चरित्र

बेहद अव्वल दर्जे का बेवकूफ। कोई एक चीज़ अगर उससे लाने को बोलें तो उसमें कई घण्टे लगा दे। कभी-कभी तो मुझे लगता था कि वह किसी नशीले पदार्थ का सेवन करता है। लेकिन जब भी मैं उससे यह पूछता वह कहता “साहब मैं कुछ लेना तो छोड़िये इन चीजों को हाथ तक नहीं लगाता”।
मुझे पता था कि वह झूठ बोल रहा है। क्योंकि कई दफ़ा मैंने उसे बीड़ी पीते हुए पकड़ा था। उसमें औसत से भी कम दर्जे का दिमाग़ था। उसके लिये यह बात पुख़्ता थी कि जब ऊपरवाला दिमाग़ बाँट रहा था तब वह शायद सो रहा होगा।
शरीर से मैं उसे स्वस्थ्य तो नहीं कह सकता। लेकिन उसे कोई बीमारी हो ऐसा भी नहीं लगाता था। पचास की उम्र में ही उसके कुछ दांत झड़ चुके थे। वह दो बच्चों का बाप था और ग़ुस्से में शायद ही मैंनें उसे कभी देखा हो। वह हमेशा डाँट खाने पर हँसा करता था। मुझे कई बार हैरानी होती थी कि वह अपनी ग़लतियों पर जरा भी ध्यान क्यों नहीं देता है।
उसका स्वभाव एकदम शान्त था। उसके इस तरह से शान्त रहने पर मुझे कभी-कभी उससे ईर्ष्या भी होती थी। कभी-कभी परेशान होने पर वह बड़बड़ाने लगता जैसे मुझे गालियाँ दे रहा हो। परन्तु वह इतना डरपोक था कि ऐसा कभी नहीं कर सकता था।
मैंने कई बार उसे पैसे देकर बाज़ार भेजा। वह हिसाब का बहुता पक्का था इसलिये उसने कभी हिसाब में गड़बड़ी नहीं की। जहां दूसरे लोग एक-एक, दो-दो रूपये लौटाना अपनी शान के खिलाफ समझते थे। वह एक-एक पाई लौटाकर कहता “माई-बाप हिसाप तो हिसाप हैं चाहे एक रुपए का हो या हज़ार का”। मैंने देखा कि उसने कभी मेरे पैसों से अपने लिये कोई चीज नहीं ख़रीदी। मेरे ज़ोर देने पर भी नहीं।
उसमें शालीनता तो न थी। परन्तु उसका स्वभाव शान्त था। उसमें दो पैसे की भी अक़्ल नहीं थी पर वह अव्वल दर्जे का ईमानदार था। उसने अपनी ग़लतियाँ सुधारने की कभी कोशिश नहीं की। परन्तु मुझे पलट कर कभी अपनी सफ़ाई भी नहीं दी। ऐसा चरित्र मैंनें अपने जीवन पहले कभी नहीं देखा।

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