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लखनऊ और आज़ादी का कैनवास

“आप लखनऊ से है क्या, आपके लहजे से लगता है?” मुंबई में हाल ही में शुरू हुए मेरे कोर्स के एक साथी ने जब ये सवाल पूछा तो मैं एक मिनट को रुक गयी। मैं जोधपुर, राजस्थान में पली-बढ़ी हूँ। लखनऊ से रिश्ता महज ५ साल पहले पढ़ाई के लिए शुरू हुआ। पर ये कहना कि “मैं लखनऊ से नहीं हूँ”, अपने और लखनऊ के बीच एक ऐसी दूरी खड़ी कर देना था जो मुझे मंजूर नहीं। मैं यही कह सकी कि, “हूँ तो जोधपुर राजस्थान से, पर लखनऊ में पढ़ी हूँ, और उस शहर से बहुत मोहब्बत करती हूँ।” (बेचारा, इतनी सारी एक्स्ट्रा इन्फॉर्मेशन सुनकर झेंप गया।) लखनऊ से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरी नज़र में, कुछ राधा-कृष्ण का सा सम्बन्ध है, जहाँ कनुप्रिया राधा यही पूछती रह गयी क़ि “तुम मेरे कौन हो, कनु?” मेरे लिए भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं क़ि लखनऊ मेरे लिए क्या है?लखनऊ से मेरा सम्बन्ध क्या है? कभी लगता है क़ि लखनऊ शायद मेरे लिए मेरा नैहर है, जो अब मुझसे छूट गया है। पर कभी-कभी ये भी लगता है क़ि शायद लखनऊ मेरा बेनाम ‘लव अफेयर’ है। थोड़ा नाज़ायज़ भी लग सकता है क़ि आप जहाँ के है नहीं, जहाँ आप सिर्फ चंद दिन पढ़ने आये, वो आपकी इतनी गहरी मोहब्बत कैसे हो सकता है। ये लेख बस कोशिश है यह जानने की क़ि लखनऊ मेरा कौन है? एक चेतावनी अपनी बात की शुरुआत में ही ये चेतावनी देना चाहूंगी क़ि मेरा लखनऊ को देखने का नजरिया उन लोगों से अलग हो सकता है जो वहाँ के पुराने वासी हैं। मेरे लिए नया फैलता हुआ लखनऊ – शहीद पथ, गोमती नगर भी उतना ही लखनऊ हैं जितना हज़रतगंज या पुराना लखनऊ, क्योंकि मेरे जीवन में नया/पुराना लखनऊ सब एक साथ दाखिल हुआ हैं। मैंने भी यहाँ क्लासेज छोड़ कर सिनेमा देखा, पर साहू में नहीं, फीनिक्स मॉल में। पुराने लखनवी मेरे अनुभव को कुछ अजीब और कुछ हद तक अधूरा भी पा सकते हैं। पर मेरे लिए वो पूर्ण है क्योंकि वो मेरा अपना है। बाकि आप चाहे तो इसे एक बाहर वाले का दृष्टिकोण भी मान सकते है। लखनऊ, एक मध्यम मार्गी बुद्ध मैं ७ जुलाई २०१३ को, १७ साल की उम्र में यहाँ आयी और १३ मई २०१८ तक, यानि २२ की होने तक यहाँ रही। इस उम्र में लखनऊ आना मेरी खुशनसीबी थी। ये बात लखनऊ के प्रति अपनी मोहब्बत के कारण नहीं, बल्कि बड़े ‘ऑब्जेक्टिव बेसिस’ पर कह रही हूँ। ( सही बता रही हूँ, आज कल ऑब्जेक्टिव होना बड़ा दुर्लभ है) जिस उम्र में, मैं यहाँ आयी वो जवानी का शुरुआती दौर कहलाता है जहाँ आप परिपक्वता के पहले-पहले अनुभव पाते और सीखते हैं। कुछ-न-कुछ नया सीखने की कोशिश में लगातार लगे रहते हैं। पर इस सीखने-सिखाने के लिए मध्यम मार्ग जरुरी है, अन्यथा आप ‘अति’ के चक्रव्यूह में फंस सकते है, ऐसा मेरा मानना है । और लखनऊ इस नज़र से एक शहर के तौर पर बिलकुल सही है क्योंकि लखनऊ एक मध्यम मार्गी बुद्ध सा है । बड़े और छोटे दोनों तरह के शहरों के बोझों से इतर है। यहाँ न बड़े शहर की मारामारी है और ना ही छोटे शहर की कुण्ठाएँ. इसीलिए यहाँ शहर सम्बन्धी ‘बैगेज’ के बिना स्वाध्याय संभव है। मुझे लखनऊ ने इन पाँच सालों में इसी नशीली स्वाध्याय प्रक्रिया में लगाए रखा और यही मेरी खुशनसीबी थी। खोज? मगर किसकी? हम साधारण तौर पर किसी नए शहर में जाने पर भी नयेपन से भागते है और नए में भी अपना पुराना कुछ खोजते रहते हैं। मैं भी शुरुआत में इस शहर से भागती थी, अपना जोधपुर यहाँ ढूँढती थी। कहीं-कहीं जोधपुर मिला भी पर धीरे-धीरे लखनऊ ने मुझे अपने सामने रखा वैसे, जैसा किसी रिश्ते में होता है, जहाँ सामने वाला परत दर परत अपने आपको आपके सामने रखता है। लखनऊ को जानने- खोजने का सफ़र, यूनिवर्सिटी के पास बैग ठीक करवाने की दुकान ढूँढने से शुरू हुआ और फिर जैसा किसी भी नए शहर को खोजने जानने की प्रक्रिया में होता है, मेरा सफर भी सर्वप्रथम लखनऊ शहर की जानी- मानी जगहों बड़े इमामबाडे, छोटे इमामबाड़े पहुँचा। यहाँ पहुँचते- पहुँचते कई टूरिस्टों वाली हरकतें भी की, रिक्शा वालों से लूटे भी गए । ये लखनऊ को जानने की पहली परत थी । मुख्य-मुख्य जगहों पर जाने के बाद मुझे एक ऐसी तलब लगी जहाँ शहर को टुंडे कबाब और रेसीडेंसी से आगे जानना चाहा । एक ‘टूरिस्ट’ बन कर नहीं, बाहर से नहीं, बल्कि शहर का हिस्सा बनकर शहर की नब्ज को जानना चाहा । ये तलब लखनऊ के प्रति धीमे-धीमे चढ़ते हुए सुरूर और जोधपुर में अपने परिवार वालों के सामने शहर की ‘एक्सपर्ट’ साउंड करने की चाह दोनों के मिश्रण का नतीजा थी । पर इसके पीछे तीव्र इच्छा थी एक घर ढूंढने की । जोधपुरवासी अब रह नहीं गए थी, इसलिए लखनऊवासी होना चाह रही थी । एक शहर से बेदखल हो गयी थी इसलिए एक नए शहर में दखल चाह रही थी । मेरा सारा प्रयास यह था कि मैं लखनऊ के बारे में लखनऊ वालों की तरह बात कर सकूँ । खैर! तो फिर दौर शुरू हुआ ‘खोज’ का। खोज? वास्तव में मैंने इस शहर को ‘खोजा’ है। कभी काकोरी में पूछ- पूछ कर नवाब आसफुद्दौला के प्रधानमंत्री टिकैतराय द्वारा बनाए गए शिव मंदिर को तो कभी ठाकुरगंज की टेढ़ी-मेढ़ी गलिओं में बेगम अख्तर की मज़ार को । ऐन हजरतगंज में बसे सिब्ब्तैनाबाद इमामबाडे को भी खोजा है मैंने, किताबें पढ़-पढ़ कर, रास्ते पूछ- पूछ कर, गलियाँ ढूँढ-ढूँढ कर। मुख्यमंत्री आवास के आगे का रास्ता लोहिया पथ है- यह भी तो खोजा ही है। सफ़ेद बारादरी, लाल बारादरी, शाह नज़फ इमामबाड़ा, खुर्शीदजादी का मक़बरा- आप इन जगहों के महत्व को तभी समझ सकते है जब आप एक टूरिस्ट या एक बाहर वाले की दृष्टि का परायापन छोड़ कर इस शहर को अपना घर मानकर देखने लगे, शहर के अपने होने की कोशिश करने लगे । वास्तव में, आप इन जगहों के बारे में बिना कोशिश के जान भी नहीं पाएंगे जब तक क़ि आप पढ़ कर, पूछ कर इन्हें ‘खोजे’ ना। और इसीलिए मैं कहती हूँ क़ि मैंने इस शहर को खोजा है। आप इसे ऐसे समझ सकते है क़ि लखनऊ तो अपनी साऱी मंज़िलों, बागों, गंजों, मक़बरों के साथ हमेशा से था । मैंने बस अपने सम्बन्ध में उनके पते और अपने राब्ते से उनके नए अर्थ ढूंढे हैं। ये वास्तव में लखनऊ के करीब आने की, बाहर का ना होकर, उसका अपना होने की कोशिश भर थी। हालांकि एक गम रहेगा कि मीर अनीस की मज़ार नहीं जा सकी। वास्तव में आज पीछे देखने पर एहसास होता है क़ि मैं शहर को खोजते- खोजते खुद को, अपनी हिम्मतों, बहादुरियों और उनकी सीमाओं को खोज रही थी । और कब लखनऊ को खोजना और खुद को खोजना एक ही हो गया, पता ही नहीं चला । इस ‘खोज’ का नतीजा ये है क़ि पहला, मुझे एक स्तर तक आत्म जागृति और आत्म अनुभूति प्राप्त हुई और दूसरा क़ि लखनऊ की ना होकर भी लखनऊ कुछ-कुछ मेरा और मैं कुछ-कुछ लखनऊ की हो गयी। (इस खोज का एक तीसरा नतीजा ये निकला क़ि मैं लखनऊ आने वाले हर मित्र, हर रिश्तेदार के लिए ‘टूरिस्ट गाइड’ बन गयी और वो भी मुफ्त की!!) लखनऊ और राजनीति लोक सभा में ८० सीट वाले राज्य की राजधानी होने के नाते लखनऊ को जानने की एक परत राजनीति से होकर गुजरे, तो ये लाजमी ही है । इस शहर ने मेरी राजनैतिक समझ को बढ़ाया। स्टेशन से पहली बार उतरते ही यूनिवर्सिटी के रास्ते में पड़ने वाले बड़े-बड़े पार्क राजनैतिक समझ की ओर पहले कदम थे, पहले ही दिन। पिछले पाँच सालों में अम्बेडकर जयंती पर अम्बेडकर पार्क पर भरे मेले से लेकर गाँधी मूर्ति पर हर दम चलने वाले धरने- प्रदर्शन ने हर तरह के लोगो- सोशलिस्टों, अम्बेडकरवादियों, गाँधीवादियों, कम्युनिस्टों के प्रति मेरी समझ को बढ़ाया। (पर लखनऊ का खास शुक्रिया सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों से मिलाने के लिए, वो आज कल विलुप्त होती प्रजाति है। ) बात मोहब्बत की जवानी और लखनऊ के ज़िक्र में मोहब्बत का ज़िक्र ना करना, लखनऊ और जवानी दोनों की बेइज़्ज़ती करना होगा। ये शहर मोहब्बत करने के बड़े मौके देता है । इस शहर ने मुझे मोहब्बत भी दी और मोहब्बत का हाथ थाम कर चलने के लिए रिवर फ्रंट और मरीन ड्राइव भी दिया। (हालाँकि एंटी- रोमियो स्क्वाड का भय बना रहता था।) सच मानिये आज कल मोहब्बत करने वालों के लिए शहरों में ज्यादा स्पेसेस हैं नहीं। मोहब्बत करना आज के युग में भी एक क्रांतिकारी गतिविधि है, खास कर लड़कियों के लिए. क्योंकि हमारे यहाँ लड़कियां मोहब्बत नहीं करती उनकी बस शादी कराई जाती है। मोहब्बत करने वाली लड़कियां ‘बुरी लड़कियां’ होती हैं। लखनऊ ने मुझे अपने इस ‘बुरी लड़की’ रूप से मिलवाया जो जाति और धर्म के बंधनों के आगे मोहब्बत करने की आज़ादी और हिम्मत रखता है । ये शायद घर से दूर आने पर मिली आज़ादी में किसी भी और बड़े शहर में हो सकता था । पर लखनऊ में कुछ ऐसा है कि, बात “मैं एक औरत हूँ और मुझे भी मोहब्बत करने का हक़ है”- यहाँ से शुरू होकर व्यक्तिगत आज़ादी के बड़े कैनवास पर पहुंच गयी । मोहब्बत की बहादुरियाँ सिखाते-सिखाते लखनऊ मेरे भीतर बहादुरी और आज़ादी की गंगोत्री बना गया. अब ये गंगा चाहे जहाँ बह ले, गंगोत्री लखनऊ ही होगा । मेरे लिए लखनऊ की सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? इतनी सारी बातों के बीच मेरे लिए भी एक सवाल है कि लखनऊ का सबसे बड़ा महत्व क्या है? मुझे लगता है कि लखनऊ ने मुझे एक ऐसा संस्कार दिया है जो मुझे ताउम्र एक बेहतर इंसान, एक बेहतर श्रोता और एक बेहतर मोहब्बत करने वाला बनाता रहेगा । यह संस्कार है- सामाजिक सौहार्द का संस्कार, बेगम आलिया के हनुमान जी के दर्शन का संस्कार, मनकामेश्वर मंदिर में इफ्तार आयोजित होने का संस्कार । हर तरह की संस्कृति और धर्म के प्रति आनंद का ये संस्कार अपने से अलग, अपने से इतर हर व्यक्ति, समाज, परिवेश की ओर भिन्नताओं से आगे बढ़ देखने की नज़र पैदा करता है । सच मानिये भारत के लोकतंत्र की जरुरत है ये । एक देश, एक भाषा, एक धर्म, एक रंग, ये सब अपने आप में बड़ा गैर- भारतीय विचार है । भारतीयता शायद वह है जो मुझे लखनऊ ने सिखाई । ये संस्कार निजी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये रिश्तों में भी आवरण सम्बन्धी परेशानियों, भेदों से आगे और ऊपर प्रेम और सहजीवन को महत्व देता है । कुछ बेवकूफियां- ये कतई नहीं कि लखनऊ एकदम सयाना, समझदार शहर है । कभी-कभी तो अजीब पागल सा भी लगता है । जैसे – मरीन ड्राइव को लीजिये. ऐसा लगता है एक टीनएजर की तरह जिद्द पाल कर बनाई गयी हो! बिना समुद्र के मरीन ड्राइव । विशाल, विपिन, विनीत!!- सारे गोमती नगर में सारे खंड, ‘व’ से शुरू होते हैं, जैसे वास्तु- ज्योतिष पूछ कर रखे हो । ऐसा मह्सूस होता है कि गोमती नगर में शायद वही लोग रहते होंगे जो चाहते ही नहीं कि लोग उनका पता ढूंढ सके और उनके घर पहुँच सके । इसी तरह अमीनाबाद में बाजार का नाम गड़बड़झाला क्यों है? अपने घर वालों को ये समझाने में इतना वक़्त बीत गया कि गड़बड़झाला एक जगह है, संज्ञा है । मेरे द्वारा किसी बाज़ार के गुणों को समझाने के लिए इस्तेमाल किया गया कोई विशेषण नहीं । कुछ वास्तविक परेशानियां बताती हूँ जो लखनऊ को समझने-समझाने में हुई- जैसे मैं आज तक अपने बाबा को नहीं समझा सकी हूँ कि दही के साथ जलेबी कैसे खाते है? (जोधपुर में दूध जलेबी खाने का रिवाज़ है) । दूसरा कि समोसों में हल्दी क्यों नहीं डाली जाती? (ये बात तो शायद उत्तर प्रदेश के बहुत हिस्सों पर लागू होती है ।) चंद मश्वरे- लखनऊ के सम्बन्ध में ज्यादा मश्वरे देने की जरुरत नहीं होती, ये शहर खुद-ब-खुद धीरे-धीरे आपको मश्वरे देता रहता है अगर आप ध्यान से देखो, सुनो और परखो । पर फिर भी चंद मश्वरे जरूर दूंगी- पहला, जब भी अकेले रहना चाहो, तब शहीद पथ जरूर जाना, बस गाड़ी ध्यान से चलाइये। दूसरा, मेट्रो नयी-नयी बनी है। बेवजह मेट्रो में सफर जरूर करना । वजह से सफर करने लायक तो अभी वो है भी नहीं । अधिकांशत: खाली-खाली सी रहती है । अपनी मोहब्बत का हाथ थामे कृष्णा नगर से चारबाग़ जाना और लौट आना । इससे ज्यादा आप हिन्दुस्थान में अपनी मोहब्बत का हाथ थामे सार्वजानिक स्थानों पर नहीं चल सकते । तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सुझाव- प्रधानमंत्री टिकैतराय के शिव मंदिर और बेहटा पुल को देखा तो बहुत दुःख हुआ । लखनऊ के सामाजिक और धार्मिक सौहार्द का प्रतीक ये मंदिर ज़र्र-ज़र्र भी है और गुमनाम भी । ASI का बोर्ड लगा है पर न तो आस-पास की जनता को कुछ ज्ञात है और न ही उसके रखरखाव का कोई प्रबंध । कोई हमें यह तक नहीं बता सका कि मंदिर आखिर है कहाँ? कोई कहता ५ किलोमीटर, तो कोई कहता १ किलोमीटर । लखनऊ शहर और उसकी इमारतें, भारतीयता के कई महत्वपूर्ण गुणों की अगवाई करती है। इन इमारतों को खोने दे । इन्हें संरक्षण और प्रचार दोनों की जरूरत है । और अंत में, जब लखनऊ के बारे में लिखने बैठी तो लगता रहा कि (जैसा वाजिद अली शाह ‘अख्तर’ ने लिखा है) कि चमन छूटा तो छूटा था,मज़ाक़-ए-रंग-ओ-बू छूटा. छूटी आदम से जन्नत, और हमसे लखनऊ छूटा. पर वास्तव में, हमसे लखनऊ नहीं छूट सकता । अलबत्ता लखनऊ हम ‘में’ छूट गया है । जहाँ जायेंगे लखनऊ हममें बना रहेगा, अपने आपको सामने लाता रहेगा, चुपके- चुपके मुस्कुराता रहेगा। मैं चाहूंगी कि मुझे जीवन वापस लखनऊ लाये और मैं जब भी यहाँ आऊं लखनऊ मुझे ऐसा ही मिले- हल्का जागता, हल्का सुरूर में, थोड़ा सा भागता पर ढेर साड़ी फुर्सत में, धक्का ना मारे पर ‘अमा यार आगे बढिये” कहता हुआ । और जब तक ये नहीं होता तब तक मैं जहाँ जाउंगी लखनऊ को याद कर अपना मटियाबुर्ज बनाती रहूंगी । -सुरभि करवा, डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्विद्यालय {जिसे लखनऊ वाले ‘आशिआना लॉ कॉलेज’ के नाम से जानते हैं } में ५ वर्षों तक कानून की पढाई कर रही थी। आजकल दिल्ली में कार्यरत है।
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

उदय शंकर

संपादन सहयोग
हंस में आई  कोई भी रचना ऐसी नहीं होती जो पढ़ी न जाए। प्राप्त रचनाओं को प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ने में उदय शंकर संपादक का   सहयोग करते  हैं । 
हिंदी आलोचक, संपादक और अनुवादक उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हैं। उन्होंने कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है। ‘नई कहानी आलोचना’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

नाज़रीन

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हारिस महमूद

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वीना उनियाल

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पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.