रजोनिवृत्ति की ओर…

लोग कहते हैं मुझे, कुछ अजीब सी हो गई हूँकुछ नहीं दोस्तों बस, थोड़ी मनमौजी सी हो गई हूँयाद है मुझे आज भी वो दिन भली-भांति,तेरे आगमन से शुरू हो गई थी,मेरे भीतर भी वो नारीत्व की एक कलाकृति कितना अटूट रिश्ता रहा हमारा,तक़रीबन तीस सालों काएक अभिन्न मित्र की तरह साथ निभाया तूने,बिना किसी इन्तज़ार के हर माह आकर  एक हलका-सा  दर्द की दस्तक भी दे देता था तू! अब  तुझसे विदाई का आ गया है समय,मेरे साथ खेल रहा है तू आंख-मिचौली मुझे खबर है और कुछ नहीं बस,छेड़ रहा है मुझे तू  कभी मेरी मनोदशा को झूला-झुलाकर तोकभी मुझमें बिजली की तरंगें पैदाकर,कभी सर्दी में गर्मी तो कभी गर्मी में सर्दी का एहसास दिलाकर,कभी मेरी त्वचा को एकदम खुश्क

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