कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचना

आलेख

रंजीत कुमार यादव
शोधार्थी –
दिल्ली विश्वविद्यालय
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कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचना
मध्यकालीन दौर के होते हुए भी कबीर अपने आधुनिक विचारों के कारण आज भी स्मरणीय हैं । अपनी साखियों एवं पदों में अपनी क्रांतिधर्मिता के कारण कबीर उस समय भी उतने ही प्रासंगिक थे जितने कि आज हैं या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि कबीर आज के बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में जहाँ हर चीज अर्थ केंद्रित हो गयी है वहां उनकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, आज स्थितियां और भी गंभीर हो गयी हैं । भक्तिकाल के उस समाज में सामाजिक कुरीतियाँ, पाखण्ड, धार्मिक अन्धविश्वास और जातिगत भेदभाव फैला हुआ था । कबीर ने इन सब का विरोध किया और बिना किसी डर के अपनी बात कही । जो आधुनिकता हम उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देखते हैं वह कबीर के यहाँ हमें बहुत पहले दिखाई पड़ती है । ‘गुरुदेव कौ अंग’ में भी कबीर जिन विचारों को लेकर सामने आते हैं वह एक आदर्श स्थिति है ।
कबीर का मत सतगुरु की तलाश में रहा है, वे इस जगत में गुरु को राह दिखाने वाला मानते हैं । उनके लिए गुरु सत्य की ज्योति है जो अंधकार से प्रकाश की ओर लाने में और पुरातन को नवीन बनाने में एकनिष्ठता रखता है । कबीर एक जगह कहते हैं कि
“तोरा मोरा मनवा कैसे एक होय रे ।
तूँ कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखन की देखी ।।”
अर्थात प्रत्यक्ष ज्ञान की जो महत्ता है वह शास्त्र पढ़ लेने से नहीं हो सकती है इसी को कबीर ने ‘आँखन देखी” कहा है, वर्तमान समाज में यही पक्ष गुरु-शिष्य परम्परा में होना चाहिए केवल किताबी ज्ञान की अपेक्षा हमें समाज के लौकिक ज्ञान की ओर देखना चाहिए जो व्यावहारिक हो ।
कबीर निरक्षर थे लेकिन उनके सांसारिक ज्ञान में विराटता थी । वे गुरु-महिमा और उसके प्रति अगाध श्रद्धा का भाव दिखाते हुए ही यह भी कहते हैं कि
“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार ।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार ।।”
जबकि आज की शिक्षा-व्यवस्था में कहीं न कहीं शिष्य के लिए गुरु-महिमा का वही अर्थ नहीं रह गया है । लोग लोभ लालच के भाव से ही आज अपने सम्बन्धों को निभा रहे हैं । कहना न होगा कि कबीर जिस गुरु की बात करते हैं वह ‘आध्यात्मिक गुरु’ हैं साथ ही, इन सब के मध्य वे ऐसे सूत्र देते हैं जिसमें शिक्षण प्रक्रिया के तत्व को ढूंढ लेना मुश्किल नहीं है ।
“गुरु कुम्हार शीष कुंभ है, गढ़ गढ़ काढै खोट ।
भीतर हाथ सहारि दे , बाहर बाहै चोट ।।”
यानी तात्पर्य यह है कि सच्चा गुरु शिष्य को एक घड़े की तरह तराशता है । जिस प्रकार एक कुम्हार घड़े बनाते समय कच्ची मिट्टी को बड़ी ही चतुराई से तराशता है वैसे ही एक गुरु शिष्य के मन मस्तिष्क को तराशता है । उसे अपने विचारों से मनुष्यता का पाठ पढाता है ताकि वह सच्चे अर्थ में मनुष्य बन सके । शिष्य उस कच्ची मिट्टी की भांति ही होता है जिसे गुरु तराशता है ।
कबीर शास्त्र जनित ज्ञान का विरोध करते हैं । आज के समय में देखा जाय तो जिस शास्त्र जनित ज्ञान की बात की जा रही है, कबीर किसी भी दृष्टि से उस विचारधारा के पैरोकार नजर नहीं आते । कबीर शास्त्र से ज्यादा जीवनानुभव से सीखने पर बल देते हैं । आज शिक्षा व्यवस्था का बाजारीकरण हो गया है । गुरु की जगह शिक्षक ने और शिष्य की जगह छात्र ने ले लिया है । बदलते परिवेश में जिस तरह से लोग सिमटते जा रहें है उसी तरह गुरु, शिष्य जैसे शब्दों का भी अर्थ संकोच हो गया है । शिक्षा के व्यवसायीकरण ने शिक्षा को अप्राप्य बना दिया है ऐसे में एक बहुत बड़ा तबका शिक्षा से वंचित रह जाता है जिसके उन्मूलन के लिये सरकार को शिक्षा को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखना पड़ता है फिर भी स्थिति चिंतनीय है । आज की व्यवस्था में संबंधों का जो बदलाव आया है उसने गुरु–शिष्य के संबंधों को भी बदल कर रख दिया है । कबीर जिस गुरु की बात करते हैं वैसा गुरु इस दौर में मिलना मुश्किल है साथ ही जिस तरह का समर्पण भाव हम शिष्य में खोजते या चाहते हैं वह भी आज के दौर में मिलना मुश्किल है ।
कबीर का यह दोहा आज के दौर में कितना सटीक जान पड़ता है –
“जाका गुरु भी अंधला, चेला खड़ा निरंध ।
अंधा अंधा ठेलिया, दुन्यूं कूप पडंत ।।”
गुरु का काम है स्वयं आगे चलकर शिष्य का मार्गदर्शन करना । कबीर यहाँ व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि जिसका गुरु स्वयं अज्ञानी है उसका शिष्य तो घोर अज्ञानी होगा ही जब एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाता हुआ चलता है तो दोनों कुँए में गिर पड़ते हैं, अर्थात भवसागर में पड़े रहकर नष्ट हो जाते हैं । आज के सन्दर्भ में इस दोहे पर दृष्टिपात करें तो देख सकते हैं कि शिक्षकों और छात्रों की एक लम्बी फेहरिश्त हमें दिख जाती है जहाँ दोनों चाटुकारिता के शिकार हैं । इस चाटुकारिता के कारण शिक्षक और छात्र दोनों एक-दुसरे को छलते हुए नजर आते हैं । छद्म आस्था लिए छात्र की अवसरवादिता इस दौर में बढती ही जा रही है । ऐसे में कबीर जिस गुरु की बात करते हैं और एक शिष्य में जिस समर्पण भाव की वकालत करते हुए नजर आते है वह आज के परिवेश में विरले ही मिलते हैं ।
“कबीर गुर गरबा मिल्या, रलि गया आटै लूँण ।
जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण ।”
यानी यहाँ पर कबीर कहते हैं कि एक बार गुरु के गले लगाने से शिष्य की जाति-पाति कुल सब मिट जाता है । एक गुरु के लिए वह जाति–पाति, कुल ,गोत्र से ऊपर महज एक शिष्य रह जाता है । एक गुरु के लिए उसके सभी शिष्य एक समान हैं । किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसे गुरु का मिल पाना बहुत मुश्किल है । आज अधिकांश शिक्षक राजनीतिक संबंधों को साधने के चक्कर में दोहरे मापदंड अपनाते हैं जिसका खामियाजा अक्सर छात्रों को चुकाना पड़ता है । आज जाति का प्रश्न इतना हावी हो गया है कि छात्र और शिक्षक के संबंधों का निर्णय जाति-साम्य पर ज्यादा निर्भर करने लगा है ।
कबीर की दृष्टि में गुरु ‘गोविन्द’ से भी बढ़कर है क्योंकि –
‘हरि रुंठे गुरु ठौर है , गुरु रूंठे नहिं ठौर ।’
कबीर गुरु को ही सर्वप्रथम आदर-सम्मान देते हैं और गुरु रूपी प्रकाश से ही मानव जीवन का अंधकार दूर हो सकता है ऐसा मानते हैं । जब वे कहते हैं कि
“सुखिया सब संसार है खाए और सोए ।
दुखिया दास कबीर है गाए और रोए ।।”
तो इससे उनके विचारों में आधुनिक सभ्यता की मनोवृति का बोध होता है जो संसार को समरसता में देखना चाहता है । कबीर का ज्ञान-मार्ग आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था पर गहरी चोट करता है, हमें आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था को गुरु-शिष्य परम्परा के नि:स्वार्थ बंधन से देखना चाहिए ताकि समाज में भेदभाव की संस्कृति को दूर किया जा सके । जैसा कि कबीर कहते भी हैं –
“नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव ।
दुन्यूं बूड़े धार मैं, चढि पाथर की नाव ।।”
कबीर कहते हैं एक सच्चे गुरु और एक सच्चे शिष्य का होना जरूरी है, उनमें निःस्वार्थ भावना होनी चाहिए क्योंकि स्वार्थ रहित गुरु शिष्य का सम्बन्ध ही समाज के लिए बेहतर हो सकता है । आज के समय में हम देखते हैं कि छात्र अपने स्वार्थ हित देख कर एक ऐसे गुरु की तलाश करता है जो उसे ज्यादा लाभ पहुंचा सकता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाना चाहता है जिससे स्वार्थ हित सध सके और व्यावसायिक कारोबार चल सके । इस तरह शिक्षा एक व्यापार का माध्यम बनता जा रहा है और अंत में जो हमें देखने को मिलता है वह यह कि छात्र एक बनावटी चकाचौंध की दुनिया में भटकता रहता है । साथ ही, कबीर शिष्य के स्वभाव पर बात करते हुए कहते हैं कि
“सतगुर मिल्या त का भयाँ, जे मनि पाड़ी भोल ।
पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल ।।”
कबीर दोहे के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि एक सच्चा सतगुरु मिल भी जाए जो आज के समय में हमें राह दिखा सकता है तो भी शिष्य का मन मलिन होतो वह गुरु-ज्ञान का महत्त्व नहीं आँक पाएगा । यदि धूल में पड़कर कपड़ा ही मैला हो गया हो तो उसे रंगने वाली मजीठ लता भी बेचारी क्या कर सकती है ? कबीर अन्यत्र भी ज्ञान-साधना की सफलता के लिए योग्य शिष्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं –
“सतगुरु बहुरा क्या करै, जे सिषही मांहे चूक ।”
कबीर की प्रासंगिकता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि उन्हें हम वर्तमान दौर में भी शिक्षा जैसे विषयों से जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि आज का पूरा शिक्षातंत्र बाजारीकरण जैसे मूल्यों और रोजगार आदि से जुड़ गया है जिस कारण उसमें भक्तिकालीन परम्परा का बोध और गुरु-शिष्य की आदर्श भावना नहीं रह गई है । इन सब बातों के आधार से ही आधुनिक समय में भक्तिकालीन संत कवि कबीरदास का भावबोध झलकता है जिसमें हमें आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था को गुरु-शिष्य परम्परा के निःस्वार्थ बंधन से देखना चाहिए ताकि समाज में भेदभाव की संस्कृति को दूर किया जा सके । आज की आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में जो स्वार्थ भावना और गुरु के प्रति आस्था का प्रश्न व्यावसायिक तौर तरीकों में दीखता है वह सब नहीं होना चाहिए । यहीं से गुरु-शिष्य की परम्परा और शिक्षा-व्यवस्था की नवीन पहल की शुरुआत होती है । हमें इस दौर में कबीर के ‘गुरुदेव कौ अंग’ से आधुनिक दृष्टि में शिक्षा-व्यवस्था को समझने का मौका मिलता है, वर्तमान में इसी से गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी जैसा कि हम उनके दोहों में देखते हैं । कबीर इस रूप में ही गुरु-शिष्य परम्परा की भारतीय जमीन पर खड़े नजर आते हैं ।

संदर्भ ग्रंथ :
कबीर ग्रंथावली, सम्पादक – श्यामसुन्दर दास, वाणी प्रकाशन, संस्करण – 2014
कबीर – हजारी प्रसाद द्विवेदी , वाणी प्रकाशन ,2015
हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचंद्र शुक्ल , वाणी प्रकाशन,2007

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