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कोरोना का भय

✍️कृष्ण प्रसाद उपाध्याय
सरकार द्वारा बलात् नियुक्त कोरोनाकाल की अनेक जान जोखिम में डाल कर दी ड्यूटियों…… जैसे पका राशन बांटना, सूखा राशन बांटना, खाद्य सामग्रियों व सौंदर्य प्रसाधन युक्त किट बांटना और अंततोगत्वा कोरोना संक्रमित लोगों के घरों की निशानदेही कर, ऑक्सो मीटर आदि उपकरण देना, अपर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के साथ उन्हीं सामग्रियों का पुनः संक्रमण मुक्त हो रहे लोगों के घरों से संकलन करना, संक्रमण के लक्षण वालों का प्रेगनेंसी टेस्ट किट जैसे किट द्वारा परीक्षण में, प्रयोगशाला सहायक का भी सहायक के रूप में प्रतिभागिता करना तथा लगायत संक्रमणग्रस्त जनों व घरों के, आस पड़ोस के पचास घरों का सर्वे करना आदि शासन द्वारा शिक्षकोचित समझे जाने वाले अनेक कार्यों के सफल व सौभाग्य से सकुशल निर्वहन करने के बाद, बिना कोई श्रेय व सुविधा लिए जब रामखिलावन त्रिपाठीजी मुक्त हुए, तो खुद को 4 दिन यथासंभव यथाशक्ति सख़्ती के साथ एकांतवासी अर्थात कोरन्टीन भी किया। तत्पश्चात् घर में शनैःशनैः ‘बाल-बाल बचे’ की भावनाजनित खुशियां तैरने लगीं… बच्चा पास आने लगा…. खुद बच्चों के कमरों में प्रवेश भी वे पाने लगे… झगड़े हुए पति-पत्नी की भांति विपरीत दिशा में करवट ले, बीच में तकिए का बांध बांधकर ही सही उसी ए/सी वाले कमरे में सोने भी लगे ही थे… कि एक रोज रात 10:00 बजे के करीब श्रीमती जी ने टीवी देखते हुए उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा ‘देखना, क्या मुझे फीवर है ?’ वे चौके, अंदर से तो उतना नहीं, लेकिन पत्नी के प्रति प्रेम प्रदर्शन का या ‘मैं भी उनकी चिंता करता हूँ’ का यह एक मौका नज़र आया हो, जो भी हो! बिस्तर से उछले और लगभग एक से डेढ़ मिनट में थर्मामीटर ले आए। देखा तो 99 डिग्री था, तापमान। बोले ‘हां, है तो, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं… चिंता करने वाली कोई बात नहीं..।’ लेकिन वह पत्नी ही क्या, जो पति की बात को वैसा ही समझे जैसा वह बोल रहा है। वे अभिधा, व्यंजना, लक्षणा आदि शब्दशक्तियों की परिभाषा भले ही जानें या न जानें लेकिन पति की बात का तात्पर्य व्यंजना और लक्षणा में ही स्वीकारना जरूर जानती हैं। बोलीं ‘क्यों बरगला रहे हो, तुम्हारे दोस्त को कोरोना हुआ था, उसे भी तो इतना ही बुखार रहता था न?’
उसके बाद भी शांति और संयम भाव के साथ त्रिपाठीजी ने उन्हें सकारात्मक स्थिति में रखने के उद्देश्य से जो लंबी जिरह की, उसका निष्कर्ष उतना ही निकला, जितना अगर वे उनके पहले सवाल के बाद ही निरुत्तर हो जाते, तो निकलता…।
रात तो जैसे भी हो कट गई, जब सुबह हुई तो देखा श्रीमती जी भिन्न प्रकोष्ठ में थीं….. पुराने राजा-महाराजाओं का जमाना होता और वे महारानी होतीं, तो निश्चित ही चिंता, टेंशन, परेशानी, रोग या शोक में से किसी एक भवन में होतीं…..! जैसे कभी कैकेयी कोप भवन में थीं। चिंता चिन्ह युक्त शांत चेहरा, अशांत व परेशान मन का प्रतिबिंबन कर रहा था। उनिन्दा, बोझिल सी पलकों वाली कुछ-कुछ सूजी हुई भी… जैसा कि सुबह प्रायः सबकी होती हैं, आंखें…. कुछ ताक रहीं थीं। मुआमले की गंभीरता को भांपते वे हुए, ये उनके करीब गए और जैसे ही उनके करीब बैठने लगे थे कि अर्धांगिनी की सूजी हुई और शून्य को निहारती आंखों ने वक्र भृकुटियों के साथ उन्हें घूरा और सामान्य से कुछ अधिक घर-घर की आवाज में ‘वहां मुड़े में बैठिए, मेरे पास नहीं!’ कहा। उसके बाद भी समझाने या ढांढस बंधाने के लिए जो कुछ रामखिलावन जी ने कहा, निरर्थक ही सिद्ध हुआ। और सामान्यतः हर प्रसंग की भांति हारकर, उनके द्वारा इंगित स्थान पर बैठ गए। वे आगे बोलीं ‘मेरे गले में कोई गांठ अटक गई हो, ऐसा लग रहा है।’ अब परेशान होने की बारी इनकी थी। सरकारी बॉडीगार्ड वाला एप्स टटोला, चार अंकों वाला सर्वाधिक प्रचारित टोल फ्री नंबर मिलाया, आस-पास के सरकारी डिस्पेंसरियों के नं. मिलाए….. लेकिन सुबह के सात-साढ़े सात बजे कौन मिलेगा? इतनी आसानी से जो सुलभ हो, वह सेवा सरकारी ही क्या?…
चाय भी जो, वे बना कर लाए थे, भार्या-भय से भी अधिक कोरोना से भयाक्रांत पति ने पत्नी को तथाकथित अछूतों सा व्यवहार करते हुए अलग-थलग ही दिया। पत्नी की तमाम चिंताओं में आधी से भी बड़ी एकमात्र चिंता थी ‘बच्चा’।
‘बच्चे का क्या होगा?’
‘उसे कौन बनाकर खिलाएगा?’
‘उसे खुद से दूर कैसे रखूंगी?’
वहीं ये अनेक, पत्नीवाली चिंताओं के साथ ही इस ओर भी सोच रहे थे, कि अब मेरा व्यवहार पत्नी के प्रति कैसा हो?
‘ क्या वैसा हो, जैसा कोरोनाग्रस्त लोगों के प्रति उनके पड़ोसियों का पाया था? या जो उन्होंने सर्वे के दौरान घर के लोगों का व्यवहार अनुभव किया?’
मसलन कुछ बानगियाँ
‘देखिए, इनको बोल के जाइए! ये बाहर ना निकलें, उनके घर से कोई न कोई बाहर आ जाता है…’
‘कल पीयूष (संक्रमित) की मम्मी, ऊपर अपनी बालकनी से कितनी देर तक मुझसे बात करतीं रहीं… बिना मास्क डाले और उन्होंने अपने बेटे को कोरोना होने की बात भी नहीं कही…’
आदि अनेक बातें, जिसे लोग उन जैसे धक्का खाते अध्यापकों से, बड़ा अधिकारी, पुलिस वाला या एमसीडी का कर्मचारी समझ कर आवेदन, निवेदन अथवा आदेश के अंदाज में कहते थे। और ये ‘बिल्कुल…! बिल्कुल…!! बिल्कुल गलत है…!!!. कॉल करेंगे…!!! जरूर!! जरूर!!… जैसे समर्थन वाले जुमले अनधिकार-आश्वासन-रूप बांटते हुए आगे बढ़ते थे।
असंख्य, अकथ्य व अलिख्यप्रायः अनेकानेक प्रसंगों में एक प्रसंग अब भी उनके मनोमस्तिष्क में ताजा था…… जिसके बाद रामखिलावन त्रिपाठी उन दोनों बाप-बेटों पर खासे झिड़कने के अंदाज में नाराज हो गए थे।
उस दिन त्रिपाठी जी ने पहले से रोल किए हुए कागज के टुकड़े की सहायता से डोर बेल बजाई… गेट जाली का ही लगा था, अगला खुला था शायद! अंदर से आवाज आई ‘कौन?’
इन्होंने कहा ‘दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरी से आए हैं, डीएम के ऑर्डर से…’
इनके पास जितनी बड़ी से बड़ी ताकत थी, डराने के लिए… झोंक दी थी। शिक्षक, टीचर या मास्टर हूँ कहते, तो कौन पूछता? अंदर से आश्वस्त आवाज़ ने फिर पूछा- ‘काम?’ लेकिन चारपाई की चरमराहट बता रही थी कि कोई इनकी ओर अग्रसर है…. ‘जी कविदास, उम्र 65 वर्ष, कोरोना पॉजिटिव का घर यही है?’ शायद इनके सरकारी ठसक या नियमित और निर्धारित कार्य से भिन्न-कार्यजन्य खीज के कारण, तब भी काम कम और उनकी बेचारगी के लिए पर्याप्त कारण ही बताया था रामखिलावन जी ने… तब तक एक रुमाल का मास्क लगाए, अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने दरवाजा खोला और कहा ‘जी कहिए!’
इन्होंने कहा ‘कविदास जी ठीक हैं?’
उन्होंने कहा ‘ठीक है, कवि नहीं, रविदास है मेरा नाम…’
बिजली से झटका खाए इंसान-से दो कदम पीछे उछल गए थे वे, बोले ‘आप खुद बाहर क्यों आए, आपके घर में कोई और नहीं है?’ शब्द ही उनके संयत थे, भाव या लहजा पर्याप्त डांट से भरा था। एक युवक ने दरवाजे के बीच खड़े इंसान को हाथ से बगल में ठेलते हुए ‘हटना पापा’, कहा और बाहर निकलकर इनके बिल्कुल करीब आने लगा…. ‘हेलो…! हेलो…!! हेलो…!!! ठहरो भाई, कहां चले आ रहे हो?’ जब तक वह कुछ समझता या बोलता… तभी इन्होंने उसे एक सख़्त वाचिक आदेश भी थमा दिया ‘पहले मास्क पहन कर आओ’ शायद वह इनसे कानाफूसी के अंदाज में बात करना चाहता था, ताकि दूसरों की परेशानी में आनंदानुभूति की आदी पड़ोसी कानों की सक्रियता न हो… लेकिन इनकी त्योरियां चढ़ चुकी थीं। उसके बाद जो हुआ बहुत वर्णनीय नहीं है…… लेकिन उस बेटे का जो व्यवहार अपने पिता के प्रति था वह इनमें पर्याप्त रोष व जुगुप्सा के सर्जन का कारण बना….. और आज वे उसी लड़के के स्थान पर खुद को पा रहे थे। जैसे इनकी अपेक्षानुरूप वह युवक नहीं व्यवहार कर पा रहा था, वैसे ही ये भी पत्नी के प्रति अस्पृश्य-सा कठोर व्यवहार में कठिनता का अनुभव कर रहे थे।
लगभग सुबह के 10:00 बजे तक इनकी तमाम उद्वेलित भावनाएं शिथिल हो चुकीं थीं और पत्नी को समझाने में भी प्रायःसफल हो गए थे, शायद! रविवार का दिन था। कहीं कोरोना टेस्टिंग कैंप का पता किया और बच्चे को टीवी व कार्टून के हवाले कर, एक ही बाइक से दंपती गए, दोनों ने चेक करवाया, दो नेगेटिव रेपोर्ट के साथ अनंत पॉजिटिविटी की उर्जा खुद के अंदर महसूस करते हुए, घर आ गए और-फिर नहा-धोकर बच्चे को कसके गले लगाया, दोनों ने…। बच्चा कह रहा था…’अले..!अले..! ये क्या कल लहे हो… कभी बोलते हो पाछ मत आना…. और कभी इन्नी जोल से हग कल देते हो…???
के पी उपाध्याय
©® Krishna Prasad Upadhyay (कृष्ण प्रसाद उपाध्याय) RPVV, BE BLOCK, Hari Nagar, New Delhi-110064, kpupadhyay1975@gmail.com

राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

उदय शंकर

संपादन सहयोग
हंस में आई  कोई भी रचना ऐसी नहीं होती जो पढ़ी न जाए। प्राप्त रचनाओं को प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ने में उदय शंकर संपादक का   सहयोग करते  हैं । 
हिंदी आलोचक, संपादक और अनुवादक उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हैं। उन्होंने कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है। ‘नई कहानी आलोचना’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

नाज़रीन

डिजिटल मार्केटिंग / सोशल मीडिया विशेषज्ञ
आज के बदलते दौर को देखते हुए , तीन साल पहले हंस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय होने का निर्णय लिया। उसके साथ- साथ हंस अब डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया में भी प्रवेश कर चुका है। जुलाई 2021 में हमारे साथ जुड़ीं नाज़रीन अब इस विभाग का संचालन कर रही हैं। वेबसाइट , फेस बुक, इंस्टाग्राम , ट्विटर जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से ये हंस को लोगों के साथ जोड़े रखती हैं। इन नए माध्यमों द्वारा अधिक से अधिक लोगों को हंस परिवार में शामिल करने का दायित्व इनके ऊपर है।

प्रेमचंद गौतम

शब्द संयोजक
कोरोना महामारी में हमसे जुदा हुए वर्षों से जुड़े हमारे कम्पोज़र सुभाष चंद का रिक्त स्थान जुलाई 2021 में प्रेमचंद गौतम ने संभाला। हंस के सम्मानित लेखकों की सामग्री को पन्नों में सुसज्जित करने का श्रेय अब इन्हें जाता है । मुख्य आवरण ले कर अंत तक पूरी पत्रिका को एक सुचारू रूप देते हैं। इस क्षेत्र में वर्षों के अनुभव और ज्ञान के साथ साथ भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है।

दुर्गा प्रसाद

कार्यालय व्यवस्थापक
पिछले 36 साल से हंस के साथ जुड़े दुर्गा प्रसाद , इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं की कार्यालय में आया कोई भी अतिथि , बिना चाय-पानी के न लौटे। हंस के प्रत्येक कार्यकर्ता की चाय से भोजन तक की व्यवस्था ये बहुत आत्मीयता से निभाते हैं। इसके अतिरिक्त हंस के बंडलों की प्रति माह रेलवे बुकिंग कराना , हंस से संबंधित स्थानीय काम निबाटना दुर्गा जी के जिम्मे आते हैं।

किशन कुमार

कार्यालय व्यवस्थापक / वाहन चालक
राजेन्द्र यादव के व्यक्तिगत सेवक के रूप में , पिछले 25 वर्षों से हंस से जुड़े किशन कुमार आज हंस का सबसे परिचित चेहरा हैं । कार्यालय में रखी एक-एक हंस की प्रति , प्रत्येक पुस्तक , हर वस्तु उनकी पैनी नज़र के सामने रहती है। कार्यालय की दैनिक व्यवस्था के साथ साथ वह हंस के वाहन चालक भी हैं।

हारिस महमूद

वितरण और लेखा प्रबंधक
पिछले 37 साल से हंस के साथ कार्यरत हैं। हंस को देश के कोने -कोने तक पहुँचाने का कार्य कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। विभिन्न राज्यों के प्रत्येक एजेंट , हर विक्रेता का नाम इन्हें कंठस्थ है। समय- समय पर व्यक्तिगत रूप से हर एजेंट से मिलकर हंस की बिक्री का पूरा ब्यौरा रखते हैं. इसके साथ लेखा विभाग भी इनके निरीक्षण में आता है।

वीना उनियाल

सम्पादन संयोजक / सदस्यता प्रभारी
पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.