कविताएँ

1.कविता विश्वकर्मा है…!

कवि नहीँ बनता पहले
पहले बनती है कविता!

कविता के पकने पर
कवि का होता है जन्म।

कविता एक फल है
कवि उसकी मिठास है।

प्रकृति की हर कमी को
कविता अंततः भर देती है,
जहाँ-जहाँ भी किसी कवि की जरूरत होगी
कविता स्वतः वहाँ-वहाँ किसी कवि को जन्म दे देगी

प्रकृति और जीवन के मध्य जो खालीपन है
उसे कविता पाट देती है
कविता मन-महलोँ की विश्वकर्मा है।
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2.पिता से बात……!

पिता से बात करते हुए ऐसा लगता है
जैसे आसमान से बात करना।

आसमान जानता है संसार की सारी बातें
इसलिए पिता से बात करते हुए
मैं सारे संसार से मिल लेता हूँ।

संसार घूमने से अच्छा है
पिता के साथ घूम लेना।

पिता के साथ घूमते हुए
आसमान को नापते देर नहीँ लगती।

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3.नई कविता ऐसे पढ़े…!

आइये, बिना कवि के नाम और तस्वीर के
कोई कविता पढ़े,
कविता को कविता की नजर से देखे
नाम और तस्वीर में छीपी पूर्वाग्रह की “तानसेनी” गन्ध से मुक्त हो कर
आँखे कुएँ के पानी से धोए,
कुआँ जो मेहनत से खोदा गया
धरती को पसीने के मोती से सींचकर बनाया गया।

ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि
हम एक मौलिक और सरस कविता चाहते हैं
तो आइये पहले मन को मौलिक बनाएं
इच्छाओं को सरस बनाएं।

हर नई कविता के स्वागत में कैसी शर्म?
अगर वो इसके लायक है तो थोड़ा सा समय निकाल कर पढ़ लो
इससे सूरज के रथ के पहिए थम नहीँ जाएँगे
ऐसा करने से हमारे प्रिय कवि की कविताएँ
आत्महत्या नहीँ करेगी!

वरिष्ठ कवि जिनकी नाक के दोनों और की आँखे भी वरिष्ठ हो चुकी है,
मैं उनसे निवेदन करता हूँ कि
नई कविताओँ को भी अपनी आँखों का सुख दे,
नई कलम को देख कर उसकी नोंक को न घूरे
उसकी स्याही को मिलावटी न कहे
उस स्याही से बने अक्षरों के अर्थों को अपनी अँजुरी में भरकर
उस दिशा में उछाल दे जहाँ से हवा सरपट दौड़कर
चाँद की पगड़ी को छू आती है।

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4.दिल्ली में…..!

दिल्ली में जो लिखा जाएगा
वही पढ़ने के हिसाब से स्तरीय होगा
ऐसी घोषणा किसी दिन की होगी
ब्रह्मा ने अपने आसन से!

दिल्ली में जो रहेगा
वही कहने के हिसाब से कवि होगा
यह घोषणा भी उसी दिन
ब्रह्मा ने की होगी!

आलोचक होने के लिए
बनारस की सीढ़ियों पर बैठना जरूरी है
सारे सच्चे आलोचक गंगा में डुबकियां लगा कर
पहुँचे हैं अंततः दिल्ली!

इधर जो लिख रहे हैं कविताएँ
अलग-अलग शहरों में बैठकर
दरअसल वो ब्रह्मा के बनाएं विधान को तोड़ रहे हैं
दिल्ली से ही कविताएँ फूटती है
और बनारस में जाकर पूरे देश में फ़ैल जाती है

सुना है
आजकल सारे कवियोँ ने अपने शहर का नाम
दिल्ली कर लिया है
और
ब्रह्मा के चतुर्मुख पर एक अज़ीब सी शान्ति है।

रचयिता-पवन कुमार वैष्णव
पता-ओल्ड आर.टी.ओ.,प्रताप नगर,
उदयपुर,राजस्थान
7568950638

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