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कोरोना का भय

कोरोना का भय

✍️कृष्ण प्रसाद उपाध्याय सरकार द्वारा बलात् नियुक्त कोरोनाकाल की अनेक जान जोखिम में डाल कर दी ड्यूटियों…… जैसे पका राशन बांटना, सूखा राशन बांटना, खाद्य सामग्रियों व सौंदर्य प्रसाधन युक्त किट बांटना और अंततोगत्वा कोरोना संक्रमित लोगों के घरों की निशानदेही कर, ऑक्सो मीटर आदि उपकरण देना, अपर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के साथ उन्हीं सामग्रियों का पुनः संक्रमण मुक्त हो रहे लोगों के घरों से संकलन करना, संक्रमण के लक्षण वालों का प्रेगनेंसी टेस्ट किट जैसे किट द्वारा परीक्षण में, प्रयोगशाला सहायक का भी सहायक के रूप में प्रतिभागिता करना तथा लगायत संक्रमणग्रस्त जनों व घरों के, आस पड़ोस के पचास घरों का सर्वे करना आदि शासन द्वारा शिक्षकोचित समझे जाने वाले अनेक कार्यों के सफल व सौभाग्य से सकुशल निर्वहन करने के बाद, बिना कोई श्रेय व सुविधा लिए जब रामखिलावन त्रिपाठीजी मुक्त हुए, तो खुद को 4 दिन यथासंभव यथाशक्ति सख़्ती के साथ एकांतवासी अर्थात कोरन्टीन भी किया। तत्पश्चात् घर में शनैःशनैः ‘बाल-बाल बचे’ की भावनाजनित खुशियां तैरने लगीं… बच्चा पास आने लगा…. खुद बच्चों के कमरों में प्रवेश भी वे पाने लगे… झगड़े हुए पति-पत्नी की भांति विपरीत दिशा में करवट ले, बीच में तकिए का बांध बांधकर ही सही उसी ए/सी वाले कमरे में सोने भी लगे ही थे… कि एक रोज रात 10:00 बजे के करीब श्रीमती जी ने टीवी देखते हुए उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा ‘देखना, क्या मुझे फीवर है ?’ वे चौके, अंदर से तो उतना नहीं, लेकिन पत्नी के प्रति प्रेम प्रदर्शन का या ‘मैं भी उनकी चिंता करता हूँ’ का यह एक मौका नज़र आया हो, जो भी हो! बिस्तर से उछले और लगभग एक से डेढ़ मिनट में थर्मामीटर ले आए। देखा तो 99 डिग्री था, तापमान। बोले ‘हां, है तो, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं… चिंता करने वाली कोई बात नहीं..।’ लेकिन वह पत्नी ही क्या, जो पति की बात को वैसा ही समझे जैसा वह बोल रहा है। वे अभिधा, व्यंजना, लक्षणा आदि शब्दशक्तियों की परिभाषा भले ही जानें या न जानें लेकिन पति की बात का तात्पर्य व्यंजना और लक्षणा में ही स्वीकारना जरूर जानती हैं। बोलीं ‘क्यों बरगला रहे हो, तुम्हारे दोस्त को कोरोना हुआ था, उसे भी तो इतना ही बुखार रहता था न?’ उसके बाद भी शांति और संयम भाव के साथ त्रिपाठीजी ने उन्हें सकारात्मक स्थिति में रखने के उद्देश्य से जो लंबी जिरह की, उसका निष्कर्ष उतना ही निकला, जितना अगर वे उनके पहले सवाल के बाद ही निरुत्तर हो जाते, तो निकलता…। रात तो जैसे भी हो कट गई, जब सुबह हुई तो देखा श्रीमती जी भिन्न प्रकोष्ठ में थीं….. पुराने राजा-महाराजाओं का जमाना होता और वे महारानी होतीं, तो निश्चित ही चिंता, टेंशन, परेशानी, रोग या शोक में से किसी एक भवन में होतीं…..! जैसे कभी कैकेयी कोप भवन में थीं। चिंता चिन्ह युक्त शांत चेहरा, अशांत व परेशान मन का प्रतिबिंबन कर रहा था। उनिन्दा, बोझिल सी पलकों वाली कुछ-कुछ सूजी हुई भी… जैसा कि सुबह प्रायः सबकी होती हैं, आंखें…. कुछ ताक रहीं थीं। मुआमले की गंभीरता को भांपते वे हुए, ये उनके करीब गए और जैसे ही उनके करीब बैठने लगे थे कि अर्धांगिनी की सूजी हुई और शून्य को निहारती आंखों ने वक्र भृकुटियों के साथ उन्हें घूरा और सामान्य से कुछ अधिक घर-घर की आवाज में ‘वहां मुड़े में बैठिए, मेरे पास नहीं!’ कहा। उसके बाद भी समझाने या ढांढस बंधाने के लिए जो कुछ रामखिलावन जी ने कहा, निरर्थक ही सिद्ध हुआ। और सामान्यतः हर प्रसंग की भांति हारकर, उनके द्वारा इंगित स्थान पर बैठ गए। वे आगे बोलीं ‘मेरे गले में कोई गांठ अटक गई हो, ऐसा लग रहा है।’ अब परेशान होने की बारी इनकी थी। सरकारी बॉडीगार्ड वाला एप्स टटोला, चार अंकों वाला सर्वाधिक प्रचारित टोल फ्री नंबर मिलाया, आस-पास के सरकारी डिस्पेंसरियों के नं. मिलाए….. लेकिन सुबह के सात-साढ़े सात बजे कौन मिलेगा? इतनी आसानी से जो सुलभ हो, वह सेवा सरकारी ही क्या?… चाय भी जो, वे बना कर लाए थे, भार्या-भय से भी अधिक कोरोना से भयाक्रांत पति ने पत्नी को तथाकथित अछूतों सा व्यवहार करते हुए अलग-थलग ही दिया। पत्नी की तमाम चिंताओं में आधी से भी बड़ी एकमात्र चिंता थी ‘बच्चा’। ‘बच्चे का क्या होगा?’ ‘उसे कौन बनाकर खिलाएगा?’ ‘उसे खुद से दूर कैसे रखूंगी?’ वहीं ये अनेक, पत्नीवाली चिंताओं के साथ ही इस ओर भी सोच रहे थे, कि अब मेरा व्यवहार पत्नी के प्रति कैसा हो? ‘ क्या वैसा हो, जैसा कोरोनाग्रस्त लोगों के प्रति उनके पड़ोसियों का पाया था? या जो उन्होंने सर्वे के दौरान घर के लोगों का व्यवहार अनुभव किया?’ मसलन कुछ बानगियाँ ‘देखिए, इनको बोल के जाइए! ये बाहर ना निकलें, उनके घर से कोई न कोई बाहर आ जाता है…’ ‘कल पीयूष (संक्रमित) की मम्मी, ऊपर अपनी बालकनी से कितनी देर तक मुझसे बात करतीं रहीं… बिना मास्क डाले और उन्होंने अपने बेटे को कोरोना होने की बात भी नहीं कही…’ आदि अनेक बातें, जिसे लोग उन जैसे धक्का खाते अध्यापकों से, बड़ा अधिकारी, पुलिस वाला या एमसीडी का कर्मचारी समझ कर आवेदन, निवेदन अथवा आदेश के अंदाज में कहते थे। और ये ‘बिल्कुल…! बिल्कुल…!! बिल्कुल गलत है…!!!. कॉल करेंगे…!!! जरूर!! जरूर!!… जैसे समर्थन वाले जुमले अनधिकार-आश्वासन-रूप बांटते हुए आगे बढ़ते थे। असंख्य, अकथ्य व अलिख्यप्रायः अनेकानेक प्रसंगों में एक प्रसंग अब भी उनके मनोमस्तिष्क में ताजा था…… जिसके बाद रामखिलावन त्रिपाठी उन दोनों बाप-बेटों पर खासे झिड़कने के अंदाज में नाराज हो गए थे। उस दिन त्रिपाठी जी ने पहले से रोल किए हुए कागज के टुकड़े की सहायता से डोर बेल बजाई… गेट जाली का ही लगा था, अगला खुला था शायद! अंदर से आवाज आई ‘कौन?’ इन्होंने कहा ‘दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरी से आए हैं, डीएम के ऑर्डर से…’ इनके पास जितनी बड़ी से बड़ी ताकत थी, डराने के लिए… झोंक दी थी। शिक्षक, टीचर या मास्टर हूँ कहते, तो कौन पूछता? अंदर से आश्वस्त आवाज़ ने फिर पूछा- ‘काम?’ लेकिन चारपाई की चरमराहट बता रही थी कि कोई इनकी ओर अग्रसर है…. ‘जी कविदास, उम्र 65 वर्ष, कोरोना पॉजिटिव का घर यही है?’ शायद इनके सरकारी ठसक या नियमित और निर्धारित कार्य से भिन्न-कार्यजन्य खीज के कारण, तब भी काम कम और उनकी बेचारगी के लिए पर्याप्त कारण ही बताया था रामखिलावन जी ने… तब तक एक रुमाल का मास्क लगाए, अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने दरवाजा खोला और कहा ‘जी कहिए!’ इन्होंने कहा ‘कविदास जी ठीक हैं?’ उन्होंने कहा ‘ठीक है, कवि नहीं, रविदास है मेरा नाम…’ बिजली से झटका खाए इंसान-से दो कदम पीछे उछल गए थे वे, बोले ‘आप खुद बाहर क्यों आए, आपके घर में कोई और नहीं है?’ शब्द ही उनके संयत थे, भाव या लहजा पर्याप्त डांट से भरा था। एक युवक ने दरवाजे के बीच खड़े इंसान को हाथ से बगल में ठेलते हुए ‘हटना पापा’, कहा और बाहर निकलकर इनके बिल्कुल करीब आने लगा…. ‘हेलो…! हेलो…!! हेलो…!!! ठहरो भाई, कहां चले आ रहे हो?’ जब तक वह कुछ समझता या बोलता… तभी इन्होंने उसे एक सख़्त वाचिक आदेश भी थमा दिया ‘पहले मास्क पहन कर आओ’ शायद वह इनसे कानाफूसी के अंदाज में बात करना चाहता था, ताकि दूसरों की परेशानी में आनंदानुभूति की आदी पड़ोसी कानों की सक्रियता न हो… लेकिन इनकी त्योरियां चढ़ चुकी थीं। उसके बाद जो हुआ बहुत वर्णनीय नहीं है…… लेकिन उस बेटे का जो व्यवहार अपने पिता के प्रति था वह इनमें पर्याप्त रोष व जुगुप्सा के सर्जन का कारण बना….. और आज वे उसी लड़के के स्थान पर खुद को पा रहे थे। जैसे इनकी अपेक्षानुरूप वह युवक नहीं व्यवहार कर पा रहा था, वैसे ही ये भी पत्नी के प्रति अस्पृश्य-सा कठोर व्यवहार में कठिनता का अनुभव कर रहे थे। लगभग सुबह के 10:00 बजे तक इनकी तमाम उद्वेलित भावनाएं शिथिल हो चुकीं थीं और पत्नी को समझाने में भी प्रायःसफल हो गए थे, शायद! रविवार का दिन था। कहीं कोरोना टेस्टिंग कैंप का पता किया और बच्चे को टीवी व कार्टून के हवाले कर, एक ही बाइक से दंपती गए, दोनों ने चेक करवाया, दो नेगेटिव रेपोर्ट के साथ अनंत पॉजिटिविटी की उर्जा खुद के अंदर महसूस करते हुए, घर आ गए और-फिर नहा-धोकर बच्चे को कसके गले लगाया, दोनों ने…। बच्चा कह रहा था…’अले..!अले..! ये क्या कल लहे हो… कभी बोलते हो पाछ मत आना…. और कभी इन्नी जोल से हग कल देते हो…??? के पी उपाध्याय ©® Krishna Prasad Upadhyay (कृष्ण प्रसाद उपाध्याय) RPVV, BE BLOCK, Hari Nagar, New Delhi-110064, kpupadhyay1975@gmail.com
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कविताएं

कविताएं

[पसीना ]

पसीना
सजीवों को आता है
निर्जीवों को नह आता
दौड़ने भागनेवाला
बहाता है पसीना
बैठे ठाले बहता है पसीना
ज्यादा ताप ज्यादा शीत से भी निकलता है पसीना
भय और घबराहट से आता नहीं उतरता है पसीना
श्रमिक जो बहाता है पसीना
वह ज्यादा चमकीला
ज्यादा गर्म
ज्यादा नमकीन होता है
त्वचा का रंग नहीं घुलता पसीने में
वह बस पृष्टभूमि में रहता है
इसलिए ग्लोब पर कहीं भी
किसी भी जीवधारी का
पनीला ही होता है पसीना
पसीना यूं तो सच ही प्रकट करता है
अतिरंजना की छूट रहती है मगर थोड़ी बहुत
उसके गुण धर्म को समझते समझाते समय
श्रम के अनुवाद की तरह से भी
भय अकुलाहट उकताहट की अभिव्यक्ति के तौर से भी ।

[वक़्त]

वक़्त कहीं नहीं जाता
वहीं रहता है
जहां उसकी जगह होती है
आदमी गुजर कर
वक़्त के दायरे से
अपनी यात्रा पूरी करता है
गए वक़्त से मिलने के लिए
फिर उसी जगह पर लौटना पड़ता है ।

राजीव कुमार तिवारी
देवघर, झारखंड
9304231509, 9852821415
rajeevtiwary6377@gmail.com

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नौकरी

नौकरी

नौकरी

(सच्चे अनुभव में चुटकी भर कल्पना का छोंक)
—————-
मैं फितरत से सुस्त और उदास रहने वाला आदमी हूं..। लेकिन दोनों ही आदतों से कमाई नहीं होती..। लिहाज़ा पापी पेट और स्वादु जीभ के लिए गाहे-बगाहे नौकरी करनी ही पड़ती है..। कितने ही शनिचर शनि देव को तेल चढ़ाने, और उससे भी ज़्यादा संडे अपने बॉसनुमा दोस्तों को दारू चढ़ाने का प्रताप था कि इस लॉकडाउन में भी इंटरव्यू का कॉल आया..।

पहला अपशकुन तो उस दफ़्तर के चौखटे में ही नज़र आ गया..। पूरी शीशे की इमारत थी..। मुझे शीशे की दीवारों से उतनी ही नफ़रत है, जितना नौकरी करने से..। उनके ससुरे कान ही नहीं आंखें भी होती हैं..। भीतर चमचमाती लॉबी..। फर्श में चेहरा दिखा तो याद आया बालों में कंघी फेरने की याद ही नहीं रही थी..। रिसप्शनिस्ट प्रसन्नता से ऐसी भरी थी, मानो फट जाएगी..। लग रहा था अभी ‘ला..लालाला..’ गा उठेगी..। हालांकि उसके काउंटर पर रखे मत्स्य-पिंजर में तैरती मछलियां बोरियत से सिर पटक रही थीं..। शीशे की दीवारों से..।

उसके बाद बाईं ओर से अंदर मुड़कर कैंटीन आया..। किसी गुरुद्वारे का लंगर-घर गौरी ख़ान टाइप इंटीरियर डेकोरेटर के हत्थे चढ़ जाए, कुछ ऐसी शक्ल का..। बैठते ही हमें फ्री का ब्रेकफास्ट परोसा गया..। प्लेट सामने आते ही मुझे वो इलहाम हो गया, जो मेरे साथी भुक्तभोगी ना समझ पाए..। ये दावत भी हमारी परीक्षा का ही हिस्सा था..। लिहाज़ा मैंने ब्रेड-टोस्ट उठाया और उसे छोटे-छोटे कौर में धीरे-धीरे मुंह को गोल-गोल घुमाकर चबाया..। ऐसे जैसे उसकी कैलोरी का पूरा माप समझ-बूझकर खा रहा हूं..। इतना ही नहीं, मैंने वो तक कर डाला जो सामान्य हालात में शायद ही दुनिया की कोई ताकत मुझसे करवा पाती; छोले-भटूरे को हाथ भी नहीं लगाया..। इसके बाद हाथ में कॉफी का कप लेकर यूं बेचैनी से घूमने लगा जैसे कर्मठता मेरे भीतर ठाठें मार रही हो..।

शायद इसी का नतीजा था कि इम्तिहान वाले कमरे में सबसे पहले घुसने का इशारा मुझे ही हुआ..। दीवार की रंगों से मेल खाते टेबलों पर प्रश्न-पत्र बड़े करीने से सजे थे..। मैं अक्सर सोचता हूं हम मिडल क्लास चाहकर भी अपने दरो-दीवार को ऐसे क्यों नहीं सजा पाते हैं..? पूरा कक्ष खाली था, लेकिन मुझे किसी की निगरानी में होने का इतना यकीन था कि मैं अकेले में भी जंग मे जाने को बेताब सैनिक जैसा बर्ताव करता रहा..। मैंने बॉलपेन को जेब से निकाला, उसे बेवजह अंगूठे से टिकटिकाना शुरू कर दिया..। नज़दीकी टेबल तक खुद नहीं गया बल्कि उसे अपनी ओर खींचकर प्रश्न-पत्र को ऐसे उलटने-पलटने लगा जैसे भूखे ग्राहक रेस्तरां में मैन्यू को करते हैं..।

सवाल नंबर-1: क्या आपकी नज़र में ये ठीक है कि इंसान के दो बाज़ू, दो टांगें, दो आंखें और दो ही कान हों..?
मैंने लिखा, “मेरी ऊर्जा के लिए तो चार बाज़ू, टांगें और कान भी कम होंगे..। इंसानों को पूरी क्षमता के मुताबिक अंग ही नहीं दिए कुदरत ने..।” देखिए झूठ और कल्पना में म्हीन रेखा होती है..। चूंकि नौकरी की परीक्षा में आप सिर्फ सद्गुण ही लेकर जाते हैं, इसलिए मैं उत्तर को बाद वाली श्रेणी में रखूंगा..।

सवाल नंबर-2: आप एक बार में कितने फोन संभाल सकते हैं..?
यहां भी वही कल्पनाशीलता काम आई: “जब सिर्फ छह-सात फोन हों तो मैं बेचैन हो जाता हूं,” मैंने हांका, “कम से कम नौ तो होने ही चाहिएं ताकि मुझे लगे कि मेरी क्षमता के साथ न्याय हो रहा है..।”

सवाल नंबर- 3: आप अपना ख़ाली वक्त कैसे बिताते हैं..?
मेरा जवाब: मैं “खाली वक्त” जैसी किसी चीज़ को जानता ही नहीं- 18वें जन्मदिन पर ही मैंने इसे अपने शब्द-कोष से निकाल फेंका था..। ”

और मुझे नौकरी मिल गई..।

नौ-नौ फोन की बाज़ीगरी के बाद भी मुझे लग नहीं रहा था कि मेरी क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है..। मैं उनमें चिल्लाता रहता: “कुछ तो करो… जल्दी करो…!” “एक्शन होना चाहिए!”, “एक्शन लिया जाएगा”, “एक्शन लिया गया है”, ये सब मेरे तकियाकलाम बन गए..। हालांकि देश के मुताबिक वेश अपनाते हुए कुछ वक्त में मैंने “होना चाहिए” जैसे जुमले भी हटा दिए और “होकर रहेगा” पर उतर आया..।
सबसे दिलचस्प था दोपहर का लंच-ब्रेक..। सबकी अपनी कहानी होती है, लेकिन वो दफ़्तर खुद को कथाकार मानने वालों से बजबजा रहा था..। ऐसा लगता था दीवारों के बाद कान सिर्फ मेरे ही हैं वहां..। ऊपर से नीचे तक किसी भी शख़्स को पकड़कर बटन भर दबाने की देर थी बस..। हम जैसे छोटे लोगों के लिए ‘ऊपर’ का मतलब दो लोग थे..। एक बॉस और दूसरा उसका चमचा-इन-चीफ़..। उनकी ख्याति और भावनाओं की खातिर नाम ‘ब’ और ‘च’ मान लेते हैं..।

श्रीमान-च के साथ हर चर्चा पांच मिनट के भीतर ही छात्र जीवन में उनके दिन के वक्त अख़बारें बेचने, शाम को पढ़ने और रात को चौकीदार की नौकरी करने की कहानी तक पहुंच जाती थी..। नव-दीक्षित चेले-चांठे मासूमियत में पूछ लिया करते थे, “सर, आप सोते कब थे..?”

“आराम हराम है,” जवाब श्रीमान-च की जेब में रेडीमेड रखा रहता था..।

वहीं श्रीमान-ब उस श्रेणी के लोगों में थे जो सुबह आंख भी सावधान की मुद्रा में मुट्ठी भींचे ही खोलते हैं..। जिनका नित्य-कर्म इसी ऐहद के सहारे पूरा होता है कि आज मैं और ज़्यादा काम करूंगा..। शेविंग ब्रश को धोते वक्त वॉश-बेसिन में बहते दाढ़ी के बालों को वो विजयी-भाव से देखते हैं और सोचते हैं: ये रही कर्म की बलि-बेदी पर दिन की पहली कुर्बानी..! अन्य अंतरंग क्रियाएं भी इस किस्म के लोगों को इसी प्रकार का सुख देती हैं: अब पानी बहा दिया गया है, अब पेपर का इस्तेमाल हो गया है…एक्शन ले लिया गया है…

श्रीमान-ब तो मानो थे ही एक्शन का चलता-फिरता अवतार: उनकी चाल-ढाल, बात का अंदाज़..शायद पत्नी के साथ चुंबन की क्रिया भी एक्शन ही थी उनके लिए..।

दफ़्तर में घुसते ही वो कोट के ऊपर का बटन उतारते और लगभग चिल्लाते हुए रिसप्शनिस्ट को यूं गुड मॉर्निंग कहते कि कानों तक पहुंचते-पहुंचते “आक्रमण..!” जैसा सुनाई पड़ता..। इसके बाद वो एक-एक डेस्क पर जाते और इसी यलगार की मुद्रा में कहते: “टुडे, वी विल हेव सम एक्शन..!”

“यस सर..।” उत्तर का समवेत सुर परेड की याद दिलाता..। मैं भी पूरे ज़ोर से इन्हीं शब्दों में श्रीमान-बी को सलामी देता..। मेरी मुट्ठियां क्यों भिंच जातीं, मैं समझ ही नहीं पाता..।
महीने भर में ही मैंने अपनी जेब और डेस्क में कुल फोनों की तादाद बढ़ाकर 11 कर दी..। 2 महीने में 13..। हालांकि इस संख्या को हमेशा से मनहूस ही मानता आया था..। हर रोज़ मैं मेट्रो में नए-नए आदेश-सूचक जुमले और आज्ञार्थक क्रियाएं सोचते हुए दफ़्तर पहुंचता..। यूं सुबह की भीड़ में भी सफर कब कट जाता, पता ही नहीं चलता..। मसलन दो दिन तक हर किसी को यही जुमला चिपकाता रहा: “देखो, काम की कमान कसी रहे…” वाक्य में प्रयुक्त अनुप्रास अलंकार अनोखा ही सुख दे रहा था..। फिर कुछ दिन ये चला- “काम में काहिली कमीनापन है…”

अब जाकर लगने लगा था कि मेरी काबिलियत के साथ कुछ न्याय हो रहा है..। वाकई ही आसपास कुछ एक्शन नज़र भी आने लगा था..। फिर एक सोमवार की सुबह जब मैं कुर्सी पर अभी खुद को टिका ही रहा था- श्रीमान-ब मेरी ओर उसी युद्धघोष के साथ दौड़े चले आए- “लेट्स हेव सम एक्शन..!”

मतलब मुझे ‘हेल फ्यूहरर’ के अंदाज़ वाला “यस सर” याद था, लेकिन उस दिन श्रीमान-ब के चेहरे पर कुछ ऐसी अबूझ छाया दिखी कि मेरे मुंह से कुछ निकला ही नहीं..। शायद खामोशी थोड़ी लंबी ही खिंच गई होगी क्योंकि अगली आवाज़ मेरे कानों में श्रीमान-ब के चिल्लाने की ही पड़ी..। “अगर अब भी यहां के कायदे नहीं जानते तो बोरिया-बिस्तर पैक कर लो…”

मुझे काटो तो खून नहीं..। किसी तरह शब्द मुंह से निकले, बिल्कुल ऐसे जैसे किसी शरारती बच्चे से गलती मनवाई जाए; सभी कुल देवी-देवताओं को याद करके सिर्फ इतना ही बन पड़ा, “सर, अभी एक्शन लिया जाएगा…”
अभी मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि आंखों के सामने सिर्फ एक्शन ही नहीं ड्रामा भी था..!

श्रीमान-ब फर्श पर गिरे पड़े थे..। आखिरी बार “एक्शन” यूं चिल्लाए, मानो शब्द कहीं फेफड़ों में फंसा रह गया हो..। बाकी की बात अधूरी ही छूट गई और वो एक और करवट लेकर कॉरिडोर पर पूरी तरह फैल गए..। अचेत..। मैं देखते ही समझ गया..। फिर भी मैंने आदतन पुष्टि की, डरते-डरते उनके करीब जाकर नब्ज़ टटोली..।

श्रीमान-ब की ईहलीला का द एंड हो चुका था..।

काम में इस खलल पर झुंझलाते हुए मैं श्रीमान-ब के पार्थिव शरीर के बगल से गुज़रा और अपनी सामान्य गति से श्रीमान-च की कुर्सी तक पहुंचा..। वो दोनों हाथों में फोन थामे हुए थे; उन्होंने दांतों के बीच बॉलपेन दबाया हुआ था, जिससे वो कुछ लिख रहे थे..। पैर टेबल पर फैले हुए थे और उनकी उंगलियां लैपटॉप के की-बोर्ड पर कुछ कर रही थीं..।

“सर, कुछ एक्शन हो गया है,” मैंने धीमी आवाज़ में कहा..।

“गुड-गुड, हमें एक्शन ही चाहिए…”

“सर, बाहर कॉरिडोर में श्रीमान-ब की लाश पड़ी है…”

“नहीं…?” श्रीमान- च के हाथों से फोन और दांतों से बॉलपेन गिर पड़ा..जिस तरह वो कुर्सी से उछले, लैपटॉप का सही-सलामत बख्शा जाना नियति ही माना जाएगा..।
“हां सर,” मैंने कहा, “बाहर चलकर खुद ही देख लीजिए!”

“ये…ये…ऐसा कैसे हो सकता है..” श्रीमान-च ने बिजली की गति से जूते पहने और कॉरिडोर की ओर दौड़ पड़े..।

“न…हीं..!!” लाश को देखते ही शीशे की दीवारों को चटका देने जितनी विदारक चीख उनके मुंह से निकली..। “ये नहीं हो सकता…”

आखिरी वाले जुमले ने मुझे मसाला फिल्मों की हिरोइन की याद दिलाई..। लेकिन मैंने प्रतिवाद करने के बजाए श्रीमान-ब की लाश को सीधा किया, उनकी आंखों को बंद किया और अपनी चिर-परिचित उदासी से उस पंचतत्त्व की काया को एकटक निहारने लगा..।

सच कहूं तो इस वक्त मेरा दिल पसीज रहा था..। पहली बार महसूस हुआ कि मैंने श्रीमान-ब से कभी नफ़रत नहीं की थी..। मौत उनके चेहरे पर कुछ-कुछ ऐसे बच्चे जैसा भाव छोड़ गई थी जो सांता-क्लॉज़ में भरोसा छोड़ने को तैयार ना हो, अपने साथी-संगियों के तर्क भारी पड़ने के बाद भी..।

“ये इतना अचानक कैसे हो गया,” श्रीमान-च ने पूछा..।

“वो बाद में जान लीजिएगा, सर,” मैंने उनके कानों के पास जाकर कहा..। “ये समय एक्शन का है…”

और एक्शन लिया गया..। तुरंत मुर्दाघर से गाड़ी मंगवाई गई..। मेरे हिस्से कफन का इंतज़ाम करके उनके घर पहुंचाने का काम आया..। ना सिर्फ मेरी निष्क्रियता एवं उदासी, बल्कि मेरा चेहरा-मोहरा भी ऐसा है जो आपकी कफन जैसी बोरियत की ही याद दिलाएगा..। इसलिए जब श्रीमान-ब की अर्थी को कंधा दे रहा था तो सफेद कुर्ते-पजामे का इंतज़ाम ना कर पाने के बावजूद भी जंच रहा था..।

फोटो पोस्ट करने के बाद साहित्य-सेवी पन्नों पर लाइव आने के निमंत्रणों की बाढ़ आ गई..। “आपके चेहरे पर छपा है, आप राइटर हो”..एक कलाप्रेमी ने कमेंट किया था..।

पता नहीं इस क्षणभंगुर यश का नशा था या कुछ और; कोई महीने भर के अंदर ही मैंने इस्तीफे का मजमूं तैयार किया..। उसमें लिखा कि मुझे महसूस हो रहा है कि मैं कंपनी को अपनी क्षमता के मुताबिक सेवाएं नहीं दे पा रहा हूं; 13 फोन और 217 व्हाट्सऐप समूह भी मेरी प्रतिभा के लिए काफी नहीं पड़ रहे..।

अब दिन भर साहित्यसेवी फेसबुक समूहों में सक्रिय रहने से जो वक्त मिलता है, उसमें कमाने के लिए भी लिख लेता हूं..। पार्ट टाइम जॉब के तौर पर कभी-कभी लोग अर्थी को कंधा देने के लिए भी बुला लेते हैं..।

अरे! ये तो बताना ही भूल गया…शीशे की उन दीवारों के भीतर ख़बरों का कारखाना चलता था..।
(समाप्त)
(तस्वीर सौजन्य- वैक्टर स्टॉक)

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कविता – प्रेम

कविता - प्रेम

कितना बाँधा है इसको मैंने, ये असीमित ही रहा।।
तुम्हारा प्रेम छिटका ब्रह्मांड में, अपरिमित ही रहा।।

अपने आत्मसंतुलन में जब भी हो गई गर्वित मैं ।
तुम्हारी विस्मृति के भान में कुछ-कुछ रही दर्पित मैं ।।
जाने क्यों झरते हुए अश्रुधार में कम्पित ही रहा।।
तुम्हारा प्रेम छिटका ब्रह्मांड में, अपरिमित ही रहा।।

राग, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, अहम् सब ही माटी हो गए ।
उन पदचिन्हों को ढूँढना मन में, परिपाटी हो गए ।।
गूँगा प्रेम प्राणों की मौन ध्वनि में भाषित ही रहा।।
तुम्हारा प्रेम छिटका ब्रह्मांड में, अपरिमित ही रहा।।

ये जो अंकुर फूटा है, काश विटप न बने तो अच्छा ।
ये आर्द्रता जीवन की कहीं आतप न बने तो अच्छा।।
मनुष्य सरलता के सोपानों में भी शंकित ही रहा।।
तुम्हारा प्रेम छिटका ब्रह्मांड में, अपरिमित ही रहा।।

चारों ओर भीड़ में आत्मा के बंधन मुट्ठी भर हैं।
सर्पों से घिरे वृक्षों पर खांटी चंदन मुट्ठी भर हैं।।
धमनियों में बहता जो, समूह में अपरिचित ही रहा।।
तुम्हारा प्रेम छिटका ब्रह्मांड में, अपरिमित ही रहा।।

कितना बाँधा है इसको मैंने, ये असीमित ही रहा।।
तुम्हारा प्रेम छिटका ब्रह्मांड में, अपरिमित ही रहा।।
~निवेदिता चक्रवर्ती

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डिजिटल भारत

डिजिटल भारत

अपनी जिह्वा और कण्ठ में
अवसादों के गट्ठर फँसाए
दोहरे मापदंडों के साथ
कुछ इंसानी जानवर
अपनी गाड़ियों में छुप कर
रिकॉर्ड करने वाले आईने को लेकर
खुद की भद्दी तस्वीर सामने देख
सड़कों पर दुम दबाए भोंकते हैं

अपने नुकीले दांतों से
दूसरों की ज़ुबान काट लेने को
घात लगाए बैठे ये भेड़िये
जिनके गलों पर पट्टे नही है
इतिहास और संस्कृति की आड़ में
चीरहरण कर रहे हैं
उसी इतिहास और गौरव का
जो इन्हें जान से प्यारा है

ये क्या हो रहा है ?
दुख होता है
क्या आज का नौजवान दुर्बल है?
क्यों इतना क्षीण हो चला
कि इस तरह की मनमानी
इस तरह के कमीनेपन पर उतर आया
कि भूल गया उसका भी यही घर है

ज़िन्दा शरीर में मृत आत्मा लिए
घूम रही इन अभागी लाशों का
खून भी सड़ा हुआ होता है
काला पड़ जाता है जम जाता है
ज़ुबान तो खैर होती है सड़ी हुई
तभी तो अपने ही दीन बन्धुओं से
अपने ही देश में ये कुरुक्षेत्र बना रही हैं
ऐसा युद्ध जिसका मतलब ही नही

खोखली खोपड़ी के ये अमानुष
अनायास की गरमागर्मी में
बीमारी की तरह नफरत फैला रहे हैं
इनके गलों पर पट्टे बांधने हैं
हमे तुम्हे ही यह लगाम कसनी होगी
वरना काल के कपाल पर ये वो इतिहास रचेंगे
प्रकांड विध्वंसी ज्वालामुखी विस्फोट
जिससे कम खतरनाक है

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शायरी

Poetry

कुछ घड़ी अंकुश हटाकर बन्धनों के देख
समय की अपनी गति फिर मोह कैसा है..

चल रहा हर एक कदम बस लक्ष्य साधकर
खिल रही कुसुमावलि का रूप कैसा है..

भाँप ले उन्माद चाहे लाख झोंकों का
रोक सकता कौन इन्हें तन भेद सकने से..

तज रहे हैं भोग जिन निधियों को पाने को
वह छिपी हर श्वास भर उन्मुक्त जीने में..

पल्लवी चतुर्वेदी

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बखेड़

बखेड़

बखेड़ा

कार्बन डाइऑक्साइड को
अवशोषित करके प्राणवायु
ऑक्सीजन लेने वाले मानव
के लिए परोपकारी पेड़ है।
घर में भाई से भाई को
एक दूसरे देश को आपस में
लड़ाने वाली मेड़ है।
आज तो प्रेम प्यार की
बयार चलती ही नहीं
नफरत बैर-बुराई
घृणा के बीज बोने
वाली लोकतांत्रिक
मानव रूपी भेड़ है।
अमीर गरीब की
खाई बड़ी है यहां
जाति धर्म के नाम पर
होता बखेड़ है।।

नीतू गणपत सूर्यवंशी
बैतूल, मध्यप्रदेश
neetujha0710@gmail.com

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बेटियाँ

बेटियाँ

कविता :

“बेटियाँ”

घर मे खुशियों की बौछार , लाती हैं “बेटियाँ”
सूने घरों मे त्यौहार , लाती हैं “बेटियाँ”
माँ की सहेली पापा की लाडली , बन जाती हैं “बेटियाँ”
दादी और दादा की भी खास , कहलाती हैं “बेटियाँ”
अपने प्यारे भाई पर खूब हुक्म , चलाती हैं “बेटियाँ”
अपनी बुआ की पक्की सखी , हो जाती है “बेटियाँ”
एक दिन ऐसा आता है , ससुराल चली जाती है “बेटियाँ”
हँसते खेलते घर को सूना , कर जाती हैं “बेटियाँ”
ससुराल में रहकर भी सारे रिश्ते , निभाती हैं “बेटियाँ”
जगह वो जन्नत से कम नहीं , जहाँ आ जाती हैं “बेटियाँ”

(बेटियों को समर्पित)

(स्वरचित)

विवेक आहूजा
बिलारी
जिला मुरादाबाद
@9410416986
vivekahuja288@gmail.com

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मास्को

मास्को

1.

शिमला में मैं पत्नी से कहता था – क्या भूत वर्तमान हो सकता है और वर्तमान भविष्य!! क्या हम घट रहे वर्तमान को समय में पीछे जाकर भविष्य के मानिंद देख सकते हैं?

पत्नी कुछ नहीं कहती थी| बस खिड़की के शीशे के बाहर देखती रहती| बाहर लैंप पोस्टों की पीली स्निग्ध रोशनियों के आवरण में चुपचाप सफेद बर्फ गिर रही होती थी| भीतर मुलायम बिस्तर पर प्रांजल की कोमल नींद बिछी रहती थी| टीवी पर बहुत धीमी आवाज में कोई क्लासिकल अंग्रेजी फिल्म होती जिसमें यूरोपीय स्थापत्य से भरे दृश्यों के पीछे मोजार्ट, बीथोवन या लिस्त की कांपती-सी धुने उठती रहती|

एक और अच्छा दृश्य याद आता है| आधी रात – बर्फ की खामोश सफेदी – हीटर की हल्की गर्माहट – कॉफी | हम दोनों खिड़की के पास अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे थे| मेरे हाथ में टॉलस्टॉय की आत्मकथा थी| अंजु टीवी पर अंग्रेजी फिल्म ‘ब्रिजिस् ऑफ स्पाई’ देख रही थी| कोल्ड वार – रशियन जासूस – मुकदमा – कैदियों का आदान-प्रदान – विभाजित जर्मनी – बर्लिन वॉल और एक शब्द बार-बार – ‘कम्युनिस्ट’ | फिल्म के बाद देर तक इन शब्दों पर बात होती रही| शोस्तोकोविच की धीमी सिंफनी (पहले फिल्म में, अब फोन में) की तहों के ऊपर हमारी बातों में किंचित गंभीरता घुस आई थी| अंत में हमारा संवाद ‘कम्युनिस्ट’, ‘कम्युनिज्म’ पर आ टिका था| गूगल पर देर तक इसकी विभिन्न परतें खोलते रहे| पत्नी की उत्सुकता ज्यादा थी| फेसबुक पर अक्सर मुझे वामपंथी कहा जाता था| यह 2017 की सर्दियों की रात थी| देश में नवीन सत्ता की स्थापना के साथ ही कुछ पुराने शब्दों की अर्थगत पुनर्संरचना हुई थी | शब्द जैसे हिंदुत्व, सेक्युलर, देशभक्ति और वामपंथी| उसके बाद से जिसके पास भी तर्क की कमी होती या विरोध में तो रुचि होती पर बहस में नहीं, वो दूसरे को वामपंथी कहकर अस्तु कर देता|

उस रात सोने से पहले पहली बार हम दोनों के मुख से लगभग एक साथ निकला था – रशिया चलें|

पर जैसा कि मैंने पहले कहा कि मुझे कभी भी इनमें से एक भी दृश्य भूत का नहीं लगता| तो क्या ‘वर्तमान’ स्मृति की दहलीज के बाहर का उजाला है और ‘स्मृति’ वर्तमान के सुनहरे उद्यान के किनारे खड़ी खामोश छाया| दोनों एक दूसरे को देखते हैं, दोनों एक दूसरे के पास उपस्थित हैं, ये एक दूसरे के भूत और भविष्य नहीं हैं बल्कि एक दूसरे के समकालीन हैं…कि स्मृति बीता हुआ कल नहीं होती, बल्कि बीते हुए कल का वर्तमान होती है| क्या ये सच है!

2.

मॉस्को के ऊपर घने बादल थे| घोषणा हो चुकी थी कि हम कुछ ही देर में उतरने वाले हैं| सीट बेल्ट लगाने की हिदायत दी जा चुकी थी| लेकिन 15 मिनट से ज्यादा का समय बीत चुका था| स्क्रीन में साफ दिखाई दे रहा था कि हम मॉस्को के ठीक ऊपर हैं| स्पष्ट था कि कैप्टन बादलों के उस विशाल सागर में गोता लगाने से हिचकिचा रहा था| सफेद-काले बादलों में दूर कहीं-कहीं हल्की रोशनी भी चमक जाती थी | वो बिजली थी | मॉस्को में शायद तेज बरसात हो रही थी और हम बरसात के ऊपर थे| पहली नजर में मेरे लिए यह फैंटेसी जैसा था – एक काव्यात्मक एहसास | पर जल्द ही इसकी जगह किसी और चीज ने ले ली| थोड़ा उचक कर दूसरी सीटों पर देखा | वहां एक आकुल सी व्यग्रता थी |मैंने बच्चों की ओर देखा | वे सो रहे थे – सब कुछ से परे, एकदम निश्चिंत | प्रांजल खिड़की के पास थी| उसके आधे चेहरे पर उज्जवल आकाश की छाया चमक रही थी| और द्विशा – हमेशा की तरह गहरी तन्मयता से युक्त, पूर्ण आश्वस्त, मेरे सुने हुए सबसे सुंदर संगीतों का सार चित्र| अंजु की आंखें बंद थी, पर मैं जानता था कि वो जाग रही है| मैं अपने सबकुछ के साथ कड़कते बादलों के ऊपर था| हमारे साथ वाली सीट पर बैठा लड़का अब भी किताब पढ़ रहा था – ओलेश गोंचार की कहानियां (कुछ देर पहले मैंने उससे किताब मांग ली थी जब वो खा रहा था) | पर अब उसके चेहरे और उंगलियों में पहले-सी तन्मयता नहीं थी | एयर होस्टेस यात्रियों से पानी के लिए पूछने लगी थी, लेकिन वे उनसे बीयर और वाईन मांग रहे थे|

‘क्या ये डर की भूमिका है!’- मैंने खुद से कहा|

मैं डरना नहीं चाहता था| सामने स्क्रीन में बहुत सारी चीजों के साथ म्यूजिक का सैक्शन भी था| ढ़ेर से क्लासिकल यूरोपियन कंपोजर| मैंने चाइकोवस्की को चुना और अपनी आंखें बंद कर ली|

भीतर टॉलस्टॉय-दोस्तोवस्की-चेखव की बातें जल्दी-जल्दी उमड़ने-घुमड़ने लगी| (आज इन पंक्तियों को लिखते वक्त भी मैं हैरान होता हूं कि उस वक्त कोई और लेखक-रशिया के बाहर का- मेरे मन में क्यों नहीं आया| लेकिन इसका कोई मुकम्मल जवाब मुझे अभी तक नहीं मिला|)

टॉलस्टॉय ने कहा था – धैर्य और समय दो सर्वाधिक शक्तिशाली योद्धा होते हैं| क्या डर के संबंध में भी ये कथन लागू होता है? क्या डर पर कोई भी दर्शन लागू होता है?

काफी देर बाद जहाज एक ओर झुका| भीतर घना धुंधलका-सा छा गया| अंजु की हथेली मेरे हाथ पर कस गई| प्रांजल के चेहरे के पीछे खिड़की के शीशे पर पानी की बूंदे नृत्य-सा कर रही थी| चारों ओर तेज फूंफकारते बादलों का घना रेला था| न जाने कितने ही बेचैनी भरे क्षणों तक जहाज उनके बीच में हल्के हिचकोले खाता रहा — चाइकोवस्की की सिम्फनी के समानांतर उठता-गिरता रहा| … और फिर अचानक, जब मुझे इस बिल्कुल बेतुके ऊहापोह से चिढ़ होने लगी, ठीक उसी समय जहाज इस निहायती ‘अब्जर्ड’ सौंदर्य अनुभव को एक झटके से छोड़कर अनंत खुले शून्य में निकल आया| एकाएक सब कुछ समतल और शांत हो गया|

जहाज में कैप्टन की निश्चिंत आवाज गूंजने लगी| लगभग पचास मिनट तक हम बादलों के ऊपर घूमते रहे थे| खिड़की के बाहर रशिया का सुखी कर देने वाला निथरा-सा चेहरा दिखाई पड़ रहा था|

3.
वीजा-पासपोर्ट चैक से निकलने के बाद ही पहली बार मैंने रशियनों को उनके चेहरे और आँखों में देखा – एक औपचारिक परिचय की तरह। लेकिन वहाँ न तो स्वागत था, न ही उपेक्षा। बस एक किस्म का शुष्क-सा स्वीकार था। आप उनसे डरते नहीं, पर उनके पास भी नहीं जा पाते। मैं स्वीकार करता हूँ कि इस पहली मुलाक़ात में मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं समझ पाया। उनके सख्त चेहरों के लाल रंग में न तो श्रेष्ठता की भावना प्रतिबिम्बित होती थी, न ही किसी तरह का कोई अहं। बल्कि बहुत स्पष्ट रूप से एक ‘बचके निकलने का-सा भाव’ दिखाई पड़ता था।

एयरपोर्ट की ऊंची काँच की खिड़कियों से बाहर दूर तक फैली हवाई पट्टियों पर ऐरोफ़्लोट के बोइंग जहाजों की गीली पंक्तियाँ नज़र आती थी। एक ऊंचे टावर पर रूसी ध्वज के रंग फड़फड़ा रहे थे – सफ़ेद, नीला, लाल। और उसके ऊपर रूसी आकाश के कैनवास पर काले-सफ़ेद बादलों का एक गहरा इम्प्रेस्निष्ट चित्र… जिसके अदृश्य अंतर्जगत में कितनी ही आशंकाएं और प्रार्थनाएं अब भी मंडरा रही थी| चारों ओर रूसी भाषा का सैलाब-सा था जिसके बीच में सुकून देने वाले छोटे-छोटे द्वीपों जैसे अंग्रेजी के शब्द नजर आते थे| इन्हीं द्वीपों पर रुकते-पड़ते हमें पुश्किन मिल गए – रूसी कवि अलेक्जेंडर पुश्किन| एअरपोर्ट के भीतर उनका आदम कद ब्रांज ‘रोमांटिक’ स्टैच्यू हाथ में किताब लिए उनके समय के पहनावे और शृंगार से युक्त बहुत निश्चिंत भाव में खड़ा था| शेरमिटयेवो एअरपोर्ट पुश्किन को समर्पित किया गया है| अपने महान साहित्यकारों के प्रति श्रद्धा भाव की अभिव्यक्ति का एक प्रेरक रूप जिसके और भी बहुत से उदाहरण बाद में हमें देखने को मिले|

मैंने अंजु को संक्षिप्त में बताया कि पुश्किन रशियन रोमांटिक काल के कवि थे और उनको आधुनिक रशियन साहित्य का संस्थापक माना जाता है| उनको शक था कि उनकी बेहद खूबसूरत पत्नी पर उसकी (पत्नी की) बहन का पति बुरी नियत रखता है| पुश्किन ने उसको ‘ड्यूल’ के लिए ललकारा और उसकी गोली से मारे गए| तब उनकी उम्र सिर्फ 37 साल थी|

अंजु ने पुश्किन के कंधे को किंचित खामोशी और सहानुभूति से थपथपाया और व्यंग्य मिश्रित अफसोस में अपना सिर झटक दिया| मैं हंस पड़ा| जाहिर है कि मैं भी उससे असहमत नहीं हो पाया था|

‘शायद इसलिए ही टॉलस्टॉय ने पुश्किन को नकार दिया था|’

शेरमिटयावो एयरपोर्ट मॉस्को से लगभग 30 किलोमीटर दूर खिमकी में स्थित है। हमें बेलोरुस्की ट्रेन स्टेशन पर पहुँचना था। एअरपोर्ट से चलने वाली ‘एरोएक्स्प्रैस’ की टिकिटें मैंने भारत में ही ऑनलाइन ले ली थी। एयरपोर्ट के बाहर बहुत तीखी ठंड थी| हवा तेज और पैनी थी| गेट के ऊपर लगी बड़ी-सी घड़ी में 4 डिग्री दर्ज था| दोनों बच्चे हमारे सीने से सटे थे| उनकी आंखों में पानी उतर आया था| दोनों के ही नाक और गाल एकदम से सुर्ख लाल हो गए थे| पर फिर भी दोनों ही मुस्कुरा रही थी|

4.
बेलोरुस्की स्टेशन पहली नजर में किसी परित्यक्त मैन्शन जैसा दिखाई दिया जिसके भीतर कोई म्यूजियम हो सकता था| ढ़ेर-से आर्क, लंबी-पैनी बुर्जियां, भीतर गूंजता-सा स्पेश, बाहर छोटे-छोटे झरोखों के बीच बरोक नक्काशी और फीका पड़ चुका नीला रंग| चारों तरफ खड़ी जवान इमारतों के बीच वो एक खामोश बुढ़ी आत्मा-सा जान पड़ता था…जो तब तक आपका हाथ बहुत सावधानी और अनुभव जनित सौम्यता से थामे रहता है जब तक आप उसकी सीमा के भीतर रहते हैं| लेकिन एक बार आप उससे बाहर निकल आते हैं तो वो बहुत बेरुखी से आप से मुंह मोड़ लेता है|

बाहर टैक्सी की लंबी कतार थी| पीली-हरी-सफेद टैक्सियां — चारों तरफ से रशियन शब्दों से लिपटी हुई| मैंने हाथ उठाया और ढे़र-सी बड़ी-बड़ी सख्त आँखे हमारे ऊपर ठहर गई| अनजान शब्दों और लहजों की बाढ़-सी टूट पड़ी|

हमारा अपार्टमेंट ट्रेवरस्काया स्ट्रीट पर स्थित था – कैफे पुश्किन और तुरानडोट के बिल्कुल बगल में|

5.
एक-दूसरे का हाथ थामे हम अपनी-अपनी खिड़कियों से बाहर देख रहे थे| बाहर मॉस्को था – एक सपना जो पहले हमारी आंखों के भीतर था और अब हम उसके भीतर थे| शोस्तोकोविच की सिंफनी बहुत करीब आ गई महसूस होती थी|

‘स्टालिनिस्ट’ शैली की इमारतों की लंबी पंक्तियां थी| लेकिन उनके बीच में लगभग नियमित अंतराल पर मध्यकालीन या निओक्लासिकल भवन उपस्थित थे| शायद उनकी छाया-सी उन नई इमारतों पर पड़ी हुई थी जिसके कारण उन इमारतों ने एक अलग ही स्थापत्य शैली विकसित कर ली थी| उनमें मध्यकालीन कलात्मकता भी थी और आधुनिक स्थापत्य की कठोर-सी स्पष्टता भी| बाद में हमने पाया कि ‘निर्माण शैली में एक संभ्रांत-सा अदब…अरिस्टोक्रेटिक सलीका’ लगभग समस्त मॉस्को की खासियत था|

6.
हम स्थानीय जीवन और रहन-सहन को जहां तक संभव हो सके करीब से देखना चाहते थे इसलिए हमने होटल की जगह अपार्टमेंट चुना था |

वो एक ऊंची, भव्य पर बंद-सी इमारत में था| ट्रेवरस्काया स्ट्रीट से कुछ 30 कदम भीतर एक अपेक्षाकृत संकरी गली में … रिहायशी इमारतों की बिल्कुल शुरुआत पर|

‘बोल्शाया ग्नेजडनिकोवस्की पेरूलाक 10 |’

फूलों के गमलों से सजी दीवार पर लकड़ी का बहुत चौड़ा और मोटा दरवाजा था जो पहली नजर में लिफ्ट जैसा दिखाई देता था| उसके पीछे वैसा ही एक और दरवाजा था| हम हड्डियों में उतर रही ठंडी हवा में सिकुड़े-से उसके सामने थे|

भीतर एक महिला गार्ड थी| वह लगभग 50-55 की उम्र की बलिष्ट महिला थी और बहुत शालीन थी| उसके लंबे नीले ओवरकोट के एक ओर छोटी पिस्टल टंगी थी और दूसरी ओर काला इलेक्ट्रिक शाॕक बेटन| सिर पर रोएदार गोल रूसी टोपी थी| उसके चेहरे का लाल रंग बहुत पका हुआ था| कुल मिलाकर वह उम्र के असर से मुक्त उन खूबसूरत रशियन महिलाओं जैसी थी जिनको हमने फिल्मों में देखा था|

सामान्य पूछताछ और प्रविष्टि के बाद वह हमें हमारे अपार्टमेंट तक ले गई| प्रांजल और द्विशा के प्रति उसने स्नेह दर्शाया था और दोनों को कैंडी दी थी| (बातचीत का माध्यम गूगल ट्रांसलेटर था)

अपार्टमेंट न० 322 | तीसरे तल पर लिफ्ट के ठीक सामने| पराए देश में हमारे पास चार दिन के लिए अपना घर था|

यात्रा की थकान और ठंड इस कदर हावी हुई कि बिस्तर पर पड़ते ही सो गए|

7.
शाम लगभग चार बजे मेरी आँख खुली|

शोस्ताकोविच का वाल्टज-2 धीमे-धीमे बज रहा था| न जाने अंजु ने उसको कब चलाया होगा|

‘हम रशिया में होंगे तो चायकोवस्की, शोस्ताकोविच हर वक्त हवा में तैरते रहेंगे| हम उनको सुनते हुए सो जाएंगे… और उनके स्वरों के एपिक विस्तार पर ही जागेंगे|’

मुझे लगा मैं एक सपने के भीतर निकला हूं जहां किसी पैलेस का छोटा-सा गोल्डन बाल रूम था|

जादू का-सा भ्रम देती चटक चमकती पीली दीवारें … उन पर फोटो फ्रेम जैसी सफेद कारीगिरी … दूधिया छत … बेतहाशा चमचमाता झूमर जिसकी दानेदार पीली-सफेद रोशनी दीवारों के फ्रेम में तरल तस्वीरों-सी उभरी थी| नीचे लकड़ी का फर्श था – गोल्डन ब्राउन|

हालांकि इस बारे में मैं बाद में अंजु के नजरिये से ज्यादा सहमत हुआ था – “अपार्टमेंट है या बहुत आर्टिस्टिकली तैयार किया रिच मैंगो-वेनिला केक — मोइस्ट और लश्चरस|”

काउच के बगल में खड़े शो-केस पर अपार्टमेंट का संक्षिप्त परिचय लिखा था – ‘कंटेंपरेरी मॉडर्न आर्ट विद लेट क्लासिकल फ्यूजन|’

धीरे-धीरे दूसरी चीजें भी उभरने लगी – इनडोर प्लांट, सेंट्रल हीटिंग के पाइप, फर्श से छत तक खिंचा पीला रेशमी पर्दा, रशियन चेहरों के पोट्रेट, ढेर सी किताबें, लंबे स्ट्रेचेबल रीडिंग लैंप|

कुछ और भी था| अन्य सब कुछ से ज्यादा महत्वपूर्ण और विस्मयकारी| उस अपार्टमेंट की ‘यूनिवर्सेलिटी’ के बीच विशुद्ध रशियन एहसास जैसा| दो चेहरे – टॉलस्टॉय और लेनिन| एक साथ एक फ्रेम में| हालांकि दोनों कभी नहीं मिले थे| टॉलस्टॉय का चेहरा फ्रेम से बाहर झांक रहा था और लेनिन का चेहरा टॉलस्टॉय की पीठ की ओर था| क्या यह महज संयोग था? क्या दोनों के पोर्ट्रेट को इस तरह से फ्रेम करना कोई प्रतीक हो सकता था !!

अहिंसा में दृढ़ विश्वास रखने वाले और ‘अपनी तरह से आध्यात्मिक’ टॉलस्टॉय मार्क्सवाद से पूर्णत: असहमत थे जबकि मार्क्सवादी-क्रांतिकारी लेनिन आध्यात्मिक टॉलस्टॉय से आधे सहमत थे|

अपनी डायरी में टॉलस्टॉय लिखते हैं – “भले ही वो हो जाए जिसकी भविष्यवाणी मार्क्स ने की है, पर अंतत: होगा यही कि निरंकुशता के हाथ ही बदलेंगे| अभी पूंजीवादी शासन करते हैं, बाद में मजदूर वर्ग के निर्देशकों का शासन होगा| … मार्क्सवादियों (और न केवल वे बल्कि संपूर्ण भौतिकवादी मत) की गलती इस तथ्य में निहित है कि वे यह नहीं समझ पाते कि मानवता का जीवन चेतना की वृद्धि, धर्म की गति, जीवन की समझ उत्तरोत्तर स्पष्ट होने तथा वैश्विक होने जिससे समस्त समस्याओं का निदान प्राप्त होता है, से आगे बढ़ता है; न कि किसी आर्थिक कारण से|… राज्य हिंसा से एक मुक्त, तर्कसंगत जीवन में परिवर्तन तुरंत नहीं हो सकता| जिस तरह राज्य के जीवन को आकार लेने में हजारों साल लगे, उसी तरह उसे विघटित होने में हजारों साल लगेंगे|”

पर इसके बावजूद लेनिन जिस गर्माहट, आत्मीयता और निष्पक्षता से टॉलस्टॉय के प्रति अपनी श्रद्धा और स्वीकार को अभिव्यक्त करते हैं, वो उनको समस्त राजनीतिकों में एक अलग ही व्यक्तित्व देता है जो न केवल आदरणीय है बल्कि ग्रहणीय भी है | रूसी निरंकुशता पर टॉलस्टॉय का हमला लेनिन को प्रसन्नता देता है लेकिन उनकी रहस्यवादी ईसाइयत और शांतिवाद लेनिन को अखरता है | वे हैरान होते हैं कि एक अत्यंत प्रतिभाशाली लेखक एक ही समय में एकसाथ क्रांतिकारी और प्रतिक्रियावादी कैसे हो सकता है| वे लिखते हैं – ” एक ओर, हमारे पास महान कलाकार और प्रतिभा है जिसने न केवल रूसी जीवन की अतुलनीय तस्वीरें खींची हैं, बल्कि विश्व साहित्य में प्रथम श्रेणी का योगदान दिया है| दूसरी ओर, क्राइस्ट में आसक्त जमींदार है| एक ओर, सामाजिक झूठ और पाखंड के खिलाफ उल्लेखनीय रूप से शक्तिशाली, बेबाक और इमानदार विरोध है; और दूसरी ओर है “टॉलस्टॉयन”, अर्थात क्लांत, उन्मत्त, रिरियाता शिकायती जिसको रूसी बुद्धिजीवी कहा जाता है, जो सार्वजनिक रूप से अपनी छाती पीटता है और विलाप करता है : “मैं एक बुरा दुष्ट आदमी हूँ, लेकिन मैं नैतिक आत्म-पूर्णता का अभ्यास कर रहा हूं; मैं अब माँस नहीं खाता हूं, मैं अब चावल कटलेट खाता हूं|”… एक ओर, बहुत गंभीर यथार्थवाद है… दूसरी ओर, पृथ्वी पर उपस्थित सर्वाधिक कुत्सित चीजों में से एक अर्थात धर्म का प्रवचन है| … लेकिन टॉलस्टॉय के विचारों और सिद्धांतों में उपस्थित विरोधाभास आकस्मिक नहीं है; वे उन्नीसवीं सदी के अंतिम पच्चीस वर्षों में रूसी जीवन की विरोधाभासी स्थितियों को व्यक्त करते हैं|”

मैं ज्यादा नहीं जानता पर उस समय उस फोटो फ्रेम को देखते हुए कुछ प्रश्न मेरे मन में जरुर उठे थे |

साहित्यकार अपने समय के नेताओं को जरूर पहचानते हैं, वे अपने समय की राजनीति और वादों-प्रतिवादों से बखूबी परिचित होते हैं, पर क्या राजनेता भी अपने समय के साहित्यकारों को पहचानता है? और आज जब हम एक ऐसे समय में रहते हैं जहां एक व्यक्ति दूसरे को उसके धर्म से बाहर पहचानने में मुश्किल महसूस कर रहा है, और जहां धर्म के संबंध में परस्पर मान्यताओं एवं विचारों से असहमति संपूर्ण व्यक्तित्व से ही असहमति और द्वेष का पर्याय बन गया है, वहाँ क्या लेनिन हमारी विशिष्ट संवेदनाओं के हकदार नहीं हैं?

लेकिन जैसे टॉलस्टॉय की प्रशंसा करने के बावजूद लेनिन उनकी तरह आध्यात्मिक नहीं थे, वैसे ही मैं इस संदर्भ में लेनिन के प्रति प्रशंसा भाव रखकर भी उनकी तरह कम्युनिस्ट नहीं हूं|

बाद में सेंट पीट्सबर्ग में ‘पीटर एंड पाॕल फोर्ट’ में पता चला कि लेनिन सहित अधिकांश रूसी क्रांतिकारियों पर मार्क्स से कहीं ज्यादा निकलोई चरनशवस्की का प्रभाव पड़ा था लेकिन तुर्गनेव और दस्ताएवस्की सहित टाॕलस्टाॕय ने उसको भी सिरे से नकार दिया था|

8.
पहले दिन घूमने का कोई कार्यक्रम नहीं बन सका| ठंड बहुत ज्यादा थी और हवा भी|

अंजु ने खाने के लिए कुछ ला देने को कहा|

मैं बाहर आ गया| अपार्टमेंट के भीतर जितनी भव्य चमक थी, उसके बाहर लंबे कॉरीडोरों में उतनी ही घनी सादगी और खामोशी थी| एक किस्म का उदासीन-सा एहसास पसरा था – कुछ-कुछ ठंडे पत्थरों की महक-सा| मुझे अनायास ही कॉल्ड वॉर की स्मृति हो आई … कि मैं कॉल्ड वॉर के किसी गुफानुमा फ्रंट पर खड़ा हूं और बहुत सी अंजान आशंकित आँखे मुझे घूर रही हैं, बस दिखाई ही नहीं देती|

ऐसा ही था भी | मैं लगभग पंद्रह मिनट तक उन कॉरिडोरों में (पहले से तीसरे तल तक) घूमता रहा पर मुझे एक भी व्यक्ति नहीं मिला| अपार्टमेंटों के भीतर की आवाजों की धुंधली छाया तक बाहर नहीं थी| सब दरवाजे मोटे और साउंडप्रूफ थे| ‘क्या निजी जीवन इतने गंभीर और ‘डिफाइंड’ ढंग से भी निजी हो सकता है?’ – मैंने सोचा था|

मैं नीचे उतर गया – ग्राउंड फ्लोर पर| वह गार्ड महिला अब भी पोर्च में धीमे-धीमे चक्कर लगा रही थी|

इसके बाद मैं देर तक उसके कैबिन में बैठा रहा| बाहर बारिश शुरू हो गई थी और मेरे पास छाता नहीं था| उसने मुझे अपने कैबिन में आमंत्रित किया था| भीतर बहुत धीमे स्वर में क्लासिकल ऑर्केस्ट्रा किस्म का संगीत चालू था – मार्च करती आर्मी के पार्श्व संगीत-सा| उसने मुझसे ब्रांडी के लिए पूछा| मैंने मना कर दिया|

उसका नाम लाडा था और वह एक सेवानिवृत्त कुश्ती कोच थी| उसकी दो बेटियां – जाशा और ग्लीना रूसी आर्मी में थी| दोनों की तस्वीरें उसकी कुर्सी के पीछे टंगी थी – दूसरी बहुत सारी तस्वीरों के बीच| कुछ बड़ी तस्वीरों में वो अपनी बेटियों के साथ लोगों की बड़ी भीड़ में खड़ी थी| हाथ में कुछ तस्वीरें थी| इर्द-गिर्द की भीड़ के हाथ में भी तस्वीरें थी| लाडा ने बताया कि वे “इम्मोर्टल रेजिमेंट” की परेड की तस्वीरें हैं – विक्ट्री डे की| प्रत्येक वर्ष विजय दिवस (9 मई) पर, रूस में लाखों लोग द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने वाले अपने रिश्तेदारों के चित्रों के साथ परेड करते हैं। रूसी सरकार भी इस परेड को हर साल जोर-शोर से आयोजित करती है| लेकिन लाडा सहित बहुत से रूसीयों को इसके प्रति सरकार के रवैए से नाराजगी है|

“सरकार इसका उपयोग देशभक्ति और वफादारी बढ़ाने के लिए कर रही है| अन्यों की तरह मैं भी इसका विरोध करती हूं| सरकार को इसमें आना ही नहीं चाहिए था| उसका उद्देश्य गलत है |” – लाडा ने कहा|

“लोगों का उद्देश्य क्या है?” – मैंने पूछा| मैं कुछ उत्सुक हो गया था| विगत कुछ वर्षों से भारत में भी इस तरह की समस्या उठी है|

“हम सिर्फ अपने पूर्वजों की स्मृति को व्यक्त करना चाहते हैं| यह सामूहिक स्मृति का उत्सव है| एक व्यापक समूह की बहुत व्यक्तिगत चीज| हमारे पूर्वज वीर थे या नहीं थे, वे लड़े या नहीं लड़े, वे डरे या नहीं डरे, वे शहीद हुए या बहुत सामान्य मौत मरे, उन्होंने गोली सामने से खाई या पीछे से – यह बिल्कुल महत्वहीन है| महत्व सिर्फ एक बात का है कि वे एक ऐसे समय का हिस्सा थे जिसमें चारों ओर मानवता की हत्या की जा रही थी और वे हत्यारों में शामिल नहीं थे| हमारा उद्देश्य महान विपत्ति के विरुद्ध महानतम संघर्ष करने वाले अपने पूर्वजों को याद करना और उनको श्रद्धांजलि देना है| जबकि देशभक्ति और वफादारी जैसे शब्द और भावनाएं उनके उस जीने के संघर्ष को बहुत सीमित ढंग से वर्गीकृत करते हैं| देशभक्ति तो स्टालिन को भी देशभक्त बताती है पर क्या …”

वो रुक गई | शायद उसको एहसास हुआ कि वो कुछ आवेग में आ गई थी और उसे ये सब नहीं कहना चाहिए| वो अपनी ब्रांडी पीने लगी| उस वक्त इस विषय पर लाडा से इतनी ही बात हो पाई| लेकिन बाद में जब मैं सामान लेकर लौटा तो उसी कैबिन में एक अन्य व्यक्ति के साथ यह बात अपने अंत पर पहुँची थी| वो उसी इमारत में रहते थे और रूसी भाषा के कवि थे|

“स्टालिन देशभक्ति है और मैंडलश्टाम एक स्मृति| देश भक्ति और स्मृति में उतना ही अंतर है जितना इन दोनों नामों में| देशभक्ति इतिहास है और स्मृति इतिहास के बाहर है| इम्मोर्टल रेजिमेंट स्मृति को इतिहास बनाने का उपक्रम नहीं है बल्कि मैंडलश्टाम जैसी स्मृतियों को अमर बनाने का प्रयास है| मैंडलश्टाम भले ही विश्व युद्ध की यातनाओं के हिस्सेदार नहीं थे, पर क्या यातनाओं का कोई नितांत अपना निजी चेहरा भी होता है? क्या यातनाएं समय के अधीन होती हैं ? मेरे किसी अपने ने विश्व युद्ध की यातनाओं को नहीं भोगा लेकिन मैं हर साल इम्मोर्टल रेजिमेंट की परेड में हिस्सेदारी करता हूं – मैंडलश्टाम की तस्वीरों के साथ| देशभक्ति शर्तों के साथ आती है और हम स्मृति को उससे भ्रष्ट नहीं करना चाहते|”

बाद में मैंने ये सारी बातें अंजु को बताई| उसने कहा – “हमारे यहां भी तो यातनाओं, संघर्षों और मौतों का लंबा इतिहास रहा है, आजादी का आंदोलन क्या किसी युद्ध से कम था, लेकिन हमारे पास तो ऐसा कुछ नहीं है – इम्मोर्टल रेजिमेंट जैसा| हो भी कैसे सकता है! इसके लिए पहचानना जरूरी है और हम पहचान की नजर पूरी तरह खो चुके हैं|”

देर रात मेरे मन में एक पंक्ति बार-बार उबाल ले रही थी – सामूहिक स्मृति का उत्सव|