सार्वजनिक स्वास्थ्य और विशेषाधिकार

जुलाई 1992 की एक शाम को हकीम शेख नाम का गरीब खेत मज़दूर कोलकाता से कुछ दूर मथुरापुर रेल्वे स्टेशन के नज़दीक रेल से गिर गया और उसके सिर में चोट लगी। मथुरापुर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर उसे कुछ देर बैठाया गया, लेकिन उसे प्राथमिक उपचार तक नहीं मिला। उसे कोलकाता के एन.आर.एस. मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया जहाँ उसका एक्सरे हुआ और भर्ती करने को कहा गया। लेकिन अस्पताल ने बिस्तर की अनुपलब्धता बताते हुए उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। सारी रात और अगले दिन दोपहर तक वह शहर के पाँच बड़े अस्पतालों में मारा-मारा फिरा। एक अस्पताल की सिफारिश पर उसे निजी क्लिनिक में सी.टी. स्कैन कराना पड़ा। स्कैन की रिपोर्ट में उसकी खोपड़ी में

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अपनी ज़मीन

मेरे घर के इर्द गिर्द कई पेड़ हैं मोहगनी,शीशम,नारियल, आम,नीम और नीलगिरी का वृक्ष है । जिनमें कुछ लंबे -चौड़े हैं तो कुछ छोटे और बौने हैं। जो अपनी अपनी जगह विद्यमान हैं, उनमें न कोई राग है न द्वेष है न वर्ण है न भेद है जीवन अभी सावशेष है, पर जब-जब हवा आँधियों में बदलकर वहाँ से गुजरती है तो एक विभत्स दृश्य सामने आता है बड़े पेड़ छोटे पौधों पर कुछ इस तरह झपटते हैं जैसे पूंजीपति,मजदूर पर पुरूषपशु अबला पर बलशाली कमजोर पर। पर वे भूल जाते हैं उनका आधार और उनके अस्तित्व को छोटे पौधे ही अपनी जड़ों से बांध कर रखते हैं। आँधियाँ सिर्फ विनाशकारिणी ही नहीं, क्रान्तिवाहिनी भी होती हैं जो उखाड़ फेंकेंगी

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ऱफ्तार जिदंगी की

रफ्तार जिंदगी की बेशक माहौल बोझिल, आंखों में खौफ का मंजर, फिजा में मौत का दहशत और दिलों में उदासी है। हर शख्स एक दूसरे से फासले बनाकर रहने को मजबूर है। परंतु आप यकीन करें आज दूर- दूर होते हुए भी हम इतने निकट कभी नहीं रहे… आप खुद किसी के भी दिल में झांक कर देख लीजिये वहां आपको अपने लिए भी सलामती की दुआओं में झुके हुए सिरों का, बुदबुदाते होठों का, जुड़े हुए हाथों का अक्स नजर आएगा। हमने यह जान लिया है कि मंदिरों की घंटियों की सुमधुर आवाज से हम वंचित रह सकते हैं, गुरद्वारे केअरदास के लिए तरस सकते हैं, मस्जिदों की अजान से महरुम हो सकते है, चर्चों के सूने गलियारे की

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चलो कुछ दीपक

चलो कुछ दीये,उन मुंडेरों पे रख आयें,जहां अंधेरा आज भी है,थोड़ी रोशनी ले जायेंजो दिल उदास हैं सदियों से,क्यों ना उनसे खुशी बांट आयें।ज़िद करें बस अपने घर की रोशनी के लिए,अरे! हम इतने स्वार्थी ना हो जायेंक्या मिला है इक्ट्ठा करके,चलो बांटे, खुशियां ले आयेंबाहर का अंधेरा तो लाज़मी है,चलो मन का अंधेरा मिटायें चलो कुछ दीये,उन मुंडेरों पे रख आयें… …….गौतम

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पॉपकॉर्न देशभक्ति

पॉपकॉर्न देशभक्ति ~~~दिलीप कुमार ———————-जुलूस में पहुँचने से पहले वनिता राव ने ब्यूटी पार्लर जाने का इरादा कर लिया।उन्होंने ब्यूटी पार्लर में अपनी रंगत दमका ली।उनके चेहरे पर युवतियों जैसी लालिमा आ गयी जबकि उन्होंने अपनी पोती को डॉक्टर के घर ले जाने का प्रोग्राम मुल्तवी कर दिया था क्योंकि आज उन्हें शहीदों के सम्मान में निकाली जाने वाले जुलूस में शामिल होना था।जबसे कश्मीर में हमला हुआ तब से उनकी देशभक्ति हिलोरें मार रही थी।उन्होंने रक्त दान के शिविर आयोजित करवाये ,मग़र खुद रक्तदान नहीं किया ,अलबत्ता रक्तदान करने की अवस्था की फ़ोटो जरूर फेसबुक पर अपलोड कर दी।उनके चेहरे पर लालिमा कुछ ज्यादा ही लग रही थी मेकअप की सो उन्होंने मुँह के क्रीम को पोंछ डाला ।अरे

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ग़ज़ल

उसे सूरज कहूँ या आफ़ताब रहने दूँ। उसे चंद्रमा कहूँ या माहताब रहने दूँ।। मज़हब देखकर आती नहीं तकलीफें किसी को। फिर उसे पीड़ा कहूँ या अजा़ब रहने दूँ।। मुफ़लिसी में जो हर कदम साथ चला मेरे। उसे मित्र कहूँ या अहबाब रहने दूँ।। कई मज़लूमों के खूं से वो सनी होगी। उसे धन कहूँ या असबाब रहने दूँ।। मुस्तक़बिल का डर तो हर माँ बाप को होता है। फिर उसे चिंता कहूँ या इज़्तिराब रहने दूँ।। गुलामी में हर दिल से जो आग निकलती है। उसे क्रांति कहूँ या इंकलाब रहने दूँ।। ये मज़हबी ज्ञान जहाँ से पाया उसने। उसे पुस्तक कहूँ या किताब रहने दूँ।। हिमांशु तेरे सवालों में जो कहा सबने। उसे उत्तर कहूँ या जबाब रहने

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देशभक्त नेता बनना चाहते हो??

नमस्कार, अगर आप राजनीति .में रुचि रखते है और एक देशभक्त नेता बनना चाहते है तो बिल्कुल सही जगह पर आए है , आज हम सीखेंगे कैसे आप अपना नाम एक देशभक्त नेता में बेशुमार कर सकते है तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते है देशभक्त नेता बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात जिसके बिना आप देशभक्त नेता बनने की सोच भी नहीं सकते वो है आपका या आपके घर में किसी का बाहुबली होना, अगर आप अपने क्षेत्र के बाहुबलियों में से हैं तो आपने देशभक्त नेता बनने का पहला पड़ाव पार कर लिया है, और अगर आप या आपके घर में कोई बाहुबली नहीं है तो भी चिंता की कोई बात नही, पता लगाइए अपने रिश्तेदारों

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‛अपने अंदर के राम को जीवित करें’

हर बार की तरह इस बार भी दशहरा पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। रावण के बड़े-बड़े पुतले बनाए जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानों भारी-भरकम शरीर वाले रावण की मुखाकृति हम पर अट्ठाहास करती हुई कह रही हो, कि तुम सब मुझे अपने हृदय से नहीं निकाल पाओगे। मैं यूं ही हर वर्ष आऊंगा। हर वर्ष तुम मुझे जलाओगे। लेकिन मुझे मार नहीं पाओगे। अगली बार पुनः उसी सम्मान के साथ दोबारा खड़ा होकर हमारी नादानियों पर ठहाका लगाते हुए पूछेगा – मैं अधर्मी, अन्यायी, पथभ्रष्ट, राक्षस कुल का अवश्य हूं, पर मुझे मारने वाली लाखों-करोड़ों की भीड़ में क्या कोई राम है? या कोई ऐसा जिसमें राम जैसी शक्ति, सामर्थ्य

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वे मजदूर

मुहल्ले के नुक्कड़ पर एक नीम का पेड़ था और उसके नीचे कूड़े का ढ़ेर…, पॉलीथिन की थैलियाँ, कागज के टुकड़े, सड़ी हुईं सब्जियाँ, रसोई के कचरे, जूठन, गोबर इत्यादि यत्र-तत्र फैले हुये थे, जिससे बदबू भरी हवा उठती रहती। दोपहर के बाद जब गर्मी बढ़ जाती तो बास मारने लगती थी। कभी-कभी समस्या गंभीर हो जाती तो आस-पास के घरवाले उस तरफ की खिड़की बन्द कर लेते थे। पास से गुजरनेवाले नाक पर रूमाल डाल लेते थे, यदि बहुत दिक्कत होती तो उधर से मुँह फेर लेते या रास्ता बदल लेते थे। कूड़े का कुछ हिस्सा उड़-उड़ कर नाली में जाने लगा और धीरे-धीरे नाली जाम हो गयी। पानी उछलकर सड़क पर बहने लगा था। कार सवार उधर से

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सुपरस्टार

सीन गरमागरम था जाहिर है, गीत के बोल भी उत्तेजक थे धुन भी उसी के अनुरूप मादक और नशीली. बॉलीवुड के सुपरस्टार रौशन कुमार बारिश से अपादमस्तक भीगी हीरोइन की अनावृत्त कमर और गीली साड़ी में उभरे नितंब के बीच अपनी दोनों हथेलियों को टिकाए अपना चेहरा उसकी नाभि से रगड़ते हुए ऊपर की ओर ले जा रहा था. क्लोजअप में हीरोइन के लरजते होंठ दिखने लगे सुपरस्टार के फड़कते होंठ उससे जा मिले. इधर बारिश की फुहार, उधर चुंबनों की बौछार. फिल्म के प्रीमियर शो में रौशन कुमार की पत्नी और बॉलीवुड की ही प्रख्यात अभिनेत्री जयमाला भी मौजूद थीं. हॉट सीन उनकी आंखों में चुभ रहे थे. चेहरे पर किस्मकिस्म के भावों की आवाजाही जारी थी. फिल्म की

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