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हंस की सालाना संगोष्ठी

‘हंस’ पत्रिका द्वारा इफ्को के सहयोग से 38वें प्रेमचंद जयंती समारोह का आयोजन ऐवान-ए-ग़ालिब सभागार में किया गया।

इस बार का विषय था-‘नवराष्ट्रवादी दौर में भाषा’। सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता, लेखक और चिंतक पद्मश्री गणेश देवी, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वैज्ञानिक गौहर रज़ा, बुद्धिजीवी सुधीर चंद्र, शिक्षाविद् प्रो. कृष्ण कुमार ने वक्ताओं के रूप में शिरकत की और राष्ट्र, राजनीति और भाषा के अंतर्संबंधों और विरोधाभासों की चर्चा की।

कार्यक्रम का संचालन कथाकार प्रत्यक्षा ने किया। ‘हंस’ के संपादक संजय सहाय ने संगोष्ठी की शुरुआत में विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि, ‘भूमंडलीकरण के कारण राष्ट्रवाद आज राजनीतिक, आर्थिक,सामाजिक परिवर्तनों के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप उभरा है। बहुसंख्यकों  द्वारा हिंदू राष्ट्र को चिन्हित करने का प्रयास जोर-शोर से जारी है। एक राष्ट्रभाषा का आग्रह भी उफान पर है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि धर्म के आधार पर राष्ट्र का निर्माण नहीं होता अगर ऐसा होता, तो सबके सब इस्लामिक या क्रिश्चियन देश खुद को राष्ट्र घोषित कर देते।’

उन्होंने कहा कि, ‘दुनियाभर में ‘राष्ट्र’ को देश का पर्याय मान लिया गया है जबकि साझा भाषा, साझा इतिहास और साझा गौरव राष्ट्र की अनिवार्य शर्तें हैं। राष्ट्र कहाने के लिए अपना राज्य होना भी जरूरी नहीं है।भारत अपने सांस्कृतिक और भाषायी वैविध्य में एक अनोखा देश है। इसे एकरूपता प्रदान करने का कोई औचित्य नहीं है, न यह साध्य है। विडंबना यह है कि एक तरफ तो हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पृथ्वी परिवार) में विश्वास करते हैं और दूसरी तरफ ‘विश्वगुरु’ होने की बात भी करते हैं!’

प्रो. सुधीर चंद्र ने कहा कि, ‘ नवराष्ट्रवाद अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग स्वरूपों में रहा है। दुनिया का शायद ही कोई मुल्क हो जो इससे अछूता हो ‘। उन्होंने सवाल उठाया कि, ‘इसके प्रति क्या किसी भी राष्ट्र में सहमति बन पाती है? कौन से राष्ट्र खुशकिस्मत हैं जहां सहमति बन पाती है वो या फिर जहां सहमति नहीं बन पाती है वो?  हमारे यहां कोशिश चल रही है कि एक राष्ट्रीय सहमति बन जाए और अगर नहीं बन पाती है तो जबरन बना दी जाए। कल तक इसी को हिंदू राष्ट्रवाद कहा जा रहा था। इसमें भ्रांति और छलावा उतना बड़ा नहीं था जो कि नवराष्ट्रवाद में है।

कोई एक राष्ट्रवाद नहीं होता। कई राष्ट्रवाद एक ही समय में उभरकर सामने आने लगते हैं। दो राष्ट्रवाद में एक तो राष्ट्रवाद है और दूसरा सांप्रदायिकता है’। उन्होंने कहा कि ‘पाकिस्तान के बनने को हम राष्ट्रवाद नहीं, सांप्रदायिकता का नतीजा मानते हैं। अगर पाकिस्तान का बनना मुस्लिम राष्ट्रवाद नहीं तो उसी तर्ज पर क्या हिंदू राष्ट्रवाद संभव है? भारत जैसे देश में आज जो राष्ट्रवाद बन रहा है वो राष्ट्रवादी नैरेटिव नहीं है,सांप्रदायिक नैरेटिव है।

क्षेत्रीय और भारतीय राष्ट्रवादों में भी टकराहट रही है जो कभी विकराल रूप ले लेती है। हम जिसे भारतीय राष्ट्रवाद कहते हैं वो वास्तव में हिंदू राष्ट्रवाद है, जो अवचेतन में था वो अब चेतन में आकर हावी हो गया है। 2002 का गुजरात, 2024 का भारत बन सकता है’।

प्रो. कृष्ण कुमार ने कहा कि, ‘ भाषा के सबसे सन्निकट होता है साहित्य और पिछले सौ साल के साहित्य में हिंदी का कोई उपन्यासकार या कवि नवराष्ट्रवाद से प्रेरित नहीं रहा है।

यह धारा अनुर्वर सिद्ध हुई है। सृजन का कोई अंकुर या विचार ऐसा नहीं फूटा जो इस विचारधारा से प्रेरित हो ‘। कृष्ण कुमार सवाल उठाते हैं कि हमने अपनी भाषा का क्या किया, जिससे हमें हर चीज का अनुवाद करना पड़ता है? नियो नेशनलिज्म में नियो लैटिन भाषा का शब्द है और इसका किसी भी प्रकार से अनुवाद नव नहीं होगा। अनुवाद करते-करते हमारी भाषा अंतर्विरोधों से घिर जाती है और हमारे बौद्धिक समाज में चर्चा तक नहीं होती। इस दौर के कई चेहरे और कारण हैं। यह वही दौर है जिसे

नवउदारवाद का दौर भी कहा गया है। यह नव धनाढ्य वर्ग का भी दौर है जो विचार को ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकता है। एक रेला संस्कृति बढ़ती चली जा रही है जहां हर चीज का रेला है, बिंबों का रेला है।हम वैचारिक रूप से आलसी समाज हैं। अपनी भाषा की ऊर्जा को स्वयं ही हमने नष्ट किया है। ऐसा कुछ हो गया है हमारी भाषा में कि हम एक बार तय कर लेते हैं तो उस पर पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं होते।  नव राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्रवाद का पर्यायवाची है जो अच्छा पर्यायवाची नहीं है। सबको एक जैसे बनाने का जो अभियान है वो इस बगीचे को नष्ट कर देगा।’

 

गौहर रज़ा ने कहा कि, ‘देश में फासिज्म का सबसे पहले अनुभव लेखकों को हुआ। मुझे नहीं लगता कि जर्मनी में इस तरह की कोई आवाज उठी होगी।  नेशन और स्टेट का कांसेप्ट इंसान के बीच में ज्यादा पुराना नहीं है।

इसे बनने में वक्त लगा है।  देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर है। दोनों में टकराहट है’। रज़ा कहते हैं कि, ‘नेशनलिज्म की सबसे अच्छी परिभाषा आइंस्टीन की लगती है- ‘नेशनलिज्म इज एन डीजिज ऑफ मासेज!’ और अगर आज के हिंदुस्तान में इसे अनुवाद करके घुमाना शुरू कर दें तो परिणाम विरुद्ध सिद्ध होंगे। हम यहां पहुंच चुके हैं।

 

विभाजन के झगड़े के दौरान यह प्रयास किया गया कि हम उन जबानों की ओर लौटें जो मिट्टी से जुड़ी हुई हैं। उर्दू और हिंदी के टकराव में कोलोनियल माइंडसेट था कि शासन कैसे किया जाता है। जबानें हमेशा लोगों के बीच में और बाजार में बनती हैं।

आज जरूरत है कि हम वापस अपनी जबानों की ओर लौटें। यह कहना गलत होगा कि उर्दू की मां फारसी और हिंदी की मां संस्कृत है।  लिट्रेचर को श्रेणियों में बांटा जाना कन्फ्यूज करता है।  लिट्रेचर को अगर सिर्फ अच्छे और बुरे दो श्रेणियों में बांट दिया जाए तो अच्छा लिटरेचर वह साहित्य है जो परंपराओं का ध्यान रखे, जो खूबसूरत अल्फाज का ध्यान रखे, जो खूबसूरत खयालात को हम तक पहुंचा सके, एक बेहतर समाज की कल्पना कर सके और हमें यह बता सके कि समाज में क्या बुराइयां हैं। अगर लिट्रेचर का मकसद अच्छा नहीं है तो वो अच्छा लिटरेचर नहीं हो सकता है। अगर लिटरेचर का मकसद राष्ट्रवाद को उभारना हो तो एक भी लिट्रेचर यादगार नहीं रहेगा लेकिन वक्ती तौर पर वह बहुत बड़ा घात करता है। आज दिखाई दे रहा है कि फासिस्ट नेशनलिस्ट, एक कविता, एक लेख, एक गाने से भी डरते हैं। देश की जिम्मेदारी पॉलिटिकल पार्टियों की नहीं, हमारी जिम्मेदारी है।’

 

गणेश देवी ने कहा कि, ‘नवराष्ट्रवाद के दौर में भाषा की जगह हमें नवराष्ट्रवाद के दौर में चुप्पी की बात करनी चाहिए। आज अगर हम पोजीशन को देखें तो जहां-जहां द्रविड़ भाषाएं थीं वहां हिंदू राष्ट्रवाद का अस्वीकार हुआ है। नेशनलिज्म का कोई भविष्य नहीं है।  इस राष्ट्रवाद के विरुद्ध थोपी हुई चुप्पी तोड़ने के लिए हमारे पास एक ही साधन है, वो भाषा है. इटली और जर्मनी का नेशनलिज्म भाषा को लेकर आया था। हम पर चुप्पी थोपने के कितने भी प्रयास हों, हमारी बहुभाषिकता हमारा हथियार है। 

फासिज्म से तभी लड़ा जा सकता है जब बोलने वाले लोग मौजूद हों। भाषा फासिज्म के विरुद्ध एकमात्र हथियार है । लोगों के बीच असुरक्षा की भावना के कारण सरकार जो भी कानून बनाती है और कहती है कि इससे सुरक्षा मिलेगी, जनता स्वीकार कर लेती है।  धर्म का राष्ट्र जो बन रहा है, उसी के साथ-साथ साहित्य का भी धर्म होता है।  जो ‘गीता’, ‘कुरान’, ‘बाइबल’ का धर्म नहीं है। भाषा हमें बचाएगी। दूसरों की चुप्पी तोड़ने से पहले अपनी चुप्पी तोड़ें।’

 संचालन क्रम में प्रत्यक्षा कहती हैं कि, ‘इस परिवर्तनशील समय की भाषा और राजनीति के बीच के बहुत पेचीदा और जटिल संबंध को जानना बहुत जरूरी है।  इसको अगर हम जानेंगे तो हम अपने समय को जान सकेंगे क्योंकि भाषा राजनीति को प्रभावित करती है और पॉलिटिकल आइडियोलॉजी को शेप करती है।

नवराष्ट्रवाद शब्द का आकर्षण सिर्फ भारत में ही नहीं दुनियाभर में व्याप्त है और भाषा इसमें एक टूल है नेशनलिस्टिक नैरेटिव स्थापित करने के लिए। वो पॉलिटिकल आइडेंटिटी और एजेंडा को सामने लाता है। इसको समझना इसलिए भी जरूरी है कि हमारे समय को क्या चीज प्रभावित कर रही है, वो हम तभी समझ पाएंगे जब हम भाषा और राजनीति के तार को समझ पाएंगे।’

मंचासीन वक्ताओं के वक्तव्य के बाद ‘हंस’ की वार्षिक संगोष्ठी की लोकतांत्रिक परंपरा अनुसार श्रोताओं ने प्रश्न भी उठाए जिसका मंच से जवाब दिया गया।  हमेशा की तरह विविध क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवियों, साहित्य प्रेमियों, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और युवाओं ने संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी की। ‘हंस’ की प्रबंध निदेशक रचना यादव ने सबके प्रति आभार जताया ।

सविता पांडेय

(संपर्क : savitapan@gmail.com)

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प्रेमचंद जयंती समारोह- 2018

प्रेमचंद जयंती समारोह- 2018

नई दिल्ली: के आईटीओ में स्थित ऐवान – ए – ग़ालिब सभागार में प्रेमचंद की 33वीं जयंती के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस बार भी हंसाक्षर ट्रस्ट और हँस पत्रिका की तरफ से वार्षिक गोष्ठी का आयोजन किया गया. जिसका विषय “लोकतंत्र की नैतिकताएं और नैतिकताओं का लोकतंत्र था. मंच का संचालन श्री प्रियदर्शन जी के द्वारा किया गया.  इस संगोष्ठी में अलग अलग क्षेत्र के वक्ताओं ने अपना वक्तव्य दिया,  जिनमे कांचा इलैया (राजनीतिक विचारक, दलित कार्यकर्ता),  हर्ष मंदर (सामाजिक कार्यकर्ता),  इन्दिरा जयसिंह (वरिष्ठ वकील), प्रताप भानु मेहता (शिक्षाविद, अशोका यूनिवर्सिटी के कुलपति ) और कृष्ण कुमार (समाज शास्त्री, शिक्षा शास्त्री) और नजमा हामिद जैसे ज्ञानी और प्रसिद्ध लोगों के नाम शामिल है.
गोष्ठी मे दलित चिंतक कांचा इलैया जी ने अपने व्याख्यान से बहुत प्रभावित किया. इतने प्रहारों के बाद भी उनकी बुलंद आवाज़ ने यकीन दिलाया कि ऐसी मुखर आवाज़ों को रोकना बहुत मुश्किल है. श्री हर्ष मंदर जी ने भाषण में मुस्लिम के ऊपर बढ़ रहे अत्याचार, गौ हत्या और लव-जिहाद के नाम पर उनकी मृत्यु और उनसे घृणा की स्थिति को हमारे सामने रखा.
इंदिरा जयसिंह ने अपने भाषण में सुप्रीम कोर्ट के प्रति लोगों के मन से उठते विश्वास के कारण पर बल देने का प्रयास किया. कृष्ण कुमार जी ने अपने भाषण में जिस सरलता और सहजता से आज के राजनीतिक प्रबंधन को स्पष्ट किया और पूरे देश को एक रसोई के बिंब से उकेरा और कहा कि सत्ता पक्ष जिस मुद्दे को चाहे तेज या धीमी आंच पर रख सकती है और चाहे तो कुछ देर के लिए फ्रीज भी कर सकती है.
प्रताप भानु मेहता जी का व्याख्यान पूरी गोष्ठी में उठने वाले सवालों को समेटने वाला रहा जिसमें बंधुत्व, आरक्षण , राष्ट्रवाद जैसे तमाम मुद्दे शामिल थे. आज लोक शब्द के बदलते अर्थों को भी स्पष्ट किया. समाज में नैतिकता के लिए जिस विश्वसनीयता की जरूरत होती है. उसके न रहने से हर तरफ पाखंड को फैलाया गया है जिसके कारणों पर गौर करना लाज़िमी है कि हमने क्या स्वरूप बनाया अपनी संस्थाओं का ??  उन्होंने कहा कि मैं राष्ट्रवाद को मानव अधिकारों का हनन मानता हूँ और देश में सभी संस्थानों में काबिज उच्चवर्णों के मेरिटधारियों की सच्चाई भी किसी से छुपी नहीं है.
जब तक भारतीय समाज दलितों और वंचितों को उनके पूरे अधिकार नहीं देगा तब तक भारत के निर्माण की परिकल्पना अधूरी है. आज प्रबंधन की राजनीति को जिस तरह हथियार बनाया जा रहा है और व्यक्तिगत पहचान को हटाकर समूहवाद से डराया जा रहा है यह सभी के लिए घातक है. सुप्रीमकोर्ट में दलितों और स्त्रियों के प्रतिनिधि न होना उनके शोषण की गाथा खुद बयाँ करती है. जिस समाज में पहचान बोध इतना हावी होगा वहां बंधुत्व नहीं हो सकता है. जब तक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक को साथ लेकर नहीं चलेंगे तो विकास संभव नहीं होगा.  प्रजातंत्र में कौन कहाँ से आया है ? देखने की बजाए यह देखना चाहिए कौन कहाँ जा रहा है ? उसकी प्रतिभा की सराहना हो न कि उसकी ऊँची जाति की. जब तक नए व्यक्तिवाद की बात नहीं होगी तब तक कुछ भी बदलाव अपेक्षित नहीं होगा. नजमा हामिद द्वारा फैज़ साहब की उर्दू नज़्म को बहुत अच्छे से पेश किया गया. जिसके जरिए उन्होंने देश की एकता और प्यार बनाए रखने पर जोर दिया.
इस संगोष्ठी के सार में लोकतंत्र की चुनौतियों को अच्छी तरह स्प्ष्ट करते गए सबकी समान भागीदारी और जिम्मेदारी और जात-पात जैसी रूढ़िवादी सोच को दूर करके एक बेहतर समाज के निर्माण और उसके विकास पर जोर देने का प्रयास किया गया.
31- july- 2018

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हंस न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण

हंस न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण

राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान समारोह “28 अगस्त 2018”  के अवसर पर “हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक” -2018 का लोकार्पण भी किया गया.  विशेषांक के अतिथि संपादक रवीकान्त जी व विनीत कुमार हैं. “हिंदी का पाठक जब बनेगा सबसे अच्छा पाठक” मीडिया और सोशल मीडिया बहुत अलग-अलग संस्थाएँ नहीं हैं। दोनों ही एक दूसरे के लिए सप्लायर और वितरक का काम करते हैं। हमारे जनमानस का बहुत बड़ा स्पेस इस दायरे में ग्राहक बन कर खड़ा है। तर्क और तथ्य की पहचान की क्षमता हर किसी में विकसित नहीं होती। क्योंकि हमारी ख़राब शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें इसी स्तर का बनाया है। इस जगत के खिलाड़ियों को पता है कि शब्दों की सीमा है। इसलिए शब्द कम होने लगे हैं। टैगलाइन, हेडलाइन, कैचलाइन के ज़रिए एंकर बोलता है और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में पढ़ा जाता है। तस्वीरों का बड़ा रोल है। लोग पढ़ने की क्षमता कई कारणों से खोते जा रहे हैं। इसलिए उनके लिए सुबह की राम राम जी की जगह गुलाब के फूल, दो कप चाय और पहाड़ के पीछे से उगते सूरज से गुडमार्निंग भेजा जाता है। जो लोग मुश्किल से पढ़ने की साधना में लगे हैं वो व्यापक समाज के अपढ़ होने की इस प्रक्रिया से बेचैन है। दुनिया के विश्वविद्यालयों में इन सब सवालों को लेकर तेज़ी से शोध हो रहे हैं। किताबें छप रही हैं। भारत में भी हो रहा है मगर स्केल वैसा नहीं है और बहुतों की गुणवत्ता बेहद सतही है। मीडिया और सोशल मीडिया लगातार आपको खुरच रहा है। भरने के नाम पर ख़ाली कर रहा है। इतनी सूचनाएँ हैं कि उनका कोई असर नहीं है। इसीलिए इनका इस्तेमाल सूचित करने की जगह भ्रमित करने में होने लगा है। जिस सोशल मीडिया से जनता आज़ाद हुई थी उसी के कारण वो भँवर में फँस गई है। उसकी प्रोफाइलिंग हो चुकी है। सरकार से लेकर दुकानदार तक सबको पता है कि आप कहाँ जाते हैं। क्या खाते हैं। किससे मिलते हैं। आप सिर्फ एक ‘कोड’ हैं जिसे अब कोई भी मैनेज कर सकता है। सिटीज़न को ‘कोड’ में बदला जा चुका है। इस प्रक्रिया में नागरिकों का समूह भी शामिल है। हंस पत्रिका के विशेषांक को पढ़िएगा। हिन्दी में तीन सौ पन्नों की सामग्री आपको बहुत कुछ सोचने समझने का मौक़ा देगी। तैयार करेगी ताकि आप अंग्रेज़ी की दुनिया में इस विषय पर हो रहे शोध और लिखी जा रही किताबों को समझ पाएँगे। अस्सी रुपया कुछ नहीं है। पत्रकारिता के छात्रों के पास तो यह अंक होना ही चाहिए। वैसे भी हिन्दी में न्यू मीडिया और सोशल मीडिया के नाम पर जो किताबें उनकी मेज़ तक ठेली गई हैं उनमें से नब्बे फ़ीसदी वाहियात हैं। इस अंक को मीडिया पढ़ाने वाले विनीत कुमार और हिन्दी लोक जगत के माध्यमों पर असंख्य किताबें पढ़ते रहने वाले रविकान्त ने तैयार किया है। बहुत से लेखक नए हैं और हिन्दी लोक जगत के नए क्षेत्रों से आए हैं। मैंने अंग्रेज़ी के कई शानदार पाठकों को देखा है। वे काफ़ी पढ़ते हैं और किताबों का संग्रह रखते हैं। इसका अच्छा ही असर होता है। हिन्दी के भी पाठक किसी से कम नहीं हैं। उनके यहाँ भी अनेक विषयों पर शानदार पुस्तकों का संग्रह देखा है और उनकी विद्वता प्रभावित करती है। दुनिया से लेकर ख़ुद को समझने की बेहतर क्षमता होती है। मगर आबादी के हिसाब से हिन्दी में अच्छे पाठक कम लगते हैं। पढ़ने और लिखने का अपना महत्व है। इसे कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। हमारे यहाँ के मर्द शादी के बाद नहीं पढ़ते हैं। आप अपने घरों में ही जाँच लें।यही कारण है कि उनसे बात करना झेल हो जाता है। आप भी अपने घर के बड़ों से बात करने में चट जाते होंगे। श्रद्धा और सम्मान की भावना न हो तो नमस्ते के बाद ही कट लेने का मन करता होगा। उनके साथ अन्याय भी हुआ है। गाँव क़स्बों से लेकर राज्यों के कालेजों में घटिया तरीक़े से पढ़ाया गया है। वे पुस्तकों से दूर किए गए हैं। इस एक कारण से भी उनकी तरक़्क़ी कुछ कम रह जाती है। इसीलिए मैं हिन्दी के पाठकों के लिए इतनी मेहनत करता हूँ। यही मेरी हिन्दी सेवा है। आपके लिए रोज़ वैसी ख़बरों का सार लाता हूँ जो हिन्दी के कूड़ेदान अख़बारों में कभी नहीं छपती। हिन्दी के अख़बार लगातार आपके सोचने समझने की शक्ति को सतही बना रहे हैं। अभी आपको मेरी यह बात अहंकारी लग सकती है मगर मैंने इस बीमारी को पकड़ लिया है। आप ग़ौर से सोचिए। ख़ुद भी हिन्दी के अख़बारों की ख़बरों को दोबारा- तिबारा पढ़ कर देखिए। आपको पता चल जाएगा। हिन्दी में एक वेबसाइट है mediavigil, आप इसे लगातार देखिए आपको मीडिया के बारे में हिन्दी में बहुत कुछ पता चलेगा। मीडिया को समझने का मौक़ा मिलेगा। हिन्दी का पाठक अच्छा पाठक तभी बनेगा जब वह हिन्दी के अख़बारों के कूड़ेदान से आज़ाद होगा। मैं चाहता हूँ कि मोहल्ला स्तर पर अख़बार बंद या अख़बार बदल का आंदोलन चले। अव्वल तो आप गोदी मीडिया के इन अख़बारों को ही बंद कर दें या फिर एकदम से मुश्किल है तो पाँचवें छठे नंबर का अख़बार ले लें। कोई भी अख़बार दो महीना से ज़्यादा न लें। एक पाठक और ग्राहक की ताक़त का अंदाज़ा अख़बार वालों को लग जाएगा। आलस्य छोड़िए। होकर से कहिए कल से चौथे नंबर का अख़बार दे जाए। हिन्दी ने ही मुझे सब दिया है। इसलिए एक ज़िद है कि हिन्दी में गुणवत्ता का विस्तार हो और उसका बोलबाला हो। आपमें बहुत क्षमता है। बस आप ये न समझें कि चैनल देखना अख़बार पढ़ना ही सब कुछ जानना है। वो दरअसल अब ‘नहीं जानने’ का माध्यम बन चुका है। इसलिए आप अच्छी चीज़ें पढ़ने से पीछे न रहें। दम साध कर पढ़िए। आप आगे बढ़ेंगे। मेरा एक ही नारा है। हिन्दी का पाठक, सबसे अच्छा पाठक । हंस का अंकागमन हो चुका है। आप आज ही ख़रीद लीजिए। रविश कुमार
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राजेंद्र यादव “हंस-कथा सम्मान”- 2018

राजेंद्र यादव "हंस-कथा सम्मान"- 2018

“राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान” 2018. इस बार प्रत्यक्षा जी को उनकी कहानी “”बारिश के देवता”” (दिसंबर 2017) के लिए दिया गया है. यह सम्मान प्रत्येक वर्ष की भांति 28 अगस्त को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, में आयोजित किया गया. उन्हें सम्मान स्वरूप इक्कीस हजार रुपये की राशि दी गई. पुरस्कृत कहानियों का चयन अगस्त 2017 से जुलाई 2018 के दौरान हंस में प्रकाशित कहानियों में से किया गया है. इस बार के निर्णायक प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश जी थे. इसी स्मरणीय मौके पर रवीकान्त जी व विनीत कुमार द्वारा संपादित हंस का न्यू मेडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण भी किया किया गया किसी फिल्म या रंगमंच की तरह सतत गतिशील, मार्मिक और महत्वपूर्ण कथा-संरचना, कसी हुई, कई-कई लुभावने विचलनों से सचेत बचती हुई, अविचलित प्रतिबद्ध कथा-रेखा , ताज़गी और सहजता के आस्वाद से सिझी-पकी रचनाकार की बेलौस वैयक्तिक भाषा-बोली का विश्वसनीय पाठ और अपने समूचेपन में कहानी की निर्दिष्ट, चलताऊ और प्रस्तावित सीमारेखा को लांघ कर, पाठकों के वृहत्तर दायरे के साथ संवाद और संप्रेषण का समकालीन भाषिकस्थापत्य – यह ‘बारिश के देवता’ के अंतर्पाठ तक के पहुँच-मार्ग का पहला, एकमात्र और प्रमुख प्रवेशद्वार है। कुछ पिछले चोर दरवाज़े भी हुआ करते हैं, जिनसे भूत के प्रेत अंधेरों में अक्सर किस्सों में दाखिल होते हैं, उनका ज़िक्र यहां नहीं. लेकिन इस मुख्य दरवाज़े से कहानी के संसार में प्रवेश करते ही उस दुःस्वप्न के अन्धकार में अचानक चौतरफ़ा घिर जाना है , जो दुर्भाग्य से आज के समय के साधारण मनुष्य का आभासी नहीं , आवयविक, विभ्रमकारी, भयग्रस्त और व्यापक उत्पीड़ित यथार्थ है। यह हमारे अपने ही दिक्-काल में हर पल घटित होता, अतीत में देखे और दिखाये गये कई स्वप्नों-यूटोपियायों के भग्नावशेषों का उत्तर-यथार्थ है। अतीत के सत्ता के बुर्ज़-गुम्बदों के ढह जाने के बाद बचा हुआ हाशिये के मानवीय जीवन का ‘उत्तर-सत्य’ | यह ‘उत्तर-सत्य’ सिद्धांत-बहुल इतिहासों द्वारा बार-बार सिद्ध, प्रचलित और प्रसिद्ध किये गये स्वप्नों का वह प्रति-स्वप्न है, जिसे यह कहानी अपने पात्रों; ख़ासकर अपने केंद्रीय पात्र रा. स. कुलकर्णी और उसकी पत्नी के समूचे ऐन्द्रिक-तंत्र के लगातार विगलित होते दैहिक-समूहगान में प्रकट करने का मुश्किल, तनावग्रस्त, विरोधाभाषी लेकिन बहुत अर्थपूर्ण खेल रचती है। यह खेल इक्कीसवीं सदी की कॉर्पोरेट पूंजी, तकनीकी, सूचना-तंत्र और राजनीति की संयुक्त परियोजना द्वारा गढ़े गये प्रकट यथार्थ की ‘क्रूरता के रंगमंच’ के विमूढ़ और पत्थर हो चुके दर्शकों के सामने खेले जा रहे, एक डरावनी पटकथा का असम्बद्धअभिमंचन है। ‘बारिश के देवता’ और इसके रचनाकार की प्रशंसनीय शक्ति इस एक तथ्य पर टिकी हुई है कि न यह ‘राजनीतिक-सही’ या ‘साहित्यिक-सही’ होने की फ़िक्र करती है, न बहुतेरे अपने समकालीन कथाकारों की तरह किसी वैकल्पिक प्रति-स्वप्न की प्रस्तावना की कोई हीनतर चेष्टा करती है। यह ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और किसी विगत सैद्धांतिकी की अनेक नयी-पुरानी अनुवर्ती कथा-रूढ़ियों को निरस्त करते हुए, आज के इसी समय और इसी जगह की वह कहानी कहती है, जो इस समय लिखी जा रही युवा पीढ़ियों की कहानियों के बीच अपनी अलग कौंध, अर्थ और आवाज़ के साथ अलग खड़ी हो जाती है। ‘बारिश के देवता’को वर्ष 2017-18 के ‘राजेंद्र यादव स्मृति हंस कथा सम्मान’के लिए चुनते हुए मुझे सार्थकता और प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। यह एक अर्थ में हंस, मुंशी प्रेमचंद और हम सब कथाकारों के प्रिय राजेंद्र यादव की परम्परा का भी सम्मान है। उदय प्रकाश जी.