उतरन

एक कुर्ती निकली अलमारी से अपनी कुछ पुरानी-सी कुछ बेरंग-सी थोड़ी फटी थी और थोड़ी गई थी उधड़ अलमारी से निकाल पटक दिया उसे ज़मीं पर इस सोच के साथ कि- मुझ पर नहीं फबेगी अब ये… मेरे घर के पीछे एक छोटी झोपड़ी में रहती है एक लड़की चेचक के दाग़ से भरा हुआ है चेहरा उसका हमउम्र होगी शायद या कुछ छोटी तो मैंने अपनी वो फटी हुई कुर्ती देदी उसे मैं नहीं पहन सकती, पर वो तो पहन सकती है फिर दिन बीतते गए और मैं भूल गई उस कुर्ती को… एक रोज़ मैंने देखा उस लड़की को कितने करीने से संवरे हैं बाल उसके आज आँखों में काजल है, माथे पर बिंदी, झुमके भी पहने हैं,

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राजीव कुमार तिवारी की कविताएं

जो हूं और जो होना चाहता था कहां होना था मुझकोजहां हूंया जहां होना चाहता था मैंक्या इस प्रश्न का उत्तरकिसी के पास है कोई ?जहां हूंऔर जहां होना चाहता थाके मध्य जो संघर्ष हैक्या जीवनउसी से रूप और आकर नहीं पाता है ?समय जो चित्र बनाता है हमाराउसमें हर रंग हर रस का मिश्रण होता हैपर प्रकट कभी कोई विशेषरस या रंग ही होता हैक्या यही पाने और चाहने के मध्य के खींच तान में हमारी उपलब्धि है ?जहां प्रवाह रुक गया नदी जल काजो होना चाहता थावो जो हूंभर रह गयाअपने वर्तमान से अवकाश लेकरसमय की किताब मेंफिर लौटना चाहता हूंउसी अनुच्छेद तकऔर उन तमाम अवरोधों कोहटाने की एक और कोशिश करना चाहता हूंताकि जो हूं कोजो होना

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कविताएं

आत्महत्या हाँ जीवन कभी कभीबहुत कठिन हो जाता हैरास्ता कोई नहीं सूझताहताशा, उदासी और कुंठा कीपकड़ से छूटने कामन के घुप्प अंधेरे जंगल सेबाहर निकलने कादर्द और दुख के दलदल मेंडूबती जाती हैपल पल जिजीविषाकोई नहीं होता इतने पासजिससे कहकर मन की बातसंघनित पीड़ा कोवाष्पित किया जा सकेजिसके कांधे पे रख के सरस्वयं को भुला जा सके पूरी तरहदूर बहुत दूर तकदृष्टि में नहीं होताउत्साह उमंग और आनंद का फैलाव जबउस काल खंड में भीस्वीकारना चाहिए जीवन कोउसकी संपूर्णता मेंउसके चूभते कोणों को सहते हुएजीवन सिर्फ अपने लिए नहींदूसरों के लिए भी हैबल्कि दूसरों के लिए ही ज्यादा हैबहुत बार हमनाव के सवार होते हैंमल्लाह के भरोसेसागर पार हो जाते हैंपर कई बार हमेंमल्लाह भी होना होता हैदूसरों को पार

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कविताएँ

1.कविता विश्वकर्मा है…! कवि नहीँ बनता पहले पहले बनती है कविता! कविता के पकने पर कवि का होता है जन्म। कविता एक फल है कवि उसकी मिठास है। प्रकृति की हर कमी को कविता अंततः भर देती है, जहाँ-जहाँ भी किसी कवि की जरूरत होगी कविता स्वतः वहाँ-वहाँ किसी कवि को जन्म दे देगी प्रकृति और जीवन के मध्य जो खालीपन है उसे कविता पाट देती है कविता मन-महलोँ की विश्वकर्मा है। *********** 2.पिता से बात……! पिता से बात करते हुए ऐसा लगता है जैसे आसमान से बात करना। आसमान जानता है संसार की सारी बातें इसलिए पिता से बात करते हुए मैं सारे संसार से मिल लेता हूँ। संसार घूमने से अच्छा है पिता के साथ घूम लेना। पिता

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अपनी ज़मीन

मेरे घर के इर्द गिर्द कई पेड़ हैं मोहगनी,शीशम,नारियल, आम,नीम और नीलगिरी का वृक्ष है । जिनमें कुछ लंबे -चौड़े हैं तो कुछ छोटे और बौने हैं। जो अपनी अपनी जगह विद्यमान हैं, उनमें न कोई राग है न द्वेष है न वर्ण है न भेद है जीवन अभी सावशेष है, पर जब-जब हवा आँधियों में बदलकर वहाँ से गुजरती है तो एक विभत्स दृश्य सामने आता है बड़े पेड़ छोटे पौधों पर कुछ इस तरह झपटते हैं जैसे पूंजीपति,मजदूर पर पुरूषपशु अबला पर बलशाली कमजोर पर। पर वे भूल जाते हैं उनका आधार और उनके अस्तित्व को छोटे पौधे ही अपनी जड़ों से बांध कर रखते हैं। आँधियाँ सिर्फ विनाशकारिणी ही नहीं, क्रान्तिवाहिनी भी होती हैं जो उखाड़ फेंकेंगी

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रोहित प्रसाद पथिक की कविताएँ

।। कविताएँ ।। 1. तुम मर तो नहीं सकते हो ! जहां से क्लियर होता है ब्रह्मांड जहां सिर्फ मौत के पौधे उगते हैं आहिस्ता-आहिस्ता वचन को पढ़कर तुम एक देश नहीं बदल सकते मैं जानता हूं काले विचारों से होकर युद्ध करना होगा तुम्हें क्योंकि विचार फक्कड़ है फिर तुम्हें एक विशालकाय बीज से भी मौत के स्वर बदलने होगें एकमात्र बची रहेगी यह धूसर जमीन तुम ध्वस्त करने तो निकल गए हो लेकिन एड़ी को मजबूत कर लेना ईट को लोहा बनाकर लाठियों से प्रेम करना किताबों में लिखे शब्दों को बुलाकर नई किताबों को लिखना क्योंकि हर पांडुलिपि धोखेबाज होती है तुम अब तक लड़ रहे थे अपने वजूद के लिए अचानक तुम्हारा मस्तिष्क एकांत हाथों में

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एक मात्रा का बोझ

सिखाये गये उन्हें धीरे धीरे बढ़ाते हुए रोटी को पूरा गोल आकार देने के नियम भले ही मायने नहीं रखता रोटी का गोल होना पेट की आग के लिए पूरे चाँद में छिपा उसकी गोलाई का सिद्धांत बताया नहीं गया उन्हें कभी भी चारदीवारी के बाहर कदम रखने के नियमों की घुट्टी ख़ुराक दर ख़ुराक दी जाती रही उन्हें हर रोज़ देह में धसती आँखों को अपने नोंकदार नाखूनों से नोंच कर फेंकने की कला सिखाई नहीं गयी उन्हें कभी भी कर्तव्यों की वेदी में स्वाह होने की सारी विधाएं रच दी गयीं उनके मन मस्तिष्क की दीवारों पर कभी नहीं थमाया गया उन्हें अधिकारों का वो पन्ना जिससे सुलगती चिंगारी को दी जा सके दहकते अंगार में बदलने को

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शुभ दीवाली होगी

शुभ दीवाली होगी मन का तिमिर जब मिट जाएगा तन का भेद जब सिमट जाएगा प्रस्फुटित होगा जब ज्ञान प्रकाश अमावस में भी चमकेगा आकाश घर घर में जब खुशहाली होगी समझना तब शुभ दिवाली होगी। जब नौजवानों का उमंग खिलेगा दिल से दिल का जब तरंग मिलेगा नव सर्जन का जब होगा उल्लास शब्द अलंकारों का होगा अनुप्रास। जब मस्ती अल्हड़ निराली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। हर हाथ को जब काम मिलेगा हर साथ को जब नाम मिलेगा कर्ज में डूबकर ना मरे किसान फ़र्ज़ में पत्थर से न डरे जवान जीवन में ना जब बदहाली होगी समझना तब शुभ दीवाली होगी। भूखमरी, गरीबी और बेरोजगारी इससे बड़ी कहाँ और है बीमारी इन मुद्दों का जब भी

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तम्मना

पंखो की उडान से सारा आसमा नाप लूं, तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | अंधियारा है घना, वजूद है छिप रहा, जुगनू बन कर आज मैं, रोशनी फैला दूं……. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | चीख भी दब रही आज , पटाखे की आवाज में, लक्श्मी के दीपक की लौ बन, जहां ये जगमगा दूं….. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | है बेटा कुल दीपक तो, बेटी भी ‘पूजा’ लायक है, बन काबिल जमाने की, सोच को संवार दूं…. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं |

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