मुक्ति

मुझे पूर्ण मुक्ति नहीं चाहिए ,मुक्ति संभव भी नहीं पिपीलिका के रूप मेंसंग्राहक होना चाहती हूंशर्करा की होना चाहती हूं मधूकप्रेमी परागकण का या होना चाहती हूं ,मक्षिका या चित्रपतंगया शलभ सा निर्मोही पुष्प होना चाहती हूंएक दिवस कासुरभित और सुवासित या होना चाहती हूंकृष्ण चूड की घनी छांवप्रेमी मिलते हो जहां या होना चाहती हूंपारिजात का फूलरहती है प्रियतमा कीप्रतीक्षा जहां मुक्ति की कल्पना मेंनहीं बनना चाहतीकिसी इमली के वृक्ष काअतृप्त प्रेत मुक्ति की लालसा मेंनहीं होना चाहती जीर्ण शीर्णकिसी खंडहर की भांति

Read more

कविताएँ

(पवन कुमार वैष्णव ) 1.मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता…! मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता हूँ,मुझे देखने से पहलेअपनी अधखुली आँखेकिसी साफ़ पानी से धो डालों! मैंने समय कोबटुए में अंतिम बचे नोटों की तरहनिकाल कर खर्च किया हैमैं जानता हूँसमय को कभी रोका नहीँ जा सकताऔर की गई क्रियाएँपूर्ववत् दोहराई तो जा सकतीलेकिन प्राप्त किये गए फल सुधारे नहीँ जा सकते..! मुझे मालूम है रोटीजब तवे पर जल जाती हैतो उसे कैसे खाया जाता है!जली हुई रोटी को कभी अलग नहीँ रखा,इन्ही जली हुई रोटियों नेमुझे हर समय पेट की आग से बचाया। मैंने कभी किसीपूराने वृक्ष की ओर पत्थर नहीँ बरसाएकिसी शाम शांत झील पर भी कोईकंकर नहीँ उछाले,मैं तपती धुप में इतना जल्दी में रहता हूँ

Read more

कविता

(राजीव कुमार तिवारी ) ## किरायेदार कितना भी मन रम जाए उनका वहां रहते हुए चाहे कलेजा ही क्यूं न फट जाए वहां से निकलते हुए किरायेदारों को मगर/फिर भी छोड़ कर जाना पड़ता है किराए का घर एक न एक दिन बहुत करीने से संवार के रखने के बाद भी किसी भी हद में लगाव जुड़ाव होने के बावजूद घर कभी किरायेदार का अपना नहीं होता किराए का एक ठौर ही रहता है छोड़ कर जाते वक़्त जब पलट कर देखता है किरायेदार घर की तरफ घर का मन भी भाव विहवल हो जाता है पर मकान मालिक की ठस नजर को नहीं दिखता ये सबकुछ वहां तो बस पैसों की लोलुपता बसती है कई कई घरों में रहता

Read more

अत्महत्या : एक सामान्य विश्लेषण

आये दिन अख़बारों में आत्महत्या की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं। इन खबरों में ऐसा कम ही होता है कि किसी व्यक्ति द्वारा की गयी आत्म-हत्या की खबर को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलें। कुछ आत्महत्याओं की ख़बरें समाचार पत्रों की दहलीज पार करने से पूर्व ही दम तोड़ देतीं हैं, तो कुछ समाचार पत्रों का हिस्सा तो बनती हैं, लेकिन, पाठक इसे पढ़कर अफ़सोस जताते हुए आत्म-हत्या करने वाले की ही घोर निंदा करते हैं और अंत में उसे बेवक़ूफ़ ठहराकर अखबार मेज पर पटकते हुए अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। और इसी तरह छपने वाली अनेकों आत्महत्याओं की खबरें अख़बारों मैं ही दम तोड़ देतीं हैं। अख़बारों का दायित्व है समाज में घटित घटनाओं को संज्ञान

Read more

ग़ज़ल

उदासियाँ हैं लबों पे लेकिन ख़ुशी के नग़मे सुना रहा हूँ यही है दस्तूर ज़िन्दगी के, मैं सारी रस्में निभा रहा हूँ न जाने क्यों कल से साँस लेने में हिचकिचाहट सी हो रही है वो कौन सा राज़ है कि जिस को मैं ज़िन्दगी से छुपा रहा हूँ? उसी ज़मीं पर कि जिस पे लाशें मुहब्बतों की पड़ी हुई हैं जला-जला कर परालियाँ फिर जदीद फ़सलें उगा रहा हूँ उजालों में फँस के गुमरही में इधर-उधर जो भटक रहे हैं पता मैं उन जुगनुओं को उँगली से तीरगी का बता रहा हूँ धुआँ उठा था तभी ख़बरदार ख़ैरख़्वाहों ने कर दिया था ये बेख़याली का है नतीजा कि हाथ अपने जला रहा हूँ कहूँ इसे ज़िन्दगी भला क्यों दबाए

Read more

उतरन

एक कुर्ती निकली अलमारी से अपनी कुछ पुरानी-सी कुछ बेरंग-सी थोड़ी फटी थी और थोड़ी गई थी उधड़ अलमारी से निकाल पटक दिया उसे ज़मीं पर इस सोच के साथ कि- मुझ पर नहीं फबेगी अब ये… मेरे घर के पीछे एक छोटी झोपड़ी में रहती है एक लड़की चेचक के दाग़ से भरा हुआ है चेहरा उसका हमउम्र होगी शायद या कुछ छोटी तो मैंने अपनी वो फटी हुई कुर्ती देदी उसे मैं नहीं पहन सकती, पर वो तो पहन सकती है फिर दिन बीतते गए और मैं भूल गई उस कुर्ती को… एक रोज़ मैंने देखा उस लड़की को कितने करीने से संवरे हैं बाल उसके आज आँखों में काजल है, माथे पर बिंदी, झुमके भी पहने हैं,

Read more

कविताएं

(राजीव कुमार तिवारी) जो हूं और जो होना चाहता था कहां होना था मुझकोजहां हूंया जहां होना चाहता था मैंक्या इस प्रश्न का उत्तरकिसी के पास है कोई ?जहां हूंऔर जहां होना चाहता थाके मध्य जो संघर्ष हैक्या जीवनउसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?समय जो चित्र बनाता है हमाराउसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता हैपर प्रकट कभी कोई विशेषरस या रंग ही होता हैक्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?जहां प्रवाह रुक गया नदी जल काजो होना चाहता थावो जो हूंभर रह गयाअपने वर्तमान से अवकाश लेकरसमय की किताब मेंफिर लौटना चाहता हूंउसी अनुच्छेद तकऔर उन तमाम अवरोधों कोहटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूंताकि जो

Read more

बड़ी व छोटी मछलियों का खेल : पाताल लोक 

महाभारत एक ऐसा सीरियल है जो स्वस्थ मनोरंजन के साथ ज्ञान की एक बेहतरीन ख़ुराक भी सही तरीक़े से मुहैया करवाने का कार्य बख़ूबी करता है। भिन्न-भिन्न मौक़ो पर मुझे महाभारत के संवाद और सीन याद आते है जैसे अभी हाल ही में रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ “पाताललोक” को जब देखा तो मुझे महाभारत के चार प्रमुख पात्र दुर्योधन,कर्ण दुशासन और शकुनि मामा के वह संवाद याद आ गये जब दुर्योधन पांडवो का अज्ञातवास तोड़ने के लिए मत्स राज्य पर हमला करने की योजना बना रहा होता हैं। तब मामा शकुनी उसे राय दे रहें होते हैं और वह अपनी बात कहते ही हैं। तब अंगराज कर्ण मामा शकुनि से कहता हैं कि मामा आप कभी तो सीधे बोल, बोल

Read more

सार्वजनिक स्वास्थ्य और विशेषाधिकार

जुलाई 1992 की एक शाम को हकीम शेख नाम का गरीब खेत मज़दूर कोलकाता से कुछ दूर मथुरापुर रेल्वे स्टेशन के नज़दीक रेल से गिर गया और उसके सिर में चोट लगी। मथुरापुर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर उसे कुछ देर बैठाया गया, लेकिन उसे प्राथमिक उपचार तक नहीं मिला। उसे कोलकाता के एन.आर.एस. मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया जहाँ उसका एक्सरे हुआ और भर्ती करने को कहा गया। लेकिन अस्पताल ने बिस्तर की अनुपलब्धता बताते हुए उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। सारी रात और अगले दिन दोपहर तक वह शहर के पाँच बड़े अस्पतालों में मारा-मारा फिरा। एक अस्पताल की सिफारिश पर उसे निजी क्लिनिक में सी.टी. स्कैन कराना पड़ा। स्कैन की रिपोर्ट में उसकी खोपड़ी में

Read more

कविताएं

आत्महत्या हाँ जीवन कभी कभीबहुत कठिन हो जाता हैरास्ता कोई नहीं सूझताहताशा, उदासी और कुंठा कीपकड़ से छूटने कामन के घुप्प अंधेरे जंगल सेबाहर निकलने कादर्द और दुख के दलदल मेंडूबती जाती हैपल पल जिजीविषाकोई नहीं होता इतने पासजिससे कहकर मन की बातसंघनित पीड़ा कोवाष्पित किया जा सकेजिसके कांधे पे रख के सरस्वयं को भुला जा सके पूरी तरहदूर बहुत दूर तकदृष्टि में नहीं होताउत्साह उमंग और आनंद का फैलाव जबउस काल खंड में भीस्वीकारना चाहिए जीवन कोउसकी संपूर्णता मेंउसके चूभते कोणों को सहते हुएजीवन सिर्फ अपने लिए नहींदूसरों के लिए भी हैबल्कि दूसरों के लिए ही ज्यादा हैबहुत बार हमनाव के सवार होते हैंमल्लाह के भरोसेसागर पार हो जाते हैंपर कई बार हमेंमल्लाह भी होना होता हैदूसरों को पार

Read more