कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी)

वापसी

कभी कभी
चाह कर भी वापस लौटना मुश्किल होता है
वापसी का रास्ता
उतना सुगम नहीं रहता हर बार
बहुतेर
उतनी जगह नहीं होती वहां बची हुई
जहां वापस लौटने की चाह होती है मन को
कोई और भर चुका होता है
हमारी उपजाई रिक्ती को
स्नेह और प्रेम का आयतन
अपूरित नहीं रहता
ज्यादा देर तक
जरूरी नहीं
कि जिसके लिए
जिसके पास लौटा जाए
वह ठहरा ही हो
बाट जोहता ही हो
प्रायः नहीं ही होता ऐसा
मन यही सब गुन कर
चुप रह जाता है
छोड़ देता है
वापसी की संभावना टोहना ।

साइकिल

गहरा बहुत गहरा जुड़ाव है
हमारी नॉस्टेलजिया से
साईकिल का
हममें सोया बच्चा जग उठता है
आज इस उम्र में भी अगर
साईकिल चलाने का अवसर हाथ आ जाए
एक सुखद प्रतीति से गुजरकर
हम गुजरे कल में पहुंच जाते हैं
याद आते हैं बचपन के वो दिन
जब साईकिल से
एक प्रेयसी की हद तक प्रेम करते थे हम
किसी खेल से कम रोमांचकारी
कम दिलचस्प नहीं था
साईकिल चलाना उन दिनों
जब नहीं मिली थी अभी
अपनी पहली साईकिल
भाई जो मुझसे बड़े हैं
उम्र में तीन साल
उन्हीं की साईकिल से
सीखा था साईकिल चलाना
ज्यादा गिरना पड़ना
चोट खाना नहीं पड़ा था
पांव अच्छी तरह
जमीन तक पहुंच जाते थे
सीट पर बैठने के बाद
कद औसत से कुछ ज्यादा था
और साईकिल थोड़ी कम ऊंची थी
हां कुशल चालक
साईकिल चलाते चलाते ही हुआ
आठवीं जमात में पहुंचा
तब मिली थी
खुद की पहली साईकिल
स्कूल घर से 4 किलोमीटर दूर था
आने जाने की असुविधा तो नहीं थी
घर से रिक्शा भाड़ा मिल जाता था
जो जरूरत से कुछ ज्यादा ही हुआ करता था
बचे हुए पैसों से
चाट, पाचक और गुड़ के लट्ठे
का भी जुगाड हो जाता था जिसमें
पर दूसरे बहुत से साथियों की तरह
मुझे भी चाहिए थी साईकिल
ताकि अपनी जमात में
थोड़ा और रुआब गांठ सकूं
खूब चलाई थी
स्कूल और कॉलेज के दिनों में साईकिल
हर छोटा बड़ा काम
साईकिल से निबटाया करता था
चाहे स्कूल कॉलेज जाना हो
ट्यूशन क्लास पहुंचना हो
बाज़ार करना हो
या फिर दोस्तों के घर मिलने जाना हो
साईकिल तो थी ही
आज भले ही
उससे बेहतर और ज्यादा तेज सवारियां
चलाता हूं
पर वो और तरह का आनंद था
मस्ती से एकदम सराबोर
दोस्तों से साईकिल रेस लगाने में
हैंडल छोड़ कर साईकिल चलाने में
स्लो साइक्लिंग में
क्या क्या मजे थे
सोचने भर से
रोमांच से भरपूर हो जाता है
आज भी मन ।

राजीव कुमार तिवारी
rajeevtiwary6377@gmail.com

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