Hanshindimagazine

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भोर का भय

डर तो उसे रात के अंधेरे से बहुत लगता था किंतु तभी जब वह कोई आम दिन होता। आज रात के अंधेरे से ज़्यादा होने वाले दिन के सूरज के सामने वो खुद को पिंघलता देख रही थी।आने वाली रौशनी अपने साथ बहुत सारी आंखें, बांते और सब सुनते कान लाने वाली थी। नींद ना आने का कोई गम नहीं था क्योंकि वो तो माँ के साथ ही घर छोड़ जा चुकि थी। माँ का ना होना खटकता तो था पर ज़्यादा चुभन इस बात की थी कि वो अकेले चली गयी। जिम्मेदारियां कमज़ोर शरीर पर एेसी गिरी जैसे पानी से भरे खेत में बारिश, ना मांगा था और ना ज़रूरत थी। पर जीवन हमेशा से खराब ना था, एक वक्त था जब वह दो कमरों के स्कूल में बैठ अपनी दो कोस दूर की काली दुनिया को भूल जाती थी। पर तपती रेत और गणित के सवालों को घर से बड़ी चुनौती बनाते बनाते विद्यालय का अन्तिम दिन आया और गया। मन तो अब भी भटकने को बेचैन था पर सबसे करीबी महाविद्यालय से करीब तो उसके लिये चान्द था, कम से कम दिखाई तो देता था। अब दिन उन मिट्टी की दीवारों को निहारते गुज़र जाते थे और चुनौती के नाम पर था उस औरत का शरीर जो रात के निशानों को गर्व से दिखता छोड़ देती थी, वो इन निशानो को छिपा क्यों नही सकती थी ? इससे भी ज़्यादा अच्छा होता अगर वो रात को थोड़ा कम चिल्लाती, इन दो बातों से ज़्यादा उसने माँ से कभी कुछ नहीं चाहा पर ये दोनों ही उसे कभी नहीं मिली। उसे माँ के ये निशान बहुत चुभते थे पर शायद और किसी को नहीं, तभी तो माँ के जाने के बाद पहली बार जब उसकी चर्चा हुई तब उनमें ये कहीं थे ही नहीं , था तो बस एक आदमी जो न जाने किसकी कल्पना थी। अब गांव में नजरे इस बच्ची को एक अलग तरह से देखती थी, पता नहीं क्या था बस अलग था, तो जो थोड़ा बहुत बाहार जाना था वो भी बन्द हो गया। ऐसी ही एक उदास दिन कि उदास दोपहर को वो फिर से आया, इस बार कई महीनो बाद।वैसे तो उसका काम कपड़े बेचने का था पर आखिरी बार कब कपड़े बेचे थे ये शयद उसे भी याद ना हो। वो बाते बहुत अच्छी करता था तभी तो उसके आने के बाद माँ की खुशी ही अलग होती थी, जो धीरे धीरे ठहाको में बदल जाती थी। कपड़ो की पोटली किनारे रख वो ज़मीन पर बैठा और उसके सामने बेठने का इन्तज़ार करने लगा, वो आकर बैठी तो फिर शुरु हुआ कहानियों का सिलसिला, कहानियां जिनमे पक्के घर थे,पक्की सड़कें थी और हाँ पक्के रिश्ते भी थे। इन्ही पक्की कहानियों मे वो अपनी जिंदगी को धुँधला होते देखने लगी, ताज्जुब तो हुआ कि कपड़े वाले ने माँ के बारे में कुछ नही पूछा पर बातें इतनी अच्छी थी कि वो ज़्यादा देर सोच ही न सकि। जाते जाते उसने पूछा था कि शहर अच्छा लगता है ना, ज़्यादा दूर नहीं है बस घर छोड़ने की देर है। कहकर वो तो चला गया पर पीछे छोड़ गया एक बवंडर, बंवडर सवालों का और सपनों का। सर्द सुबह में जैसे कोहरा हट सड़क का हर चेहरा साफ़ दिखने लगता है वैसा ही कुछ अब उसे अतीत मालूम हो रहा था, जिसे वो साफ़ दिखने की कोशिशों मे जुट गई थी। क्या माँ ने निशान कभी इसलिए नहीं ढके कि वो इस घर से नफ़रत करना सीख सके ? कहीं वो लोगों कि कल्पना वाला आदमी ये पोटली वाला ही तो ना था? ये सवाल और जवाब उसके मन में कई दिन घूमे, अब और कुछ करने को था भी क्या? और फिर हाथ बढ गया पलंग पर बिस्तर के नीचे रखे उस कागज़ की ओर जिसे वो कार्ड कहता था। ना जाने किस उम्मीद से वो ये कार्ड गाँव में बांटता फ़िरता था? शायद समझता था कि शहर आकर ये लोग सीधा उससे कपड़े खरीदने जाएंगे जो ये कभी गाँव में तो बेच ना पाया, थोडी हंसी आई पर बस थोडी ही और फिर हाथ पहुँचा उस बक्से की ओर जिसमें उसने कब से सपने बंद कर रखे थे,तो सपनो को वही रहने दिया और कुछ कपड़े व कार्ड रख लिया। घर में ये रात आखिरि के साथ साथ सबसे लम्बी भी होने वाली थी। वो सारी तैयारियां कर चुकी  थी बस राह देखनी थी तो भोर की। वक्त कब धीरे चला था जो आज चलता, घडी के हिसाब से सुबह हुई हालाँकि नारंगी किरणें घर में अभी घुसी नहीं थी पर उसने उनका इंतजार नही किया और चल पडी। वो व्यक्ति, जो कायदे से उसका पिता था, आज भी उतनी ही गहरी नींद में था जितना हमेशा। रास्ते बीतने लगे तो उसे एहसास हुआ कि शहर सच में दूर ना था।भले ही शहर वाले कम ही गाँव आते थे पर गाँव वालों ने शहर आने के बहुत रास्ते ढूंढ रखे थे। गाँव के लोगों को शहर का नाम पता तो था पर वो उसे केवल ‘शहर’ बुलाते थे और वो इसी शहर आ चुकी थी। दो साल बीत चुके हैं आज उसे यहाँ आये हुए, घर काफ़ी अच्छा है ,बडा, पक्का । अरे! नहीं नहीं ,ये वो पता नहीं था जिसे वो साथ लेकर आई थी,दरअसल जाना तो वहीं था पर वहां पहुंचते ही पता चला कि वहां से पुलिस सबको कहीं ले जा रही थी। बाकियों का तो पता नहीं पर इस बालिका को एक महोदय अपने घर ले आये, अब ये उन्ही के घर में थी, बड़ा, पक्का मकान और खिड़की से देखकर सड़के भी पक्की ही मालूम होती थी, अब बाहर निकलने की तो इज़ाज़त तो थी नही । ये वो तीसरी शर्त थी जो महोदय ने रखी थी और पहली दो, ज़्यादा कुछ नहीं बस यही की वो निशान ढ़क कर रखे और रात को थोड़ा कम चिल्लाए। नाम – विभूति शर्मा विभाग – इतिहास ( 2nd year)
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

उदय शंकर

संपादन सहयोग
हंस में आई  कोई भी रचना ऐसी नहीं होती जो पढ़ी न जाए। प्राप्त रचनाओं को प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ने में उदय शंकर संपादक का   सहयोग करते  हैं । 
हिंदी आलोचक, संपादक और अनुवादक उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हैं। उन्होंने कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है। ‘नई कहानी आलोचना’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

नाज़रीन

डिजिटल मार्केटिंग / सोशल मीडिया विशेषज्ञ
आज के बदलते दौर को देखते हुए , तीन साल पहले हंस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय होने का निर्णय लिया। उसके साथ- साथ हंस अब डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया में भी प्रवेश कर चुका है। जुलाई 2021 में हमारे साथ जुड़ीं नाज़रीन अब इस विभाग का संचालन कर रही हैं। वेबसाइट , फेस बुक, इंस्टाग्राम , ट्विटर जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से ये हंस को लोगों के साथ जोड़े रखती हैं। इन नए माध्यमों द्वारा अधिक से अधिक लोगों को हंस परिवार में शामिल करने का दायित्व इनके ऊपर है।

प्रेमचंद गौतम

शब्द संयोजक
कोरोना महामारी में हमसे जुदा हुए वर्षों से जुड़े हमारे कम्पोज़र सुभाष चंद का रिक्त स्थान जुलाई 2021 में प्रेमचंद गौतम ने संभाला। हंस के सम्मानित लेखकों की सामग्री को पन्नों में सुसज्जित करने का श्रेय अब इन्हें जाता है । मुख्य आवरण ले कर अंत तक पूरी पत्रिका को एक सुचारू रूप देते हैं। इस क्षेत्र में वर्षों के अनुभव और ज्ञान के साथ साथ भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है।

दुर्गा प्रसाद

कार्यालय व्यवस्थापक
पिछले 36 साल से हंस के साथ जुड़े दुर्गा प्रसाद , इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं की कार्यालय में आया कोई भी अतिथि , बिना चाय-पानी के न लौटे। हंस के प्रत्येक कार्यकर्ता की चाय से भोजन तक की व्यवस्था ये बहुत आत्मीयता से निभाते हैं। इसके अतिरिक्त हंस के बंडलों की प्रति माह रेलवे बुकिंग कराना , हंस से संबंधित स्थानीय काम निबाटना दुर्गा जी के जिम्मे आते हैं।

किशन कुमार

कार्यालय व्यवस्थापक / वाहन चालक
राजेन्द्र यादव के व्यक्तिगत सेवक के रूप में , पिछले 25 वर्षों से हंस से जुड़े किशन कुमार आज हंस का सबसे परिचित चेहरा हैं । कार्यालय में रखी एक-एक हंस की प्रति , प्रत्येक पुस्तक , हर वस्तु उनकी पैनी नज़र के सामने रहती है। कार्यालय की दैनिक व्यवस्था के साथ साथ वह हंस के वाहन चालक भी हैं।

हारिस महमूद

वितरण और लेखा प्रबंधक
पिछले 37 साल से हंस के साथ कार्यरत हैं। हंस को देश के कोने -कोने तक पहुँचाने का कार्य कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। विभिन्न राज्यों के प्रत्येक एजेंट , हर विक्रेता का नाम इन्हें कंठस्थ है। समय- समय पर व्यक्तिगत रूप से हर एजेंट से मिलकर हंस की बिक्री का पूरा ब्यौरा रखते हैं. इसके साथ लेखा विभाग भी इनके निरीक्षण में आता है।

वीना उनियाल

सम्पादन संयोजक / सदस्यता प्रभारी
पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.