चलूँ?

चलूँ? तुम मुझसे मिले हो आज जब मेरे किनारे खुरदरे हैं,जब मैं शायद जूझ रही हूँ, मेरी सतह ढूँढ रही हूँ.तुम्हें मेरा खुद से झगड़ना रास नहीं आता,मेरा लाइब्रेरी के कोने में अकेले बैठना नहीं भाता.मेरा सोच में डूबे रहना तुम्हें अखरता है,मेरी उड़ने की चाहत से भी शायद तुम्हारा मन बिखरता है.तुम चाहते हो मैं हर बात को ज़हन में दफना लूँ,झूठी हंसी-ठिठोली की दिखावट अपना लूँ..मगर कैसे?मैं आचरण पर बनावट का आवरण ओढ़ लूँ?खुद को छलूँ, अपने ही सच से मुँह मोड़ लूँ?मतभेद में जीने लगूँ, खुद से तार तोड़ लूँ?नहीं. मुझे अकेलेपन की आदत हो गई है.दुनियादारी अब मुझे समझ नहीं आ आती,भीड़ में मैं ज्यादा चल नहीं पाती.मैं बस अपने ही में खो कर रह लेती

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