कविता

(राजीव कुमार तिवारी ) ## किरायेदार कितना भी मन रम जाए उनका वहां रहते हुए चाहे कलेजा ही क्यूं न फट जाए वहां से निकलते हुए किरायेदारों को मगर/फिर भी छोड़ कर जाना पड़ता है किराए का घर एक न एक दिन बहुत करीने से संवार के रखने के बाद भी किसी भी हद में लगाव जुड़ाव होने के बावजूद घर कभी किरायेदार का अपना नहीं होता किराए का एक ठौर ही रहता है छोड़ कर जाते वक़्त जब पलट कर देखता है किरायेदार घर की तरफ घर का मन भी भाव विहवल हो जाता है पर मकान मालिक की ठस नजर को नहीं दिखता ये सबकुछ वहां तो बस पैसों की लोलुपता बसती है कई कई घरों में रहता

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अत्महत्या : एक सामान्य विश्लेषण

आये दिन अख़बारों में आत्महत्या की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं। इन खबरों में ऐसा कम ही होता है कि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी आत्म-हत्या की खबर को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलें। कुछ आत्महत्याओं की ख़बरें समाचार पत्रों की दहलीज पार करने से पूर्व ही दम तोड़ देतीं हैं, तो कुछ समाचार पत्रों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन, पाठक इसे पढ़कर अफ़सोस जताते हुए आत्म-हत्या करने वाले की ही घोर निंदा करते हैं और अंत में उसे बेवक़ूफ़ ठहराकर अखबार मेज पर पटकते हुए अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। और इसी तरह छपने वाली अनेकों आत्महत्याओं की खबरें अख़बारों मैं ही दम तोड़ देतीं हैं। अख़बारों का दायित्व है समाज में घटित घटनाओं को संज्ञान

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ग़ज़ल

उदासियाँ हैं लबों पे लेकिन ख़ुशी के नग़मे सुना रहा हूँ यही है दस्तूर ज़िन्दगी के, मैं सारी रस्में निभा रहा हूँ न जाने क्यों कल से साँस लेने में हिचकिचाहट सी हो रही है वो कौन सा राज़ है कि जिस को मैं ज़िन्दगी से छुपा रहा हूँ? उसी ज़मीं पर कि जिस पे लाशें मुहब्बतों की पड़ी हुई हैं जला-जला कर परालियाँ फिर जदीद फ़सलें उगा रहा हूँ उजालों में फँस के गुमरही में इधर-उधर जो भटक रहे हैं पता मैं उन जुगनुओं को उँगली से तीरगी का बता रहा हूँ धुआँ उठा था तभी ख़बरदार ख़ैरख़्वाहों ने कर दिया था ये बेख़याली का है नतीजा कि हाथ अपने जला रहा हूँ कहूँ इसे ज़िन्दगी भला क्यों दबाए

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उतरन

एक कुर्ती निकली अलमारी से अपनी कुछ पुरानी-सी कुछ बेरंग-सी थोड़ी फटी थी और थोड़ी गई थी उधड़ अलमारी से निकाल पटक दिया उसे ज़मीं पर इस सोच के साथ कि- मुझ पर नहीं फबेगी अब ये… मेरे घर के पीछे एक छोटी झोपड़ी में रहती है एक लड़की चेचक के दाग़ से भरा हुआ है चेहरा उसका हमउम्र होगी शायद या कुछ छोटी तो मैंने अपनी वो फटी हुई कुर्ती देदी उसे मैं नहीं पहन सकती, पर वो तो पहन सकती है फिर दिन बीतते गए और मैं भूल गई उस कुर्ती को… एक रोज़ मैंने देखा उस लड़की को कितने करीने से संवरे हैं बाल उसके आज आँखों में काजल है, माथे पर बिंदी, झुमके भी पहने हैं,

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कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) जो हूं और जो होना चाहता था कहां होना था मुझकोजहां हूंया जहां होना चाहता था मैंक्या इस प्रश्न का उत्तरकिसी के पास है कोई ?जहां हूंऔर जहां होना चाहता थाके मध्य जो संघर्ष हैक्या जीवनउसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?समय जो चित्र बनाता है हमाराउसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता हैपर प्रकट कभी कोई विशेषरस या रंग ही होता हैक्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?जहां प्रवाह रुक गया नदी जल काजो होना चाहता थावो जो हूंभर रह गयाअपने वर्तमान से अवकाश लेकरसमय की किताब मेंफिर लौटना चाहता हूंउसी अनुच्छेद तकऔर उन तमाम अवरोधों कोहटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूंताकि जो

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कविताएं

आत्महत्या हाँ जीवन कभी कभीबहुत कठिन हो जाता हैरास्ता कोई नहीं सूझताहताशा, उदासी और कुंठा कीपकड़ से छूटने कामन के घुप्प अंधेरे जंगल सेबाहर निकलने कादर्द और दुख के दलदल मेंडूबती जाती हैपल पल जिजीविषाकोई नहीं होता इतने पासजिससे कहकर मन की बातसंघनित पीड़ा कोवाष्पित किया जा सकेजिसके कांधे पे रख के सरस्वयं को भुला जा सके पूरी तरहदूर बहुत दूर तकदृष्टि में नहीं होताउत्साह उमंग और आनंद का फैलाव जबउस काल खंड में भीस्वीकारना चाहिए जीवन कोउसकी संपूर्णता मेंउसके चूभते कोणों को सहते हुएजीवन सिर्फ अपने लिए नहींदूसरों के लिए भी हैबल्कि दूसरों के लिए ही ज्यादा हैबहुत बार हमनाव के सवार होते हैंमल्लाह के भरोसेसागर पार हो जाते हैंपर कई बार हमेंमल्लाह भी होना होता हैदूसरों को पार

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कविता

सबसे अधिक वो रोयाजिसने जमीं को चीर ‘फसल’ को बोया सबसे अधिक उसको छला गयाजो हँसते हँसते सीने पर ‘गोली’ खा गया सबसे अधिक वो आंखें रोईजो वोट देकर ‘आस’ में सोई औऱसबसे अधिक जयजयकार उनको मिलीजिसने कुर्सी की खातिर गन्दी ‘चाले’ चली। – नरेंद्र दान चारण

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कविताएँ

1.पिता से बात……! पिता से बात करते हुए ऐसा लगता हैजैसे आसमान से बात करना। आसमान जानता है संसार की सारी बातेंइसलिए पिता से बात करते हुएमैं सारे संसार से मिल लेता हूँ। संसार घूमने से अच्छा हैपिता के साथ घूम लेना। पिता के साथ घूमते हुएआसमान को नापते देर नहीँ लगती। *********** 2. पिता से दूर रहकर….! पिता के दुखते हुए हाथ,सुख का सृजन करते हैंअन्तस् में दबी हुई वेदनाओं के बीच में सेखिंच लाते हैं मुस्कुराहटअपने गहन होंठो परसिर्फ मेरे लिए! पिता कहते हैं“मेरी सुख की दुनिया सिर्फ तू ही हैबाकी बची दुनिया ग्लोब जैसी है गोल-गोल”पिता कहते हैं,”इस ग्लोब जैसी दुनिया कोमैंंने कभी समझना नहीँ चाहा!” बस एक मुझे ही समझने में उन्हें सरलता रही हैऔर पिता

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कविताएँ

1.कविता विश्वकर्मा है…! कवि नहीँ बनता पहले पहले बनती है कविता! कविता के पकने पर कवि का होता है जन्म। कविता एक फल है कवि उसकी मिठास है। प्रकृति की हर कमी को कविता अंततः भर देती है, जहाँ-जहाँ भी किसी कवि की जरूरत होगी कविता स्वतः वहाँ-वहाँ किसी कवि को जन्म दे देगी प्रकृति और जीवन के मध्य जो खालीपन है उसे कविता पाट देती है कविता मन-महलोँ की विश्वकर्मा है। *********** 2.पिता से बात……! पिता से बात करते हुए ऐसा लगता है जैसे आसमान से बात करना। आसमान जानता है संसार की सारी बातें इसलिए पिता से बात करते हुए मैं सारे संसार से मिल लेता हूँ। संसार घूमने से अच्छा है पिता के साथ घूम लेना। पिता

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कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचना

आलेख रंजीत कुमार यादवशोधार्थी –दिल्ली विश्वविद्यालयMobile number -9910829645Email- jeetyaduvanshi@gmail.com कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचनामध्यकालीन दौर के होते हुए भी कबीर अपने आधुनिक विचारों के कारण आज भी स्मरणीय हैं । अपनी साखियों एवं पदों में अपनी क्रांतिधर्मिता के कारण कबीर उस समय भी उतने ही प्रासंगिक थे जितने कि आज हैं या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि कबीर आज के बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में जहाँ हर चीज अर्थ केंद्रित हो गयी है वहां उनकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, आज स्थितियां और भी गंभीर हो गयी हैं । भक्तिकाल के उस समाज में सामाजिक कुरीतियाँ, पाखण्ड, धार्मिक अन्धविश्वास और जातिगत भेदभाव फैला हुआ था । कबीर ने इन सब

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