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रोहित प्रसाद पथिक की कविताएँ

।। कविताएँ ।।

1. तुम मर तो नहीं सकते हो !

जहां से
क्लियर होता है ब्रह्मांड

जहां सिर्फ
मौत के पौधे उगते हैं
आहिस्ता-आहिस्ता
वचन को पढ़कर तुम
एक देश नहीं बदल सकते

मैं जानता हूं
काले विचारों से
होकर युद्ध करना होगा तुम्हें
क्योंकि विचार फक्कड़ है
फिर तुम्हें
एक विशालकाय बीज से भी
मौत के स्वर बदलने होगें
एकमात्र बची रहेगी यह धूसर जमीन

तुम ध्वस्त करने
तो निकल गए हो
लेकिन एड़ी को मजबूत कर लेना
ईट को लोहा बनाकर लाठियों से प्रेम करना
किताबों में लिखे शब्दों को बुलाकर
नई किताबों को लिखना

क्योंकि हर पांडुलिपि धोखेबाज होती है
तुम अब तक
लड़ रहे थे अपने वजूद के लिए
अचानक तुम्हारा मस्तिष्क एकांत
हाथों में सूजन और आंखें बड़ी और
मुंह से लाल लार निकल रही है और तुम…

2. विश्वसनीयता

माना की प्रतीक्षा करते हुए शब्दों ने
कह दिया मुझे अलविदा

कहना न होगा प्रायः तुम्हें
मुझे भी बता दो
एक वेबसाइट पर लिखित पोस्ट का पता
जहाँ मरने के बाद का दृश्य
कभी भी दुखी ना करता हो हमें

डोम के छोटे-छोटे बच्चों के होंठ से
जल-जल कहते
फिर दुबक कर
समस्त परिवार के लोगों को रौंद डाला
किसने यही तो हमें समझना है
विचारों के अंदर आहिस्ता आहिस्ता
काले धन का आयोजन होता जाता है
दैनिक जीवन के लोग
रास्ते पर टेलीकास्ट करते हुए नजर आते है
खून से लथपथ हाथों में
आज भी त्वरित है तुम्हारे चीख,भत्सना, गर्भपात, भूख और भ्रष्टाचार जैसे शब्द

एकदम अलग-अलग अस्थाई आह्वान करके नीच डोम मरते हैं
सही कहा है अपनें
विवेक और बुद्धि में अंतर होता है
विवेक बुद्धि से प्रेम कर नहीं सकता
बल्कि करवाता है
नसीहतों के ताने-बाने में डोम से प्रेम कर बैठे लोग
धीरे से थम गया विश्वास
फिर
कोरे पन्नों पर
जन्मदिन मुबारक हो
लिख दिया मैंने

3. मौत के हवाले कविता

( एक )

लिखते-लिखते
मौत के हवाले
चढ़ गई
एक कविता.

मैं अदम्य साहस
करता रहा कि
कम से कम
इस अधमरी कविता की
मौत कैसे होगी… ?

जो खुद
मौत से लड़ती है
वह भी मौत से
संवाद करेंगी.

और रात के
अंधेरे में
अचानक मौन होगा अंधेरा.
और सत्य शांत होगा.

तब मेरे द्वारा
रचित एक
अधमरी कविता को
मैं स्वयं
श्रद्धांजलि दूंगा,
और मेरे आंखों में
आंसू सूखे होंगे.

( दो )

कविता
लहू-लुहान है
वजह है एकमात्र
अपने शब्दों के प्रहार से
भाषा शैली से
लेखन दृष्टि से
पाठकों के विचार से
और
कवि के
अनूठे हलफनामे से…

आखिरकार
कवि ने स्वयं
एक शब्द लिखा—–

वह शब्द है ‘मौत’
और मौत
जब मृत हुआ
तब कवि ने
चुपके से
अपनी डायरी खोली
और मौत के
हवाले कर दी
अपनी लिखित,सुसज्जित, भावात्मक…
कविताओं को.

( तीन )

उदास है मन
क्योंकि
मरने वाली है कविता.

सोचती है कलम
मैंने भी
किसे अपना स्याही दी
जो अल्प आयु थी.

फिर कोरे कागज़ ने भी
अपनी बात
रखने में कोई कसर नहीं छोड़ा
कहा—
“साली…
कविता को मरना ही था
तो कवि ने मुझ पर
लिखा ही क्यों ? “
डायरी भी भभकी
और बोली—–

सारा दोष
हलकट कवि का है
अधमरी कविताओं को
मत लिखो जो
धीरे-धीरे मौत के
हवाले हो रही हो….!
एक वायरस की तरह.

4. सापेक्ष होते हुए भी

हाथों की हथेलियों में
निर्वस्‍त्र हैं
हमारी किस्मत की लकीरे
नागवार गुजरता है मन इन्हें देख

शायद !
किस्मत अपनी किस्मत पर भारी पड़ा हो
पैरो की तलहट्‍टी सिकुड़ गया है
मगर चलन अब भी जारी है.
कई सवाल जो जुबां पर बवाल मचा रहे हैं
अपने उत्तर की खोज में तड़प उठे है.
मगर
आज भीचाटुकार बाबा बनकर जीना चाहते है.
ग्रहों में भी चापलूसी का भाव
सिसकी मारता छाया हुआ है
सभी मनुष्य आपनी कमजोरी पर
ईट पर नाच रहे हैं…

एक मात्र हम
किसी साहुकार की तपती
भट्टी को निहारते हैं निरन्तर
कहते हुए भी भिन्न लगते हैं
कटुरता की वाणी आज भरते हैं.
मैं आज शामिल हुआ तुम्हारे समारोह में
बड़े ससम्मान के साथ मुझे
कुछ भी बस…
कुछ भी कह देते हो
आज हुआ हूँ
मैं तुम्हारे सापेक्ष
दो मेरे प्रश्‍नो के जवाब
देना होगा तुम्हे !
क्‍यों भाग रहे हो ?
अपने कर्तव्यों से
आज तुम चुप हो
मेरे सापेक्ष होते हुए भी !

5. लाश

मर जाना
जीने से
कई गुना बेहतर है

क्योंकि
हर लाश को नसीब होती है
कफन
चीता
फूल
घी और आत्म शांति

जो बेहतर है
एक दकियानूसी जीवन के
मंसूबों से…

6. इन्हें मत मारो

मत मारो
यह भी
सदस्य है
तुम्हारे मन के शहर का

यह
वही
दलित है
जिन्होंने जन्म दिया है तुम्हें

सोचो
ओए ! गंदे सूअरों

यही है
जिन्होंने स्वच्छ किया है
तुम्हारे मलिन विचारों को
अब ठहरो
और हाथों में लिए
कठोर पत्थर को कोमल करों

फेंक दो
किसी डस्टबिन में
अपनी जातिवादी विचारधारा को

अब भी कहता हूँ;

” इन्हें मत मारो !
मत मारो…! “

7. बारह बजे के बाद

बदल जाती है दुनिया
खुशियों के जल से
भर जाता है मानव
एक नया दिन शुरू होता है
नए नियम लागू हो जाते हैं
क्रम बदल जाता है
सिर्फ
बारह बजे के बाद

बदल जाती हैं
अखबारों की हेडलाइंस
लिखे जाते हैं नए विधान
बुने जाते हैं
जीवन गीत
शाॅल ओढ़कर रखी जाती है
आसमां में शरीर
रचे जा रहे हैं
उपन्यास एवं कविताएं
गाई जाती है
गांवों में बिरहा*

रास्तों पर
जन्म लेते है नए लोग
खुल जाते हैं मार्केट के कपाट
और धीरे-धीरे अंधेरा भाग कर
बुलाता है उजाले को
सिर्फ बारह बजे के बाद.
__________________________________________
* बिरहा- भोजपुरी लोकगीत

8. युवा

युवा होना
एक खतरनाक क्रिया है
क्योंकि कम उम्र में ही
जन्म लेती है आकांक्षाएं
जैसे जन्म लेता है
एक पंछी अपने अंडे से

इस उम्र में
पैर डगमगाते है
आंखें सपसपाती है
किसी भी जिस्म को देख
खून उबलता है
एक सौ डिग्री के तापक्रम पर
फिर चमड़ी को फाड़ कर
बाहर निकलता है युवा गर्म खून
और संसार वाले नहाते हैं उस खून से

वीर्य बलवान होता है
कितना यह नहीं पता ?
शिकार बन जाता है वीर्य खुद
उपस्थित होता है यह संसार के
एक सूक्ष्म भाग पर…

□□□

( यह मेरी मौलिक व अप्रकाशित कविताएँ हैं, कृपया प्रकाशित करें। धन्यवाद।)

■ कवि परिचय:

नाम: रोहित प्रसाद पथिक (युवा कवि)
पता: केस रोड़ रेल पार डीपू पाडा क्वार्टर नम्बर:(741/सी), आसनसोल-713302( पश्चिम बंगाल)
मोबाइल: 8101303434/8167879455
ईमेल: poetrohit2001@gmail.com

राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

उदय शंकर

संपादन सहयोग
हंस में आई  कोई भी रचना ऐसी नहीं होती जो पढ़ी न जाए। प्राप्त रचनाओं को प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ने में उदय शंकर संपादक का   सहयोग करते  हैं । 
हिंदी आलोचक, संपादक और अनुवादक उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हैं। उन्होंने कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है। ‘नई कहानी आलोचना’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

नाज़रीन

डिजिटल मार्केटिंग / सोशल मीडिया विशेषज्ञ
आज के बदलते दौर को देखते हुए , तीन साल पहले हंस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय होने का निर्णय लिया। उसके साथ- साथ हंस अब डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया में भी प्रवेश कर चुका है। जुलाई 2021 में हमारे साथ जुड़ीं नाज़रीन अब इस विभाग का संचालन कर रही हैं। वेबसाइट , फेस बुक, इंस्टाग्राम , ट्विटर जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से ये हंस को लोगों के साथ जोड़े रखती हैं। इन नए माध्यमों द्वारा अधिक से अधिक लोगों को हंस परिवार में शामिल करने का दायित्व इनके ऊपर है।

प्रेमचंद गौतम

शब्द संयोजक
कोरोना महामारी में हमसे जुदा हुए वर्षों से जुड़े हमारे कम्पोज़र सुभाष चंद का रिक्त स्थान जुलाई 2021 में प्रेमचंद गौतम ने संभाला। हंस के सम्मानित लेखकों की सामग्री को पन्नों में सुसज्जित करने का श्रेय अब इन्हें जाता है । मुख्य आवरण ले कर अंत तक पूरी पत्रिका को एक सुचारू रूप देते हैं। इस क्षेत्र में वर्षों के अनुभव और ज्ञान के साथ साथ भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है।

दुर्गा प्रसाद

कार्यालय व्यवस्थापक
पिछले 36 साल से हंस के साथ जुड़े दुर्गा प्रसाद , इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं की कार्यालय में आया कोई भी अतिथि , बिना चाय-पानी के न लौटे। हंस के प्रत्येक कार्यकर्ता की चाय से भोजन तक की व्यवस्था ये बहुत आत्मीयता से निभाते हैं। इसके अतिरिक्त हंस के बंडलों की प्रति माह रेलवे बुकिंग कराना , हंस से संबंधित स्थानीय काम निबाटना दुर्गा जी के जिम्मे आते हैं।

किशन कुमार

कार्यालय व्यवस्थापक / वाहन चालक
राजेन्द्र यादव के व्यक्तिगत सेवक के रूप में , पिछले 25 वर्षों से हंस से जुड़े किशन कुमार आज हंस का सबसे परिचित चेहरा हैं । कार्यालय में रखी एक-एक हंस की प्रति , प्रत्येक पुस्तक , हर वस्तु उनकी पैनी नज़र के सामने रहती है। कार्यालय की दैनिक व्यवस्था के साथ साथ वह हंस के वाहन चालक भी हैं।

हारिस महमूद

वितरण और लेखा प्रबंधक
पिछले 37 साल से हंस के साथ कार्यरत हैं। हंस को देश के कोने -कोने तक पहुँचाने का कार्य कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। विभिन्न राज्यों के प्रत्येक एजेंट , हर विक्रेता का नाम इन्हें कंठस्थ है। समय- समय पर व्यक्तिगत रूप से हर एजेंट से मिलकर हंस की बिक्री का पूरा ब्यौरा रखते हैं. इसके साथ लेखा विभाग भी इनके निरीक्षण में आता है।

वीना उनियाल

सम्पादन संयोजक / सदस्यता प्रभारी
पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.