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सार्वजनिक स्वास्थ्य और विशेषाधिकार

सार्वजनिक स्वास्थ्य और विशेषाधिकार

 

 

 

 

जुलाई 1992 की एक शाम को हकीम शेख नाम का गरीब खेत मज़दूर कोलकाता से कुछ दूर मथुरापुर रेल्वे स्टेशन के नज़दीक रेल से गिर गया और उसके सिर में चोट लगी। मथुरापुर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर उसे कुछ देर बैठाया गया, लेकिन उसे प्राथमिक उपचार तक नहीं मिला। उसे कोलकाता के एन.आर.एस. मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया जहाँ उसका एक्सरे हुआ और भर्ती करने को कहा गया। लेकिन अस्पताल ने बिस्तर की अनुपलब्धता बताते हुए उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। सारी रात और अगले दिन दोपहर तक वह शहर के पाँच बड़े अस्पतालों में मारा-मारा फिरा। एक अस्पताल की सिफारिश पर उसे निजी क्लिनिक में सी.टी. स्कैन कराना पड़ा। स्कैन की रिपोर्ट में उसकी खोपड़ी में रक्तस्राव होने का पता चला। आखिर दस हज़ार रुपए पेशगी जमा करने के बाद उसे एक निजी अस्पताल में जगह मिली। इलाज से वह बच तो गया लेकिन इसके लिए उसे सत्ताईस हज़ार रुपए खर्च करने पड़े जो उसकी हैसियत से बाहर की रकम थी। इस पर पश्चिम बंग खेत मज़दूर समिति ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि सरकारी अस्पताल में बिस्तर की अनुपलब्धता के चलते भर्ती न करके पश्चिम बंगाल सरकार ने अनुच्छेद 21 तहत हकीम शेख मिले मौलिक अधिकारों का हनन किया है।
पश्चिम बंग खेत मज़दूर समिति और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (1996 4 एस.सी.सी. 37) में चिकित्सकीय उपचार के अधिकार को जीवन के अधिकार के साथ घनिष्ठ रूप से जोड़ते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि अगर शासकीय अस्पताल किसी मरीज़ को समय पर चिकित्सा सहायता मुहैया करने में विफल रहते हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 का हनन है। फैसले में कहा गया कि बेशक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक संसाधनों की ज़रूरत है, लेकिन नागरिकों को उपचार और देखभाल के लिए पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान करना राज्य का कर्तव्य है और वह इससे इनकार नहीं कर सकता। इस ऐतिहासिक निर्णय के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –
1. गम्भीर बीमारी और आपातकाल में सरकारी अस्पताल में भर्ती होना अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति का मूल अधिकार है।
2. बिस्तर का उपलब्ध न होना, भर्ती से इनकार का आधार नहीं हो सकता।
3. सरकारी कोष में धन की कमी को अदालत का आदेश न मानने का कारण नहीं माना जा सकता।
4. भर्ती न करने की स्थिति में सरकारी अस्पताल के साथ-साथ वहाँ पदस्थ चिकित्सा अधिकारी भी मौलिक अधिकार के हनन के दोषी माने जाएँगे।
5. यह फैसला पश्चिम बंगाल के साथ-साथ अन्य राज्यों और केन्द्र सरकार पर भी लागू होता है।
खत्री बनाम बिहार राज्य (1981 (1) एस.एस.सी. 627, 631) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि धन की कमी के आधार पर राज्य अपने संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं रोक सकता। राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह नागरिकों की रक्षा के लिए चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने को उच्च प्राथमिकता दे।
विन्सेंट पनिकुर लोंगरा बनाम भारत संघ (ए.आई.आर. 1987 एस.सी. 990) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा – “सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुधार व संधारण को उच्च महत्व दिया जाना अत्यावश्यक है क्योंकि इस पर समुदाय का अस्तित्व एवं जिस समाज की कल्पना संविधान ने की है, उसका निर्माण इसकी उन्नति पर निर्भर है। इसलिए हमारा मत है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उच्च प्राथमिकता है – शायद सर्वोच्च प्राथमिकता है।”
पण्डित परमानन्द कटारा बनाम भारत संघ व अन्य (ए.आई.आर. 1989 एस.सी. 2039) के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक चिकित्सक, वह सरकारी अस्पताल में कार्यरत हो या न हो, का यह पेशागत दायित्व है कि व्यक्ति जीवन रक्षा के लिए अपनी विशिष्ठ सेवा दे। कोई भी कानून या राज्य का कार्य चिकित्सा के पेशे से जुड़े व्यक्तियों को अपने इस सर्वोपरि दायित्व के निर्वहन में देरी करने या त्याग देने के लिए बाधा नहीं बन सकता।
चिकित्कों के कर्तव्यों की व्याख्या करते हुए लक्ष्मण बालकृष्ण जोशी बनाम डॉ. त्र्यंबकराव बापू गोडबोले (ए.आई.आर. 1969 एस.सी. 128) के मामले में सर्वोच्च ने कहा कि मरीज द्वारा सहायता माँगने पर चिकित्सक द्वारा मरीज की देखभाल व उपचार करने और ज़रूरत हो तो भर्ती करने से इनकार करना उसकी लापरवाही मानी जाएगी।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने चिकित्सा, उपचार और बीमारी में देखभाल को जीने के अधिकार के तहत माना है और तदुनुसार सरकारों और सम्बन्धित विभागों को अनेक आदेश दिए हैं। इन तमाम फैसलों और आदेशों को वर्तमान कोरोना महामारी से उत्पन्न स्थिति के बरअक्स देखने की ज़रूरत है।
अनेक स्रोतों से यह सूचनाएँ, तस्वीरें और विडियो सम्प्रेषित हो रहे हैं, जो बताते हैं कि अस्पतालों में इलाज नहीं मिल रहा है, कई-कई चक्कर काटने पड़ रहे हैं, मरीज़ों को बगैर इलाज के लौटाया जा रहा है, जाँच नहीं हो रही, जाँच के परिणाम आने में देरी हो रही है, उपचार नहीं मिल रहा आदि। कई अभिनेता, पत्रकार, शासकीय कर्मचारियों और राजनेताओं तक के विडीयो-ऑडियो सन्देश सोशल मीडिया पर प्रचारित हो रहे हैं जिनमें वे अपने या अपने परिवार के सदस्यों के प्रति अस्पतालों और चिकित्साकर्मियों की उपेक्षा की शिकायत करते और बेबस होकर इलाज की करुण गुहार लगाते नज़र आ रहे हैं।
उन साधनसम्पन्न लोगों के लिए सरकारी अस्पतालों में जाना और इलाज कराने की कोशिश करना एक कष्टकारी व दुखद अनुभव ज़रूर है जिनके सम-वर्गीय नाते-रिश्तेदारों को सरकार ने विशेष विमान भेजकर विदेशों से घर वापिस लौटाया है। किसी को ये तक पता नहीं कि इस आपात हवाई सफर का किराया किसने वहन किया? जबकि उस आम भारतीय नागरिक के लिए सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा और चिकित्साकर्मियों का असंवेदनशील व्यवहार नई बात नहीं। उस भारतीय को हमने सैकड़ों-हज़ारों मील पैदल चलते देखा है, साइकिल पर बीमार पिता को ढ़ोते हुए देखा है, सड़क पर या रेल पटरियों पर और फिर रेल में सफर के दौरान मरते हुए देखा है। उन्हें घर पहुँचाने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेन या बसों के किराये के भुगतान को लेकर देश में संवाद के हर मंच पर चर्चा हमने देखी-सुनी है।
एक तरह से यह अच्छा ही हुआ कि खाते-पीते लोग कोविड-19 के बहाने राष्ट्र के सरकारी अस्पतालों की हकीकत से रूबरू हुए। अस्पताल ही क्यों, तामाम सरकारी संस्थाएँ उपेक्षित और जर्जर हो चुकी हैं; भारत संचार निगम, भारतीय जीवन बीमा निगम, एअर इंडिया, तमाम सरकारी बैंक आदि की हालत खस्ता है। सरकारी स्कूलों की बात करना ही बेमानी है, कोई भी “समझदार” इन्सान अपने बच्चों को वहाँ पढ़ने नहीं भेजना चाहता। कोविड-19 ने आईना दिखाया है कि जो कुछ “निजी” है, वो मुनाफे के लिए है। संकटकाल निजी उद्यमों को लिए मुनाफे की फसल काटने का मौसम होता है। आमजन के हित के लिए कुछ हो सकता है तो वह “सार्वजनिक” ही हो सकता है – सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक परिवहन… आदि।
भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। हमें यह कहते हुए गर्व होता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा संविधान कहता है कि भारत एक समाजवादी पन्थनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। संविधान की उद्देशिका में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने का संकल्प भी किया गया है। हालाँकि आज़ादी के बाद से सरकारी नीतियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निजीकरण को बढ़ावा देती रही हैं। शुरुआत में निजी और सार्वजनिक के बीच सन्तुलन बनाए रखते हुए “मिश्रित अर्थव्यवस्था” को अपनाने की नाकाम कोशिश की गई। 1990 के दशक से खुले तौर पर निजीकरण अंगीकार कर लिया गया। तमाम सरकारी उपक्रमों को, जिनमें अस्पताल, मेडीकल कॉ़लेज, चिकित्सा शोध संस्थान, दवा निर्माण आदि शामिल हैं, को अपनी मौत मरने को लिए छोड़ दिया गया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट “वर्ल्ड हेल्थ स्टेटेस्टिक्स 2020” बताती है कि विविध मानदण्डों पर भारत बेहद पिछड़ा हुआ है। आबादी, क्षेत्र, अर्थव्यवस्था आदि मापदण्डों पर लगभग भारत के समान राष्ट्रों की तुलनात्मक तालिका देखें –
मानदण्ड
भारत
ब्राज़ील
चीन
इंडोनेशिया
श्रीलंका
प्रति 10,000 आबादी पर चिकित्सकों की संख्या
8.6
21.6
19.8
4.3
10.0
प्रति 10,000 आबादी पर नर्स की संख्या
17.3
101.2
26.6
24.1
21.8
जन्म के समय जीवन प्रत्याशा
68.8
75.1
76.4
69.3
75.3
स्वास्थ्य मद में सरकार के कुल खर्च का अंश (प्रतिशत में)
3.4
10.3
9.1
8.7
8.5
भारत में चिकित्सकों, नर्सों की संख्या कम है, जीवन प्रत्याशा दर कम है और सरकारी खर्च कम भी है। ग्लोबल ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भारत का स्थान 129है। श्रीलंका (71), ब्राज़ील (79), चीन (85) और इंडोनेशिया (111) हमसे आगे हैं। बांग्लादेश जैसा पिछड़ा कहलाने वाला मुल्क135 वें स्थान पर है जो भारत से बहुत पीछे नहीं। केन्द्रीय बजट 2020-21 में स्वास्थ्य के लिए 67,484 लाख करोड़ रुपए और सामाजिक कल्याण पर 1,52,962 लाख करोड रुपए, जबकि रक्षा के लिए 3,23,053 करोड रुपए आवंटित किए गए हैं। रक्षा पर खर्च स्वास्थ्य और समाज कल्याण के कुल जोड़ से भी अधिक है। यही वजह है कि भारत में प्रति एक हजार की आबादी पर मात्र डेढ़ बिस्तर उपलब्ध है, जबकि चीन, ब्राज़ील, थाइलैण्ड और दक्षिण कोरिया में चार बिस्तर हैं। भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जुलाई 2018 में जारी आँकड़ों के अनुसार भारत में कुल 25,778 सरकारी अस्पताल और 7,39,024 बिस्तर हैं, जिनमें प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, उप-जिला अस्पताल और जिला अस्पताल शामिल हैं।
सरकार ने स्वास्थ्य में खर्च कम करके निजी अस्पतालों, चिकित्सा महाविद्यालयों और शोध संस्थानों को सस्ती ज़मीन और बिजली, कर राहत जैसी सुविधाएँ देकर प्रोत्साहित किया है। वही निजी अस्पताल अब मुनाफा कमा रहे हैं और आमजन का इलाज करने से इनकार कर रहे हैं।
जाहिर है इन हालातों का सामना करना खाते-पीते लोगों को दुश्वार हो रहा है और वे हर मुमकिन रास्ते से अपनी बात सरकार या रसूखदार लोगों तक पहुँचाने की कोशिश में लगे हैं ताकि उनके अपनों का इलाज हो सके। हमारे देश में भेदभावकारी जाति व्यवस्था और सामन्तवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कतार में लगकर सार्वजनिक सुविधा पाने का इन्तज़ार करना अधिकांश लोगों को अपमानजनक लगता है। कोविड-19 के संकट में सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले मदद के आग्रहों ने विशेषाधिकार पाने की बेशर्म सामन्ती लालसा को बेनकाब कर दिया है। किस तर्क के आधार अभिनेता या पत्रकार का रिश्तेदार किसी प्रवासी मज़दूर से पहले इलाज का हकदार है?
एक बार फिर हमें न्यायालयों के निर्णयों पर गौर करना चाहिए ताकि सनद रहे कि इस महामारी के दौर में भी सभी के स्वास्थ्य की समान रूप से रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। संविधान हर नागरिक को प्रतिष्ठा और अवसर की समता का वादा भी करता है।
– अमित कोहली

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बड़ी व छोटी मछलियों का खेल : पाताल लोक

बड़ी व छोटी मछलियों का खेल : पाताल लोक

महाभारत एक ऐसा सीरियल है जो स्वस्थ मनोरंजन के साथ ज्ञान की एक बेहतरीन ख़ुराक भी सही तरीक़े से मुहैया करवाने का कार्य बख़ूबी करता है। भिन्न-भिन्न मौक़ो पर मुझे महाभारत के संवाद और सीन याद आते है जैसे अभी हाल ही में रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ “पाताललोक” को जब देखा तो मुझे महाभारत के चार प्रमुख पात्र दुर्योधन,कर्ण दुशासन और शकुनि मामा के वह संवाद याद आ गये जब दुर्योधन पांडवो का अज्ञातवास तोड़ने के लिए मत्स राज्य पर हमला करने की योजना बना रहा होता हैं। तब मामा शकुनी उसे राय दे रहें होते हैं और वह अपनी बात कहते ही हैं। तब अंगराज कर्ण मामा शकुनि से कहता हैं कि मामा आप कभी तो सीधे बोल, बोल लिया करिये तो जवाब में मामा शकुनि  कहते हैं कि सीधे बोल बोलने वाला सतयुग तो कबका चला गया अंगराज। ये तो टेड़े बोल बोलने वाला द्वापर हैं इसमें बात कुछ कहो और अर्थ कुछ और निकले और जीना चाहते हो भांजे तो ये कला भी सीख ही लो, इस कला में अंगराज कर्ण निपुण थे या नहीं ये अलग बात हैं,लेकिन वेब सीरीज़ “पाताल लोक” ने मामा शकुनी की इस कला की जानकारी देने की एक कोशिश तो की ही हैं क्योकि आज जो बातें कहते हुए मुख्य धारा की मीडिया की रूह हलक़ में आ जाती हैं। उन सभी बातों को मामा शकुनी की कलानुसार वेब सीरीज़ पाताललोक ने बहुत ज़बरदस्त तरीक़े से कहा हैं। वेब सीरीज़ “पाताललोक” ने क्लास डिफ़्रेंस को बहुत अच्छी तरह से पेश किया हैं कि बच्चों के मन में हीन भावना और आपराधिक प्रवत्ती पैदा होती कहां से हैं? इस बात का उदाहरण वेब सीरिज़ के मुख्य पात्र इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी का बेटा हैं जो एक बहुत ही शानदार कान्वेंट स्कूल में पढ़ता हैं लेकिन वह इकलौता ऐसा बच्चा होता हैं जो अपनी कार से स्कूल नहीं आता, उसकी इंगलिश भी अच्छी नहीं होती और जो उस माहौल में एडजस्ट नहीं हो पाता क्योंकि अन्य छात्र इंस्पेक्टर हाथीराम के बेटे को अपने बराबर का समझते ही नहीं हैं। जिसकी वजह से वह मन ही मन हीन भावना का शिकार होता रहता है। यही हीन भावना उसके अन्दर दिन प्रतिदिन गुस्से को पैदा करती हैं, जब उसके सहने की ताक़त जवाब दे देती हैं तो वह अपनी इंसल्ट करने वाले पर खाली पिस्टल हैं। इसी तरह सीरीज़ के अन्य बाल किरदार जैसे विशाल त्यागी का अपना सगा चाचा ज़मीन की लालच में उसकी तीन बहनों के साथ बलात्कार करवा कर बड़ा काम अंजाम देता है। जिसके बाद विशाल त्यागी चाचा के तीनो बेटों की हत्या कर बड़े काम का बदला पूरा काम कर कर लेता हैं और विशाल त्यागी से हथौड़ा त्यागी बन जाता हैं। इसके अतिरिक्त चीनी के साथ भी बचपन से शोषण होता हैं। जिससे निजात पाने के लिए ही वह संजीव मेहरा मर्डर केस में शामिल होता है। इन सभी बाल किरदारो के साथ बचपन से ही बुरा होता हैं जिसके फ़लस्वरूप उन्हें वह सब करना पड़ता है जो वह नहीं करना चाहते। इसी तरह वेब सीरीज़ पाताललोक ने क्लास डिफ़्रेन्स के साथ दूसरी महत्वपूर्ण बात कास्ट सिस्टम को भी बहुत कलात्मक अंदाज़ के साथ बयान किया हैं। पंजाब जैसे राज्य में आज भी किस तरह से छोटी कास्ट वालो को बात-बात पर ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत गालियों से नवाज़ा जाता हैं,जितनी हो सके उनकी उतनी तौहीन की जाती है। इस तौहीन का फल यह निकलता है कि “तोप सिंह” जैसा सीधा आदमी अपराधी बन जाता है। सुख्खा जो तोप सिंह को ट्रेन करता है उसका सर धड़ से ऐसे अलग किया जाता है जैसे दूध में से मक्खी निकाली जाती है। बड़ी कास्ट का रुतबा यहीं पर ख़त्म नहीं होता,तोप सिंह के न मिलने पर उसकी मां के साथ कैसे दस लोग बारी-बारी से शोषण करते है। शोषण का सीन और मंत्री की जीप में रखा गंगाजल “कास्ट सिस्टम” की मज़बूत जड़ो के बारे में अधूरा ज्ञान पूरा कर देता है कि आज भी समाज इस बिमारी से कितना ग्रसित है? ठीक इसी तरह ‘वेब सीरीज पाताललोक’ ने अल्पसंख्यक समुदाय को जिस से टारगेट कर उनको निशाना बनाया जाता हैं। इस बात को भी इशारो में बताने की बेहतरीन कोशिश की हैं। जिसका एक ज़बरदस्त उदाहरण सीरीज़ का पात्र “कबीर एम” हैं ‘कबीर एम’ के पिता ने उसके लिए एक सर्टिफिकेट बनवाया होता है कि इसका ख़तना नहीं बल्कि आपरेशन हुआ होता हैं क्योंकि उसके पिता के दिल में यह डर होता हैं कि जिस तरह ‘बड़े के गोश्त’ की वजह से उसके बड़े बेटे की हत्या कर दी जाती हैं कहीं इसी तरह कबीर एम की भी हत्या न हो जाए। जो डर कबीर एम के पिता को था वही डर पूरा अल्पसंख्यक समुदाय लेकर हर रोज़ जीता हैं कि कहीं कोई घटना उनके परिवार के साथ न हो जाए। पाताललोक अल्पसंख्यक समुदाय के मन में मौजूद इसी डर की ओर इशारा कर रही है। इसके साथ अल्पसंख्यक समुदाय की ओर विभाग में जिस तरह का भेदभाव होता है और “कट्वा” कहकर किस तरह से सम्बोधित किया जाता है। इस चीज़ को भी सीरीज़ में बख़ूबी दिखाया गया है कि ज़्यादा मात्रा भेदभाव करने वालो की होती हैं,कम मात्रा साथ देने वालो की। अल्पसंख्यक समुदाय या किसी भी समाज की जीत इसी बात पर है कि वह शिक्षा पर सही से ध्यान दे तभी उसे सम्मान मिल सकता है जिसका अच्छा उदाहरण “इंस्पेक्टर अंसारी” का किरदार है जो नीचे से उठकर पहले इंस्पेक्टर और बाद में “यूपीएससी” का एग्ज़ाम क्लीयर करता हैं। “पाताल लोक” में एलजीबीटी समाज की मुश्किलों को भी बख़ूबी दिखाया हैं कि कैसे चीनी को पहले लड़की समझकर उसे महिला वार्ड में रखा जाता हैं लेकिन जब यह बात खुलती है चीनी एलजीबीटी हैं तो किस तरह से उसके लाते मारी जाती हैं दरअसल ये लाते पड़ तो तो चीनी के रही थी लेकिन असल में पूरा एलजीबीटी समाज इसी तरह से रोज़ किसी न किसी की लात खाता ही है क्योंकि इस समाज में एलजीबीटी होना आज भी बहुत शर्म की बात समझी जाती है। इन्हीं शोषण भरी लातो से बचने के लिए वह विशाल त्यागी के साथ रहता है क्योंकि उसे भरोसा होता हैं कि शायद काम ख़त्म होते ही उसे पैसे मिल जाएंगे और वह आपरेशन करवाकर एक ख़ुशहाल ज़िन्दगी जी सकेगा? इन सबके साथ सीरीज़ में पुलिस इन्वेस्टिगेशन को भी ज़बरदस्त तरीक़े से दिखाया गया हैं कि किस तरह से सिस्टम में मौजूद बड़ी मछलियां हाथीराम जैसी छोटी मछलियों के साथ कैसे खेल खेलती है। जिन्हें पता तो सब होता है कि जिसे केस दिया जा रहा है वह केस हल कर पाएगा या नहीं? फिर भी केस दिया जाता है क्योंकि उनके फ़ेल होने की स्थिति में बड़ी मछलियों के आक़ा उन्हें भरपूर इनाम से नवाज़ देंगे। इसके विपरीत इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी जैसी छोटी मछली इस बात से ही ख़ुश हो जाती है कि उसे एक हाई प्रोफ़ाइल केस मिल गया है। वहीं दूसरी तरफ़ संजीव मेहरा जो सिर्फ़ एक मोहरे से ज़्यादा और कुछ नहीं होता उसे भी यह सोचने का मौक़ा मिल जाता है कि आज तक वह जैसी पत्रकारिता कर रहा होता है यदि उससे अलग हटकर दूसरे टाइप की पत्रकारिता की जाए तो कैसा रहेगा? संजीव मिले मौक़े का लाभ उठाकर अपना रास्ता बदल देता हैं। वहीं इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी इस ग़ुमान में होता हैं कि इस हाई प्रोफ़ाइल केस को साल्व करने के बाद उसे भी तरक़्क़ी मिल जाएगी लेकिन यह सब एक भ्रम से ज़्यादा और कुछ नहीं होता क्योंकि खेल तो दोनों तरफ़ से सिस्टम की बड़ी मछलियां ही खेल रही होती हैं। इस बात का यह सबूत है कि जैसे ही इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी से चूक होती है तो फ़ौरन ही तरक़्की के बजाए उसे सस्पेंशन मिलता है और जो वह कर रहा होता हैं वह जांच सीबीआई के हाथों में दे दी जाती है। अब यहीं पर से महाभारत का वह दृश्य जिसमें दुर्योधन, कर्ण, दुशासन और मामा शकुनि संवाद कर रहे होते है कि पांडवों का अज्ञात वास कैसे तोड़ा जाए जबकि उन्हें यह बात बहुत अच्छे से मालूम है कि पांडव मत्स राज्य में अज्ञात वास काट रहे होते है तब मामा शकुनी दुर्योधन को राय देते है कि ‘भांजे दुर्योधन तुम जाकर जीजा महाराज को अर्ध सत्य बताओ कि कीचक वध के उपरान्त मत्स राज्य अनाथ हो गया है अब वह हस्तिनापुर की छांव तले आना चाहता है और इस कार्य को तुम स्वंय करना चाहते हो फिर गंगापुत्र भीष्म, आचार्य द्रोण और कुल गुरु कृपाचार्य भी तुम्हारे प्रस्ताव का विरोध नहीं कर पाएंगे’ जैसा सच दुर्योधन अपने पिता को बताता है वैसी ही जांच वेब सीरीज़ पाताल लोक में सीबीआई भी करती हैं और जो नहीं होता वह भी बताती है। अपने सस्पेंशन से न टूटकर इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी अर्ध सत्य को पूर्ण सत्य बनाने की तलाश करने में कामयाब हो जाता है और इस कामयाबी का पुरस्कार उसकी बची हुई जान और नौकरी पर बहाली होती हैं।
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कविताएं

कविताएं

जो हूं और जो होना चाहता था

कहां होना था मुझको
जहां हूं
या जहां होना चाहता था मैं
क्या इस प्रश्न का उत्तर
किसी के पास है कोई ?
जहां हूं
और जहां होना चाहता था
के मध्य जो संघर्ष है
क्या जीवन
उसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?
समय जो चित्र बनाता है हमारा
उसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता है
पर प्रकट कभी कोई विशेष
रस या रंग ही होता है
क्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?
जहां प्रवाह रुक गया नदी जल का
जो होना चाहता था
वो जो हूं
भर रह गया
अपने वर्तमान से अवकाश लेकर
समय की किताब में
फिर लौटना चाहता हूं
उसी अनुच्छेद तक
और उन तमाम अवरोधों को
हटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूं
ताकि जो हूं को
जो होना चाहता था
में बदल सकूं ।

करोना काल : कुछ प्रश्न

जीवन कब अपनी गति में लौटेगा
हम कब जीवन की पगडंडी पे लौटेंगे
किसी अबूझ पहेली सा ये समय है
पल पल एक रहस्य है
भय है संशय है अनिश्चय है
इन प्रश्नों का हल क्या हम पाएंगे
क्या इन अंधेरों के पार जा हम पाएंगे
सबकुछ अस्त हो जाएगा धीरे धीरे
या फिर प्रात सूरज की लालिमा से
क्षितिज का कोना कोना दमकेगा चमकेगा फिर से
राह आशा की कहीं कोई खुलती हुई दिखती नहीं
प्रयत्नों की गति इससे मगर रुकती नहीं ।

दोहरापन

तुम्हारा कोई अपना
नहीं अटका पड़ा है
किसी दूसरे शहर में
इन कठिन दिनों में
भूख और भय की दोहरी मार सहता
आशंका और अनिश्चय के मध्य झूलता हुआ
सभी अपने तुम्हारे सुरक्षित हैं
अपने अपने घरों में
जीवन का हद संभव आनंद लेते हुए
तभी तुम कह पाते हो
श्रमिकों को घर वापस लाने वाली रेल गाड़ी को
Corona express
महामारी एक्सप्रेस
तुमको नहीं पता
कैसी व्याकुलता और विवशता है
उन लोगों की
जो पांव पैदल ही
हजार दो हजार मील की यात्रा ठान रहे हैं
किसी ट्रक बस टेम्पो में
ठसा ठस भरे हुए
निकल पड़े हैं जो लोग
अपनी पत्नी बच्चे
यहां तक कि बुजुर्गो के साथ भी
अपने गांव घर तक पहुंचने के लिए
नहीं समझी जाती तुमसे
उनके द्वारा भोगी जा रही पीड़ा
तुम जब ये जानोगे
कि उनमें से बहुतों के कच्ची मिट्टी के घर
वर्षों हुए
मौसम की मार सहकर टूट गए हैं
बालिस्त भर जमीन का टुकड़ा भी नहीं
कितनों के पास खेती के लिए
तुम उनके लौटने को
पूरी तरह गैर जरूरी ठहराओगे
तुम्हें उनका लौटना
एक आपराधिक कृत्य जैसा लग रहा है
असह्य हो रहा है
तुम्हारे लिए उनकी वापसी के औचित्य को स्वीकार पाना
चिंता सताने लगी है तुम्हें
कि वापस लौटते ये लाखों लोग
लौटकर आखिर करेंगे क्या
तुम उनके हित की चिंता नहीं कर रहे हो इस तरह भी
तुम आशंकित हो दरअसल
तुम्हारी समझ कहती है
कि इन श्रमिकों के वापस आने से
महामारी का प्रसार बढ़ेगा
अपराध बढ़ेगा
सामाजिक असुरक्षा बढ़ेगी
जिससे आखिरकार
सुख चैन से गुजर रही तुम्हारी जिंदगी में
थोड़ी असुविधा बढ़ेगी
बहुत दोहरापन है तुम्हारी सोच में ।

राजीव कुमार तिवारी
मुख्य गाड़ी लिपिक, जसीडीह
पूर्व रेलवे 
प्रोफेसर कॉलोनी, बिलासी टाउन
देवघर, झारखंड 
9304231509, 9852821415

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उतरन

उतरन

एक कुर्ती निकली अलमारी से अपनी कुछ पुरानी-सी कुछ बेरंग-सी थोड़ी फटी थी और थोड़ी गई थी उधड़ अलमारी से निकाल पटक दिया उसे ज़मीं पर इस सोच के साथ कि- मुझ पर नहीं फबेगी अब ये… मेरे घर के पीछे एक छोटी झोपड़ी में रहती है एक लड़की चेचक के दाग़ से भरा हुआ है चेहरा उसका हमउम्र होगी शायद या कुछ छोटी तो मैंने अपनी वो फटी हुई कुर्ती देदी उसे मैं नहीं पहन सकती, पर वो तो पहन सकती है फिर दिन बीतते गए और मैं भूल गई उस कुर्ती को… एक रोज़ मैंने देखा उस लड़की को कितने करीने से संवरे हैं बाल उसके आज आँखों में काजल है, माथे पर बिंदी, झुमके भी पहने हैं, जिनका रंग थोड़ा उतर गया है पैरों में लाल चप्पल जिसपर लगे हैं टाँके एक या दो शायद और… और उसने पहनी है मेरी वो कुर्ती पर दिख क्यों नहीं रहा उस पर वो छेद जिसके कारण थमा दी थी उसे वो कुर्ती फिर ध्यान से देखा कुछ अलग था इस बार उस कुर्ती में उसने काढ लिए थे बूटे कई रंग-बिरंगे, छोटे-बड़े अनेक जैसे किसी ने टांक दिए हों आसमान में अनगिनत सितारे…. एकाएक वो कुर्ती मुझे वापस अपनी लगने लगी मुझे ईर्ष्या होने लगी मैं घमंड में खुद से बोली- आखिर ये है तो मेरी ही कुर्ती पर आखिर मुझसे खूबसूरत वो लग रही थी उसके चेचक के वो दाग़ लग रहे थे चाँद के दाग़ समान… फिर नज़रें मिली उसकी मुझसे मैंने दी उसे वो फीकी मुस्कुराहट जैसे दी थी वो पुरानी फीकी कुर्ती और बदले में वो मुस्कुरा दी आँखों में चमक के साथ जैसे चमक रही थी देह पर उसके वो कुर्ती… -युक्ति गौड़
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ग़ज़ल

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उदासियाँ हैं लबों पे लेकिन ख़ुशी के नग़मे सुना रहा हूँ यही है दस्तूर ज़िन्दगी के, मैं सारी रस्में निभा रहा हूँ न जाने क्यों कल से साँस लेने में हिचकिचाहट सी हो रही है वो कौन सा राज़ है कि जिस को मैं ज़िन्दगी से छुपा रहा हूँ? उसी ज़मीं पर कि जिस पे लाशें मुहब्बतों की पड़ी हुई हैं जला-जला कर परालियाँ फिर जदीद फ़सलें उगा रहा हूँ उजालों में फँस के गुमरही में इधर-उधर जो भटक रहे हैं पता मैं उन जुगनुओं को उँगली से तीरगी का बता रहा हूँ धुआँ उठा था तभी ख़बरदार ख़ैरख़्वाहों ने कर दिया था ये बेख़याली का है नतीजा कि हाथ अपने जला रहा हूँ कहूँ इसे ज़िन्दगी भला क्यों दबाए रखती है मेरी गर्दन बहुत सहा ज़ुल्म इस का मैं ने अब इसकी गर्दन दबा रहा हूँ
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कविता

कविता

## किरायेदार कितना भी मन रम जाए उनका वहां रहते हुए चाहे कलेजा ही क्यूं न फट जाए वहां से निकलते हुए किरायेदारों को मगर/फिर भी छोड़ कर जाना पड़ता है किराए का घर एक न एक दिन बहुत करीने से संवार के रखने के बाद भी किसी भी हद में लगाव जुड़ाव होने के बावजूद घर कभी किरायेदार का अपना नहीं होता किराए का एक ठौर ही रहता है छोड़ कर जाते वक़्त जब पलट कर देखता है किरायेदार घर की तरफ घर का मन भी भाव विहवल हो जाता है पर मकान मालिक की ठस नजर को नहीं दिखता ये सबकुछ वहां तो बस पैसों की लोलुपता बसती है कई कई घरों में रहता है एक किरायेदार वर्षों के अंतराल में थोड़ी थोड़ी हर घर की यादें सहेजे हुए थोड़ा थोड़ा हर याद में बंटा हुआ बहुत से किरायेदार मकान मालिक बन जाते हैं ढेरों नहीं बन पाते आजीवन जो बन जाते हैं वे कहीं से भी किरायेदार नहीं रह जाते फिर । राजीव कुमार तिवारी मुख्य गाड़ी लिपिक, जसीडीह भारतीय रेल प्रोफेसर कॉलोनी, बीलासी टाऊन , देवघर , झारखंड 9304231509 ,9852821415 rajeevtiwary6377@gmail.com
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अत्महत्या : एक सामान्य विश्लेषण

अत्महत्या : एक सामान्य विश्लेषण

आये दिन अख़बारों में आत्महत्या की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं। इन खबरों में ऐसा कम ही होता है कि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी आत्म-हत्या की खबर को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलें। कुछ आत्महत्याओं की ख़बरें समाचार पत्रों की दहलीज पार करने से पूर्व ही दम तोड़ देतीं हैं, तो कुछ समाचार पत्रों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन, पाठक इसे पढ़कर अफ़सोस जताते हुए आत्म-हत्या करने वाले की ही घोर निंदा करते हैं और अंत में उसे बेवक़ूफ़ ठहराकर अखबार मेज पर पटकते हुए अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। और इसी तरह छपने वाली अनेकों आत्महत्याओं की खबरें अख़बारों मैं ही दम तोड़ देतीं हैं। अख़बारों का दायित्व है समाज में घटित घटनाओं को संज्ञान में लाना, सो वह अपने दायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा से करते हैं। प्रकाशित घटनाओं पर आम जन, समाज सेवी संगठन और सरकार के अधीनस्थ विभाग कितना संज्ञान लेते हैं यह उनकी विवेकशील-तत्परता पर निर्भर करता है। आम तौर पर पहले दिन छपी घटनाएं मृत-प्रायः होती हैं। अतः आवश्यक होने पर अख़बारों को ही मुद्रित घटनाओं का पुनः संज्ञान लेना होता है। जब वह खबरों का लगातार प्रकाशन करता है तो सरकारी विभाग, समाज सेवी संगठन, समाज सेवी जनों के साथ-साथ नेता, अभिनेता आदि घटना स्थल की ओर सहानुभूति और सहयोग के लिए कूँच करते हैं। सहयोगकर्ता अपनी-अपनी वाह-वाही कराने के लिय सहानुभूति और सहयोग के कसीदे पढ़ते हैं। लेकिन ऐसे सहयोग और सहानुभूति के कसीदे पढ़ने से क्या लाभ? जब, चिड़ियाँ चुंग गयीं खेत! लेकिन, इन सभी के बीच मानवाधिकार का राग अलापने वाले विशिष्ट लोग, कहीं दूर तक दिखाई नहीं पड़ते। ख़ैर, अख़बारों का दायित्व होता है कि वह घटनाओं का संज्ञान लेकर, उन्हें सार्वजनिक करें। सो वह करते हैं। अब अख़बारों को रद्दी के भाव बेचने के लायक समझा जाय या उसे ‘पूर्ण-जन-जागरण’ का माध्यम बनाया जाय। यह हम पाठकों (जिसमें सरकार भी सम्मिलित है) की इच्छा पर निर्भर है। आत्म-हत्या, आत्म-मंथन का विषय है। एक ओर यह मानवीय जीवन को आधार बनाकर मानवाधिकारों की वकालत करने वालों के मुख पर तमाचा है, तो दूसरी ओर यह हमारे समाज के उन लोगों के वर्चस्व को ख़ारिज करता है जो स्वयं को समाज का प्रबुद्धजन और ठेकेदार मानते हैं। आत्म-हत्या एक ऐसा सामाजिक अभिशाप है जो हमारे समाज के उन लोगों को मौत की नींद सुला देता है जो भीतर से बहुत उदार और मानवीय संवेदनाओं को आत्मसात् करने वाले होते हैं। ऐसा कम ही होता है कि अपराध बोध से प्रतिष्ठा धूमिल होने के डर से उत्पन्न आत्मग्लानि के कारण, कोई व्यक्ति आत्महत्या कर ले। यह एक अपवाद होगा। आत्म-हत्या, किसी एक जाति अथवा किसी एक पंथ के लोगों के द्वारा ही नहीं की जाती। वरन् इसकी परधि में सम्पूर्ण मानवजाति है। इस सन्दर्भ में सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि यह हमारे और आपके बीच ही होती है और हम अनभिज्ञ रहते हैं। हमारी अनभिज्ञता, हमारी भयंकर भूल में परिवर्तित हो जाती है और हम भूल जाते हैं कि आत्म-हत्या करने वाला हमारे समाज और देश के लिए कितना महत्वपूर्ण था। हम भूल जाते हैं कि जिस छात्र ने गले में फंदा डालकर जान दी है वह हमारे देश के लिए क्या योगदान दे सकता था? क्या इस सच्चाई से इंकार किया जा सकता है कि आत्महत्या करने वाले छात्र में डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वीर सैनिक बनने की योग्यता नहीं थी? क्या उसमें नए भारत में एक सफल उद्योगपति बनने की राह पर चलने के लायक गुण नहीं थे? ऐसे अनेकों प्रश्न हैं, जिनके उत्तर हम सभी को स्वयं से ही पूंछने होंगे, और ध्यान रखना होगा कि आत्महत्या करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की, स्वयं की महत्वाकांक्षा होती है जो उसे ऊँचे मुकाम पर ले जाना चाहती है। भले ही वह आर्थिक रूप से कितना ही निर्बल क्यों न हो। प्रत्येक मानव-जीवन, जिसे जीने का जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है। वह जीना चाहता है। वह नहीं चाहता कि वह समय से पूर्व मृत्यु (अकाल मृत्यु) का आलिंगन करे। लेकिन, वह कौन-कौन से तथाकथित कारण हैं जिनके चलते व्यक्ति को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है? विवशता के कारण की गयी आत्महत्या पर, एक विवेकी-बुद्धिजीवी का ह्रदय चीत्कार कर उठता है। लेकिन, यह आंतरिक चीत्कार किसी काम की नहीं ! क्यों? कदाचित् इसलिए कि हमने अपने उन कर्तव्यों को, जो हमें समाज के प्रति (सामाजिक उत्थान एवं मानवीय सहयोग) निभाना चाहिए थे, उन्हें भुला दिया है। हमने स्वयं को समाज का बाहरी सदस्य मानकर, समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों से मुक्ति पाकर धारणा बना ली है कि समाज की जिम्मेदारी अन्य सामाजिक सदस्यों की है या फिर सरकार की। यदि इसी दृष्टिकोण को समाज के सभी सदस्यों पर लागू कर दिया जाय, तो समाज बचता ही नहीं! अतः वह व्यक्ति जो समाज में रहते हुए भी, स्वयं को समाज का हिस्सा न मानकर, समाज के साथ बाहरी सदस्य के रूप में व्यवहार करता है। वह अपने सामाजिक दायित्वों की चोरी करते हुए, समाज के समस्त दायित्वों का भार अन्यों पर अथवा सरकार पर थोपने का कार्य करता है। जबकि, प्रत्येक व्यक्ति, समाज और सरकार का ही अभिन्न-अंग होता है। वस्तुतः जो लोग स्वयं को समाज का हिस्सा मानते हैं। वह पीड़ित परिवार की यथा संभव सहायता करते ही हैं। लेकिन, यह तत्कालीन सहायता है, जिसे पीड़ित परिवार की आपातकालीन सहायता कहा जायेगा। क्या यह मृतक के ‘मानवीय-जीवन-मूल्य’ की भरपाई करती है? यदि नहीं, तो क्या समाज या सरकार इस भरपाई की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेंगे? शायद नहीं। क्योंकि, ऐसा करने से समाज में उन लोगों के लिए नकारात्मक सन्देश जायेगा जो किसी न किसी कारण से आत्मदाह की दहलीज पर बैठे हैं, और वह आत्महत्या के लिए प्रेरित होंगे। आत्महत्या एक ऐसा गंभीर एवं ज्वलंत विषय है जिसपर हमें गंभीर विश्लेषण कर, आत्महत्या के मूल कारणों को खोजना होगा। साथ ही हमें उन लोगों को भी खोजना होगा जो किसी न किसी कारण से अवसादीय मनोदशा से गुजर रहे हैं। यह आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठायें उससे पूर्ब ही हमें इनकी पहचान करनी होगी। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो यह हमारा आपातकाल मदद के पूर्व ही सहयोग की ओर बढ़ने वाला कदम होगा। अवसाद ग्रसित लोगों की पहचान हमें अपने कार्यस्थल, आसपड़ोस, अपने मित्रों, कुटुम्बियों, रिश्तेदारों सहित जहाँ तक हमारी पहुँच बन सके, वहां तक करनी होगी। तदोपरान्त, हमें अपने सकारात्मक व्यवहार से उनका आत्मबल बढ़ाना होगा। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो यह सामाजिक समरसता और सहयोग की पारस्परिक भावना को मुखरित करने वाला सर्वश्रेष्ठ मानवीय पहलू होगा, जो हमारे समाज को संगठित करेगा। यदि हम आगे बढ़कर अपने सतत् प्रयासों से ऐसा कर सके, तो हमारे समाज से आत्महत्या रुपी अभिशाप पर चमत्कारी गति से विराम लगने से कोई नहीं रोक सकता।
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कविताएँ

कविताएँ

1.मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता…! मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता हूँ, मुझे देखने से पहले अपनी अधखुली आँखे किसी साफ़ पानी से धो डालों! मैंने समय को बटुए में अंतिम बचे नोटों की तरह निकाल कर खर्च किया है मैं जानता हूँ समय को कभी रोका नहीँ जा सकता और की गई क्रियाएँ पूर्ववत् दोहराई तो जा सकती लेकिन प्राप्त किये गए फल सुधारे नहीँ जा सकते..! मुझे मालूम है रोटी जब तवे पर जल जाती है तो उसे कैसे खाया जाता है! जली हुई रोटी को कभी अलग नहीँ रखा, इन्ही जली हुई रोटियों ने मुझे हर समय पेट की आग से बचाया। मैंने कभी किसी पूराने वृक्ष की ओर पत्थर नहीँ बरसाए किसी शाम शांत झील पर भी कोई कंकर नहीँ उछाले, मैं तपती धुप में इतना जल्दी में रहता हूँ कि झील की ठण्डी लहरों को देखने के बारे में कभी सोचा ही नहीँ। मैंने पूरा टिकट दिया और खड़े-खड़े ही कई बसों में लम्बी यात्राये की बैठने के लिए सीट कभी-कभार ही मिलती थी लेकिन ऐसी बसों में की गई यात्राओं ने मुझे भीड़ में खड़े रह कर अपने गन्तव्य तक पहुंचने का अभ्यास सिखाया! मुझे मालूम है कि इन तमाम अभावों से मैंने समय,जली रोटियाँ,पुराने वृक्ष,शांत झील और भीड़ भरी बसों के उस पक्ष को देखा जिसमें यथार्थ था..संघर्ष था..और एक मजबूत क़दमों वाला साधारण जीवन था..! आज मैं आँखों में आये आँसुओं को पलकों की मजबूत परिधि में रोक सकता हूँ, दुःखों को गेंद की तरह हौंसले की दीवार पर मार सकता हूँ..! ********** 2.कबूतर…! न मिट्टी का घर बचेगा न गांव बचेंगे और न पेड़ बचेंगे! यह बात एक कबूतर ने दूसरे कबूतर से कही पूरे विश्वास के साथ…! दरअसल उस दिन उस कबूतर के जोड़े ने एक घोंसला प्लास्टिक की सुतलियों से बनाया था सीमेंट के रोशनदान पर…! अब कबूतर जान चुके हैं इंसान के आधुनिक होने का तरीका, इसी तरीके से जीना पड़ेगा अब कबूतरों को भी! कबूतर के अंडे खतरे में हैं या पूरी दुनिया ही खतरे में है। अंडा और दुनिया दोनों गोल है और प्लास्टिक तो हर जगह है। यह विचार मनुष्य भी कर ले तो बेहतर है कबूतर तो सालों पहले यह बात जान चुके हैं। *********** 3.कविताएँ…! कविताएँ व्यक्तिगत नहीँ होती हैं, वे समाज की हर उस आँख की होती हैं जिन्हें वे चुभती हैं, हर उस कान की होती हैं जिन पर वे चीखती हैं, हर उस विवेक की होती हैं जिन्हें वे झाड़-पोंछ देती हैं। कविताएँ सार्वभौमिक होती हैं! कविताएँ नेताओं की भाषण नहीँ है कविताएँ शेयर बाज़ार की शेयर नहीँ हैं कविताएँ बाबाओं की प्रवचन नहीँ हैं कविताएँ अभिनेताओं की फ़िल्मी संवाद नहीँ हैं कविताएँ न्यूज चैनलों की खबरें नहीँ हैं। ये सब व्यक्तिगत लाभ है! कविताएँ सूरज की धुप है चन्द्रमा की चांदनी है बादलोँ की बरसात है कविताएँ पेड़ है कविताएँ नमक है कविताएँ भूख-प्यास है कविताएँ थकान है..! कविताएँ लिखने वाले की सिर्फ कलम खुद की स्याही खुद की कागज खुद का कविता है हर आँख,कान और विवेक की! ********* 4.प्यार…! बार-बार चिल्ला कर यह कहना कि हम तुम्हे बहुत प्यार करते हैं पर तुम्हे दिखाई नहीँ देता.. यह भी प्यार में मिला एक धोखा है। प्यार चीखकर कहने भर का विषय नहीँ निस्वार्थ भाव से देने का एक मौन उपक्रम है। जिसने कहा देखों इस फूल को मैंने बोया मैं ही इसके लिए गमला लाया वहााँ पर प्यार मर जाता है सिर्फ अधिकार जीवित रहता है। प्यार चिड़िया का दाना चुगना और अपने बच्चे की चोंच में वह दाना चुगाना है। प्यार गाय का अपने बछड़े को अंतिम बच्चा दूध अपने थन से पिलाना है प्यार नहीँ सिर्फ चिड़िया को दाना डालना या गाय को पाल कर उसका दूध निकालना। प्यार पर्वत से फूटते एक सोते का एक नदी में अनुवाद है समुद्र से उठी भाप का बरसात में रूपान्तरण है। प्यार बिना कवि का नाम देखे उसकी पहली कविता को जी भरकर पढ़ने का सुख है **********स्वरचित और मौलिक********** -पवन कुमार वैष्णव उदयपुर,राजस्थान 7568950638
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मुक्ति

मुक्ति

मुझे पूर्ण मुक्ति नहीं चाहिए , मुक्ति संभव भी नहीं पिपीलिका के रूप में संग्राहक होना चाहती हूं शर्करा की होना चाहती हूं मधूक प्रेमी परागकण का या होना चाहती हूं , मक्षिका या चित्रपतंग या शलभ सा निर्मोही पुष्प होना चाहती हूं एक दिवस का सुरभित और सुवासित या होना चाहती हूं कृष्ण चूड की घनी छांव प्रेमी मिलते हो जहां या होना चाहती हूं पारिजात का फूल रहती है प्रियतमा की प्रतीक्षा जहां मुक्ति की कल्पना में नहीं बनना चाहती किसी इमली के वृक्ष का अतृप्त प्रेत मुक्ति की लालसा में नहीं होना चाहती जीर्ण शीर्ण किसी खंडहर की भांति
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कविताएं

कविताएं

वापसी

कभी कभी
चाह कर भी वापस लौटना मुश्किल होता है
वापसी का रास्ता
उतना सुगम नहीं रहता हर बार
बहुतेर
उतनी जगह नहीं होती वहां बची हुई
जहां वापस लौटने की चाह होती है मन को
कोई और भर चुका होता है
हमारी उपजाई रिक्ती को
स्नेह और प्रेम का आयतन
अपूरित नहीं रहता
ज्यादा देर तक
जरूरी नहीं
कि जिसके लिए
जिसके पास लौटा जाए
वह ठहरा ही हो
बाट जोहता ही हो
प्रायः नहीं ही होता ऐसा
मन यही सब गुन कर
चुप रह जाता है
छोड़ देता है
वापसी की संभावना टोहना ।

साइकिल

गहरा बहुत गहरा जुड़ाव है
हमारी नॉस्टेलजिया से
साईकिल का
हममें सोया बच्चा जग उठता है
आज इस उम्र में भी अगर
साईकिल चलाने का अवसर हाथ आ जाए
एक सुखद प्रतीति से गुजरकर
हम गुजरे कल में पहुंच जाते हैं
याद आते हैं बचपन के वो दिन
जब साईकिल से
एक प्रेयसी की हद तक प्रेम करते थे हम
किसी खेल से कम रोमांचकारी
कम दिलचस्प नहीं था
साईकिल चलाना उन दिनों
जब नहीं मिली थी अभी
अपनी पहली साईकिल
भाई जो मुझसे बड़े हैं
उम्र में तीन साल
उन्हीं की साईकिल से
सीखा था साईकिल चलाना
ज्यादा गिरना पड़ना
चोट खाना नहीं पड़ा था
पांव अच्छी तरह
जमीन तक पहुंच जाते थे
सीट पर बैठने के बाद
कद औसत से कुछ ज्यादा था
और साईकिल थोड़ी कम ऊंची थी
हां कुशल चालक
साईकिल चलाते चलाते ही हुआ
आठवीं जमात में पहुंचा
तब मिली थी
खुद की पहली साईकिल
स्कूल घर से 4 किलोमीटर दूर था
आने जाने की असुविधा तो नहीं थी
घर से रिक्शा भाड़ा मिल जाता था
जो जरूरत से कुछ ज्यादा ही हुआ करता था
बचे हुए पैसों से
चाट, पाचक और गुड़ के लट्ठे
का भी जुगाड हो जाता था जिसमें
पर दूसरे बहुत से साथियों की तरह
मुझे भी चाहिए थी साईकिल
ताकि अपनी जमात में
थोड़ा और रुआब गांठ सकूं
खूब चलाई थी
स्कूल और कॉलेज के दिनों में साईकिल
हर छोटा बड़ा काम
साईकिल से निबटाया करता था
चाहे स्कूल कॉलेज जाना हो
ट्यूशन क्लास पहुंचना हो
बाज़ार करना हो
या फिर दोस्तों के घर मिलने जाना हो
साईकिल तो थी ही
आज भले ही
उससे बेहतर और ज्यादा तेज सवारियां
चलाता हूं
पर वो और तरह का आनंद था
मस्ती से एकदम सराबोर
दोस्तों से साईकिल रेस लगाने में
हैंडल छोड़ कर साईकिल चलाने में
स्लो साइक्लिंग में
क्या क्या मजे थे
सोचने भर से
रोमांच से भरपूर हो जाता है
आज भी मन ।

राजीव कुमार तिवारी
rajeevtiwary6377@gmail.com