कविताएं

1) बरसाती नदी बरसात के दिनों को छोड़कर साल के बांकि दिनों में यह नदी कम और परती पराट ज्यादा दिखती है आषाढ़ के मेघों की उमड़ घुमड़ सुनकर पाताल की हदों में जा चुकी नदी वापस लौटने लगती है धरातल पर बारिश की बूंदों के साथ इसमें लौटने लगता है नदीपन लौटने लगता है जल लौटने लगता है प्रवाह लौटने लगता है जीवन सावन भादो आते आते नदी लबालब भरकर उपटने लगती है सरसता और हरियाली रचने लगती है अपने किनारों पर और फिर से उसे नदी समझने लगते हैं लोग । 2) कहने और करने का फर्क जिसको उठाना न पड़े वह कुछ भी बोल सकता है पहाड़ को धूल आग को फूल जिसके सर पे होता है

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(राजीव कुमार तिवारी) वापसी कभी कभीचाह कर भी वापस लौटना मुश्किल होता हैवापसी का रास्ताउतना सुगम नहीं रहता हर बारबहुतेरउतनी जगह नहीं होती वहां बची हुईजहां वापस लौटने की चाह होती है मन कोकोई और भर चुका होता हैहमारी उपजाई रिक्ती कोस्नेह और प्रेम का आयतनअपूरित नहीं रहताज्यादा देर तकजरूरी नहींकि जिसके लिएजिसके पास लौटा जाएवह ठहरा ही होबाट जोहता ही होप्रायः नहीं ही होता ऐसामन यही सब गुन करचुप रह जाता हैछोड़ देता हैवापसी की संभावना टोहना । साइकिल गहरा बहुत गहरा जुड़ाव हैहमारी नॉस्टेलजिया सेसाईकिल काहममें सोया बच्चा जग उठता हैआज इस उम्र में भी अगरसाईकिल चलाने का अवसर हाथ आ जाएएक सुखद प्रतीति से गुजरकरहम गुजरे कल में पहुंच जाते हैंयाद आते हैं बचपन के वो दिनजब

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कविता

(राजीव कुमार तिवारी ) ## किरायेदार कितना भी मन रम जाए उनका वहां रहते हुए चाहे कलेजा ही क्यूं न फट जाए वहां से निकलते हुए किरायेदारों को मगर/फिर भी छोड़ कर जाना पड़ता है किराए का घर एक न एक दिन बहुत करीने से संवार के रखने के बाद भी किसी भी हद में लगाव जुड़ाव होने के बावजूद घर कभी किरायेदार का अपना नहीं होता किराए का एक ठौर ही रहता है छोड़ कर जाते वक़्त जब पलट कर देखता है किरायेदार घर की तरफ घर का मन भी भाव विहवल हो जाता है पर मकान मालिक की ठस नजर को नहीं दिखता ये सबकुछ वहां तो बस पैसों की लोलुपता बसती है कई कई घरों में रहता

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कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) जो हूं और जो होना चाहता था कहां होना था मुझकोजहां हूंया जहां होना चाहता था मैंक्या इस प्रश्न का उत्तरकिसी के पास है कोई ?जहां हूंऔर जहां होना चाहता थाके मध्य जो संघर्ष हैक्या जीवनउसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?समय जो चित्र बनाता है हमाराउसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता हैपर प्रकट कभी कोई विशेषरस या रंग ही होता हैक्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?जहां प्रवाह रुक गया नदी जल काजो होना चाहता थावो जो हूंभर रह गयाअपने वर्तमान से अवकाश लेकरसमय की किताब मेंफिर लौटना चाहता हूंउसी अनुच्छेद तकऔर उन तमाम अवरोधों कोहटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूंताकि जो

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कविताएं

आत्महत्या हाँ जीवन कभी कभीबहुत कठिन हो जाता हैरास्ता कोई नहीं सूझताहताशा, उदासी और कुंठा कीपकड़ से छूटने कामन के घुप्प अंधेरे जंगल सेबाहर निकलने कादर्द और दुख के दलदल मेंडूबती जाती हैपल पल जिजीविषाकोई नहीं होता इतने पासजिससे कहकर मन की बातसंघनित पीड़ा कोवाष्पित किया जा सकेजिसके कांधे पे रख के सरस्वयं को भुला जा सके पूरी तरहदूर बहुत दूर तकदृष्टि में नहीं होताउत्साह उमंग और आनंद का फैलाव जबउस काल खंड में भीस्वीकारना चाहिए जीवन कोउसकी संपूर्णता मेंउसके चूभते कोणों को सहते हुएजीवन सिर्फ अपने लिए नहींदूसरों के लिए भी हैबल्कि दूसरों के लिए ही ज्यादा हैबहुत बार हमनाव के सवार होते हैंमल्लाह के भरोसेसागर पार हो जाते हैंपर कई बार हमेंमल्लाह भी होना होता हैदूसरों को पार

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