हंस पत्रिका – अगस्त अंक – 2019 ( जलियांवाला बाग़ : शताब्दी वर्ष )

30.00

जलियांवाला बाग़ की घटना के सौ बरस बीत गए हैं. इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो जीवन के एक पहलू में घटती हैं लेकिन उसका असर जीवन के तमाम पहलुओं पर पड़ता है.
इस अंक में हम उस त्रासदी के रचनात्मक असर पर एक दृष्टि डाल रहे हैं. उस एक घटना ने हमारे देश में लेखन पर जो असर डाला उसके कुछ रूपों को सामने ला रहे हैं, आखिर एक साहित्यिक पत्रिका होने के चलते हमारा ताल्लुक तो लेखन से ही है. इसमें एक बड़ा हिस्सा ऐसे लेखन का है जो अपने हुक्मरानों के लिए ऐसा खतरा बन गया था कि उसे तत्काल जब्त कर लिया गया. साहित्यकारों का एक बड़ा तबका तात्कालिक लेखन को दोयम दर्ज़ का लेखन मानता है और खास कर ऐसी राजनीतिक घटनाओं से प्रेरित लेखन को.
दूसरी ओर कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता लेखन को बैठे-ठाले का काम मानते हैं और राजनीतिक कर्म के मुकाबले हीनतर कार्य समझते हैं. जलियांवाला बाग पर हुए लेखन से गुजरते हुए हमें इस बायनरी से निकलने की राह मिल सकती है.
(बलवंत कौर / विभास वर्मा)

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