बिहार हूँ मैं।

चाणक्य की नीति हूँ , आर्यभट्ट का आविष्कार हूँ मैं ।महावीर की तपस्या हूँ , बुद्ध का अवतार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।। सीता की भूमि हूँ , विद्यापति का संसार हूँ मैं।जनक की नगरी हूँ, माँ गंगा का शृंगार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।। चंद्रगुप्त का साहस हूँ , अशोक की तलवार हूँ मैं।बिम्बिसार का शासन हूँ , मगध का आकार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।। दिनकर की कविता हूँ, रेणु का सार हूँ मैं।नालंदा का ज्ञान हूँ, पर्वत मन्धार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं। वाल्मिकी की रामायण हूँ, मिथिला का संस्कार हूँ मैंपाणिनी का व्याकरण हूँ , ज्ञान का भण्डार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं। राजेन्द्र का सपना हूँ, गांधी की हुंकार हूँ

Read more

ज़िंदगी

वक़्त रेल की पटरी सा होता है, जो ज़िंदगी को टेढ़े-मेढे रास्तों से ले जा कर मंजिल तक पहुंचा ही देता है। और जिंदगी होती है गाड़ी की तरह। धीमी गति से शुरू होती है फिर धीमे-धीमे स्पीड पकड़ती है, फिर कोई स्टेशन आ जाता है फिर रुक जाती है। फिर धीमी गति से चलना शुरू होती है फिर कोई स्टेशन आ जाता है और वह फिर रुक जाती है। और फिर से अगले स्टेशन की ओर गति बढ़ाती चल पड़ती है। मज़े की बात तो यह है कि हर स्टेशन की कोई कहानी होती है, हर स्टेशन पर गाड़ी का रुकना जरूरी होता है। ज़िंदगी अगर एक्सप्रेस गाड़ी की तरह बिना रुके एक ही गति से सीधा मंजिल पर

Read more

खर्चापानी

चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही जनता यकायक महत्वपूर्ण हो उठी । साधारण लोग जो मिनिस्टर, नेताओं, अफसरों के पीछे छोटे-बड़े काम के लिये चप्पल घिसा करते थे, इस समय पासा पलट जाता है, आज उनके पीछे बड़े-बड़े नेता और राजनैतिक पार्टियाँ घूम रहीं थीं । वे शक्ति पाने के लिये प्रजा के दरबार में चक्कर लगा रहे थे । प्रजातंत्र की यही सबसे बड़ी खूबी है, सत्ता के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को जनता के आंगन में आना ही पड़ता है । इस समय चतुर राजनैतिक पार्टियाँ जनता को गाय के समान समझने लगतीं हैं, जिसे दूहने के लिये वे तरह–तरह का चारा फेंकती हैं । कोई पार्टी उन्हें भविष्य का सुनहरा सपना दिखाती है तो कोई उपहार बाँटती है,

Read more

Ghazal

बलजीत सिंह बेनाम ग़ज़लजब मोहब्बत से भरे ख़त देखनाभूल कर भी मत अदावत देखना साँस लेते लेते दम घुटने लगेइस क़दर भी क्या अज़ीयत देखना मसअला दुनिया का छेड़ो बाद मेंपहले अपने घर की इज्ज़त देखना ज़हन से जो हों अपाहिज़ आदमीवो मोहब्बत में सियासत देखना झूठ को सच में बदलते किस तरहये कभी आकर अदालत देखना

Read more

ग़ज़ल

क़ुरबतों की रुत सुहानी लिख रहा है बात वो सदियों पुरानी लिख रहा है साहिलों की रेत पर मौजों से आख़िर कौन हर लम्हा कहानी लिख रहा है पत्थरों के शह्र से आया है क्या वो मौत को जो ज़िंदगानी लिख रहा है शोर साँसों का मचाकर हर बशर क्यूँ अपने होने की निशानी लिख रहा है उम्र भर था जो रहा भरता ख़ज़ाने ज़िन्दगी को आज फ़ानी लिख रहा है अस्ल में बेरंग करता है धरा को लिखने को बेशक़ वो धानी लिख रहा है है यही तासीर चाहत की ‘सिफ़र’ क्या आग को भी दिल ये पानी लिख रहा है

Read more

काफिर बच्ची

काफ़िर लड़की पौ फटने वाली थी, पर अँधेरे ने रात का दामन अभी भी नहीं छोड़ा था। उन दोनों  के बार्डर पार करने का यही सबसे मुफीद वक्त था, जब फौजी दरयाफ्त कम से कम होती थी। हाड़ कंपाती ठंड मे एक ने दूसरे से पूछा – “अमजद, तूने सच मे गोली मारी थी उस लड़की को ?” दूसरे ने ठंडे स्वर मे कहा -“हाँ शुबेह, तुम्हें शक क्यों  है ? ये मेरी अहद थी, सो मैंने किया। ” शुबेह को उस पर यकीन न हुआ उसने पूछा,-“पर तू तो कह रहा था कि उस लड़की ने तुझे फौजियों से उस रात छुपाया था, फिर कत्ल कैसे किया तूने उसका ? हाथ न काँपा तेरा ?” अमजद झल्लाते हुए बोला- 

Read more

सरनेम

सरकारी बैंक में कार्यरत सुयश कुमार के स्थानंतरण के दो महीने हो चुके थे, परंतु किराये का मकान उसे अभी तक नहीं मिला था, जबकि उसने यहाँ ज्वाइन करते ही सभी सहकर्मियों, वेंडरों व खास ग्राहकों को मकान खोजने के लिये कह दिया था । सुबह की हवा थी इसलिये ठंढक महसूस हो रही थी । आर के त्रिपाठी ने चाय की अंतिम घूंट ली और पाठक जी के घर की ओर चल पड़ा, उसने सुयश कुमार को जल्द ही मकान खोजने का आश्वासन दिया था । उसे पता चला था कि पाठक जी के मकान के उपर के तल का हिस्सा खाली था । “ पाठक जी, आपके घर के उपर वाला हिस्सा खाली है क्या ? हमारे कर्यालय

Read more

पत्ते पीले पड़ गए

समय से समर में, ये बूढ़ा भी हार गया आज… पत्त्ते पीले पड़ गए इसके… जब छोटा था मैं, ये भी मेरे जैसा ही था। साथ बड़े हुए हम। पर आज इसके सामने तिनके जैसा हूँ मैँ। इतना विशाल होकर भी काँप रहा ये आज… पत्ते पीले पड़ गए इसके… इसने हर मौसम की मार झेली है। अपने सौतेले भाई को मरते हुए भी देखा है इसने। बस देख न सका ये अंत अपना.. पत्ते पीले पड़ गए इसके… कभी सुनाता था अपनी मजबूती के किस्से मुझको। आज मेरा ही सहारा ढूंढ रहा है। पक्षी भी अनाथ कर चल दिए इसको। दीमकों को अब ये किराया दे रहा है… पत्ते पीले पड़ गए इसके… लोग अपना चूल्हा तैयार कर रहे

Read more

ख़ामोशियों के स्वर

” टन-टन-टन-टनन…।” छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे कंधों पर अपना – अपना स्कूल बस्ता लिए क्लास से बाहर निकलते हैं। पूरा कैंपस उनके शोर से भर जाता है….. मस्ती में हँसते-खिलखिलाते, एक-दूसरे से बातें करते बच्चे….अपने – अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते हैं। दिन भर बच्चों से भरा रहने वाला स्कूल कैम्पस देखते-ही-देखते खाली होने लगता है…… मासूम हँसी – खुशी और जिंदगी का रेला मेन गेट से बाहर निकल जाता है, और छोड़ जाता है – सन्नाटा, अकेलापन और पहाड़ियों में गूंजती ख़ामोशी का स्वर। ” माउन्टेन व्यू “- उत्तराखंड के चमोली जिले में औली हिल स्टेशन पर शहर से दूर एक स्कूल, जिसने इन पाँच वर्षों में ही राज्य के शीर्ष स्कूलों में जगह बना ली

Read more