ग़ज़ल

उदासियाँ हैं लबों पे लेकिन ख़ुशी के नग़मे सुना रहा हूँ
यही है दस्तूर ज़िन्दगी के, मैं सारी रस्में निभा रहा हूँ

न जाने क्यों कल से साँस लेने में हिचकिचाहट सी हो रही है
वो कौन सा राज़ है कि जिस को मैं ज़िन्दगी से छुपा रहा हूँ?

उसी ज़मीं पर कि जिस पे लाशें मुहब्बतों की पड़ी हुई हैं
जला-जला कर परालियाँ फिर जदीद फ़सलें उगा रहा हूँ

उजालों में फँस के गुमरही में इधर-उधर जो भटक रहे हैं
पता मैं उन जुगनुओं को उँगली से तीरगी का बता रहा हूँ

धुआँ उठा था तभी ख़बरदार ख़ैरख़्वाहों ने कर दिया था
ये बेख़याली का है नतीजा कि हाथ अपने जला रहा हूँ

कहूँ इसे ज़िन्दगी भला क्यों दबाए रखती है मेरी गर्दन
बहुत सहा ज़ुल्म इस का मैं ने अब इसकी गर्दन दबा रहा हूँ

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