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कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचना

आलेख

रंजीत कुमार यादव
शोधार्थी –
दिल्ली विश्वविद्यालय
Mobile number -9910829645
Email- jeetyaduvanshi@gmail.com

कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचना
मध्यकालीन दौर के होते हुए भी कबीर अपने आधुनिक विचारों के कारण आज भी स्मरणीय हैं । अपनी साखियों एवं पदों में अपनी क्रांतिधर्मिता के कारण कबीर उस समय भी उतने ही प्रासंगिक थे जितने कि आज हैं या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि कबीर आज के बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में जहाँ हर चीज अर्थ केंद्रित हो गयी है वहां उनकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, आज स्थितियां और भी गंभीर हो गयी हैं । भक्तिकाल के उस समाज में सामाजिक कुरीतियाँ, पाखण्ड, धार्मिक अन्धविश्वास और जातिगत भेदभाव फैला हुआ था । कबीर ने इन सब का विरोध किया और बिना किसी डर के अपनी बात कही । जो आधुनिकता हम उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देखते हैं वह कबीर के यहाँ हमें बहुत पहले दिखाई पड़ती है । ‘गुरुदेव कौ अंग’ में भी कबीर जिन विचारों को लेकर सामने आते हैं वह एक आदर्श स्थिति है ।
कबीर का मत सतगुरु की तलाश में रहा है, वे इस जगत में गुरु को राह दिखाने वाला मानते हैं । उनके लिए गुरु सत्य की ज्योति है जो अंधकार से प्रकाश की ओर लाने में और पुरातन को नवीन बनाने में एकनिष्ठता रखता है । कबीर एक जगह कहते हैं कि
“तोरा मोरा मनवा कैसे एक होय रे ।
तूँ कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखन की देखी ।।”
अर्थात प्रत्यक्ष ज्ञान की जो महत्ता है वह शास्त्र पढ़ लेने से नहीं हो सकती है इसी को कबीर ने ‘आँखन देखी” कहा है, वर्तमान समाज में यही पक्ष गुरु-शिष्य परम्परा में होना चाहिए केवल किताबी ज्ञान की अपेक्षा हमें समाज के लौकिक ज्ञान की ओर देखना चाहिए जो व्यावहारिक हो ।
कबीर निरक्षर थे लेकिन उनके सांसारिक ज्ञान में विराटता थी । वे गुरु-महिमा और उसके प्रति अगाध श्रद्धा का भाव दिखाते हुए ही यह भी कहते हैं कि
“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार ।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार ।।”
जबकि आज की शिक्षा-व्यवस्था में कहीं न कहीं शिष्य के लिए गुरु-महिमा का वही अर्थ नहीं रह गया है । लोग लोभ लालच के भाव से ही आज अपने सम्बन्धों को निभा रहे हैं । कहना न होगा कि कबीर जिस गुरु की बात करते हैं वह ‘आध्यात्मिक गुरु’ हैं साथ ही, इन सब के मध्य वे ऐसे सूत्र देते हैं जिसमें शिक्षण प्रक्रिया के तत्व को ढूंढ लेना मुश्किल नहीं है ।
“गुरु कुम्हार शीष कुंभ है, गढ़ गढ़ काढै खोट ।
भीतर हाथ सहारि दे , बाहर बाहै चोट ।।”
यानी तात्पर्य यह है कि सच्चा गुरु शिष्य को एक घड़े की तरह तराशता है । जिस प्रकार एक कुम्हार घड़े बनाते समय कच्ची मिट्टी को बड़ी ही चतुराई से तराशता है वैसे ही एक गुरु शिष्य के मन मस्तिष्क को तराशता है । उसे अपने विचारों से मनुष्यता का पाठ पढाता है ताकि वह सच्चे अर्थ में मनुष्य बन सके । शिष्य उस कच्ची मिट्टी की भांति ही होता है जिसे गुरु तराशता है ।
कबीर शास्त्र जनित ज्ञान का विरोध करते हैं । आज के समय में देखा जाय तो जिस शास्त्र जनित ज्ञान की बात की जा रही है, कबीर किसी भी दृष्टि से उस विचारधारा के पैरोकार नजर नहीं आते । कबीर शास्त्र से ज्यादा जीवनानुभव से सीखने पर बल देते हैं । आज शिक्षा व्यवस्था का बाजारीकरण हो गया है । गुरु की जगह शिक्षक ने और शिष्य की जगह छात्र ने ले लिया है । बदलते परिवेश में जिस तरह से लोग सिमटते जा रहें है उसी तरह गुरु, शिष्य जैसे शब्दों का भी अर्थ संकोच हो गया है । शिक्षा के व्यवसायीकरण ने शिक्षा को अप्राप्य बना दिया है ऐसे में एक बहुत बड़ा तबका शिक्षा से वंचित रह जाता है जिसके उन्मूलन के लिये सरकार को शिक्षा को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखना पड़ता है फिर भी स्थिति चिंतनीय है । आज की व्यवस्था में संबंधों का जो बदलाव आया है उसने गुरु–शिष्य के संबंधों को भी बदल कर रख दिया है । कबीर जिस गुरु की बात करते हैं वैसा गुरु इस दौर में मिलना मुश्किल है साथ ही जिस तरह का समर्पण भाव हम शिष्य में खोजते या चाहते हैं वह भी आज के दौर में मिलना मुश्किल है ।
कबीर का यह दोहा आज के दौर में कितना सटीक जान पड़ता है –
“जाका गुरु भी अंधला, चेला खड़ा निरंध ।
अंधा अंधा ठेलिया, दुन्यूं कूप पडंत ।।”
गुरु का काम है स्वयं आगे चलकर शिष्य का मार्गदर्शन करना । कबीर यहाँ व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि जिसका गुरु स्वयं अज्ञानी है उसका शिष्य तो घोर अज्ञानी होगा ही जब एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाता हुआ चलता है तो दोनों कुँए में गिर पड़ते हैं, अर्थात भवसागर में पड़े रहकर नष्ट हो जाते हैं । आज के सन्दर्भ में इस दोहे पर दृष्टिपात करें तो देख सकते हैं कि शिक्षकों और छात्रों की एक लम्बी फेहरिश्त हमें दिख जाती है जहाँ दोनों चाटुकारिता के शिकार हैं । इस चाटुकारिता के कारण शिक्षक और छात्र दोनों एक-दुसरे को छलते हुए नजर आते हैं । छद्म आस्था लिए छात्र की अवसरवादिता इस दौर में बढती ही जा रही है । ऐसे में कबीर जिस गुरु की बात करते हैं और एक शिष्य में जिस समर्पण भाव की वकालत करते हुए नजर आते है वह आज के परिवेश में विरले ही मिलते हैं ।
“कबीर गुर गरबा मिल्या, रलि गया आटै लूँण ।
जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण ।”
यानी यहाँ पर कबीर कहते हैं कि एक बार गुरु के गले लगाने से शिष्य की जाति-पाति कुल सब मिट जाता है । एक गुरु के लिए वह जाति–पाति, कुल ,गोत्र से ऊपर महज एक शिष्य रह जाता है । एक गुरु के लिए उसके सभी शिष्य एक समान हैं । किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसे गुरु का मिल पाना बहुत मुश्किल है । आज अधिकांश शिक्षक राजनीतिक संबंधों को साधने के चक्कर में दोहरे मापदंड अपनाते हैं जिसका खामियाजा अक्सर छात्रों को चुकाना पड़ता है । आज जाति का प्रश्न इतना हावी हो गया है कि छात्र और शिक्षक के संबंधों का निर्णय जाति-साम्य पर ज्यादा निर्भर करने लगा है ।
कबीर की दृष्टि में गुरु ‘गोविन्द’ से भी बढ़कर है क्योंकि –
‘हरि रुंठे गुरु ठौर है , गुरु रूंठे नहिं ठौर ।’
कबीर गुरु को ही सर्वप्रथम आदर-सम्मान देते हैं और गुरु रूपी प्रकाश से ही मानव जीवन का अंधकार दूर हो सकता है ऐसा मानते हैं । जब वे कहते हैं कि
“सुखिया सब संसार है खाए और सोए ।
दुखिया दास कबीर है गाए और रोए ।।”
तो इससे उनके विचारों में आधुनिक सभ्यता की मनोवृति का बोध होता है जो संसार को समरसता में देखना चाहता है । कबीर का ज्ञान-मार्ग आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था पर गहरी चोट करता है, हमें आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था को गुरु-शिष्य परम्परा के नि:स्वार्थ बंधन से देखना चाहिए ताकि समाज में भेदभाव की संस्कृति को दूर किया जा सके । जैसा कि कबीर कहते भी हैं –
“नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव ।
दुन्यूं बूड़े धार मैं, चढि पाथर की नाव ।।”
कबीर कहते हैं एक सच्चे गुरु और एक सच्चे शिष्य का होना जरूरी है, उनमें निःस्वार्थ भावना होनी चाहिए क्योंकि स्वार्थ रहित गुरु शिष्य का सम्बन्ध ही समाज के लिए बेहतर हो सकता है । आज के समय में हम देखते हैं कि छात्र अपने स्वार्थ हित देख कर एक ऐसे गुरु की तलाश करता है जो उसे ज्यादा लाभ पहुंचा सकता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाना चाहता है जिससे स्वार्थ हित सध सके और व्यावसायिक कारोबार चल सके । इस तरह शिक्षा एक व्यापार का माध्यम बनता जा रहा है और अंत में जो हमें देखने को मिलता है वह यह कि छात्र एक बनावटी चकाचौंध की दुनिया में भटकता रहता है । साथ ही, कबीर शिष्य के स्वभाव पर बात करते हुए कहते हैं कि
“सतगुर मिल्या त का भयाँ, जे मनि पाड़ी भोल ।
पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल ।।”
कबीर दोहे के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि एक सच्चा सतगुरु मिल भी जाए जो आज के समय में हमें राह दिखा सकता है तो भी शिष्य का मन मलिन होतो वह गुरु-ज्ञान का महत्त्व नहीं आँक पाएगा । यदि धूल में पड़कर कपड़ा ही मैला हो गया हो तो उसे रंगने वाली मजीठ लता भी बेचारी क्या कर सकती है ? कबीर अन्यत्र भी ज्ञान-साधना की सफलता के लिए योग्य शिष्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं –
“सतगुरु बहुरा क्या करै, जे सिषही मांहे चूक ।”
कबीर की प्रासंगिकता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि उन्हें हम वर्तमान दौर में भी शिक्षा जैसे विषयों से जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि आज का पूरा शिक्षातंत्र बाजारीकरण जैसे मूल्यों और रोजगार आदि से जुड़ गया है जिस कारण उसमें भक्तिकालीन परम्परा का बोध और गुरु-शिष्य की आदर्श भावना नहीं रह गई है । इन सब बातों के आधार से ही आधुनिक समय में भक्तिकालीन संत कवि कबीरदास का भावबोध झलकता है जिसमें हमें आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था को गुरु-शिष्य परम्परा के निःस्वार्थ बंधन से देखना चाहिए ताकि समाज में भेदभाव की संस्कृति को दूर किया जा सके । आज की आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में जो स्वार्थ भावना और गुरु के प्रति आस्था का प्रश्न व्यावसायिक तौर तरीकों में दीखता है वह सब नहीं होना चाहिए । यहीं से गुरु-शिष्य की परम्परा और शिक्षा-व्यवस्था की नवीन पहल की शुरुआत होती है । हमें इस दौर में कबीर के ‘गुरुदेव कौ अंग’ से आधुनिक दृष्टि में शिक्षा-व्यवस्था को समझने का मौका मिलता है, वर्तमान में इसी से गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी जैसा कि हम उनके दोहों में देखते हैं । कबीर इस रूप में ही गुरु-शिष्य परम्परा की भारतीय जमीन पर खड़े नजर आते हैं ।

संदर्भ ग्रंथ :
कबीर ग्रंथावली, सम्पादक – श्यामसुन्दर दास, वाणी प्रकाशन, संस्करण – 2014
कबीर – हजारी प्रसाद द्विवेदी , वाणी प्रकाशन ,2015
हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचंद्र शुक्ल , वाणी प्रकाशन,2007

आलेख

रंजीत कुमार यादव
शोधार्थी –
दिल्ली विश्वविद्यालय
Mobile number -9910829645
Email- jeetyaduvanshi@gmail.com

कबीर की ‘गुरुदेव कौ अंग’ के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया की विवेचना
मध्यकालीन दौर के होते हुए भी कबीर अपने आधुनिक विचारों के कारण आज भी स्मरणीय हैं । अपनी साखियों एवं पदों में अपनी क्रांतिधर्मिता के कारण कबीर उस समय भी उतने ही प्रासंगिक थे जितने कि आज हैं या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि कबीर आज के बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में जहाँ हर चीज अर्थ केंद्रित हो गयी है वहां उनकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, आज स्थितियां और भी गंभीर हो गयी हैं । भक्तिकाल के उस समाज में सामाजिक कुरीतियाँ, पाखण्ड, धार्मिक अन्धविश्वास और जातिगत भेदभाव फैला हुआ था । कबीर ने इन सब का विरोध किया और बिना किसी डर के अपनी बात कही । जो आधुनिकता हम उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देखते हैं वह कबीर के यहाँ हमें बहुत पहले दिखाई पड़ती है । ‘गुरुदेव कौ अंग’ में भी कबीर जिन विचारों को लेकर सामने आते हैं वह एक आदर्श स्थिति है ।
कबीर का मत सतगुरु की तलाश में रहा है, वे इस जगत में गुरु को राह दिखाने वाला मानते हैं । उनके लिए गुरु सत्य की ज्योति है जो अंधकार से प्रकाश की ओर लाने में और पुरातन को नवीन बनाने में एकनिष्ठता रखता है । कबीर एक जगह कहते हैं कि
“तोरा मोरा मनवा कैसे एक होय रे ।
तूँ कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखन की देखी ।।”
अर्थात प्रत्यक्ष ज्ञान की जो महत्ता है वह शास्त्र पढ़ लेने से नहीं हो सकती है इसी को कबीर ने ‘आँखन देखी” कहा है, वर्तमान समाज में यही पक्ष गुरु-शिष्य परम्परा में होना चाहिए केवल किताबी ज्ञान की अपेक्षा हमें समाज के लौकिक ज्ञान की ओर देखना चाहिए जो व्यावहारिक हो ।
कबीर निरक्षर थे लेकिन उनके सांसारिक ज्ञान में विराटता थी । वे गुरु-महिमा और उसके प्रति अगाध श्रद्धा का भाव दिखाते हुए ही यह भी कहते हैं कि
“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार ।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार ।।”
जबकि आज की शिक्षा-व्यवस्था में कहीं न कहीं शिष्य के लिए गुरु-महिमा का वही अर्थ नहीं रह गया है । लोग लोभ लालच के भाव से ही आज अपने सम्बन्धों को निभा रहे हैं । कहना न होगा कि कबीर जिस गुरु की बात करते हैं वह ‘आध्यात्मिक गुरु’ हैं साथ ही, इन सब के मध्य वे ऐसे सूत्र देते हैं जिसमें शिक्षण प्रक्रिया के तत्व को ढूंढ लेना मुश्किल नहीं है ।
“गुरु कुम्हार शीष कुंभ है, गढ़ गढ़ काढै खोट ।
भीतर हाथ सहारि दे , बाहर बाहै चोट ।।”
यानी तात्पर्य यह है कि सच्चा गुरु शिष्य को एक घड़े की तरह तराशता है । जिस प्रकार एक कुम्हार घड़े बनाते समय कच्ची मिट्टी को बड़ी ही चतुराई से तराशता है वैसे ही एक गुरु शिष्य के मन मस्तिष्क को तराशता है । उसे अपने विचारों से मनुष्यता का पाठ पढाता है ताकि वह सच्चे अर्थ में मनुष्य बन सके । शिष्य उस कच्ची मिट्टी की भांति ही होता है जिसे गुरु तराशता है ।
कबीर शास्त्र जनित ज्ञान का विरोध करते हैं । आज के समय में देखा जाय तो जिस शास्त्र जनित ज्ञान की बात की जा रही है, कबीर किसी भी दृष्टि से उस विचारधारा के पैरोकार नजर नहीं आते । कबीर शास्त्र से ज्यादा जीवनानुभव से सीखने पर बल देते हैं । आज शिक्षा व्यवस्था का बाजारीकरण हो गया है । गुरु की जगह शिक्षक ने और शिष्य की जगह छात्र ने ले लिया है । बदलते परिवेश में जिस तरह से लोग सिमटते जा रहें है उसी तरह गुरु, शिष्य जैसे शब्दों का भी अर्थ संकोच हो गया है । शिक्षा के व्यवसायीकरण ने शिक्षा को अप्राप्य बना दिया है ऐसे में एक बहुत बड़ा तबका शिक्षा से वंचित रह जाता है जिसके उन्मूलन के लिये सरकार को शिक्षा को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखना पड़ता है फिर भी स्थिति चिंतनीय है । आज की व्यवस्था में संबंधों का जो बदलाव आया है उसने गुरु–शिष्य के संबंधों को भी बदल कर रख दिया है । कबीर जिस गुरु की बात करते हैं वैसा गुरु इस दौर में मिलना मुश्किल है साथ ही जिस तरह का समर्पण भाव हम शिष्य में खोजते या चाहते हैं वह भी आज के दौर में मिलना मुश्किल है ।
कबीर का यह दोहा आज के दौर में कितना सटीक जान पड़ता है –
“जाका गुरु भी अंधला, चेला खड़ा निरंध ।
अंधा अंधा ठेलिया, दुन्यूं कूप पडंत ।।”
गुरु का काम है स्वयं आगे चलकर शिष्य का मार्गदर्शन करना । कबीर यहाँ व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि जिसका गुरु स्वयं अज्ञानी है उसका शिष्य तो घोर अज्ञानी होगा ही जब एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाता हुआ चलता है तो दोनों कुँए में गिर पड़ते हैं, अर्थात भवसागर में पड़े रहकर नष्ट हो जाते हैं । आज के सन्दर्भ में इस दोहे पर दृष्टिपात करें तो देख सकते हैं कि शिक्षकों और छात्रों की एक लम्बी फेहरिश्त हमें दिख जाती है जहाँ दोनों चाटुकारिता के शिकार हैं । इस चाटुकारिता के कारण शिक्षक और छात्र दोनों एक-दुसरे को छलते हुए नजर आते हैं । छद्म आस्था लिए छात्र की अवसरवादिता इस दौर में बढती ही जा रही है । ऐसे में कबीर जिस गुरु की बात करते हैं और एक शिष्य में जिस समर्पण भाव की वकालत करते हुए नजर आते है वह आज के परिवेश में विरले ही मिलते हैं ।
“कबीर गुर गरबा मिल्या, रलि गया आटै लूँण ।
जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण ।”
यानी यहाँ पर कबीर कहते हैं कि एक बार गुरु के गले लगाने से शिष्य की जाति-पाति कुल सब मिट जाता है । एक गुरु के लिए वह जाति–पाति, कुल ,गोत्र से ऊपर महज एक शिष्य रह जाता है । एक गुरु के लिए उसके सभी शिष्य एक समान हैं । किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसे गुरु का मिल पाना बहुत मुश्किल है । आज अधिकांश शिक्षक राजनीतिक संबंधों को साधने के चक्कर में दोहरे मापदंड अपनाते हैं जिसका खामियाजा अक्सर छात्रों को चुकाना पड़ता है । आज जाति का प्रश्न इतना हावी हो गया है कि छात्र और शिक्षक के संबंधों का निर्णय जाति-साम्य पर ज्यादा निर्भर करने लगा है ।
कबीर की दृष्टि में गुरु ‘गोविन्द’ से भी बढ़कर है क्योंकि –
‘हरि रुंठे गुरु ठौर है , गुरु रूंठे नहिं ठौर ।’
कबीर गुरु को ही सर्वप्रथम आदर-सम्मान देते हैं और गुरु रूपी प्रकाश से ही मानव जीवन का अंधकार दूर हो सकता है ऐसा मानते हैं । जब वे कहते हैं कि
“सुखिया सब संसार है खाए और सोए ।
दुखिया दास कबीर है गाए और रोए ।।”
तो इससे उनके विचारों में आधुनिक सभ्यता की मनोवृति का बोध होता है जो संसार को समरसता में देखना चाहता है । कबीर का ज्ञान-मार्ग आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था पर गहरी चोट करता है, हमें आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था को गुरु-शिष्य परम्परा के नि:स्वार्थ बंधन से देखना चाहिए ताकि समाज में भेदभाव की संस्कृति को दूर किया जा सके । जैसा कि कबीर कहते भी हैं –
“नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव ।
दुन्यूं बूड़े धार मैं, चढि पाथर की नाव ।।”
कबीर कहते हैं एक सच्चे गुरु और एक सच्चे शिष्य का होना जरूरी है, उनमें निःस्वार्थ भावना होनी चाहिए क्योंकि स्वार्थ रहित गुरु शिष्य का सम्बन्ध ही समाज के लिए बेहतर हो सकता है । आज के समय में हम देखते हैं कि छात्र अपने स्वार्थ हित देख कर एक ऐसे गुरु की तलाश करता है जो उसे ज्यादा लाभ पहुंचा सकता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाना चाहता है जिससे स्वार्थ हित सध सके और व्यावसायिक कारोबार चल सके । इस तरह शिक्षा एक व्यापार का माध्यम बनता जा रहा है और अंत में जो हमें देखने को मिलता है वह यह कि छात्र एक बनावटी चकाचौंध की दुनिया में भटकता रहता है । साथ ही, कबीर शिष्य के स्वभाव पर बात करते हुए कहते हैं कि
“सतगुर मिल्या त का भयाँ, जे मनि पाड़ी भोल ।
पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल ।।”
कबीर दोहे के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि एक सच्चा सतगुरु मिल भी जाए जो आज के समय में हमें राह दिखा सकता है तो भी शिष्य का मन मलिन होतो वह गुरु-ज्ञान का महत्त्व नहीं आँक पाएगा । यदि धूल में पड़कर कपड़ा ही मैला हो गया हो तो उसे रंगने वाली मजीठ लता भी बेचारी क्या कर सकती है ? कबीर अन्यत्र भी ज्ञान-साधना की सफलता के लिए योग्य शिष्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं –
“सतगुरु बहुरा क्या करै, जे सिषही मांहे चूक ।”
कबीर की प्रासंगिकता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि उन्हें हम वर्तमान दौर में भी शिक्षा जैसे विषयों से जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि आज का पूरा शिक्षातंत्र बाजारीकरण जैसे मूल्यों और रोजगार आदि से जुड़ गया है जिस कारण उसमें भक्तिकालीन परम्परा का बोध और गुरु-शिष्य की आदर्श भावना नहीं रह गई है । इन सब बातों के आधार से ही आधुनिक समय में भक्तिकालीन संत कवि कबीरदास का भावबोध झलकता है जिसमें हमें आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था को गुरु-शिष्य परम्परा के निःस्वार्थ बंधन से देखना चाहिए ताकि समाज में भेदभाव की संस्कृति को दूर किया जा सके । आज की आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में जो स्वार्थ भावना और गुरु के प्रति आस्था का प्रश्न व्यावसायिक तौर तरीकों में दीखता है वह सब नहीं होना चाहिए । यहीं से गुरु-शिष्य की परम्परा और शिक्षा-व्यवस्था की नवीन पहल की शुरुआत होती है । हमें इस दौर में कबीर के ‘गुरुदेव कौ अंग’ से आधुनिक दृष्टि में शिक्षा-व्यवस्था को समझने का मौका मिलता है, वर्तमान में इसी से गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी जैसा कि हम उनके दोहों में देखते हैं । कबीर इस रूप में ही गुरु-शिष्य परम्परा की भारतीय जमीन पर खड़े नजर आते हैं ।

संदर्भ ग्रंथ :
कबीर ग्रंथावली, सम्पादक – श्यामसुन्दर दास, वाणी प्रकाशन, संस्करण – 2014
कबीर – हजारी प्रसाद द्विवेदी , वाणी प्रकाशन ,2015
हिंदी साहित्य का इतिहास -आचार्य रामचंद्र शुक्ल , वाणी प्रकाशन,2007

राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएं यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियां, हासिल तथा अन्य कहानियां व वहां तक पहुंचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान, अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश,’‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। हिन्दी जगत में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने पर उन्हें जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। 28 अक्टूबर 2013  अपनी अंतिम सांस तक आपने  हंस का संपादन पूरी निष्ठा के साथ किया। हंस की उड़ान को इन ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय राजेन्द्र यादव को जाता है।

उदय शंकर

संपादन सहयोग
हंस में आई  कोई भी रचना ऐसी नहीं होती जो पढ़ी न जाए। प्राप्त रचनाओं को प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ने में उदय शंकर संपादक का   सहयोग करते  हैं । 
हिंदी आलोचक, संपादक और अनुवादक उदय शंकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े हैं। उन्होंने कथा-आलोचक सुरेंद्र चौधरी की रचनाओं को तीन जिल्दों में संपादित किया है। ‘नई कहानी आलोचना’ शीर्षक से एक आलोचना पुस्तक प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था।पिता थे मुंशी अजायब राय।शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन केनेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी देदिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके। उपन्यास हैं सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया। जब तक शरीर में प्राण रहे प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र,अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक मेंयह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्धसंपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई।

नाज़रीन

डिजिटल मार्केटिंग / सोशल मीडिया विशेषज्ञ
आज के बदलते दौर को देखते हुए , तीन साल पहले हंस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय होने का निर्णय लिया। उसके साथ- साथ हंस अब डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया में भी प्रवेश कर चुका है। जुलाई 2021 में हमारे साथ जुड़ीं नाज़रीन अब इस विभाग का संचालन कर रही हैं। वेबसाइट , फेस बुक, इंस्टाग्राम , ट्विटर जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से ये हंस को लोगों के साथ जोड़े रखती हैं। इन नए माध्यमों द्वारा अधिक से अधिक लोगों को हंस परिवार में शामिल करने का दायित्व इनके ऊपर है।

प्रेमचंद गौतम

शब्द संयोजक
कोरोना महामारी में हमसे जुदा हुए वर्षों से जुड़े हमारे कम्पोज़र सुभाष चंद का रिक्त स्थान जुलाई 2021 में प्रेमचंद गौतम ने संभाला। हंस के सम्मानित लेखकों की सामग्री को पन्नों में सुसज्जित करने का श्रेय अब इन्हें जाता है । मुख्य आवरण ले कर अंत तक पूरी पत्रिका को एक सुचारू रूप देते हैं। इस क्षेत्र में वर्षों के अनुभव और ज्ञान के साथ साथ भाषा पर भी इनकी अच्छी पकड़ है।

दुर्गा प्रसाद

कार्यालय व्यवस्थापक
पिछले 36 साल से हंस के साथ जुड़े दुर्गा प्रसाद , इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं की कार्यालय में आया कोई भी अतिथि , बिना चाय-पानी के न लौटे। हंस के प्रत्येक कार्यकर्ता की चाय से भोजन तक की व्यवस्था ये बहुत आत्मीयता से निभाते हैं। इसके अतिरिक्त हंस के बंडलों की प्रति माह रेलवे बुकिंग कराना , हंस से संबंधित स्थानीय काम निबाटना दुर्गा जी के जिम्मे आते हैं।

किशन कुमार

कार्यालय व्यवस्थापक / वाहन चालक
राजेन्द्र यादव के व्यक्तिगत सेवक के रूप में , पिछले 25 वर्षों से हंस से जुड़े किशन कुमार आज हंस का सबसे परिचित चेहरा हैं । कार्यालय में रखी एक-एक हंस की प्रति , प्रत्येक पुस्तक , हर वस्तु उनकी पैनी नज़र के सामने रहती है। कार्यालय की दैनिक व्यवस्था के साथ साथ वह हंस के वाहन चालक भी हैं।

हारिस महमूद

वितरण और लेखा प्रबंधक
पिछले 37 साल से हंस के साथ कार्यरत हैं। हंस को देश के कोने -कोने तक पहुँचाने का कार्य कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। विभिन्न राज्यों के प्रत्येक एजेंट , हर विक्रेता का नाम इन्हें कंठस्थ है। समय- समय पर व्यक्तिगत रूप से हर एजेंट से मिलकर हंस की बिक्री का पूरा ब्यौरा रखते हैं. इसके साथ लेखा विभाग भी इनके निरीक्षण में आता है।

वीना उनियाल

सम्पादन संयोजक / सदस्यता प्रभारी
पिछले 31 वर्ष से हंस के साथ जुड़ीं वीना उनियाल के कार्यभार को एक शब्द में समेटना असंभव है। रचनाओं की प्राप्ति से लेकर, हर अंक के निर्बाध प्रकाशन तक और फिर हंस को प्रत्येक सदस्य के घर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में इनकी अहम् भूमिका है। पत्रिका के हर पहलू से पूरी तरह परिचित हैं और नए- पुराने सदस्यों के साथ निरंतर संपर्क बनाये रखती हैं।

रचना यादव

प्रबंध निदेशक
राजेन्द्र यादव की सुपुत्री , रचना व्यवसाय से भारत की जानी -मानी कत्थक नृत्यांगना और नृत्य संरचनाकर हैं। वे 2013 से हंस का प्रकाशन देख रही हैं- उसका संचालन , विपणन और वित्तीय पक्ष संभालती हैं. संजय सहाय और हंस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हंस के विपणन को एक आधुनिक दिशा देने में सक्रिय हैं।

संजय सहाय

संपादक

प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी इच्छा थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

संजय सहाय लेखन की दुनिया में एक स्थापित एवं प्रतिष्ठित नाम है। साथ ही वे नाट्य निर्देशक और नाटककार भी हैं. उन्होंने रेनेसांस नाम से गया (बिहार) में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जिसमें लगातार उच्च स्तर के नाटक , फिल्म और अन्य कला विधियों के कार्यक्रम किए जाते हैं.