अधूरा ख्वाब

एक आहट-सी सुनी थी मैंनेपीछे मुड़ के देखा भी था … वहां उस वक्त तो कोई नहीं था पर उस आहट में कुछ तोदिखा था,शायद सिर्फ़ एक परछाई यामहज़ एक कल्पना मात्र या शायद किसी का वो अधूरा ख्वाबजो उस अंधेरी रात में भी कहींकोने में बैठा जुगनू की तरहचमक रहा था ।।

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