कविताएँ

1.पिता से बात……!

पिता से बात करते हुए ऐसा लगता है
जैसे आसमान से बात करना।

आसमान जानता है संसार की सारी बातें
इसलिए पिता से बात करते हुए
मैं सारे संसार से मिल लेता हूँ।

संसार घूमने से अच्छा है
पिता के साथ घूम लेना।

पिता के साथ घूमते हुए
आसमान को नापते देर नहीँ लगती।

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2. पिता से दूर रहकर….!

पिता के दुखते हुए हाथ,
सुख का सृजन करते हैं
अन्तस् में दबी हुई वेदनाओं के बीच में से
खिंच लाते हैं मुस्कुराहट
अपने गहन होंठो पर
सिर्फ मेरे लिए!

पिता कहते हैं
“मेरी सुख की दुनिया सिर्फ तू ही है
बाकी बची दुनिया ग्लोब जैसी है गोल-गोल”
पिता कहते हैं,”इस ग्लोब जैसी दुनिया को
मैंंने कभी समझना नहीँ चाहा!”

बस एक मुझे ही समझने में उन्हें सरलता रही है
और पिता इस सरलता को जीना चाहते हैं उम्र भर।

पिता अकेले ढलान से उतरते हुए भी थक जाते है
पर पिता कहते हैं “मैं कभी नहीँ थकता हूँ
जब मैं तुम्हे अपने कन्धे पर लेकर किसी पहाड़ पर चढ़ता हूूँ।”
और
पिता पहाड़ पर ऐसे चढ़ते थे
जैसे मेरे लिए सूरज को पकड़ना चाह रहे थे।

पिता कहते हैं
“मेरी आँखों में कोई स्वप्न नहीँ रहा अब शेष
हाँ,अब मेरी नींद में तुम जरूर होते हो।”

जब कभी मैं बहुत उदास होकर अपनी साँस छोड़ता हूँ
पता नहीँ क्यों पिता गहरी नींद से उठ जाते हैं
मेरी तस्वीर को हाथ में लेकर उसे साफ़ करने लगते हैं
जबकि अब मैं पिता से बहुत दूर हूँ।

पवन कुमार वैष्णव
पता-ओल्ड आर.टी.ओ.रोड.
प्रताप नगर,उदयपुर(राजस्थान)
7568950638
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