भोर का भय

डर तो उसे रात के अंधेरे से बहुत लगता था किंतु तभी जब वह कोई आम दिन होता। आज रात के अंधेरे से ज़्यादा होने वाले दिन के सूरज के सामने वो खुद को पिंघलता देख रही थी।आने वाली रौशनी अपने साथ बहुत सारी आंखें, बांते और सब सुनते कान लाने वाली थी। नींद ना आने का कोई गम नहीं था क्योंकि वो तो माँ के साथ ही घर छोड़ जा चुकि थी। माँ का ना होना खटकता तो था पर ज़्यादा चुभन इस बात की थी कि वो अकेले चली गयी। जिम्मेदारियां कमज़ोर शरीर पर एेसी गिरी जैसे पानी से भरे खेत में बारिश, ना मांगा था और ना ज़रूरत थी। पर जीवन हमेशा से खराब ना था, एक

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नीचे का खुदा

नीचे का खुदा (लघुकथा) दोनों सिपाहियों की ड्यूटी थी ,वो दोनों स्नाइपर थे और वो दोनों दुश्मनों के निशाने पर भी थे ।आबिद और इकबाल।वैसे इकबाल हिन्दू था और नाम था इकबाल सिंह ,जबकि आबिद का नाम आबिद पटेल था ।इकबाल को सब इकबाल कहकर ही बुलाते थे ताकि लोगों को लगे के वो मुसलमान है क्योंकि वो शक्ल सूरत और रवैये से पठान नजर आता था ,जबकि आबिद को लोग पटेल कहकर बुलाते थे ताकि उसे लोग हिन्दू समझें ।ये एक किस्म की मसखरी थी जो पूरे यूनिट के लोग किया करते थे।दोनों बन्दे टॉप स्नाइपर्स थे और एक दूसरे के अच्छे दोस्त भी ।किसी दंगाग्रस्त क्षेत्र में उन दोनों ने तमाम बलवाइयों को चुन चुन कर मारा था।तनाव

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इवेंट मैनेजमेन्ट कम्पनी

इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी (लघुकथा) वो पढ़ा लिखा था ,दिल्ली में एक वाइट कालर जॉब के लिये एक मुद्दत से प्रयासरत था ।शाहदरा से रोहिणी तक उसने अपना बॉयोडाटा दे रखा था नौकरियों के लिये।सुबह वो आनन्द विहार से मेट्रो पकड़ लेता था और गुड़गांव तक जाता था बाज़ार की हर जरूरत के अनुसार उसने ट्रेनिंग ली थी ,अंग्रेजी बोलने से लेकर कंप्यूटर पर काम करने तक लेकर।।मगर दिल्ली में नौकरियां रहीं ही नहीं थीं , ब्लू कॉलर वाले जॉब निकल रहे थे ,कामगारों के लिये ही रोजगार थे ,डिग्री वाले बेकार थे ,,दिल्ली में नौकरियां थीं ही नहीं लेकिन नौकरियों के तलबगार बेइन्तहा थे।हरिओम ने घर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने के लिये प्रयास किये लेकिन दिल्ली में बच्चों पर बढ़ते

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पॉपकॉर्न देशभक्ति

पॉपकॉर्न देशभक्ति ~~~दिलीप कुमार ———————-जुलूस में पहुँचने से पहले वनिता राव ने ब्यूटी पार्लर जाने का इरादा कर लिया।उन्होंने ब्यूटी पार्लर में अपनी रंगत दमका ली।उनके चेहरे पर युवतियों जैसी लालिमा आ गयी जबकि उन्होंने अपनी पोती को डॉक्टर के घर ले जाने का प्रोग्राम मुल्तवी कर दिया था क्योंकि आज उन्हें शहीदों के सम्मान में निकाली जाने वाले जुलूस में शामिल होना था।जबसे कश्मीर में हमला हुआ तब से उनकी देशभक्ति हिलोरें मार रही थी।उन्होंने रक्त दान के शिविर आयोजित करवाये ,मग़र खुद रक्तदान नहीं किया ,अलबत्ता रक्तदान करने की अवस्था की फ़ोटो जरूर फेसबुक पर अपलोड कर दी।उनके चेहरे पर लालिमा कुछ ज्यादा ही लग रही थी मेकअप की सो उन्होंने मुँह के क्रीम को पोंछ डाला ।अरे

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काफिर बच्ची

काफ़िर लड़की पौ फटने वाली थी, पर अँधेरे ने रात का दामन अभी भी नहीं छोड़ा था। उन दोनों  के बार्डर पार करने का यही सबसे मुफीद वक्त था, जब फौजी दरयाफ्त कम से कम होती थी। हाड़ कंपाती ठंड मे एक ने दूसरे से पूछा – “अमजद, तूने सच मे गोली मारी थी उस लड़की को ?” दूसरे ने ठंडे स्वर मे कहा -“हाँ शुबेह, तुम्हें शक क्यों  है ? ये मेरी अहद थी, सो मैंने किया। ” शुबेह को उस पर यकीन न हुआ उसने पूछा,-“पर तू तो कह रहा था कि उस लड़की ने तुझे फौजियों से उस रात छुपाया था, फिर कत्ल कैसे किया तूने उसका ? हाथ न काँपा तेरा ?” अमजद झल्लाते हुए बोला- 

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सरनेम

सरकारी बैंक में कार्यरत सुयश कुमार के स्थानंतरण के दो महीने हो चुके थे, परंतु किराये का मकान उसे अभी तक नहीं मिला था, जबकि उसने यहाँ ज्वाइन करते ही सभी सहकर्मियों, वेंडरों व खास ग्राहकों को मकान खोजने के लिये कह दिया था । सुबह की हवा थी इसलिये ठंढक महसूस हो रही थी । आर के त्रिपाठी ने चाय की अंतिम घूंट ली और पाठक जी के घर की ओर चल पड़ा, उसने सुयश कुमार को जल्द ही मकान खोजने का आश्वासन दिया था । उसे पता चला था कि पाठक जी के मकान के उपर के तल का हिस्सा खाली था । “ पाठक जी, आपके घर के उपर वाला हिस्सा खाली है क्या ? हमारे कर्यालय

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सुपरस्टार

सीन गरमागरम था जाहिर है, गीत के बोल भी उत्तेजक थे धुन भी उसी के अनुरूप मादक और नशीली. बॉलीवुड के सुपरस्टार रौशन कुमार बारिश से अपादमस्तक भीगी हीरोइन की अनावृत्त कमर और गीली साड़ी में उभरे नितंब के बीच अपनी दोनों हथेलियों को टिकाए अपना चेहरा उसकी नाभि से रगड़ते हुए ऊपर की ओर ले जा रहा था. क्लोजअप में हीरोइन के लरजते होंठ दिखने लगे सुपरस्टार के फड़कते होंठ उससे जा मिले. इधर बारिश की फुहार, उधर चुंबनों की बौछार. फिल्म के प्रीमियर शो में रौशन कुमार की पत्नी और बॉलीवुड की ही प्रख्यात अभिनेत्री जयमाला भी मौजूद थीं. हॉट सीन उनकी आंखों में चुभ रहे थे. चेहरे पर किस्मकिस्म के भावों की आवाजाही जारी थी. फिल्म की

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