भोर का भय

डर तो उसे रात के अंधेरे से बहुत लगता था किंतु तभी जब वह कोई आम दिन होता। आज रात के अंधेरे से ज़्यादा होने वाले दिन के सूरज के सामने वो खुद को पिंघलता देख रही थी।आने वाली रौशनी अपने साथ बहुत सारी आंखें, बांते और सब सुनते कान लाने वाली थी। नींद ना आने का कोई गम नहीं था क्योंकि वो तो माँ के साथ ही घर छोड़ जा चुकि थी। माँ का ना होना खटकता तो था पर ज़्यादा चुभन इस बात की थी कि वो अकेले चली गयी। जिम्मेदारियां कमज़ोर शरीर पर एेसी गिरी जैसे पानी से भरे खेत में बारिश, ना मांगा था और ना ज़रूरत थी। पर जीवन हमेशा से खराब ना था, एक

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