु जीभ के लिए गाहे-बगाहे नौकरी करनी ही पड़ती है..। कितने ही शनिचर शनि देव को तेल चढ़ाने, और उससे भी ज़्यादा संडे अपने बॉसनुमा दोस्तों को दारू चढ़ाने का प्रताप था कि इस लॉकडाउन में भी इंटरव्यू का कॉल आया..। पहला अपशकुन तो उस दफ़्तर के चौखटे में ही नज़र आ गया..। पूरी शीशे की इमारत थी..। मुझे शीशे की दीवारों से उतनी ही नफ़रत है, जितना नौकरी करने से..। उनके ससुरे कान ही नहीं आंखें भी होती हैं..। भीतर चमचमाती लॉबी..। फर्श में चेहरा दिखा तो

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कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी ) [पसीना ] पसीनासजीवों को आता हैनिर्जीवों को नह आतादौड़ने भागनेवालाबहाता है पसीनाबैठे ठाले बहता है पसीनाज्यादा ताप ज्यादा शीत से भी निकलता है पसीनाभय और घबराहट से आता नहीं उतरता है पसीनाश्रमिक जो बहाता है पसीनावह ज्यादा चमकीलाज्यादा गर्मज्यादा नमकीन होता हैत्वचा का रंग नहीं घुलता पसीने मेंवह बस पृष्टभूमि में रहता हैइसलिए ग्लोब पर कहीं भीकिसी भी जीवधारी कापनीला ही होता है पसीनापसीना यूं तो सच ही प्रकट करता हैअतिरंजना की छूट रहती है मगर थोड़ी बहुतउसके गुण धर्म को समझते समझाते समयश्रम के अनुवाद की तरह से भीभय अकुलाहट उकताहट की अभिव्यक्ति के तौर से भी । [वक़्त] वक़्त कहीं नहीं जातावहीं रहता हैजहां उसकी जगह होती हैआदमी गुजर करवक़्त के दायरे सेअपनी यात्रा

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कोरोना का भय

✍️कृष्ण प्रसाद उपाध्याय सरकार द्वारा बलात् नियुक्त कोरोनाकाल की अनेक जान जोखिम में डाल कर दी ड्यूटियों…… जैसे पका राशन बांटना, सूखा राशन बांटना, खाद्य सामग्रियों व सौंदर्य प्रसाधन युक्त किट बांटना और अंततोगत्वा कोरोना संक्रमित लोगों के घरों की निशानदेही कर, ऑक्सो मीटर आदि उपकरण देना, अपर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के साथ उन्हीं सामग्रियों का पुनः संक्रमण मुक्त हो रहे लोगों के घरों से संकलन करना, संक्रमण के लक्षण वालों का प्रेगनेंसी टेस्ट किट जैसे किट द्वारा परीक्षण में, प्रयोगशाला सहायक का भी सहायक के रूप में प्रतिभागिता करना तथा लगायत संक्रमणग्रस्त जनों व घरों के, आस पड़ोस के पचास घरों का सर्वे करना आदि शासन द्वारा शिक्षकोचित समझे जाने वाले अनेक कार्यों के सफल व सौभाग्य से सकुशल निर्वहन

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पाषाण कोर्तक

उषाकाल,अक्षुण्ण पाषाण कोर्तक से मिलीउपेक्षित सूफी अल्फ़ाज़ सी झरती झर झरकिसी सन्नध्द अडिग प्राण सी चार रही थीऔर सुना रही थी कस कर बंद मुष्ठिका व्यथानंगे पांव वसुधा को नापती स्वैराचारऔर करती अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अनुसरणहड़प्पा की अपठित अनुबंध लिपि जैसीकिसी गुहा में लिखी, अस्पष्ट75 वर्षों में एक दफा दिखने वालेउस धूमकेतु के समान सरकती इतिहास मेंमैंने उठा लिया उसे तांबे के पुराने संदूक सेऔर रख दिया टिमटिमाते ढिबरी संगचुरन की पुड़िया के चटख कोलपेट दिया उसके आवरण में मलतास की पंखुड़ियों को उठाया पथ सेकाढ़ कर मिला दिया स्याह पन्नों मेंफिर भी न जाने क्यों,वहमुक्त नहीं, सशक्त नहींमानो जिस्म में उसके रक्त नहींराख वसन से झांकती उसकी देहउन्मुक्तता को तत्पर न थीतीन पहर बुझा कर ज्यों हताश लौटी मैंबुझ चुकी

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डिजिटल भारत

अपनी जिह्वा और कण्ठ में अवसादों के गट्ठर फँसाए दोहरे मापदंडों के साथ कुछ इंसानी जानवर अपनी गाड़ियों में छुप कर रिकॉर्ड करने वाले आईने को लेकर खुद की भद्दी तस्वीर सामने देख सड़कों पर दुम दबाए भोंकते हैं अपने नुकीले दांतों से दूसरों की ज़ुबान काट लेने को घात लगाए बैठे ये भेड़िये जिनके गलों पर पट्टे नही है इतिहास और संस्कृति की आड़ में चीरहरण कर रहे हैं उसी इतिहास और गौरव का जो इन्हें जान से प्यारा है ये क्या हो रहा है ? दुख होता है क्या आज का नौजवान दुर्बल है? क्यों इतना क्षीण हो चला कि इस तरह की मनमानी इस तरह के कमीनेपन पर उतर आया कि भूल गया उसका भी यही घर

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कविताएं

1) बरसाती नदी बरसात के दिनों को छोड़कर साल के बांकि दिनों में यह नदी कम और परती पराट ज्यादा दिखती है आषाढ़ के मेघों की उमड़ घुमड़ सुनकर पाताल की हदों में जा चुकी नदी वापस लौटने लगती है धरातल पर बारिश की बूंदों के साथ इसमें लौटने लगता है नदीपन लौटने लगता है जल लौटने लगता है प्रवाह लौटने लगता है जीवन सावन भादो आते आते नदी लबालब भरकर उपटने लगती है सरसता और हरियाली रचने लगती है अपने किनारों पर और फिर से उसे नदी समझने लगते हैं लोग । 2) कहने और करने का फर्क जिसको उठाना न पड़े वह कुछ भी बोल सकता है पहाड़ को धूल आग को फूल जिसके सर पे होता है

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आजादी

“आजादी” मखमली स्वर्णिम आभा को प्रतिबिम्बित करने वाला केवल मात्र शब्द नहीं है आजादी – बलिदानों की वेदी या स्वतंत्रता के नारों का उद्घोष मात्र भी नहीं है वास्तव में – अभेद्य प्रस्तर बन चुकी परम्पराओं से घिरों का साकार सुखद स्वप्न है आजादी चुभते शब्दजालों और वाक् परम्पराओं के बीच की छटपटाहट है आजादी नाकामी के उलहानों और अवसर की विषमता के बीच जिद्द की जीत है आजादी अंधविश्वासी भेड़चाल और अज्ञानता की जद् में सहसा शिक्षा का अधिकार है आजादी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रहे ढ़र्रे को तोड़ कर पनपी तार्किक सोच है आजादी मजदूर की मुस्कान हक-दायित्वों का मान सबका अक्षर-ज्ञान है आजादी ©मधुबाला

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कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) वापसी कभी कभीचाह कर भी वापस लौटना मुश्किल होता हैवापसी का रास्ताउतना सुगम नहीं रहता हर बारबहुतेरउतनी जगह नहीं होती वहां बची हुईजहां वापस लौटने की चाह होती है मन कोकोई और भर चुका होता हैहमारी उपजाई रिक्ती कोस्नेह और प्रेम का आयतनअपूरित नहीं रहताज्यादा देर तकजरूरी नहींकि जिसके लिएजिसके पास लौटा जाएवह ठहरा ही होबाट जोहता ही होप्रायः नहीं ही होता ऐसामन यही सब गुन करचुप रह जाता हैछोड़ देता हैवापसी की संभावना टोहना । साइकिल गहरा बहुत गहरा जुड़ाव हैहमारी नॉस्टेलजिया सेसाईकिल काहममें सोया बच्चा जग उठता हैआज इस उम्र में भी अगरसाईकिल चलाने का अवसर हाथ आ जाएएक सुखद प्रतीति से गुजरकरहम गुजरे कल में पहुंच जाते हैंयाद आते हैं बचपन के वो दिनजब

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मुक्ति

मुझे पूर्ण मुक्ति नहीं चाहिए ,मुक्ति संभव भी नहीं पिपीलिका के रूप मेंसंग्राहक होना चाहती हूंशर्करा की होना चाहती हूं मधूकप्रेमी परागकण का या होना चाहती हूं ,मक्षिका या चित्रपतंगया शलभ सा निर्मोही पुष्प होना चाहती हूंएक दिवस कासुरभित और सुवासित या होना चाहती हूंकृष्ण चूड की घनी छांवप्रेमी मिलते हो जहां या होना चाहती हूंपारिजात का फूलरहती है प्रियतमा कीप्रतीक्षा जहां मुक्ति की कल्पना मेंनहीं बनना चाहतीकिसी इमली के वृक्ष काअतृप्त प्रेत मुक्ति की लालसा मेंनहीं होना चाहती जीर्ण शीर्णकिसी खंडहर की भांति

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कविताएँ

(पवन कुमार वैष्णव ) 1.मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता…! मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता हूँ,मुझे देखने से पहलेअपनी अधखुली आँखेकिसी साफ़ पानी से धो डालों! मैंने समय कोबटुए में अंतिम बचे नोटों की तरहनिकाल कर खर्च किया हैमैं जानता हूँसमय को कभी रोका नहीँ जा सकताऔर की गई क्रियाएँपूर्ववत् दोहराई तो जा सकतीलेकिन प्राप्त किये गए फल सुधारे नहीँ जा सकते..! मुझे मालूम है रोटीजब तवे पर जल जाती हैतो उसे कैसे खाया जाता है!जली हुई रोटी को कभी अलग नहीँ रखा,इन्ही जली हुई रोटियों नेमुझे हर समय पेट की आग से बचाया। मैंने कभी किसीपूराने वृक्ष की ओर पत्थर नहीँ बरसाएकिसी शाम शांत झील पर भी कोईकंकर नहीँ उछाले,मैं तपती धुप में इतना जल्दी में रहता हूँ

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