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आजादी

आजादी

“आजादी” मखमली स्वर्णिम आभा को प्रतिबिम्बित करने वाला केवल मात्र शब्द नहीं है आजादी – बलिदानों की वेदी या स्वतंत्रता के नारों का उद्घोष मात्र भी नहीं है वास्तव में – अभेद्य प्रस्तर बन चुकी परम्पराओं से घिरों का साकार सुखद स्वप्न है आजादी चुभते शब्दजालों और वाक् परम्पराओं के बीच की छटपटाहट है आजादी नाकामी के उलहानों और अवसर की विषमता के बीच जिद्द की जीत है आजादी अंधविश्वासी भेड़चाल और अज्ञानता की जद् में सहसा शिक्षा का अधिकार है आजादी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रहे ढ़र्रे को तोड़ कर पनपी तार्किक सोच है आजादी मजदूर की मुस्कान हक-दायित्वों का मान सबका अक्षर-ज्ञान है आजादी ©मधुबाला
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डिजिटल भारत

डिजिटल भारत

अपनी जिह्वा और कण्ठ में
अवसादों के गट्ठर फँसाए
दोहरे मापदंडों के साथ
कुछ इंसानी जानवर
अपनी गाड़ियों में छुप कर
रिकॉर्ड करने वाले आईने को लेकर
खुद की भद्दी तस्वीर सामने देख
सड़कों पर दुम दबाए भोंकते हैं

अपने नुकीले दांतों से
दूसरों की ज़ुबान काट लेने को
घात लगाए बैठे ये भेड़िये
जिनके गलों पर पट्टे नही है
इतिहास और संस्कृति की आड़ में
चीरहरण कर रहे हैं
उसी इतिहास और गौरव का
जो इन्हें जान से प्यारा है

ये क्या हो रहा है ?
दुख होता है
क्या आज का नौजवान दुर्बल है?
क्यों इतना क्षीण हो चला
कि इस तरह की मनमानी
इस तरह के कमीनेपन पर उतर आया
कि भूल गया उसका भी यही घर है

ज़िन्दा शरीर में मृत आत्मा लिए
घूम रही इन अभागी लाशों का
खून भी सड़ा हुआ होता है
काला पड़ जाता है जम जाता है
ज़ुबान तो खैर होती है सड़ी हुई
तभी तो अपने ही दीन बन्धुओं से
अपने ही देश में ये कुरुक्षेत्र बना रही हैं
ऐसा युद्ध जिसका मतलब ही नही

खोखली खोपड़ी के ये अमानुष
अनायास की गरमागर्मी में
बीमारी की तरह नफरत फैला रहे हैं
इनके गलों पर पट्टे बांधने हैं
हमे तुम्हे ही यह लगाम कसनी होगी
वरना काल के कपाल पर ये वो इतिहास रचेंगे
प्रकांड विध्वंसी ज्वालामुखी विस्फोट
जिससे कम खतरनाक है

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चुनाव

चुनाव

राजनीति में हर तरह का नामकरण होता है. चुनाव चाहे सांसद का हो, विधानसभा के सदस्य का हो, नगर निगम या ग्राम पंचायत का हो हर तरफ इसकी व्याख्या अलग अलग प्रकार की है. बिहार में चुनाव नजदीक है और अब तो राज्य चुनाव आयोग ने भी साफ कह दिया है कि चुनाव सही वक़्त पर ही होंगे.  भारत की राजनीति में सबसे शक्तिशाली शब्द है “बाहुबली”. इसका स्थान प्रथम है. पैमाने अलग अलग हैं मगर शीर्ष पर यही काबिज है. फिर आते है कद्दावर नेता, ये मिश्रित चरित्र होता है – बाहुबली और सभ्य का मिश्रण. बहुत आकर्षक प्रतिनिधित्व है ये. सम्मोहन की कला है इसमें. फिर आते हैं पैसा फेको तमाशा देखो चरित्र. ये चरित्र चुनाव के वक्त रोयल स्टेग या ब्लेंडर्स प्राइड की सस्ती बॉटल बांट देते हैं और और जहां जहां बूथ होती है उसके अगल बगल वाले मोहल्ले में मटन बन जाता है. बस फिर क्या, दिलफेंक इंसान होते हैं भैया जी. अब बारी है मर्यादा पुरषोत्तम अर्थात महिला सीट पर अपनी धर्मपत्नी को उतारने वाले। चुनाव के वक्त अपनी धर्मपत्नी के आगे पीछे ही रहते हैं. चेहरा उनकी पत्नी का होता है मगर वोट उनके मर्यादा पुरषोत्तम के नाम पर मिलता है. जीत हो भी जाती है तो सत्ता मर्यादा पुरषोत्तम ही संभालते हैं. फिर आते हैं वोट कटवा अर्थात वो उम्मीदवार जो नामांकन के पहले दिन से ही कुर्सी का ख्वाब देख चूके होते हैं. बस सपने संजोने में लग जाते हैं. दिन भर बड़ी बड़ी बातें करेंगे, उसने ये नहीं किया वो नहीं किया जबकि सच्चाई ये होती है कि करना इन्हे भी नहीं है कुछ. प्रेमचंद की मशहूर पंक्ति है “यहां ईमानदार कौन जिसे बेईमानी का मौका ना मिला हो या वो जिसने ऐसा विवेक पैदा नहीं किया की बेईमानी कैसे की जाती है. वोट कटवे में एक बात बहुत ही अच्छी होती है. इनमे आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा होता है. नामांकन इस तरह से करते हैं जैसे राजकुमार गद्दी संभालने निकला है. और तो और चुनाव परिणाम आने पर ये अपने वोट की संख्या नहीं देखते , ये अपने वोट का प्रतिशत देखते हैं. ये इनकी खास बात होती हैं. ऐसे लूटने वाले इन्हे भी लूटते हैं जम कर. मटन ये भी बनवाते हैं. खस्सी कटवाते हैं. मगर वोट इनके बस परिवार वाले ही देते हैं. अंत में आते हैं जिताऊ उम्मीदवार. दरअसल ये कुछ नहीं करते हैं. बस मजा लेते हैं बैठकर. सारे उम्मीदवार की हरकत देखते हैं और चुनाव के दिन अपनी कार से निकल कर हर पोलिंग ऑफिस में थोड़ा बहुत पूरी सब्जी का पैसा देकर निकल लेते हैं. क्योंकि इन्हे पता है जीत किसकी है.
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पाषाण कोर्तक

पाषाण कोर्तक

उषाकाल,अक्षुण्ण पाषाण कोर्तक से मिली उपेक्षित सूफी अल्फ़ाज़ सी झरती झर झर किसी सन्नध्द अडिग प्राण सी चार रही थी और सुना रही थी कस कर बंद मुष्ठिका व्यथा नंगे पांव वसुधा को नापती स्वैराचार और करती अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अनुसरण हड़प्पा की अपठित अनुबंध लिपि जैसी किसी गुहा में लिखी, अस्पष्ट 75 वर्षों में एक दफा दिखने वाले उस धूमकेतु के समान सरकती इतिहास में मैंने उठा लिया उसे तांबे के पुराने संदूक से और रख दिया टिमटिमाते ढिबरी संग चुरन की पुड़िया के चटख को लपेट दिया उसके आवरण में मलतास की पंखुड़ियों को उठाया पथ से काढ़ कर मिला दिया स्याह पन्नों में फिर भी न जाने क्यों,वह मुक्त नहीं, सशक्त नहीं मानो जिस्म में उसके रक्त नहीं राख वसन से झांकती उसकी देह उन्मुक्तता को तत्पर न थी तीन पहर बुझा कर ज्यों हताश लौटी मैं बुझ चुकी थी वह कोर्तक किसी खंडहर में पाषाण बनी शब्द दर शब्द मैंने ढोया था उसे और खोया था उसे ‘स्त्री’ पा कर
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धरातल से ऊपर कैसे हुआ जाता है

धरातल से ऊपर कैसे हुआ जाता है

प्रिय कवि प्रखर बतलाएँ कि वक़्त के विपरीत प्रकृति से विकृत भविष्य मे जाकर अतीत की कविता कैसे लिखी जाती है सुबह की कविता सुलगती दोपहरी में रात्रि  का विरह निर्मल भोर मे चीख़ों-कराहों के बीच रोष मे नारों के शोर मे इस अराजकता के दौर में  भी सुकून की कविता कैसे लिखी जाती है दिन उजाले मे होते हो रेप और रात के अंधेरे मे शवदाह वैमनस्य फैला हो मन-मस्तिष्क मैला हो देह से दिलों तक भरी हो सिहरन एसे वक़्त मे प्रेम की कविता कैसे लिखी जा सकती है बलात्कार के दृश्यों से उभरकर औपचारिकता के लिए कुछ पल सिहरकर चुभते नाखूनों चोक होते नधूनों को बिसरकर लज्जा के सदमों से उभरकर वत्सल की कविता कैसे लिखी जा सकती है छाती मे उठता है जो उबाल वो जो एक कंपकंपी सी छूटती है मन  के भावों  हृदय के घावों के बावजूद मौन कैसे रहा जा सकता है आँख फेरना एक बात है आँख कैसे मूँदी जा सकती है नींद कैसे आती है अनभिज्ञता अगर वरदान  है होशोंहवास है उन्माद अगर प्रत्यक्ष को परोक्ष बनाकर अज्ञातता का सूत्र साधकर धमनियों  शिराओं  की गिरह बांध कर प्रिय कवियों बतलाओ सहज कैसे रहा जाता है कवि का किरदार सिर्फ़ लिखना है या दिखना भी है निर्बल के पक्ष में अन्याय के विरोध में कविता क्या महज मर्म है या काल का दस्तावेज भी है और अगर नही है तो इससे  अलग कैसे हुआ  जाता है प्रिय कवियों ईमान की  कहना  थाली मे हो परोसी मिर्ची को इमरती कैसे लिखा जाता है सतह पर उगी भांग से कपास कैसे लूआ जाता है धरातल से ऊपर कैसे हुआ जाता है ***
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कोरोना का भय

कोरोना का भय

✍️कृष्ण प्रसाद उपाध्याय सरकार द्वारा बलात् नियुक्त कोरोनाकाल की अनेक जान जोखिम में डाल कर दी ड्यूटियों…… जैसे पका राशन बांटना, सूखा राशन बांटना, खाद्य सामग्रियों व सौंदर्य प्रसाधन युक्त किट बांटना और अंततोगत्वा कोरोना संक्रमित लोगों के घरों की निशानदेही कर, ऑक्सो मीटर आदि उपकरण देना, अपर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के साथ उन्हीं सामग्रियों का पुनः संक्रमण मुक्त हो रहे लोगों के घरों से संकलन करना, संक्रमण के लक्षण वालों का प्रेगनेंसी टेस्ट किट जैसे किट द्वारा परीक्षण में, प्रयोगशाला सहायक का भी सहायक के रूप में प्रतिभागिता करना तथा लगायत संक्रमणग्रस्त जनों व घरों के, आस पड़ोस के पचास घरों का सर्वे करना आदि शासन द्वारा शिक्षकोचित समझे जाने वाले अनेक कार्यों के सफल व सौभाग्य से सकुशल निर्वहन करने के बाद, बिना कोई श्रेय व सुविधा लिए जब रामखिलावन त्रिपाठीजी मुक्त हुए, तो खुद को 4 दिन यथासंभव यथाशक्ति सख़्ती के साथ एकांतवासी अर्थात कोरन्टीन भी किया। तत्पश्चात् घर में शनैःशनैः ‘बाल-बाल बचे’ की भावनाजनित खुशियां तैरने लगीं… बच्चा पास आने लगा…. खुद बच्चों के कमरों में प्रवेश भी वे पाने लगे… झगड़े हुए पति-पत्नी की भांति विपरीत दिशा में करवट ले, बीच में तकिए का बांध बांधकर ही सही उसी ए/सी वाले कमरे में सोने भी लगे ही थे… कि एक रोज रात 10:00 बजे के करीब श्रीमती जी ने टीवी देखते हुए उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा ‘देखना, क्या मुझे फीवर है ?’ वे चौके, अंदर से तो उतना नहीं, लेकिन पत्नी के प्रति प्रेम प्रदर्शन का या ‘मैं भी उनकी चिंता करता हूँ’ का यह एक मौका नज़र आया हो, जो भी हो! बिस्तर से उछले और लगभग एक से डेढ़ मिनट में थर्मामीटर ले आए। देखा तो 99 डिग्री था, तापमान। बोले ‘हां, है तो, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं… चिंता करने वाली कोई बात नहीं..।’ लेकिन वह पत्नी ही क्या, जो पति की बात को वैसा ही समझे जैसा वह बोल रहा है। वे अभिधा, व्यंजना, लक्षणा आदि शब्दशक्तियों की परिभाषा भले ही जानें या न जानें लेकिन पति की बात का तात्पर्य व्यंजना और लक्षणा में ही स्वीकारना जरूर जानती हैं। बोलीं ‘क्यों बरगला रहे हो, तुम्हारे दोस्त को कोरोना हुआ था, उसे भी तो इतना ही बुखार रहता था न?’ उसके बाद भी शांति और संयम भाव के साथ त्रिपाठीजी ने उन्हें सकारात्मक स्थिति में रखने के उद्देश्य से जो लंबी जिरह की, उसका निष्कर्ष उतना ही निकला, जितना अगर वे उनके पहले सवाल के बाद ही निरुत्तर हो जाते, तो निकलता…। रात तो जैसे भी हो कट गई, जब सुबह हुई तो देखा श्रीमती जी भिन्न प्रकोष्ठ में थीं….. पुराने राजा-महाराजाओं का जमाना होता और वे महारानी होतीं, तो निश्चित ही चिंता, टेंशन, परेशानी, रोग या शोक में से किसी एक भवन में होतीं…..! जैसे कभी कैकेयी कोप भवन में थीं। चिंता चिन्ह युक्त शांत चेहरा, अशांत व परेशान मन का प्रतिबिंबन कर रहा था। उनिन्दा, बोझिल सी पलकों वाली कुछ-कुछ सूजी हुई भी… जैसा कि सुबह प्रायः सबकी होती हैं, आंखें…. कुछ ताक रहीं थीं। मुआमले की गंभीरता को भांपते वे हुए, ये उनके करीब गए और जैसे ही उनके करीब बैठने लगे थे कि अर्धांगिनी की सूजी हुई और शून्य को निहारती आंखों ने वक्र भृकुटियों के साथ उन्हें घूरा और सामान्य से कुछ अधिक घर-घर की आवाज में ‘वहां मुड़े में बैठिए, मेरे पास नहीं!’ कहा। उसके बाद भी समझाने या ढांढस बंधाने के लिए जो कुछ रामखिलावन जी ने कहा, निरर्थक ही सिद्ध हुआ। और सामान्यतः हर प्रसंग की भांति हारकर, उनके द्वारा इंगित स्थान पर बैठ गए। वे आगे बोलीं ‘मेरे गले में कोई गांठ अटक गई हो, ऐसा लग रहा है।’ अब परेशान होने की बारी इनकी थी। सरकारी बॉडीगार्ड वाला एप्स टटोला, चार अंकों वाला सर्वाधिक प्रचारित टोल फ्री नंबर मिलाया, आस-पास के सरकारी डिस्पेंसरियों के नं. मिलाए….. लेकिन सुबह के सात-साढ़े सात बजे कौन मिलेगा? इतनी आसानी से जो सुलभ हो, वह सेवा सरकारी ही क्या?… चाय भी जो, वे बना कर लाए थे, भार्या-भय से भी अधिक कोरोना से भयाक्रांत पति ने पत्नी को तथाकथित अछूतों सा व्यवहार करते हुए अलग-थलग ही दिया। पत्नी की तमाम चिंताओं में आधी से भी बड़ी एकमात्र चिंता थी ‘बच्चा’। ‘बच्चे का क्या होगा?’ ‘उसे कौन बनाकर खिलाएगा?’ ‘उसे खुद से दूर कैसे रखूंगी?’ वहीं ये अनेक, पत्नीवाली चिंताओं के साथ ही इस ओर भी सोच रहे थे, कि अब मेरा व्यवहार पत्नी के प्रति कैसा हो? ‘ क्या वैसा हो, जैसा कोरोनाग्रस्त लोगों के प्रति उनके पड़ोसियों का पाया था? या जो उन्होंने सर्वे के दौरान घर के लोगों का व्यवहार अनुभव किया?’ मसलन कुछ बानगियाँ ‘देखिए, इनको बोल के जाइए! ये बाहर ना निकलें, उनके घर से कोई न कोई बाहर आ जाता है…’ ‘कल पीयूष (संक्रमित) की मम्मी, ऊपर अपनी बालकनी से कितनी देर तक मुझसे बात करतीं रहीं… बिना मास्क डाले और उन्होंने अपने बेटे को कोरोना होने की बात भी नहीं कही…’ आदि अनेक बातें, जिसे लोग उन जैसे धक्का खाते अध्यापकों से, बड़ा अधिकारी, पुलिस वाला या एमसीडी का कर्मचारी समझ कर आवेदन, निवेदन अथवा आदेश के अंदाज में कहते थे। और ये ‘बिल्कुल…! बिल्कुल…!! बिल्कुल गलत है…!!!. कॉल करेंगे…!!! जरूर!! जरूर!!… जैसे समर्थन वाले जुमले अनधिकार-आश्वासन-रूप बांटते हुए आगे बढ़ते थे। असंख्य, अकथ्य व अलिख्यप्रायः अनेकानेक प्रसंगों में एक प्रसंग अब भी उनके मनोमस्तिष्क में ताजा था…… जिसके बाद रामखिलावन त्रिपाठी उन दोनों बाप-बेटों पर खासे झिड़कने के अंदाज में नाराज हो गए थे। उस दिन त्रिपाठी जी ने पहले से रोल किए हुए कागज के टुकड़े की सहायता से डोर बेल बजाई… गेट जाली का ही लगा था, अगला खुला था शायद! अंदर से आवाज आई ‘कौन?’ इन्होंने कहा ‘दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरी से आए हैं, डीएम के ऑर्डर से…’ इनके पास जितनी बड़ी से बड़ी ताकत थी, डराने के लिए… झोंक दी थी। शिक्षक, टीचर या मास्टर हूँ कहते, तो कौन पूछता? अंदर से आश्वस्त आवाज़ ने फिर पूछा- ‘काम?’ लेकिन चारपाई की चरमराहट बता रही थी कि कोई इनकी ओर अग्रसर है…. ‘जी कविदास, उम्र 65 वर्ष, कोरोना पॉजिटिव का घर यही है?’ शायद इनके सरकारी ठसक या नियमित और निर्धारित कार्य से भिन्न-कार्यजन्य खीज के कारण, तब भी काम कम और उनकी बेचारगी के लिए पर्याप्त कारण ही बताया था रामखिलावन जी ने… तब तक एक रुमाल का मास्क लगाए, अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने दरवाजा खोला और कहा ‘जी कहिए!’ इन्होंने कहा ‘कविदास जी ठीक हैं?’ उन्होंने कहा ‘ठीक है, कवि नहीं, रविदास है मेरा नाम…’ बिजली से झटका खाए इंसान-से दो कदम पीछे उछल गए थे वे, बोले ‘आप खुद बाहर क्यों आए, आपके घर में कोई और नहीं है?’ शब्द ही उनके संयत थे, भाव या लहजा पर्याप्त डांट से भरा था। एक युवक ने दरवाजे के बीच खड़े इंसान को हाथ से बगल में ठेलते हुए ‘हटना पापा’, कहा और बाहर निकलकर इनके बिल्कुल करीब आने लगा…. ‘हेलो…! हेलो…!! हेलो…!!! ठहरो भाई, कहां चले आ रहे हो?’ जब तक वह कुछ समझता या बोलता… तभी इन्होंने उसे एक सख़्त वाचिक आदेश भी थमा दिया ‘पहले मास्क पहन कर आओ’ शायद वह इनसे कानाफूसी के अंदाज में बात करना चाहता था, ताकि दूसरों की परेशानी में आनंदानुभूति की आदी पड़ोसी कानों की सक्रियता न हो… लेकिन इनकी त्योरियां चढ़ चुकी थीं। उसके बाद जो हुआ बहुत वर्णनीय नहीं है…… लेकिन उस बेटे का जो व्यवहार अपने पिता के प्रति था वह इनमें पर्याप्त रोष व जुगुप्सा के सर्जन का कारण बना….. और आज वे उसी लड़के के स्थान पर खुद को पा रहे थे। जैसे इनकी अपेक्षानुरूप वह युवक नहीं व्यवहार कर पा रहा था, वैसे ही ये भी पत्नी के प्रति अस्पृश्य-सा कठोर व्यवहार में कठिनता का अनुभव कर रहे थे। लगभग सुबह के 10:00 बजे तक इनकी तमाम उद्वेलित भावनाएं शिथिल हो चुकीं थीं और पत्नी को समझाने में भी प्रायःसफल हो गए थे, शायद! रविवार का दिन था। कहीं कोरोना टेस्टिंग कैंप का पता किया और बच्चे को टीवी व कार्टून के हवाले कर, एक ही बाइक से दंपती गए, दोनों ने चेक करवाया, दो नेगेटिव रेपोर्ट के साथ अनंत पॉजिटिविटी की उर्जा खुद के अंदर महसूस करते हुए, घर आ गए और-फिर नहा-धोकर बच्चे को कसके गले लगाया, दोनों ने…। बच्चा कह रहा था…’अले..!अले..! ये क्या कल लहे हो… कभी बोलते हो पाछ मत आना…. और कभी इन्नी जोल से हग कल देते हो…??? के पी उपाध्याय ©® Krishna Prasad Upadhyay (कृष्ण प्रसाद उपाध्याय) RPVV, BE BLOCK, Hari Nagar, New Delhi-110064, kpupadhyay1975@gmail.com
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कविताएं

कविताएं

[पसीना ]

पसीना
सजीवों को आता है
निर्जीवों को नह आता
दौड़ने भागनेवाला
बहाता है पसीना
बैठे ठाले बहता है पसीना
ज्यादा ताप ज्यादा शीत से भी निकलता है पसीना
भय और घबराहट से आता नहीं उतरता है पसीना
श्रमिक जो बहाता है पसीना
वह ज्यादा चमकीला
ज्यादा गर्म
ज्यादा नमकीन होता है
त्वचा का रंग नहीं घुलता पसीने में
वह बस पृष्टभूमि में रहता है
इसलिए ग्लोब पर कहीं भी
किसी भी जीवधारी का
पनीला ही होता है पसीना
पसीना यूं तो सच ही प्रकट करता है
अतिरंजना की छूट रहती है मगर थोड़ी बहुत
उसके गुण धर्म को समझते समझाते समय
श्रम के अनुवाद की तरह से भी
भय अकुलाहट उकताहट की अभिव्यक्ति के तौर से भी ।

[वक़्त]

वक़्त कहीं नहीं जाता
वहीं रहता है
जहां उसकी जगह होती है
आदमी गुजर कर
वक़्त के दायरे से
अपनी यात्रा पूरी करता है
गए वक़्त से मिलने के लिए
फिर उसी जगह पर लौटना पड़ता है ।

राजीव कुमार तिवारी
देवघर, झारखंड
9304231509, 9852821415
rajeevtiwary6377@gmail.com

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नौकरी

नौकरी

नौकरी

(सच्चे अनुभव में चुटकी भर कल्पना का छोंक)
—————-
मैं फितरत से सुस्त और उदास रहने वाला आदमी हूं..। लेकिन दोनों ही आदतों से कमाई नहीं होती..। लिहाज़ा पापी पेट और स्वादु जीभ के लिए गाहे-बगाहे नौकरी करनी ही पड़ती है..। कितने ही शनिचर शनि देव को तेल चढ़ाने, और उससे भी ज़्यादा संडे अपने बॉसनुमा दोस्तों को दारू चढ़ाने का प्रताप था कि इस लॉकडाउन में भी इंटरव्यू का कॉल आया..।

पहला अपशकुन तो उस दफ़्तर के चौखटे में ही नज़र आ गया..। पूरी शीशे की इमारत थी..। मुझे शीशे की दीवारों से उतनी ही नफ़रत है, जितना नौकरी करने से..। उनके ससुरे कान ही नहीं आंखें भी होती हैं..। भीतर चमचमाती लॉबी..। फर्श में चेहरा दिखा तो याद आया बालों में कंघी फेरने की याद ही नहीं रही थी..। रिसप्शनिस्ट प्रसन्नता से ऐसी भरी थी, मानो फट जाएगी..। लग रहा था अभी ‘ला..लालाला..’ गा उठेगी..। हालांकि उसके काउंटर पर रखे मत्स्य-पिंजर में तैरती मछलियां बोरियत से सिर पटक रही थीं..। शीशे की दीवारों से..।

उसके बाद बाईं ओर से अंदर मुड़कर कैंटीन आया..। किसी गुरुद्वारे का लंगर-घर गौरी ख़ान टाइप इंटीरियर डेकोरेटर के हत्थे चढ़ जाए, कुछ ऐसी शक्ल का..। बैठते ही हमें फ्री का ब्रेकफास्ट परोसा गया..। प्लेट सामने आते ही मुझे वो इलहाम हो गया, जो मेरे साथी भुक्तभोगी ना समझ पाए..। ये दावत भी हमारी परीक्षा का ही हिस्सा था..। लिहाज़ा मैंने ब्रेड-टोस्ट उठाया और उसे छोटे-छोटे कौर में धीरे-धीरे मुंह को गोल-गोल घुमाकर चबाया..। ऐसे जैसे उसकी कैलोरी का पूरा माप समझ-बूझकर खा रहा हूं..। इतना ही नहीं, मैंने वो तक कर डाला जो सामान्य हालात में शायद ही दुनिया की कोई ताकत मुझसे करवा पाती; छोले-भटूरे को हाथ भी नहीं लगाया..। इसके बाद हाथ में कॉफी का कप लेकर यूं बेचैनी से घूमने लगा जैसे कर्मठता मेरे भीतर ठाठें मार रही हो..।

शायद इसी का नतीजा था कि इम्तिहान वाले कमरे में सबसे पहले घुसने का इशारा मुझे ही हुआ..। दीवार की रंगों से मेल खाते टेबलों पर प्रश्न-पत्र बड़े करीने से सजे थे..। मैं अक्सर सोचता हूं हम मिडल क्लास चाहकर भी अपने दरो-दीवार को ऐसे क्यों नहीं सजा पाते हैं..? पूरा कक्ष खाली था, लेकिन मुझे किसी की निगरानी में होने का इतना यकीन था कि मैं अकेले में भी जंग मे जाने को बेताब सैनिक जैसा बर्ताव करता रहा..। मैंने बॉलपेन को जेब से निकाला, उसे बेवजह अंगूठे से टिकटिकाना शुरू कर दिया..। नज़दीकी टेबल तक खुद नहीं गया बल्कि उसे अपनी ओर खींचकर प्रश्न-पत्र को ऐसे उलटने-पलटने लगा जैसे भूखे ग्राहक रेस्तरां में मैन्यू को करते हैं..।

सवाल नंबर-1: क्या आपकी नज़र में ये ठीक है कि इंसान के दो बाज़ू, दो टांगें, दो आंखें और दो ही कान हों..?
मैंने लिखा, “मेरी ऊर्जा के लिए तो चार बाज़ू, टांगें और कान भी कम होंगे..। इंसानों को पूरी क्षमता के मुताबिक अंग ही नहीं दिए कुदरत ने..।” देखिए झूठ और कल्पना में म्हीन रेखा होती है..। चूंकि नौकरी की परीक्षा में आप सिर्फ सद्गुण ही लेकर जाते हैं, इसलिए मैं उत्तर को बाद वाली श्रेणी में रखूंगा..।

सवाल नंबर-2: आप एक बार में कितने फोन संभाल सकते हैं..?
यहां भी वही कल्पनाशीलता काम आई: “जब सिर्फ छह-सात फोन हों तो मैं बेचैन हो जाता हूं,” मैंने हांका, “कम से कम नौ तो होने ही चाहिएं ताकि मुझे लगे कि मेरी क्षमता के साथ न्याय हो रहा है..।”

सवाल नंबर- 3: आप अपना ख़ाली वक्त कैसे बिताते हैं..?
मेरा जवाब: मैं “खाली वक्त” जैसी किसी चीज़ को जानता ही नहीं- 18वें जन्मदिन पर ही मैंने इसे अपने शब्द-कोष से निकाल फेंका था..। ”

और मुझे नौकरी मिल गई..।

नौ-नौ फोन की बाज़ीगरी के बाद भी मुझे लग नहीं रहा था कि मेरी क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है..। मैं उनमें चिल्लाता रहता: “कुछ तो करो… जल्दी करो…!” “एक्शन होना चाहिए!”, “एक्शन लिया जाएगा”, “एक्शन लिया गया है”, ये सब मेरे तकियाकलाम बन गए..। हालांकि देश के मुताबिक वेश अपनाते हुए कुछ वक्त में मैंने “होना चाहिए” जैसे जुमले भी हटा दिए और “होकर रहेगा” पर उतर आया..।
सबसे दिलचस्प था दोपहर का लंच-ब्रेक..। सबकी अपनी कहानी होती है, लेकिन वो दफ़्तर खुद को कथाकार मानने वालों से बजबजा रहा था..। ऐसा लगता था दीवारों के बाद कान सिर्फ मेरे ही हैं वहां..। ऊपर से नीचे तक किसी भी शख़्स को पकड़कर बटन भर दबाने की देर थी बस..। हम जैसे छोटे लोगों के लिए ‘ऊपर’ का मतलब दो लोग थे..। एक बॉस और दूसरा उसका चमचा-इन-चीफ़..। उनकी ख्याति और भावनाओं की खातिर नाम ‘ब’ और ‘च’ मान लेते हैं..।

श्रीमान-च के साथ हर चर्चा पांच मिनट के भीतर ही छात्र जीवन में उनके दिन के वक्त अख़बारें बेचने, शाम को पढ़ने और रात को चौकीदार की नौकरी करने की कहानी तक पहुंच जाती थी..। नव-दीक्षित चेले-चांठे मासूमियत में पूछ लिया करते थे, “सर, आप सोते कब थे..?”

“आराम हराम है,” जवाब श्रीमान-च की जेब में रेडीमेड रखा रहता था..।

वहीं श्रीमान-ब उस श्रेणी के लोगों में थे जो सुबह आंख भी सावधान की मुद्रा में मुट्ठी भींचे ही खोलते हैं..। जिनका नित्य-कर्म इसी ऐहद के सहारे पूरा होता है कि आज मैं और ज़्यादा काम करूंगा..। शेविंग ब्रश को धोते वक्त वॉश-बेसिन में बहते दाढ़ी के बालों को वो विजयी-भाव से देखते हैं और सोचते हैं: ये रही कर्म की बलि-बेदी पर दिन की पहली कुर्बानी..! अन्य अंतरंग क्रियाएं भी इस किस्म के लोगों को इसी प्रकार का सुख देती हैं: अब पानी बहा दिया गया है, अब पेपर का इस्तेमाल हो गया है…एक्शन ले लिया गया है…

श्रीमान-ब तो मानो थे ही एक्शन का चलता-फिरता अवतार: उनकी चाल-ढाल, बात का अंदाज़..शायद पत्नी के साथ चुंबन की क्रिया भी एक्शन ही थी उनके लिए..।

दफ़्तर में घुसते ही वो कोट के ऊपर का बटन उतारते और लगभग चिल्लाते हुए रिसप्शनिस्ट को यूं गुड मॉर्निंग कहते कि कानों तक पहुंचते-पहुंचते “आक्रमण..!” जैसा सुनाई पड़ता..। इसके बाद वो एक-एक डेस्क पर जाते और इसी यलगार की मुद्रा में कहते: “टुडे, वी विल हेव सम एक्शन..!”

“यस सर..।” उत्तर का समवेत सुर परेड की याद दिलाता..। मैं भी पूरे ज़ोर से इन्हीं शब्दों में श्रीमान-बी को सलामी देता..। मेरी मुट्ठियां क्यों भिंच जातीं, मैं समझ ही नहीं पाता..।
महीने भर में ही मैंने अपनी जेब और डेस्क में कुल फोनों की तादाद बढ़ाकर 11 कर दी..। 2 महीने में 13..। हालांकि इस संख्या को हमेशा से मनहूस ही मानता आया था..। हर रोज़ मैं मेट्रो में नए-नए आदेश-सूचक जुमले और आज्ञार्थक क्रियाएं सोचते हुए दफ़्तर पहुंचता..। यूं सुबह की भीड़ में भी सफर कब कट जाता, पता ही नहीं चलता..। मसलन दो दिन तक हर किसी को यही जुमला चिपकाता रहा: “देखो, काम की कमान कसी रहे…” वाक्य में प्रयुक्त अनुप्रास अलंकार अनोखा ही सुख दे रहा था..। फिर कुछ दिन ये चला- “काम में काहिली कमीनापन है…”

अब जाकर लगने लगा था कि मेरी काबिलियत के साथ कुछ न्याय हो रहा है..। वाकई ही आसपास कुछ एक्शन नज़र भी आने लगा था..। फिर एक सोमवार की सुबह जब मैं कुर्सी पर अभी खुद को टिका ही रहा था- श्रीमान-ब मेरी ओर उसी युद्धघोष के साथ दौड़े चले आए- “लेट्स हेव सम एक्शन..!”

मतलब मुझे ‘हेल फ्यूहरर’ के अंदाज़ वाला “यस सर” याद था, लेकिन उस दिन श्रीमान-ब के चेहरे पर कुछ ऐसी अबूझ छाया दिखी कि मेरे मुंह से कुछ निकला ही नहीं..। शायद खामोशी थोड़ी लंबी ही खिंच गई होगी क्योंकि अगली आवाज़ मेरे कानों में श्रीमान-ब के चिल्लाने की ही पड़ी..। “अगर अब भी यहां के कायदे नहीं जानते तो बोरिया-बिस्तर पैक कर लो…”

मुझे काटो तो खून नहीं..। किसी तरह शब्द मुंह से निकले, बिल्कुल ऐसे जैसे किसी शरारती बच्चे से गलती मनवाई जाए; सभी कुल देवी-देवताओं को याद करके सिर्फ इतना ही बन पड़ा, “सर, अभी एक्शन लिया जाएगा…”
अभी मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि आंखों के सामने सिर्फ एक्शन ही नहीं ड्रामा भी था..!

श्रीमान-ब फर्श पर गिरे पड़े थे..। आखिरी बार “एक्शन” यूं चिल्लाए, मानो शब्द कहीं फेफड़ों में फंसा रह गया हो..। बाकी की बात अधूरी ही छूट गई और वो एक और करवट लेकर कॉरिडोर पर पूरी तरह फैल गए..। अचेत..। मैं देखते ही समझ गया..। फिर भी मैंने आदतन पुष्टि की, डरते-डरते उनके करीब जाकर नब्ज़ टटोली..।

श्रीमान-ब की ईहलीला का द एंड हो चुका था..।

काम में इस खलल पर झुंझलाते हुए मैं श्रीमान-ब के पार्थिव शरीर के बगल से गुज़रा और अपनी सामान्य गति से श्रीमान-च की कुर्सी तक पहुंचा..। वो दोनों हाथों में फोन थामे हुए थे; उन्होंने दांतों के बीच बॉलपेन दबाया हुआ था, जिससे वो कुछ लिख रहे थे..। पैर टेबल पर फैले हुए थे और उनकी उंगलियां लैपटॉप के की-बोर्ड पर कुछ कर रही थीं..।

“सर, कुछ एक्शन हो गया है,” मैंने धीमी आवाज़ में कहा..।

“गुड-गुड, हमें एक्शन ही चाहिए…”

“सर, बाहर कॉरिडोर में श्रीमान-ब की लाश पड़ी है…”

“नहीं…?” श्रीमान- च के हाथों से फोन और दांतों से बॉलपेन गिर पड़ा..जिस तरह वो कुर्सी से उछले, लैपटॉप का सही-सलामत बख्शा जाना नियति ही माना जाएगा..।
“हां सर,” मैंने कहा, “बाहर चलकर खुद ही देख लीजिए!”

“ये…ये…ऐसा कैसे हो सकता है..” श्रीमान-च ने बिजली की गति से जूते पहने और कॉरिडोर की ओर दौड़ पड़े..।

“न…हीं..!!” लाश को देखते ही शीशे की दीवारों को चटका देने जितनी विदारक चीख उनके मुंह से निकली..। “ये नहीं हो सकता…”

आखिरी वाले जुमले ने मुझे मसाला फिल्मों की हिरोइन की याद दिलाई..। लेकिन मैंने प्रतिवाद करने के बजाए श्रीमान-ब की लाश को सीधा किया, उनकी आंखों को बंद किया और अपनी चिर-परिचित उदासी से उस पंचतत्त्व की काया को एकटक निहारने लगा..।

सच कहूं तो इस वक्त मेरा दिल पसीज रहा था..। पहली बार महसूस हुआ कि मैंने श्रीमान-ब से कभी नफ़रत नहीं की थी..। मौत उनके चेहरे पर कुछ-कुछ ऐसे बच्चे जैसा भाव छोड़ गई थी जो सांता-क्लॉज़ में भरोसा छोड़ने को तैयार ना हो, अपने साथी-संगियों के तर्क भारी पड़ने के बाद भी..।

“ये इतना अचानक कैसे हो गया,” श्रीमान-च ने पूछा..।

“वो बाद में जान लीजिएगा, सर,” मैंने उनके कानों के पास जाकर कहा..। “ये समय एक्शन का है…”

और एक्शन लिया गया..। तुरंत मुर्दाघर से गाड़ी मंगवाई गई..। मेरे हिस्से कफन का इंतज़ाम करके उनके घर पहुंचाने का काम आया..। ना सिर्फ मेरी निष्क्रियता एवं उदासी, बल्कि मेरा चेहरा-मोहरा भी ऐसा है जो आपकी कफन जैसी बोरियत की ही याद दिलाएगा..। इसलिए जब श्रीमान-ब की अर्थी को कंधा दे रहा था तो सफेद कुर्ते-पजामे का इंतज़ाम ना कर पाने के बावजूद भी जंच रहा था..।

फोटो पोस्ट करने के बाद साहित्य-सेवी पन्नों पर लाइव आने के निमंत्रणों की बाढ़ आ गई..। “आपके चेहरे पर छपा है, आप राइटर हो”..एक कलाप्रेमी ने कमेंट किया था..।

पता नहीं इस क्षणभंगुर यश का नशा था या कुछ और; कोई महीने भर के अंदर ही मैंने इस्तीफे का मजमूं तैयार किया..। उसमें लिखा कि मुझे महसूस हो रहा है कि मैं कंपनी को अपनी क्षमता के मुताबिक सेवाएं नहीं दे पा रहा हूं; 13 फोन और 217 व्हाट्सऐप समूह भी मेरी प्रतिभा के लिए काफी नहीं पड़ रहे..।

अब दिन भर साहित्यसेवी फेसबुक समूहों में सक्रिय रहने से जो वक्त मिलता है, उसमें कमाने के लिए भी लिख लेता हूं..। पार्ट टाइम जॉब के तौर पर कभी-कभी लोग अर्थी को कंधा देने के लिए भी बुला लेते हैं..।

अरे! ये तो बताना ही भूल गया…शीशे की उन दीवारों के भीतर ख़बरों का कारखाना चलता था..।
(समाप्त)
(तस्वीर सौजन्य- वैक्टर स्टॉक)