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कविताएं

जो हूं और जो होना चाहता था

कहां होना था मुझको
जहां हूं
या जहां होना चाहता था मैं
क्या इस प्रश्न का उत्तर
किसी के पास है कोई ?
जहां हूं
और जहां होना चाहता था
के मध्य जो संघर्ष है
क्या जीवन
उसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?
समय जो चित्र बनाता है हमारा
उसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता है
पर प्रकट कभी कोई विशेष
रस या रंग ही होता है
क्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?
जहां प्रवाह रुक गया नदी जल का
जो होना चाहता था
वो जो हूं
भर रह गया
अपने वर्तमान से अवकाश लेकर
समय की किताब में
फिर लौटना चाहता हूं
उसी अनुच्छेद तक
और उन तमाम अवरोधों को
हटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूं
ताकि जो हूं को
जो होना चाहता था
में बदल सकूं ।

करोना काल : कुछ प्रश्न

जीवन कब अपनी गति में लौटेगा
हम कब जीवन की पगडंडी पे लौटेंगे
किसी अबूझ पहेली सा ये समय है
पल पल एक रहस्य है
भय है संशय है अनिश्चय है
इन प्रश्नों का हल क्या हम पाएंगे
क्या इन अंधेरों के पार जा हम पाएंगे
सबकुछ अस्त हो जाएगा धीरे धीरे
या फिर प्रात सूरज की लालिमा से
क्षितिज का कोना कोना दमकेगा चमकेगा फिर से
राह आशा की कहीं कोई खुलती हुई दिखती नहीं
प्रयत्नों की गति इससे मगर रुकती नहीं ।

दोहरापन

तुम्हारा कोई अपना
नहीं अटका पड़ा है
किसी दूसरे शहर में
इन कठिन दिनों में
भूख और भय की दोहरी मार सहता
आशंका और अनिश्चय के मध्य झूलता हुआ
सभी अपने तुम्हारे सुरक्षित हैं
अपने अपने घरों में
जीवन का हद संभव आनंद लेते हुए
तभी तुम कह पाते हो
श्रमिकों को घर वापस लाने वाली रेल गाड़ी को
Corona express
महामारी एक्सप्रेस
तुमको नहीं पता
कैसी व्याकुलता और विवशता है
उन लोगों की
जो पांव पैदल ही
हजार दो हजार मील की यात्रा ठान रहे हैं
किसी ट्रक बस टेम्पो में
ठसा ठस भरे हुए
निकल पड़े हैं जो लोग
अपनी पत्नी बच्चे
यहां तक कि बुजुर्गो के साथ भी
अपने गांव घर तक पहुंचने के लिए
नहीं समझी जाती तुमसे
उनके द्वारा भोगी जा रही पीड़ा
तुम जब ये जानोगे
कि उनमें से बहुतों के कच्ची मिट्टी के घर
वर्षों हुए
मौसम की मार सहकर टूट गए हैं
बालिस्त भर जमीन का टुकड़ा भी नहीं
कितनों के पास खेती के लिए
तुम उनके लौटने को
पूरी तरह गैर जरूरी ठहराओगे
तुम्हें उनका लौटना
एक आपराधिक कृत्य जैसा लग रहा है
असह्य हो रहा है
तुम्हारे लिए उनकी वापसी के औचित्य को स्वीकार पाना
चिंता सताने लगी है तुम्हें
कि वापस लौटते ये लाखों लोग
लौटकर आखिर करेंगे क्या
तुम उनके हित की चिंता नहीं कर रहे हो इस तरह भी
तुम आशंकित हो दरअसल
तुम्हारी समझ कहती है
कि इन श्रमिकों के वापस आने से
महामारी का प्रसार बढ़ेगा
अपराध बढ़ेगा
सामाजिक असुरक्षा बढ़ेगी
जिससे आखिरकार
सुख चैन से गुजर रही तुम्हारी जिंदगी में
थोड़ी असुविधा बढ़ेगी
बहुत दोहरापन है तुम्हारी सोच में ।

राजीव कुमार तिवारी
मुख्य गाड़ी लिपिक, जसीडीह
पूर्व रेलवे 
प्रोफेसर कॉलोनी, बिलासी टाउन
देवघर, झारखंड 
9304231509, 9852821415

राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

साद अहमद

ग्राफ़िक डिज़ाइनर / वीडिओ एडिटर
साद अहमद, ‘हंस’ से जून,2021 से जुड़े हैं। ‘हंस’ के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पब्लिश सभी पोस्टर और वीडियो एडिटिंग के साथ-साथ इन पर अक्षर प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकों के कवर डिज़ाइन का भी दायित्व है। 
आप संस्थान सम्बन्धी सभी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार से जुड़े कार्यो की ज़िम्मेदारी सँभालते हैं। साथ ही अपने अनुभव से मार्केटिंग/सोशल मीडिया विभाग में सहयोग करते हैं। 
 
आप इनसे निम्नलिखित ईमेल पर सम्पर्क कर सकते हैं : 
 
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

शोभा अक्षर

सम्पादन सहयोग

शोभा अक्षर, ‘हंस’ से दिसम्बर, 2022 से जुड़ी हैं। पत्रिका के सम्पादन सहयोग के साथ-साथ आप पर संस्थान के सोशल मीडिया कंटेंट का भी दायित्व है। सम्पादकीय विभाग से जुड़ी गतिविधियों का कार्य आप देखती हैं।

आप इनसे निम्नलिखित ईमेल एवं नम्बर पर सम्पर्क कर सकते हैं :

ईमेल : editorhans@gmail.com
फ़ोन न : 011-41050047

प्रेमचंद गौतम

शब्द संयोजक
कोरोना महामारी में हमसे जुदा हुए वर्षों से जुड़े हमारे कम्पोज़र सुभाष चंद का रिक्त स्थान जुलाई 2021 में प्रेमचंद गौतम ने संभाला। हंस के सम्मानित लेखकों की सामग्री को पन्नों में सुसज्जित करने का श्रेय अब इन्हें जाता है । मुख्य आवरण ले कर अंत तक पूरी पत्रिका को एक सुचारू रूप देते हैं। इस क्षेत्र में वर्षों के अनुभव और ज्ञान के साथ साथ भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है।

दुर्गा प्रसाद

कार्यालय व्यवस्थापक
पिछले 36 साल से हंस के साथ जुड़े दुर्गा प्रसाद , इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं की कार्यालय में आया कोई भी अतिथि , बिना चाय-पानी के न लौटे। हंस के प्रत्येक कार्यकर्ता की चाय से भोजन तक की व्यवस्था ये बहुत आत्मीयता से निभाते हैं। इसके अतिरिक्त हंस के बंडलों की प्रति माह रेलवे बुकिंग कराना , हंस से संबंधित स्थानीय काम निबाटना दुर्गा जी के जिम्मे आते हैं।

किशन कुमार

कार्यालय व्यवस्थापक / वाहन चालक
राजेन्द्र यादव के व्यक्तिगत सेवक के रूप में , पिछले 25 वर्षों से हंस से जुड़े किशन कुमार आज हंस का सबसे परिचित चेहरा हैं । कार्यालय में रखी एक-एक हंस की प्रति , प्रत्येक पुस्तक , हर वस्तु उनकी पैनी नज़र के सामने रहती है। कार्यालय की दैनिक व्यवस्था के साथ साथ वह हंस के वाहन चालक भी हैं।

हारिस महमूद

वितरण और लेखा प्रबंधक
पिछले 37 साल से हंस के साथ कार्यरत हैं। हंस को देश के कोने -कोने तक पहुँचाने का कार्य कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। विभिन्न राज्यों के प्रत्येक एजेंट , हर विक्रेता का नाम इन्हें कंठस्थ है। समय- समय पर व्यक्तिगत रूप से हर एजेंट से मिलकर हंस की बिक्री का पूरा ब्यौरा रखते हैं. इसके साथ लेखा विभाग भी इनके निरीक्षण में आता है।

वीना उनियाल

सम्पादन संयोजक / सदस्यता प्रभारी
पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.