कविताएं

1)
बरसाती नदी

बरसात के दिनों को छोड़कर
साल के बांकि दिनों में
यह नदी कम
और परती पराट ज्यादा दिखती है
आषाढ़ के मेघों की उमड़ घुमड़ सुनकर
पाताल की हदों में जा चुकी नदी
वापस लौटने लगती है
धरातल पर
बारिश की बूंदों के साथ
इसमें लौटने लगता है नदीपन
लौटने लगता है जल
लौटने लगता है प्रवाह
लौटने लगता है जीवन
सावन भादो आते आते
नदी लबालब भरकर उपटने लगती है
सरसता और हरियाली
रचने लगती है अपने किनारों पर
और फिर से उसे नदी समझने लगते हैं लोग ।

2)

कहने और करने का फर्क

जिसको उठाना न पड़े
वह कुछ भी बोल सकता है
पहाड़ को धूल
आग को फूल
जिसके सर पे होता है
बोझ का अर्थ वही समझता है
चलने वाले को रास्ते का ऊंच नीच देखना होता है
चलने की बात करनेवाले को नहीं
दायित्व इंसान को
वाचाल और फ़ूहड़ होने से बचाता है
जिसको गिरने का मर्म पता होता है
वह किसी के गिरने को कथा की तरह नहीं समझ पाता
एक नुकसान की तरह देखता है
एक दुख की तरह अनुभव करता है ।

3)
कवि कर्म

कवि तुम कर सकते हो कुछ, तो
अंधेरों के विरुद्ध छिड़ी लड़ाई में
अपने हिस्से के आलोक का योगदान दो
लोगों के मन – कुण्ड में घुली
नफरतों के विष की सांद्रता
और कड़वाहट को
अपने हृदय के प्रेम के अमृत से
पतला और मीठा करो
जीवन संघर्ष से हारकर
मन मारकर बैठी चेतनाओं में
अपने शब्दों के जादू से
फिर से जीवेष्णा भरो
प्रकृति के सौंदर्य का गीत गाने से नहीं होगा
प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने वाले
मानव कुकृत्यों के विरुद्ध उठ रही आवाज़ों और आंदोलनों को
अपने शब्दों से गति और दिशा दो
राजनीति को गन्दा काम कहके
उससे किनारा मत करो
अपने विचारों के झाड़ू से
वहां इकट्ठा कचरे की सफाई करो
कवि तुम्हारा काम शासन की अनुशंसा के गीत गाना नहीं
विपक्ष के स्वर को अपने शब्दों का संबल देना है
पांत में आख़िरी स्थान पे खड़े आदमी के हित की बात करना है
युग चित्र खींचना नहीं
तुम्हारा काम युग प्रवर्तक होना है
कवि तुम शासन और शासक से बहुत बड़े हो
तुम्हारे पास सृजन की शक्ति है
अपने मस्तक को हमेशा ऊंचा
और सीने को तना रखो ।

4)
आताताई

उसके होठों पर
बहेलिए की मुस्कान
आंखों में रक्त पिपासा
चित्त में ठहराव
और हृदय में नफ़रत और घृणा का
उबलता कुण्ड है
कच्ची पक्की दाढ़ियां में
उसका गोल चेहरा
गंजे सिर के साथ
पहली नजर में ही
भीतर तक शातिर दिखता है
उसकी आवाज़ में
हृदय की कोमलता को
चीरने वाली धार है
किसी की तरफ
उंगली उठाकर
जब वह आक्रोश में
कुछ बोलता है
तो दुनियां की सबसे क्रूर
और वीभत्स छवि उभरती है
बहुत से डरे सहमे घबराए लोग
उसमें और एक आदमखोर में
स्पष्ट फर्क नहीं कर पाते फिर
मछली की आंख के सिवा
उसे कुछ नहीं दिखता
इस हद तक स्थिरचित्त है वह
अपने लक्ष्य के प्रति
इसी बात के
कायल हैं उसके प्रशंसक
और यही भीतर तक
कंपा देती है उसके
संभावित शिकारों को ।

राजीव कुमार तिवारी
9304231509, 9852821415
rajeevtiwary6377@gmail.com

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