अपनी ज़मीन

मेरे घर के इर्द गिर्द
कई पेड़ हैं
मोहगनी,शीशम,नारियल,
आम,नीम और नीलगिरी का वृक्ष है ।
जिनमें कुछ लंबे -चौड़े हैं
तो कुछ छोटे और बौने हैं।
जो अपनी अपनी जगह विद्यमान हैं,
उनमें न कोई राग है न द्वेष है
न वर्ण है न भेद है
जीवन अभी सावशेष है,
पर जब-जब हवा
आँधियों में बदलकर
वहाँ से गुजरती है
तो एक विभत्स दृश्य सामने आता है
बड़े पेड़ छोटे पौधों पर
कुछ इस तरह झपटते हैं
जैसे पूंजीपति,मजदूर पर
पुरूषपशु अबला पर
बलशाली कमजोर पर।
पर वे भूल जाते हैं
उनका आधार और
उनके अस्तित्व को
छोटे पौधे ही अपनी
जड़ों से बांध कर रखते हैं।

आँधियाँ सिर्फ विनाशकारिणी ही नहीं,
क्रान्तिवाहिनी भी होती हैं
जो उखाड़ फेंकेंगी
इन बड़े वृक्षों को
उनकी जड़ो से,
जो छोटे पौधों को बढ़ने नहीं देती और
रह जाएंगे सिर्फ ये छोटे पौधे ही,
अपनी ज़मीन पर
अपने होने का प्रमाण लिये

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