धरातल से ऊपर कैसे हुआ जाता है

प्रिय कवि प्रखर
बतलाएँ
कि वक़्त के विपरीत
प्रकृति से विकृत
भविष्य मे जाकर अतीत की कविता
कैसे लिखी जाती है

सुबह की कविता सुलगती दोपहरी में
रात्रि  का विरह निर्मल भोर मे
चीख़ों-कराहों के बीच
रोष मे नारों के शोर मे
इस अराजकता के दौर में  भी
सुकून की कविता

कैसे लिखी जाती है


दिन उजाले मे होते हो रेप
और रात के अंधेरे मे शवदाह
वैमनस्य फैला हो
मन-मस्तिष्क मैला हो
देह से दिलों तक भरी हो सिहरन
एसे वक़्त मे प्रेम की कविता कैसे लिखी जा सकती है

बलात्कार के दृश्यों से उभरकर
औपचारिकता के लिए कुछ पल सिहरकर
चुभते नाखूनों
चोक होते नधूनों को बिसरकर
लज्जा के सदमों से उभरकर
वत्सल की कविता कैसे लिखी जा सकती है

छाती मे उठता है जो उबाल
वो जो एक कंपकंपी सी छूटती है
मन  के भावों  हृदय के घावों के बावजूद
मौन कैसे रहा जा सकता है
आँख फेरना एक बात है
आँख कैसे मूँदी जा सकती है नींद कैसे आती है

अनभिज्ञता अगर वरदान  है
होशोंहवास है उन्माद अगर
प्रत्यक्ष को परोक्ष बनाकर
अज्ञातता का सूत्र साधकर
धमनियों  शिराओं  की गिरह बांध कर
प्रिय कवियों बतलाओ सहज कैसे रहा जाता है

कवि का किरदार सिर्फ़ लिखना है
या दिखना भी है
निर्बल के पक्ष में अन्याय के विरोध में
कविता क्या महज मर्म है
या काल का दस्तावेज भी है
और अगर नही है तो इससे  अलग कैसे हुआ  जाता है

प्रिय कवियों
ईमान की  कहना 
थाली मे हो परोसी मिर्ची को
इमरती कैसे लिखा जाता है
सतह पर उगी भांग से कपास कैसे लूआ जाता है
धरातल से ऊपर कैसे हुआ जाता है
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