नौकरी

नौकरी (सच्चे अनुभव में चुटकी भर कल्पना का छोंक) —————- मैं फितरत से सुस्त और उदास रहने वाला आदमी हूं..। लेकिन दोनों ही आदतों से कमाई नहीं होती..। लिहाज़ा पापी पेट और स्वादु जीभ के लिए गाहे-बगाहे नौकरी करनी ही पड़ती है..। कितने ही शनिचर शनि देव को तेल चढ़ाने, और उससे भी ज़्यादा संडे अपने बॉसनुमा दोस्तों को दारू चढ़ाने का प्रताप था कि इस लॉकडाउन में भी इंटरव्यू का कॉल आया..। पहला अपशकुन तो उस दफ़्तर के चौखटे में ही नज़र आ गया..। पूरी शीशे की इमारत थी..। मुझे शीशे की दीवारों से उतनी ही नफ़रत है, जितना नौकरी करने से..। उनके ससुरे कान ही नहीं आंखें भी होती हैं..। भीतर चमचमाती लॉबी..। फर्श में चेहरा दिखा तो

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ना पढ़े जाने वाला लेखक

डोंट रीड मी..!———————-ना पढ़ा जाने वाला लेखक होने के कई फायदे हैं..। अभी परसों ही मैंने तीसरी क्लास के अपने पहले क्रश से इज़हार-ए-मोहब्बत वाली कहानी दागी..। आप सोच सकते हैं मैं ये बकलोली करने यहां नहीं बैठा होता अगर आपकी भाभी जी उसे पढ़ लेतीं..। अपने अब तक के रिकॉर्ड को देखकर पूरा यकीन था कि वो क्रश वाली मोहतरमा भी नहीं पढ़ेंगी..। लेकिन वो आशिकों वाली चुल और उस पर ठहरा पत्रकार..मैंने ना सिर्फ उसे टैग किया बल्कि डेढ़ दर्जन मीडिया संस्थानों से बटोरे घाघपने का पूरा सदुपयोग करते हुए गजब का क्लिकबेट शीर्षक भी चिपकाया- “वो शाम को होमवर्क के बहाने उसके साथ क्या करने आया था..?” या फिर “आखिर क्या हुआ कि राज की हो ना

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